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बर्फ़ के नीचे छिपा जीवन: क्या पुराने सूक्ष्मजीव नई दवाओं का रास्ता दिखाएंगे?

आसान शब्दों में

आर्कटिक की जमी हुई मिट्टी में बहुत पुराने सूक्ष्मजीवों की आनुवंशिक जानकारी बची हो सकती है। वैज्ञानिक उस जानकारी से ऐसे पदार्थ खोजने की कोशिश कर रहे हैं जो आगे चलकर दवा बनाने में काम आएँ। मगर यह काम लंबा और महँगा है, और इसमें स्थानीय समुदायों के अधिकारों तथा लाभ के उचित बँटवारे का भी ध्यान रखना ज़रूरी है।

जमी हुई मिट्टी में क्या-क्या बचा रह सकता है?

कनाडा के आर्कटिक क्षेत्र की मिट्टी और तलछट में लंबे समय से आनुवंशिक सामग्री जमा होती रही है। समय के साथ इसका कुछ हिस्सा टूट-फूट जाता है, इसलिए वैज्ञानिकों को हमेशा पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती। फिर भी, बचे हुए छोटे अंशों से उन सूक्ष्मजीवों के बारे में संकेत मिल सकते हैं जो अब वहाँ नहीं हैं या जिनके बारे में विज्ञान बहुत कम जानता है।

एथाबास्का विश्वविद्यालय में जैव-सूचनाविज्ञान और पर्यावरणीय सूक्ष्मजीवों पर काम करने वाले शोध समूह के प्रमुख सृजक भटनागर इन नमूनों को सूक्ष्म जीवन का ऐतिहासिक रिकॉर्ड मानते हैं। उनकी टीम ने कई वर्षों तक कनाडाई आर्कटिक के पानी से पर्यावरणीय आनुवंशिक सामग्री जुटाई है। इससे ऐसे जीवों का पता चल सकता है जो कड़ाके की ठंड में ढल गए थे, या ऐसी पुरानी प्रजातियों का जिन्हें आम निगरानी में देख पाना मुश्किल है।

हालाँकि, किसी जीव का आनुवंशिक निशान मिलना यह साबित नहीं करता कि वह जीव अब भी जीवित है या उससे दवा बनाने लायक पदार्थ सीधे मिल जाएगा। पहले नमूने की जानकारी का विश्लेषण करना पड़ता है, फिर उन जीनों की पहचान करनी होती है जिनका किसी पदार्थ से संबंध हो सकता है। इसके बाद प्रयोग करके देखना होता है कि वे जीन सचमुच क्या काम करते हैं और उनसे बना पदार्थ कैसा है।

प्रयोगशाला में न पनपने वाले जीवों की खोज

लंबे समय तक सूक्ष्मजीवों को प्रयोगशाला में उगाना उनकी खोज में बड़ी रुकावट रहा। शोधकर्ताओं के एक अनुमान के मुताबिक, पर्यावरण में पाए जाने वाले करीब ९९ प्रतिशत सूक्ष्मजीवों को पुराने प्रयोगशाला तरीकों से उगाना संभव नहीं था। जब कोई जीव प्रयोगशाला की थाली में नहीं पनपता, तो उसके बनाए पदार्थों या उसके भीतर होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करना कठिन हो जाता है।

पर्यावरण से सीधे ली गई आनुवंशिक सामग्री का विश्लेषण और एक-एक कोशिका के आनुवंशिक क्रम को पढ़ने वाली तकनीकें इस बाधा को कुछ हद तक दूर करती हैं। जीव को उगाने की प्रतीक्षा करने के बजाय, वैज्ञानिक नमूने से उसकी आनुवंशिक सामग्री जुटाकर कंप्यूटर की मदद से उसका खाका तैयार कर सकते हैं। फिर वे ऐसे जीन-समूह खोजते हैं जो मिलकर कोई प्राकृतिक पदार्थ बना सकते हों। इन्हें जैव-निर्माण जीन-समूह कहा जाता है।

