आसान शब्दों में
शोधकर्ताओं ने बहुत-सी चेहरों की तस्वीरों से एक कंप्यूटर प्रोग्राम को सिखाया कि वह चेहरे की दिखने वाली उम्र और कैंसर के मरीज़ों के बचने की संभावना का अंदाज़ा लगाए। कुछ समूहों में उसके अनुमान मौत के जोखिम से जुड़े दिखे, लेकिन इससे किसी एक व्यक्ति का भविष्य नहीं जाना जा सकता। अस्पतालों में इस्तेमाल से पहले इस तरीके की और जाँच ज़रूरी है।
चेहरे को देखकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश
डॉक्टर मरीज़ की जाँच और मेडिकल रिकॉर्ड के साथ-साथ कभी-कभी उसकी सामान्य हालत, ऊर्जा और कमज़ोरी पर भी ध्यान देते हैं। इससे उन्हें इलाज के विकल्पों, जैसे सर्जरी, कीमोथेरेपी या रेडिएशन, और ज़रूरी देखभाल के बारे में सोचने में मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा आकलन डॉक्टर के अनुभव और नज़रिए पर निर्भर करता है, इसलिए अलग-अलग डॉक्टरों के निष्कर्ष अलग हो सकते हैं।
रे मैक के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने यह परखने की कोशिश की कि क्या कंप्यूटर चेहरे की तस्वीरों में ऐसे पैटर्न पहचान सकता है जो केवल देखकर पकड़ना मुश्किल हो। मैक मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम कैंसर संस्थान में कैंसर के रेडिएशन उपचार के विशेषज्ञ हैं। इस तरीके का मकसद डॉक्टर की जगह लेना नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त संकेत देना था, जिसे बाकी चिकित्सकीय जानकारी के साथ देखा जा सके।
शुरुआत में प्रोग्राम को करीब चार करोड़ चेहरों की तस्वीरों से सामान्य पैटर्न सीखने दिए गए। फिर उसे दो कामों के लिए तैयार किया गया: चेहरे की दिखने वाली जैविक उम्र का अनुमान लगाना और कैंसर के मरीज़ों की तस्वीरों से उनके बचने की संभावना से जुड़ा संकेत देना। यहाँ जैविक उम्र का मतलब पहचान-पत्र में दर्ज उम्र नहीं, बल्कि चेहरे के रूप से निकाला गया अनुमान है। यह व्यक्ति की असली उम्र से मेल खाए, ज़रूरी नहीं।
मरीज़ों की तस्वीरों से क्या पता चला?
कैंसर के ३,८२० मरीज़ों के समूह में शोधकर्ताओं ने जोखिम के अलग-अलग स्तर बनाए। इनमें से १२२ मरीज़ सबसे ऊँचे स्तर में आए और उनकी तस्वीरें लेने के बाद के ९० दिनों में ६४ की मृत्यु हो गई। इससे पता चलता है कि इस समूह में ऊँचे अंक कम समय में मृत्यु की अधिक दर से जुड़े थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि ऊँचे अंक पाने वाले हर मरीज़ की मृत्यु होगी, या अंक ही उसके साथ हुई घटना की वजह बताते हैं।
एक अलग और बड़े अध्ययन में ३८,००० से अधिक मरीज़ शामिल थे। वहाँ भी एक संबंध दिखा: जिन लोगों के चेहरे कंप्यूटर के अनुमान में उनकी असली उम्र से अधिक उम्र के लग रहे थे, उनमें कुल मिलाकर मृत्यु का जोखिम ज़्यादा था। यह आँकड़ों में दिखा एक रुझान है, हर व्यक्ति पर लागू होने वाला पक्का नियम नहीं। बहुत-से लोगों के औसत नतीजों से किसी एक मरीज़ के बारे में निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
शोधकर्ताओं के अनुसार, चेहरे की अनुमानित उम्र और बचने की संभावना से जुड़ा अंक, दोनों को साथ लेने पर चिकित्सकीय अनुमान बेहतर हुआ। हो सकता है कि ये दोनों संकेत अलग-अलग तरह की जानकारी दें और बड़ी चिकित्सकीय तस्वीर के साथ देखने पर ज़्यादा काम आएँ। फिर भी उपलब्ध जानकारी यह साबित नहीं करती कि यह तरीका रोज़मर्रा के इलाज में डॉक्टरों का मार्गदर्शन करने के लिए तैयार है।
चेहरे के किन हिस्सों पर गया ध्यान?
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि अनुमान लगाते समय प्रोग्राम चेहरे के किन हिस्सों पर अधिक ध्यान दे रहा था। उम्र का अनुमान लगाते वक्त नाक और मुँह के बीच की त्वचा की सिलवटें और माथे के कुछ हिस्से उभरकर सामने आए। मृत्यु के जोखिम से जुड़ा अंक बनाते समय उसका ध्यान नाक की ऊपरी हड्डी और आँखों के नीचे के हिस्से पर अधिक गया।
किसी हिस्से पर ध्यान जाना यह नहीं बताता कि वह हिस्सा नतीजे से क्यों जुड़ा है। तस्वीर में सेहत से जुड़े कुछ संकेत हो सकते हैं, या फिर दूसरे कारणों का मिला-जुला असर दिख सकता है। यह भी संभव है कि प्रोग्राम ने प्रशिक्षण वाली तस्वीरों में कोई ऐसा पैटर्न पकड़ लिया हो जिसका जैविक मतलब अभी साफ़ न हो। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि किसी खास जगह की झुर्रियाँ या नाक का आकार बीमारी या जोखिम का कारण हैं।
शोधकर्ताओं ने यह संभावना भी रखी कि चेहरे का रूप कुछ आदतों या स्वास्थ्य स्थितियों से प्रभावित हो सकता है। मैक ने कहा कि कुछ लोगों में धूम्रपान और बहुत अधिक शराब पीने का संबंध चेहरे की अधिक उम्र के अनुमान से देखा गया है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि प्रोग्राम सीधे इन आदतों को पहचान रहा था। तस्वीर और सेहत, दोनों को प्रभावित करने वाले दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
मुस्कान और रोशनी से कितना बदलता है नतीजा?
