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वायरस का छिपा हुआ दरवाज़ा: कोशिका से जुड़ने की अनोखी तरकीब

आसान शब्दों में

एंडीज़ वायरस कोशिका से जुड़ने के लिए अपनी सतह पर बने एक गहरे गड्ढे का इस्तेमाल करता है। कोशिका का एक लंबा, पतला हिस्सा उस गड्ढे तक पहुँच जाता है, जबकि बड़े आकार के कई एंटीबॉडी वहाँ तक आसानी से नहीं पहुँच पाते। इस जुड़ाव को समझने से ऐसे छोटे, पतले अणु बनाने की राह खुल सकती है, जो वायरस को कोशिका से चिपकने से रोकें।

संक्रमण की शुरुआत कृंतकों के संपर्क से होती है, और कभी-कभी यह एक व्यक्ति से दूसरे तक फैलता है

हांटा वायरस उन वायरसों का समूह है, जो संक्रमित कृंतकों से इंसानों तक पहुँच सकते हैं और गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं। संक्रमण के सबसे गंभीर रूपों में फेफड़ों की एक ऐसी बीमारी शामिल है, जिसमें साँस लेना तेज़ी से मुश्किल होता जाता है। इंसानों को संक्रमित करने वाले पहचाने गए हांटा वायरसों में एंडीज़ वायरस की एक खास बात है: यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक भी फैल सकता है। इंसानों में बीमारी पैदा करने वाले इस समूह के दूसरे ज्ञात वायरसों में यह क्षमता नहीं देखी गई है।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर संपर्क से संक्रमण हो जाएगा। फिर भी, यह समझना खास तौर पर अहम है कि वायरस कोशिका पर हमला कैसे शुरू करता है। अगर शोधकर्ता जान लें कि वायरस कोशिका की सतह पर मौजूद एक रिसेप्टर से किस तरह जुड़ता है, तो वे उसकी कमजोर जगहों की ज़्यादा सटीक पहचान कर सकते हैं और शुरुआती जुड़ाव को रोकने के तरीके तलाश सकते हैं। नया अध्ययन कोई तैयार इलाज नहीं देता। इसके बजाय, यह बताता है कि वायरस जुड़ने के लिए किस बनावट पर निर्भर करता है और उसे रोकने के लिए किन बातों पर ध्यान दिया जा सकता है।

रिसेप्टर वायरस के किसी एक हिस्से से नहीं जुड़ता

पहले के अध्ययनों से पता चला था कि एंडीज़ वायरस और नई दुनिया के कुछ अन्य हांटा वायरस कोशिकाओं की सतह पर मौजूद इंसानी प्रोटीन प्रोटोकेडहेरिन-1 का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रोटीन का संक्षिप्त नाम PCDH1 है। लेकिन रिसेप्टर का नाम जान लेने भर से यह समझ में नहीं आता था कि वायरस उससे जुड़ता कैसे है। बुनियादी सवाल यही था: वायरस का प्रोटीन इस रिसेप्टर को कैसे पहचानता है और दोनों का संपर्क ठीक किस जगह होता है।

पहले किए गए प्रयोगों में एक बड़ी अड़चन सामने आई थी। वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन की अकेली इकाई PCDH1 से जुड़ नहीं पाती थी। जुड़ाव तभी दिखाई दिया, जब स्पाइक की चारों इकाइयाँ एक साथ जुड़कर एक ढाँचा बनाती थीं। इससे संकेत मिला कि पहचान की जगह किसी एक इकाई की सतह पर पहले से मौजूद कोई साधारण हिस्सा नहीं है। वह चारों इकाइयों के मिलकर एक खास आकार लेने से बनती है। इसलिए सिर्फ अलग-अलग हिस्सों की जाँच करना काफी नहीं था; शोधकर्ताओं को उनका जुड़ा हुआ ढाँचा भी देखना था।