टोरंटो विश्वविद्यालय में जस्टिन नॉडवेल की प्रयोगशाला ऐसे जीन-समूहों को स्ट्रेप्टोमाइसीज़ नाम के जीवाणुओं में पहुँचाने पर काम कर रही है। जैविक अभियांत्रिकी के तरीकों से इन जीवाणुओं को वे पदार्थ बनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। प्रयोगशाला में आसानी से संभाले जा सकने वाले जीवाणु को दूसरे जीव का आनुवंशिक निर्देश पढ़ने के लिए इस्तेमाल करना इस काम का मूल विचार है। इससे उन जीनों को भी परखा जा सकता है जो सामान्य परिस्थितियों में सक्रिय नहीं होते।

आनुवंशिक जानकारी से पदार्थ तक का कठिन सफ़र

किसी दिलचस्प जीन-समूह की पहचान होते ही दवा तैयार नहीं हो जाती। कुछ जीन-समूह बहुत बड़े होते हैं और उनमें आनुवंशिक वर्णों के लगभग एक लाख जोड़े हो सकते हैं। इतनी आनुवंशिक सामग्री बनाना या जोड़ना मेहनत और संसाधन माँगता है। उसे चरणों में बढ़ाने के लिए भी कई प्रयोग करने पड़ते हैं, जिससे हर परियोजना तकनीकी रूप से कठिन और महँगी बन जाती है।

यह तय करना भी आसान नहीं होता कि जीन-समूह कहाँ से शुरू होता है और कहाँ खत्म। कुछ जीन किसी पदार्थ को बनाने से जुड़े दिखते हैं, लेकिन उनके पास के दूसरे जीनों की भूमिका साफ़ नहीं होती। अगर उस पदार्थ को बनाने की रासायनिक प्रक्रिया पहले से मालूम न हो, तो यह चुनना मुश्किल हो जाता है कि किन जीनों को दूसरे जीव में पहुँचाया जाए। ऐसे में कंप्यूटर से मिले संकेतों के साथ प्रयोगों की मदद लेनी पड़ती है और कई संभावनाएँ जाँचनी पड़ सकती हैं।

ठंड में ढले किसी सूक्ष्मजीव के आनुवंशिक निर्देशों को ऐसे जीवाणु में पहुँचाना भी पक्का सफल नहीं होता जो गर्म प्रयोगशाला के माहौल में पनपता है। मूल जीव के भीतर काम करने वाले जीन दूसरे जीव में अलग तरह से व्यवहार कर सकते हैं। इसलिए जीन-समूह को नए जीव के अनुकूल बनाने के लिए बदलाव और परीक्षण करने पड़ते हैं। जीन मिल जाने भर से मनचाहा पदार्थ बनना तय नहीं है।

क्या आर्कटिक से नई दवाएँ मिल सकती हैं?

कम खोजे गए वातावरण में अलग तरह के पदार्थ मिलने की उम्मीद रहती है। सूक्ष्मजीवों की विशेष रासायनिक प्रक्रियाओं से पहले भी कई दवाएँ मिली हैं। इनमें कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली डॉक्सोरूबिसिन और रैपामाइसिन जैसी दवाएँ शामिल हैं। ऐसे उदाहरणों से यह सवाल उठता है कि आर्कटिक जैसे कठिन और अलग-थलग वातावरण में ढले सूक्ष्मजीव हमें क्या नया बता सकते हैं।

फिर भी, हर नए जीन से इलाज मिलने या हर प्राकृतिक पदार्थ के दवा बन जाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। दूसरे वातावरणों में खोज करने पर कई बार ऐसे पदार्थ दोबारा मिल जाते हैं जिन्हें वैज्ञानिक पहले ही पहचान चुके होते हैं। इसलिए यह जाँचना ज़रूरी है कि नमूने में मिला पदार्थ सचमुच नया है या नहीं। नया होने पर भी, उसके गुण समझने और उसे पर्याप्त मात्रा में बनाने का तरीका खोजने के बाद ही उसके इलाज में काम आने की बात की जा सकती है।

