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जब भौतिकी की सीख राजनीति तक पहुँची: क्या सबूत दलगत सोच पर भारी पड़ सकते हैं?

आसान शब्दों में

भौतिक विज्ञानी और रिपब्लिकन उम्मीदवार टॉम स्टालकप का मानना है कि राजनीति को बेहतर सबूत मिलने पर अपने फैसले बदलने चाहिए। विज्ञान हर सार्वजनिक सवाल का तैयार जवाब नहीं देता, लेकिन वह दावों को परखने और अधूरी जानकारी पहचानने में मदद करता है। किसी विचार को सिर्फ इसलिए सही नहीं मानना चाहिए कि वह हमारे दल के पक्ष में है।

राजनीति में विज्ञान की जगह

अमेरिका में विज्ञान कई बार दलगत झंडे की तरह इस्तेमाल होता है। कोई पक्ष अपने तर्क के समर्थन में वैज्ञानिक अध्ययन दिखाता है, लेकिन वही जानकारी उसके खिलाफ जाए तो उस पर संदेह करने लगता है। भौतिक विज्ञानी और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार टॉम स्टालकप के मुताबिक, अच्छी सरकार चलाने के लिए इस आदत को बदलना जरूरी है। वैज्ञानिक सबूत भाषण को सजाने की चीज नहीं, बल्कि नीतियों को परखने और जरूरत पड़ने पर उनमें सुधार करने का आधार होने चाहिए—भले ही उनसे ऐसे नतीजे निकलें जो उन्हें अपनाने वाले दल को पसंद न आएँ।

भौतिक विज्ञानी से उम्मीदवार तक

स्टालकप ने 2000 में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी से संघनित पदार्थ भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। इससे पहले उन्होंने तलाहासी की राष्ट्रीय उच्च चुंबकीय क्षेत्र प्रयोगशाला में काम किया था। उनका शोध क्रिस्टलीय बनावट वाले कार्बनिक अतिचालकों पर था। सही परिस्थितियों में ये पदार्थ बिजली को बिना प्रतिरोध के प्रवाहित कर सकते हैं। उन्होंने कॉपर ब्रोमाइड नाम के यौगिक का अध्ययन किया, जिसमें करीब 80 केल्विन पर एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दिया।

उनके अनुसार, शोध का सवाल सिर्फ यह मापना नहीं था कि पदार्थ किस तापमान पर अतिचालक बनता है। उन्होंने पाया कि पदार्थ को ठंडा करने की गति उसके बदलाव के तापमान, इलेक्ट्रॉन के प्रभावी द्रव्यमान और दूसरी विशेषताओं पर असर डालती है। इस प्रयोग से यह बात सामने आती है कि वैज्ञानिक नतीजों को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आँकड़े किन परिस्थितियों में जुटाए गए थे। सिर्फ एक संख्या पेश करने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। स्टालकप इसी बात को राजनीति से जोड़ते हैं: किसी जानकारी का हवाला देना काफी नहीं है; फैसले लेने वालों को बताना चाहिए कि सबूत वास्तव में किस बात का समर्थन करते हैं और उनकी सीमाएँ क्या हैं।

डॉक्टरेट पूरी करने के बाद उन्होंने विश्वविद्यालय में पढ़ाने या शोध करने का रास्ता नहीं चुना। उनका कहना है कि कई साल की पढ़ाई और शोध के बाद वे थक गए थे। पहले उन्होंने एक इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में काम किया, जो दूर से चलने वाला मौसम केंद्र बना रही थी। फिर 2004 में उन्होंने अपनी कंपनी शुरू की। उसके मौसम केंद्रों से मिलने वाले आँकड़ों का इस्तेमाल जलवायु पर काम करने वाले शोधकर्ता करते हैं। बाद में इन केंद्रों में कैमरे भी लगाए गए, ताकि अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ की हलचल और प्रशांत महासागर के दूरस्थ जार्विस द्वीप पर पक्षियों की गतिविधियाँ देखी जा सकें। स्टालकप जोर देकर कहते हैं कि उनकी कंपनी माप के उपकरण देती है; शोधकर्ताओं को किस नतीजे पर पहुँचना चाहिए, यह तय नहीं करती।

विज्ञान का मतलब मनपसंद सबूत चुनना नहीं

स्टालकप का कहना है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों दल विज्ञान से जुड़ी जानकारी को अपने हिसाब से चुनकर पेश कर सकते हैं। वे उन अध्ययनों पर जोर देते हैं जो उनके पक्ष को मजबूत करें और विरोध में जाने वाली जानकारी को नजरअंदाज कर देते हैं। स्टालकप इसे राजनीतिक फायदे के लिए ज्ञान को अपने मुताबिक ढालना मानते हैं। उनके अनुसार, जब नई जानकारी सामने आए तो नीतियों की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि राजनीति के हर मतभेद को प्रयोगशाला में सुलझाया जा सकता है। मूल्यों, प्राथमिकताओं और संसाधनों के बँटवारे का भी फैसलों में हिस्सा होता है। लेकिन किसी तथ्य से जुड़े दावे को केवल इसलिए जाँच से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए कि उससे किसी खास दल को फायदा होता है।