स्पाइक वायरस की सतह पर बनी वह संरचना है, जो कोशिका से संपर्क बनाने में मदद करती है। इस मामले में स्पाइक में Gn नाम के ग्लाइकोप्रोटीन की चार प्रतियाँ होती हैं। शोध दल ने इस संरचना को वायरस से बाहर स्थिर करने की कोशिश की, ताकि उसकी बनावट का अध्ययन किया जा सके और उसकी तुलना इंसानी रिसेप्टर से की जा सके। इसके लिए उन्होंने एंडीज़ वायरस के स्पाइक का ऐसा रूप तैयार किया, जिसे घोल में रखा जा सकता था। उसमें एक खास सहायक ढाँचा भी जोड़ा गया, जिसने चारों इकाइयों को स्थिर बनाए रखने में मदद की। इस तरह शोधकर्ता जुड़ाव का अध्ययन करने के लिए ज़रूरी बनावट को संभाल सके।

तीन-आयामी तस्वीर में दिखा बीच का गहरा गड्ढा

शोधकर्ताओं ने क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के साथ प्रयोग भी किए। इस तकनीक में जैविक अणुओं को जमाकर उनकी ऐसी तस्वीर ली जाती है, जिसमें उनकी बनावट के बारीक हिस्से सुरक्षित रहते हैं। इन तस्वीरों की मदद से अणु के आकार का सटीक नक्शा बनाया जा सकता है। टीम ने तैयार किए गए स्पाइक को PCDH1 प्रोटीन के साथ मिलाया और फिर बने हुए संयुक्त ढाँचे का विश्लेषण किया। इस काम में न्यूयॉर्क के अल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन, पेरिस के पाश्चर संस्थान और श्रेवेपोर्ट स्थित लुइज़ियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र के शोधकर्ता शामिल थे। अध्ययन नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

बनावट की जाँच से पता चला कि PCDH1 स्पाइक के बीच में बने एक गहरे गड्ढे के भीतर जुड़ता है। यह गड्ढा Gn की चारों प्रतियों के आपस में मिलने से बनता है। जुड़ाव पूरी तरह सममित भी नहीं है: रिसेप्टर स्पाइक के हर हिस्से के सामने एक जैसे ढंग से नहीं बैठता। यानी जुड़ने की जगह किसी एक इकाई से नहीं, बल्कि पूरी स्पाइक संरचना से बनती है। चारों इकाइयाँ आसपास की दीवारों की तरह मिलकर बीच में एक ऐसा गड्ढा बनाती हैं, जिसके भीतर रिसेप्टर का एक हिस्सा पहुँच सकता है।

इस बारीक बनावट का महत्व सिर्फ अणुओं का आकार बताने तक सीमित नहीं है। अगर जुड़ने की जगह किसी एक इकाई पर होती, तो उसे समझने और बदलने का तरीका अलग हो सकता था। लेकिन अध्ययन बताता है कि वायरस अपनी सतह के हिस्सों को इस तरह जोड़ता है कि जुड़ने की पूरी जगह सिर्फ चार इकाइयों वाले ढाँचे में बनती है। इससे समझ आता है कि अकेला प्रोटीन जुड़ाव क्यों नहीं दिखा पाया। यह भी साफ होता है कि स्पाइक के हिस्सों की आपसी व्यवस्था ही कोशिका को पहचानने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।

तीन लूप मिलकर बनाते हैं जुड़ने की जगह

यह जानने के लिए कि गड्ढे को बनाने में कौन-से हिस्से सचमुच योगदान देते हैं, शोधकर्ताओं ने Gn प्रोटीन की कुछ चुनी हुई जगहों में बदलाव किए और फिर देखा कि जुड़ाव पर क्या असर पड़ता है। बदलाव करके किए गए प्रयोगों से तीन लूप की भूमिका सामने आई। ये लूप PCDH1 के जुड़ने की जगह बनाने में मदद करते हैं। यह नतीजा इस विचार को मज़बूत करता है कि पहचान की जगह किसी एक अलग इकाई की खासियत नहीं है; यह वायरस के पूरे संयुक्त ढाँचे के कई बारीक हिस्सों के मेल से बनती है।