इसलिए आर्कटिक में खोज का महत्व केवल इस बात से नहीं आँका जाना चाहिए कि कितनी जल्दी नई दवा मिलती है। इससे सूक्ष्मजीवों की विविधता और पदार्थ बनाने के उनके तरीकों के बारे में भी हमारी समझ बढ़ सकती है। नतीजा कोई उपयोगी पदार्थ हो सकता है, नई आनुवंशिक जानकारी हो सकती है या मौजूदा तकनीकों की सीमाओं से जुड़ी सीख। आँकड़ों में मिले शुरुआती संकेत से लेकर इस्तेमाल लायक इलाज तक पहुँचने में कई चरण लगते हैं।

आर्कटिक से मिली जानकारी पर किसका हक़?

यह सवाल केवल प्रयोगशाला और खर्च तक सीमित नहीं है। आनुवंशिक जानकारी जब सार्वजनिक आँकड़ा-भंडारों में डाली जाती है, तो अलग-अलग देशों के शोधकर्ता और कंपनियाँ उसका अध्ययन कर सकते हैं। भटनागर ने चिंता जताई है कि कनाडा से बाहर की कोई व्यावसायिक संस्था इस जानकारी से बड़ा मूल्यवान उत्पाद बना सकती है, जबकि उससे जुड़े समुदायों को उचित लाभ न मिले।

कनाडाई आर्कटिक में रहने वाले मूलनिवासी समुदायों के संदर्भ में यह मुद्दा खास महत्व रखता है। पौधों, उपचार और पर्यावरण के बारे में उनका पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों से सँजोई गई सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हो सकता है; उसे उसके जानकारों से अलग करके सिर्फ़ जानकारी नहीं माना जा सकता। लेख में बताया गया है कि कनाडा आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और उनसे मिले लाभ के बँटवारे से जुड़े नागोया प्रोटोकॉल का पक्षकार नहीं है। इससे इन समुदायों के जैविक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा को लेकर सवाल उठते हैं।

दूसरे क्षेत्रों के पुराने अनुभव भी सावधानी बरतने की वजह देते हैं। कई बार पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी चीज़ें जुटाई गईं, उनसे पदार्थ अलग किए गए और फिर समुदायों की भूमिका को पर्याप्त महत्व दिए बिना उन पर व्यावसायिक अधिकार माँगे गए। इसलिए नमूने जुटाना या उनके आनुवंशिक क्रम सार्वजनिक करना केवल तकनीकी काम नहीं है। जानकारी कहाँ से आई, उसके इस्तेमाल की सहमति किसने दी और उससे होने वाले लाभ में किसका हिस्सा होगा—इन सवालों पर परियोजना की शुरुआत से ही ध्यान देना चाहिए।

निष्कर्ष

आर्कटिक की जमी हुई मिट्टी बीते समय के सूक्ष्म जीवन की झलक दे सकती है। उसमें बची आनुवंशिक जानकारी से ऐसे रासायनिक रास्तों का पता चल सकता है जो आगे चलकर नई दवाओं की खोज में मदद करें। लेकिन पुराने जीनों को समझना, उन्हें किसी उपयुक्त जीव में काम करने लायक बनाना, बड़े जीन-समूह तैयार करना और मिले पदार्थ की उपयोगिता जाँचना—इन सबमें समय, मेहनत और पैसा लगता है। साथ ही, मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों का सम्मान और लाभ का न्यायसंगत बँटवारा भी ज़रूरी है। इस खोज की सफलता इस बात से भी तय होगी कि इससे मिलने वाली जानकारी और फायदे किस तरह साझा किए जाते हैं।