इसी सोच से उनका यह आग्रह निकलता है कि दलगत वफादारी से पहले विज्ञान को महत्व दिया जाए। विज्ञान हर सार्वजनिक प्रश्न का तैयार जवाब नहीं देता, लेकिन यह समझने के तरीके देता है कि कौन-सा दावा उपलब्ध आँकड़ों से समर्थित है और किसके पक्ष में सबूत नहीं हैं। वैज्ञानिक जानकारी बदल भी सकती है: नई माप सामने आ सकती हैं या पुराने नतीजों का फिर से विश्लेषण किया जा सकता है। तब अपनी व्याख्या या नीति में बदलाव करना जरूरी हो सकता है। इस नजरिए से राय बदलना हमेशा कमजोरी नहीं होता; मजबूत सबूत मिलने पर ऐसा करना समझदारी भरा कदम हो सकता है।

स्टालकप आगाह करते हैं कि तथ्यों को चुनकर पेश करने के लिए उन्हें गढ़ना जरूरी नहीं। कोई वक्ता कुछ सही आँकड़ों को जोड़कर ऐसा तर्क खड़ा कर सकता है जो सुनने में भरोसेमंद लगे, जबकि तस्वीर बदल देने वाली अहम जानकारी छोड़ दी गई हो। जब लोगों को खबरें ऐसे स्रोतों से मिलती हैं जो केवल उनकी अपनी सोच से मेल खाने वाले तथ्य दिखाते हैं, तो इस अधूरेपन को पकड़ना मुश्किल हो जाता है। उनके अनुसार, मीडिया का ध्रुवीकरण दो अलग-अलग सूचना-दायरों को जन्म दे सकता है। हर दायरे के लोगों को न तो दूसरे पक्ष की सोच का संतुलित परिचय मिलता है, न ही इस बात का कि उपलब्ध सबूत असल में क्या बताते हैं।

जलवायु परिवर्तन: सबूतों की कसौटी

जलवायु परिवर्तन इस बात का साफ उदाहरण है कि दलगत पहचान और आँकड़ों में तनाव कैसे पैदा हो सकता है। स्टालकप रिपब्लिकन हैं, फिर भी वे मानते हैं कि जलवायु गर्म हो रही है और मानवीय गतिविधियाँ इसमें योगदान देती हैं। उनका कहना है कि उनकी कंपनी के मौसम केंद्रों से मिलने वाले माप जलवायु अनुसंधान में इस्तेमाल किए जाते हैं। इस मामले में उनकी राय कुछ रिपब्लिकन नेताओं से अलग है, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन को धोखा बताया है। हालांकि, वे यह नहीं मानते कि संकट से निपटने के नाम पर शुरू की गई हर परियोजना या खर्च अपने आप सफल हो जाता है।

वे याद दिलाते हैं कि सरकारी पैसा उन कंपनियों को भी दिया जा सकता है जो बाद में असफल हो जाती हैं। इसके लिए वे बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहने के दौरान सोलिंड्रा कंपनी को मिले सरकारी समर्थन पर हुए विवाद का जिक्र करते हैं। लेकिन इस उदाहरण से अपने आप जलवायु परिवर्तन के सबूत गलत साबित नहीं होते। यह एक अलग सवाल उठाता है: सरकारी कार्यक्रम कितनी अच्छी तरह बनाए गए हैं और उनसे लाभ पाने वालों की जवाबदेही कैसे तय होती है। इन दोनों सवालों को अलग रखना जरूरी है। कोई व्यक्ति वैज्ञानिक तथ्य को स्वीकार करते हुए भी समस्या से निपटने के लिए चुने गए खास खर्च या तरीके पर आपत्ति कर सकता है।

यह फर्क इसलिए अहम है कि सार्वजनिक बहस में समस्या के सच होने और सुझाए गए समाधान के कारगर होने को अक्सर एक ही बात मान लिया जाता है। यह मानना कि जलवायु बदल रही है, अपने आप यह तय नहीं करता कि सबसे अच्छी नीति कौन-सी है। इससे यह गारंटी भी नहीं मिलती कि हर आर्थिक सहायता अपना लक्ष्य हासिल करेगी। दूसरी ओर, किसी एक परियोजना की नाकामी से जलवायु के माप खारिज नहीं हो जाते। अच्छे फैसले के लिए पहले घटना से जुड़े सबूतों की जाँच और फिर हर व्यावहारिक विकल्प का अलग-अलग आकलन होना चाहिए। साथ ही, सफलता के मानदंड, जोखिम और लागत भी साफ तौर पर सामने रखे जाने चाहिए।