टीम ने इन हिस्सों की अहमियत जाँचने के लिए एक और प्रयोग किया। उन्होंने तीनों लूप से जुड़े बदलाव पुरानी दुनिया के हांटा वायरसों के ग्लाइकोप्रोटीन में किए। अध्ययन के मुताबिक, इन बदलावों से उन प्रोटीनों में PCDH1 से जुड़ने की क्षमता आ गई, जो पहले नई दुनिया के हांटा वायरसों के प्रोटीन में थी। प्रयोगों से यह प्रमाण मिला कि Gn के कुछ खास हिस्सों की बनावट तय कर सकती है कि प्रोटीन रिसेप्टर को पहचान पाएगा या नहीं। यह सिर्फ सूक्ष्मदर्शी से मिली तस्वीर में दिखने वाला आकार का फर्क नहीं था।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अलग-अलग वायरसों की सारी विशेषताएँ इन्हीं तीन लूप से तय होती हैं या सिर्फ इन लूपों को बदल देने से उनके बीच के सभी फर्क समझ में आ जाते हैं। प्रयोगों से खास तौर पर यह पता चला कि ये तीन हिस्से जुड़ने की जगह बनाने में योगदान देते हैं और शोधकर्ताओं के परीक्षण में उनमें बदलाव करना PCDH1 को पहचानने की क्षमता एक प्रोटीन से दूसरे में पहुँचाने के लिए काफी था। इस तरह अध्ययन ने संरचना को देखने के साथ-साथ उसके असर को भी परखा। शोधकर्ता सिर्फ संपर्क की एक संभावित तस्वीर बनाकर नहीं रुके।

एंटीबॉडी गहरे गड्ढे को दो तरीकों से रोकते हैं

टीम ने वायरस को निष्क्रिय करने वाले चार एंटीबॉडी की जाँच की। बनावट और कामकाज से जुड़े विश्लेषणों में पता चला कि वे स्पाइक और रिसेप्टर के बीच जुड़ाव को दो अलग-अलग तरीकों से रोकते हैं। एक तरीके में एंटीबॉडी, PCDH1 के जुड़ने की जगह तक पहुँचने का रास्ता रोक देते हैं। दूसरे तरीके में वे एक ऐसी भौतिक रुकावट बनाते हैं, जिससे रिसेप्टर स्पाइक के पास नहीं पहुँच पाता या उससे ठीक से जुड़ नहीं पाता।

गहरा गड्ढा एक दिलचस्प स्थिति पैदा करता है। रिसेप्टर उसके भीतर तक पहुँच सकता है, लेकिन यही गहराई एंटीबॉडी के लिए वहाँ पहुँचना मुश्किल भी बना सकती है। PCDH1 लंबा और पतला है, इसलिए उसका आकार उसे गड्ढे के भीतर तक जाने देता है। इसके उलट, ज़्यादातर एंटीबॉडी आकार में बड़े होते हैं और शायद उतनी गहराई तक न जा सकें। इस तरह वायरस जुड़ने की जगह को अपनी सतह से हटाता नहीं, बल्कि उसे ऐसे धँसे हुए हिस्से में रखता है जहाँ कुछ अणुओं का पहुँचना कठिन होता है।

श्रेवेपोर्ट स्थित लुइज़ियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र में सूक्ष्मजीव विज्ञान और प्रतिरक्षा विज्ञान के सहायक प्रोफेसर रोहित जांगरा ने बताया कि गड्ढे की गहराई से समझ आता है कि एंटीबॉडी वहाँ तक आसानी से क्यों नहीं पहुँच पाते। आसान शब्दों में कहें तो पतला रिसेप्टर भीतर सरककर संपर्क की जगह तक पहुँच सकता है, जबकि बड़ा एंटीबॉडी गड्ढे के किनारे से टकरा सकता है या उस सही स्थिति में नहीं आ पाता, जिससे वह जुड़ने की जगह तक पहुँच सके। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी एंटीबॉडी असर नहीं कर सकता। अध्ययन में परखे गए चारों एंटीबॉडी जुड़ाव रोक पाए—या तो उन्होंने जगह को ढक दिया या उसके रास्ते में बाधा खड़ी कर दी।

