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बहुत ज़्यादा प्रसंस्कृत खाने की पहचान करना इतना मुश्किल क्यों है?।

आसान शब्दों में

अमेरिका यह तय करना चाहता है कि कारख़ानों में बड़े पैमाने पर तैयार किए जाने वाले खाने की पहचान कैसे की जाए। ऐसा खाना आम है और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा पाया गया है, लेकिन विशेषज्ञ अभी इसकी साफ़ परिभाषा पर सहमत नहीं हैं। फिलहाल, किसी एक चीज़ को लेकर घबराने के बजाय पूरे दिन के खाने की आदतों पर ध्यान देना बेहतर है।

सरकार एक आधिकारिक परिभाषा क्यों चाहती है?

अगस्त में अमेरिका के स्वास्थ्य एवं मानव सेवा मंत्री रॉबर्ट एफ. केनेडी जूनियर ने घोषणा की कि सरकार अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आधिकारिक परिभाषा तय करने की योजना बना रही है। संघीय स्तर पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। केनेडी ने कहा कि इसका मकसद लोगों को बेहतर खाने के विकल्प चुनने में मदद देना है। हालांकि, उस समय उन्होंने यह नहीं बताया कि किन कसौटियों के आधार पर तय होगा कि कौन-सा खाना इस श्रेणी में आएगा। दो महीने से ज़्यादा समय बीतने के बाद, समाचार रिपोर्टों में कहा गया कि इस योजना को आगे बढ़ाने में अड़चन आ गई है। खाद्य कंपनियों ने इसका विरोध किया और व्हाइट हाउस में इसके संभावित कानूनी नतीजों को लेकर चिंता जताई गई।

यह बहस ऊपर से किसी शब्द का मतलब तय करने जैसी लग सकती है, लेकिन इसका असर खाद्य नीतियों पर पड़ सकता है। अगर सरकारी विभाग इस बात पर सहमत न हों कि अति-प्रसंस्कृत खाने से क्या समझा जाए, तो उत्पादों की निगरानी के लिए एक जैसे नियम बनाना मुश्किल होगा। यह तय करना भी कठिन हो सकता है कि स्कूलों के भोजन को बेहतर बनाने या खरीदारों को पैकेट पर दी गई जानकारी समझने में मदद देने जैसे कदमों में किन चीज़ों को शामिल किया जाए।

चैपल हिल स्थित उत्तर कैरोलाइना विश्वविद्यालय में पोषण विज्ञान की प्राध्यापक लिंडसे स्मिथ टाइली कहती हैं कि साझा कसौटी न होने से उत्पादों पर नज़र रखने वाली एजेंसियों के साथ-साथ निर्माताओं, दुकानदारों और ग्राहकों के बीच भी उलझन पैदा होती है। कोई कंपनी किसी उत्पाद को इस श्रेणी से बाहर मान सकती है, जबकि कोई सरकारी विभाग उसे इसका उदाहरण समझे। साफ़ तौर पर घोषित नियम न हो, तो फैसलों को समझना और उन्हें हर जगह एक ही तरह से लागू करना कठिन हो जाता है।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन समेत कई वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संगठन संघीय स्तर पर एक परिभाषा तय करने के पक्ष में हैं। सिर्फ़ एक शब्द पर सहमति बन जाने से खाने-पीने से जुड़ी सारी समस्याएँ हल नहीं होंगी, लेकिन इससे नीतियाँ बनाने के लिए एक शुरुआती आधार मिल सकता है और उत्पादों व उनसे जुड़े जोखिमों पर चर्चा कम उलझाऊ हो सकती है। तय कसौटी होने पर सरकार बेहतर ढंग से जाँच सकेगी कि कुछ कदम उचित हैं या नहीं, जैसे स्कूलों के भोजन में किसी सामग्री पर रोक लगाना या ग्राहकों को दी जाने वाली जानकारी को बेहतर बनाना।