भ्रामक खबरों से सीख और मीडिया की जिम्मेदारी

स्टालकप का राजनीतिक बातों पर अविश्वास मीडिया की गुणवत्ता में गिरावट और भ्रामक जानकारी के फैलाव से भी जुड़ा है। वे राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के दौर में इराक पर हमले को सही ठहराने के लिए दिए गए तर्कों की याद दिलाते हैं। उनके मुताबिक, उस समय 10 में से 7 अमेरिकी मानते थे कि सद्दाम हुसैन का 11 सितंबर के हमलों से संबंध था। वे इस उदाहरण से आगाह करते हैं कि किसी दावे को सार्वजनिक चर्चा में बार-बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता। अधूरी या पक्षपाती जानकारी मिलने पर लोग किसी राजनीतिक कहानी को सच मान सकते हैं।

स्टालकप पत्रकारिता की तुलना अदालत से करते हैं और एक ऐसे कानूनी नियम का हवाला देते हैं जो तथ्यों को भ्रामक ढंग से पेश करने से रोकता है। लेकिन यह तुलना अपने आप में कुछ सवाल खड़े करती है। अदालत तय नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार काम करती है, जबकि समाचार कक्षों को बदलती घटनाओं और आपस में टकराते स्रोतों से जूझना पड़ता है। फिर भी, उनकी मूल आपत्ति समझने लायक है: पत्रकारों को ऐसी अहम जानकारी नहीं हटानी चाहिए जो खबर का अर्थ बदल दे। उन्हें पक्के तथ्यों, उनकी व्याख्याओं और संभावनाओं में फर्क साफ रखना चाहिए और गलती सामने आने पर उसे सुधारना चाहिए।

खबरों को समझने में पाठकों की भी जिम्मेदारी होती है। आलोचनात्मक नजर रखने का अर्थ यह नहीं कि मीडिया संस्थानों से आने वाली हर बात को खारिज कर दिया जाए। इसका मतलब है कि आप दावे का स्रोत देखें, वह किस संदर्भ में किया गया है यह समझें और जानें कि क्या उससे उलट जानकारी भी सामने रखी गई है। सावधानी से संदेह करना और हर बात पर संदेह करना एक जैसा नहीं है। पहला तरीका बेहतर सबूत माँगता है और नई जानकारी मिलने पर राय की समीक्षा करता है। दूसरा किसी भी ऐसे नतीजे को ठुकरा सकता है जो पहले से बनी सोच के अनुकूल न हो—भले ही उसके समर्थन में सबूत लगातार बढ़ रहे हों।

शोध के लिए पैसा: खामियाँ सुधारें, व्यवस्था न तोड़ें

विज्ञान और राजनीति पर स्टालकप की चिंता बुनियादी शोध के लिए धन देने तक फैली हुई है। उन्होंने ऐसी कोशिशों का विरोध किया है जिनमें वैज्ञानिक अनुदान का भविष्य तय करने में राजनीतिक अधिकारियों को सीधी भूमिका दी जाए। उन्होंने राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान और स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग समेत संघीय संस्थाओं में हुए बदलाव रोकने की भी माँग की। वे मानते हैं कि अनुदान के कुछ फैसलों में राजनीतिक दबाव या पक्षपात हो सकता है। लेकिन उनके अनुसार, किसी खास खामी को ठीक करने के लिए सीमित और सटीक कदम उठाने चाहिए; ऐसी व्यापक व्यवस्थाएँ नहीं हटानी चाहिए जिनसे उन शोधकर्ताओं और परियोजनाओं को भी नुकसान पहुँचे जिनका समस्या से कोई लेना-देना नहीं।

उनका तर्क बुनियादी शोध की प्रकृति पर टिका है। ऐसे शोध से शायद तुरंत कोई बिकने वाली चीज या आर्थिक लाभ न मिले। स्टालकप के अपने अतिचालक पदार्थों के अध्ययन में बदलाव का तापमान 2 या 3 केल्विन बढ़ाना भी, उनके शब्दों में, ऐसा काम नहीं था जिससे तुरंत मुनाफा होने वाला हो। लेकिन लंबे समय में पदार्थों के गुणों को समझने से इलेक्ट्रॉनिक्स में कहीं बड़े विकास का रास्ता खुल सकता है। उनका कहना है कि अगर शोध को सिर्फ फौरन मिलने वाले लाभ से आँका जाए, तो समाज उस ज्ञान से वंचित हो सकता है जिसके उपयोग सामने आने में समय लगता है।