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग चेहरे के भाव, मेकअप और रोशनी में ली गई तस्वीरों को भी जाँचा। उनके बताए विश्लेषण में इन बदलावों से नतीजे में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा। उम्र का अनुमान लगाते समय प्रोग्राम कुछ तरह की कॉस्मेटिक सर्जरी वाली तस्वीरों को भी संभाल सका। लेकिन नाक की सर्जरी के बाद की तस्वीरों में उसने उसी व्यक्ति की सर्जरी से पहले की तस्वीरों के मुकाबले उम्र थोड़ी अधिक आँकी।
यह उदाहरण दिखाता है कि किसी प्रोग्राम का प्रदर्शन तस्वीरों के प्रकार और चेहरे में हुए बदलावों पर निर्भर हो सकता है। किसी खास परिस्थिति में असर न दिखने से यह मान लेना ठीक नहीं कि वह हर जगह असरहीन होगी। नतीजों को अलग-अलग लोगों और असल दुनिया जैसी तस्वीर लेने की स्थितियों में जाँचना ज़रूरी है।
अस्पतालों में इस्तेमाल से पहले की ज़रूरी जाँच
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका अभी मरीज़ों के इलाज में इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं है। इसकी एक बड़ी सीमा यह है कि बचने की संभावना का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल किए गए कैंसर मरीज़ों के आँकड़े बोस्टन के इलाके से आए थे और उनमें से ज़्यादातर की त्वचा का रंग गोरा था। इसलिए यह सवाल बना हुआ है कि अलग-अलग नस्ली और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए यह तरीका कितना सही होगा।
शोधकर्ता अब प्रशिक्षण में अलग-अलग तरह के और चेहरे शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। यह केवल तकनीकी सुधार का मामला नहीं है। अगर कुछ समुदायों के चेहरे आँकड़ों में कम हों, तो प्रोग्राम का प्रदर्शन उनके लिए कम सटीक हो सकता है। ऐसी स्थिति में एक ही अंक को सबके लिए निष्पक्ष बताना भ्रामक होगा और इलाज से जुड़े फैसलों में अन्याय कर सकता है। इसलिए अलग-अलग समूहों में स्वतंत्र और बड़े पैमाने पर जाँच करना, और गलती की संभावित सीमा साफ़ बताना ज़रूरी है।
एक और चिंता यह है कि लोग इस अंक को अंतिम फैसला समझ सकते हैं। ऊँचा अंक मरीज़ को डरा सकता है या किसी को इलाज और देखभाल कम देने की वजह बन सकता है। दूसरी ओर, कम अंक झूठा भरोसा दे सकता है, जबकि व्यक्ति को तुरंत ध्यान की ज़रूरत हो। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जैव-नैतिकता के प्रोफेसर मैथ्यू लियाओ ने आगाह किया कि इस अनुमान पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करने से किसी व्यक्ति को आवश्यक देखभाल से वंचित किया जा सकता है।
चिंताएँ अस्पताल तक ही सीमित नहीं हैं। भविष्य में चेहरे से सेहत का अनुमान लगाने वाली तकनीक का इस्तेमाल बीमा कंपनियाँ कवरेज तय करने में या नौकरी देने वाले उम्मीदवार चुनने में कर सकते हैं। यह साबित नहीं हुआ है कि मौजूदा प्रोग्राम का इन कामों में इस्तेमाल हो रहा है। फिर भी ये संभावनाएँ बताती हैं कि तस्वीरों की निजता, लोगों की सहमति और सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार पर पहले से विचार करना चाहिए। यह भी साफ़ होना चाहिए कि तस्वीरों और नतीजों का मालिक कौन है और उन पर आपत्ति कैसे की जा सकती है। कोई तरीका कंप्यूटर से चलता है, इसलिए वह अपने-आप निष्पक्ष या सही इस्तेमाल के लायक नहीं हो जाता।
फिलहाल एक शोध-संकेत, इलाज का फैसला नहीं
यह अध्ययन चेहरे की तस्वीरों से ऐसे संकेत खोजने की नई कोशिश दिखाता है जिनका संबंध कैंसर के मरीज़ों के आगे के स्वास्थ्य से हो सकता है। जाँचे गए समूहों में ऊँचे अंकों का संबंध मृत्यु के अधिक जोखिम से दिखा और चेहरे की उम्र के अनुमान को बचने की संभावना वाले अंक के साथ लेने पर अनुमान बेहतर हुआ। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं कि प्रोग्राम चेहरे में ठीक क्या देख रहा है। यह भी साबित नहीं हुआ कि चेहरे की कोई खास बनावट बीमारी का कारण है या किसी एक मरीज़ का भविष्य बता सकती है। अस्पतालों में उपयोग से पहले अलग-अलग लोगों के आँकड़ों के साथ व्यापक जाँच और असल इस्तेमाल के असर का मूल्यांकन ज़रूरी है। फिलहाल इसे एक शुरुआती शोध-संकेत की तरह देखना चाहिए, न कि निदान या पूरी चिकित्सकीय जाँच के विकल्प की तरह।