आम खाने की चीज़ें भी इस बहस में शामिल

अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के आँकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में लोग रोज़ जितनी कैलोरी लेते हैं, उसका औसतन लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा इन उत्पादों से आता है। 1 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों और किशोरों में यह हिस्सा इससे भी अधिक है, हालांकि स्रोत में बढ़ोतरी का कोई तय आँकड़ा नहीं दिया गया है। इससे साफ़ है कि यह मुद्दा रोज़मर्रा के खाने के माहौल से जुड़ा है; बात सिर्फ़ यह तय करने की नहीं कि किसी ने कोई खास नाश्ता खाया या नहीं।

आलू के चिप्स, मिठाइयाँ और कुछ जमे हुए तैयार भोजन इस श्रेणी में आ सकते हैं। ऐसे कई उत्पाद कारख़ानों में अलग-अलग तरीकों से बनाए जाते हैं और उनमें चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा ज़्यादा हो सकती है। रंग, स्वाद या बनावट देने वाली चीज़ें भी मिलाई जा सकती हैं। लेकिन किसी चीज़ का पैकेट में बिकना या किसी निर्माण प्रक्रिया से गुज़रना भर यह तय करने के लिए काफ़ी नहीं कि वह अति-प्रसंस्कृत है। सभी प्रसंस्कृत खाद्य एक जैसे नहीं होते और कुछ प्रसंस्कृत चीज़ें भी संतुलित खानपान का हिस्सा हो सकती हैं।

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की पोषण विशेषज्ञ और एमेरिटा प्राध्यापक मैरियन नेस्ले के मुताबिक, इनमें से कई उत्पादों को कारख़ानों में इस तरह तैयार किया जाता है कि वे लोगों को बहुत लुभावने लगें। इनमें स्वाद, बनावट और मिलाई गई चीज़ों का खास मेल हो सकता है। इस श्रेणी के बारे में सोचने के लिए वह एक आसान सवाल सुझाती हैं: क्या यह चीज़ किसी आम घरेलू रसोई में बनाई जा सकती है? यह समझने का एक मोटा तरीका है, न कि कोई आधिकारिक नियम जिससे हर उत्पाद का फैसला हो जाए।

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन में वैश्विक स्वास्थ्य और जैव-व्यवहार विज्ञान के सहायक प्राध्यापक मैथ्यू लैंड्री बताते हैं कि ऐसे कई उत्पाद इस तरह बनाए जाते हैं कि उन्हें खाना आसान हो और लोग उन्हें बार-बार खाएँ। उनका स्वाद, बनावट और पैकेट चलते-फिरते खाने या थोड़ा और खाने के लिए सुविधाजनक हो सकता है। इनमें से कई उत्पाद आसानी से साथ ले जाए जा सकते हैं और कुछ का बच्चों के बीच बड़े पैमाने पर प्रचार किया जाता है। ये खूबियाँ उनकी लोकप्रियता समझने में मदद करती हैं, लेकिन इनसे अकेले यह साबित नहीं होता कि किसी खास उत्पाद का स्वास्थ्य पर कोई निश्चित असर पड़ता है।

प्रसंस्करण के चार स्तर, पर साफ़ सीमाएँ नहीं

खाने को किस हद तक बदला या तैयार किया गया है, इसके आधार पर कुछ शोधकर्ता नॉवा नाम की वर्गीकरण प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं। इसमें खाद्य पदार्थों को चार समूहों में बाँटा जाता है। पहले समूह में बिना प्रसंस्करण वाली या बहुत मामूली रूप से बदली गई चीज़ें आती हैं, जैसे फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, मेवे, फलियाँ और मांस। दूसरे समूह में खाना पकाने में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली चीज़ें आती हैं, जैसे नमक, चीनी और वसा।