गड्ढे की बनावट से इलाज का नया विचार

खोजी गई बनावट से वायरस-विरोधी दवाएँ विकसित करने की एक दिशा सामने आती है। ऐसे पतले और लंबे अणु तैयार किए जा सकते हैं, जो गड्ढे की गहराई तक पहुँचें और जुड़ने के लिए वायरस से होड़ करें, या उस जगह को बंद कर दें जिसकी रिसेप्टर को ज़रूरत होती है। लेकिन अध्ययन में ऐसा कोई अणु तैयार करके उसकी असरदारता साबित नहीं की गई। यह अभी एक विचार है, जो शोधकर्ताओं की खोजी गई जगह की विशेषताओं पर आधारित है। गड्ढे की गहराई और उसमें रिसेप्टर के पहुँच पाने की वजह समझने से यह अंदाज़ा लगाने में मदद मिलती है कि किसी संभावित इलाज को वहाँ तक पहुँचने के लिए किस तरह का आकार चाहिए।

इस विचार का महत्व यह है कि इसमें जैविक लक्ष्य के आकार को उस अणु के आकार से जोड़ा गया है, जो उसे रोक सकता है। अगर कोई अणु गड्ढे के भीतर नहीं जा सकता, तो स्पाइक के दूसरे हिस्सों से जुड़ पाने के बावजूद वह उसके गहरे हिस्से को निशाना बनाने के लिए उपयुक्त नहीं होगा। इसके उलट, लंबे और पतले आकार का अणु यह जाँचने के लिए बनाया जा सकता है कि क्या वह जुड़ने की जगह तक पहुँचकर Gn और PCDH1 का संपर्क तोड़ सकता है। टीम एंडीज़ वायरस की इस संरचनात्मक कमजोरी को आधार बनाकर वायरस-विरोधी तरीके तलाशना चाहती है। संभव है कि इससे उससे मिलते-जुलते वायरसों, जैसे सिन नोम्ब्रे वायरस, पर भी काम करने के रास्ते खुलें।

यह शोध यात्रा की शुरुआत है, उसका अंत नहीं। अध्ययन वायरस और उसके रिसेप्टर के संपर्क को समझने का एक ढाँचा देता है। यह जुड़ाव और कुछ एंटीबॉडी के काम से जुड़ी संरचनात्मक विशेषताओं की पहचान भी करता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि सुझाए गए अणु असरदार इलाज बन जाएंगे। पहले ऐसे अणुओं को बनाना होगा और फिर जाँचना होगा कि क्या वे गड्ढे तक पहुँचकर सही परिस्थितियों में जुड़ाव रोक सकते हैं। फिर भी, वायरस और कोशिका के संपर्क की सही जगह का पता होने से शोधकर्ताओं को एक साफ शुरुआती बिंदु मिलता है। अब वे वायरस को रोकने की कोशिश उस संपर्क की बनावट जाने बिना नहीं, बल्कि उसकी जानकारी के आधार पर कर सकते हैं।

निष्कर्ष

नेचर में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, एंडीज़ वायरस Gn की चार इकाइयों से बनी स्पाइक का इस्तेमाल करके बीच में एक गहरा गड्ढा बनाता है, जहाँ इंसानी रिसेप्टर PCDH1 जुड़ता है। क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और प्रयोगों से पता चला कि Gn के तीन लूप जुड़ने की जगह बनाने में मदद करते हैं। इनसे जुड़े बदलावों के ज़रिए पुरानी दुनिया के हांटा वायरसों के ग्लाइकोप्रोटीन में भी PCDH1 को पहचानने की क्षमता लाई जा सकी। वायरस को निष्क्रिय करने वाले चार एंटीबॉडी ने या तो जुड़ने की जगह ढककर या वहाँ तक पहुँचने में बाधा डालकर संपर्क रोका। गड्ढे की गहराई बड़े एंटीबॉडी के लिए चुनौती है, जबकि लंबा और पतला रिसेप्टर वहाँ तक पहुँच सकता है। ये नतीजे ऐसे पतले, लंबे अणुओं की खोज का आधार देते हैं, जो गड्ढे में पहुँचकर वायरस को कोशिका से जुड़ने से रोक सकें। यह तरीका एंडीज़ वायरस और शायद उससे जुड़े सिन नोम्ब्रे जैसे वायरसों के खिलाफ आगे के शोध में काम आ सकता है।