इसका यह मतलब नहीं कि हर अनुदान को पैसा मिलना चाहिए या जाँच-परख की मौजूदा व्यवस्था से कभी गलती नहीं होती। असली सवाल यह है कि समीक्षा की प्रक्रिया को बेहतर कैसे बनाया जाए, बिना उसे राजनीतिक वफादारी जाँचने का औजार बनाए। अगर शोध को समर्थन देने के फैसले अधिकारियों की इस इच्छा से जुड़ जाएँ कि वे अपनी पसंद के विचारों को इनाम दें, तो शोध की स्वतंत्रता और उसमें जनता का भरोसा दोनों प्रभावित होंगे। लेकिन हितों के टकराव या कमजोर मूल्यांकन को अनदेखा करने से भी भरोसा घट सकता है। इसलिए सुधार के लिए साफ नियम, जाँची जा सकने वाली समीक्षा और समस्या की सही जगह पर केंद्रित कार्रवाई जरूरी है।

उम्मीदवार और दल की चुनावी गणित

स्टालकप मैसाचुसेट्स के चौथे निर्वाचन क्षेत्र से रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला डेमोक्रेटिक सांसद जेक ऑचिनक्लॉस से है, जिन्होंने 2020 में यह सीट जीती थी। इस क्षेत्र में रिपब्लिकन उम्मीदवारों के सामने बड़ी चुनौती है: 1947 के बाद से यहाँ कोई रिपब्लिकन सांसद नहीं चुना गया। चुनावी तौर पर कठिन इस क्षेत्र में उम्मीदवार को अपनी पार्टी के कुछ पारंपरिक विचारों से अलग बोलने की गुंजाइश मिल सकती है। फिर भी, इससे वे दलगत राजनीति के हिसाब-किताब से बाहर नहीं हो जाते और उनके बयानों को नीतियों की जाँच का विकल्प नहीं माना जा सकता।

स्टालकप कहते हैं कि विज्ञान का सम्मान सिर्फ डेमोक्रेटिक पार्टी की खासियत नहीं है। उनके अनुसार, डेमोक्रेट भी अपने विचारों के खिलाफ जाने वाले सबूतों को ठुकरा सकते हैं या वैज्ञानिक भाषा का इस्तेमाल करके विरोधियों से नैतिक रूप से बेहतर दिखने की कोशिश कर सकते हैं। वे यह भी मानते हैं कि आधे देश को अज्ञानी कहने से लोगों को समझाने के बजाय दूरी और बढ़ती है। हालांकि, दोनों दलों की आलोचना कर देने से यह साबित नहीं होता कि हर मुद्दे पर दोनों बराबर गलत हैं। हर दावे की अलग से जाँच होनी चाहिए: यह किसने किया, उसके समर्थन में क्या सबूत हैं और वह विशेषज्ञों की स्थापित जानकारी से कितना मेल खाता है।

यह फर्क जरूरी है, वरना दलगत सोच से ऊपर उठने की अपील भी एक खोखला नारा बन सकती है। किसी राजनेता का यह कहना कि वह विज्ञान के पक्ष में है, अपने आप उसकी सोच को सही नहीं ठहराता। ज्यादा अहम यह है कि क्या वह अपने समर्थकों और विरोधियों से जुड़े मुद्दों पर एक ही कसौटी अपनाता है और नई जानकारी आने पर अपनी राय बदलने को तैयार है। यही कसौटी संस्थाओं पर भी लागू होती है: क्या वे अपनी जानकारी की सीमाएँ बताती हैं, फैसलों के पीछे के कारण समझाती हैं और नतीजों की स्वतंत्र जाँच होने देती हैं?

निष्कर्ष

टॉम स्टालकप की कहानी में भौतिकी का प्रशिक्षण और राजनीति में दलगत सोच का असर घटाने की कोशिश साथ दिखाई देती है। जलवायु परिवर्तन से लेकर शोध के लिए धन तक उनके उदाहरण बताते हैं कि विज्ञान का सम्मान करने का दावा भर मतभेद नहीं सुलझाता। फिर भी, यह बहस के लिए एक जरूरी कसौटी देता है: प्रासंगिक जानकारी पूरी तरह सामने रखी जाए, सबूत और राजनीतिक फैसले अलग-अलग समझे जाएँ और नए तथ्य आने पर नीतियों की समीक्षा की जाए। दोनों दलों की आलोचना करने से हर दावे की अलग जाँच की जरूरत खत्म नहीं होती। विज्ञान पर किसी उम्मीदवार की गंभीरता उसके बयानों से नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जानी चाहिए कि क्या वह उन्हीं कसौटियों को उन मुद्दों पर भी लागू करता है जहाँ उनका पालन उसके अपने राजनीतिक हितों के खिलाफ जाता है।