तीसरे समूह में वे खाद्य पदार्थ आते हैं जिन्हें डिब्बाबंद करने या खमीर उठाने जैसे तरीकों से तैयार किया जाता है। कुछ तरह के पनीर इसके उदाहरण हैं। चौथे समूह में वे उत्पाद रखे जाते हैं जिन्हें कारख़ानों में या भौतिक तरीकों से बहुत अधिक बदला गया हो। इनमें मिलाई गई चीनी, सोडियम और संतृप्त वसा की मात्रा ज़्यादा हो सकती है। स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थ, रंग और इमल्सीफ़ायर भी इनमें हो सकते हैं। आलू के चिप्स, मिठाइयाँ और कुछ जमे हुए तैयार भोजन संभावित उदाहरण हैं, लेकिन यह कोई पक्की सूची नहीं है जो एक ही नाम वाले हर उत्पाद पर अपने-आप लागू हो जाए।

नॉवा की एक सीमा यह है कि यह खाने की पोषण संबंधी पूरी गुणवत्ता के बजाय उसे तैयार करने के तरीके पर ज़ोर देता है। इस वजह से इसके वर्गीकरण में कम पोषण देने वाला उत्पाद और उपयोगी पोषक तत्वों वाला उत्पाद एक ही समूह में आ सकते हैं, अगर दोनों प्रसंस्करण की कसौटी पर खरे उतरते हों। आईएफ-प्रो जैसे दूसरे तरीके पोषण संबंधी जानकारी को भी हिसाब में शामिल करने की कोशिश करते हैं। फिर भी, शोधकर्ताओं में अब तक इस बात पर सहमति नहीं बनी है कि इन सभी पहलुओं को जोड़ने का एक साझा तरीका क्या हो।

सीमा तय करना तब और मुश्किल हो जाता है जब सामने ऐसे उत्पाद हों जिनके बारे में सीधा जवाब देना आसान न हो। स्वाद मिला हुआ दही किस श्रेणी में आएगा? अनाज की पट्टियों या टोफू का क्या होगा? जवाब सामग्री, बनाने के तरीके और इस्तेमाल की जा रही वर्गीकरण प्रणाली पर निर्भर हो सकता है। कोई भी सीमा तय की जाए, उसके आसपास कुछ उत्पाद ज़रूर होंगे। कुछ चीज़ों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है, जबकि ग्राहक या विशेषज्ञ उन्हें इसका हिस्सा न मानें; कुछ दूसरी चीज़ें बाहर रह सकती हैं, भले ही उन्हें शामिल करने के तर्क मौजूद हों।

स्वास्थ्य पर असर के बारे में अब तक क्या पता है?

मौजूदा शोध में अति-प्रसंस्कृत खाने और कुछ लंबे समय तक रहने वाली बीमारियों के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध देखा गया है। इनमें टाइप 2 मधुमेह और दिल तथा रक्त-नलिकाओं से जुड़ी बीमारियाँ शामिल हैं। मानसिक स्वास्थ्य के कुछ संकेतकों के खराब होने से भी इन खाद्य पदार्थों का संबंध पाया गया है। लेकिन किसी संबंध का दिखना अपने-आप यह नहीं बताता कि असर क्यों हुआ। इससे यह भी साबित नहीं होता कि हर मामले में कारख़ाने में किया गया प्रसंस्करण ही इसकी वजह है।

कुछ उत्पादों में चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा अधिक हो सकती है और इन पोषण संबंधी पहलुओं का स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। साथ ही, बनाने का तरीका, खाने का पूरा स्वरूप या उसे खाने की आदतों से जुड़े दूसरे पहलू भी भूमिका निभा सकते हैं। अभी यह साफ़ नहीं है कि दिखाई दे रहे संबंधों को इनमें से कौन-सी चीज़ समझाती है और हर चीज़ का योगदान कितना है। इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं कि कारख़ाने में तैयार हर खाना एक ही तरह का नुकसान करता है या उस श्रेणी के सभी उत्पाद एक जैसे हैं।

कुछ शोधकर्ता यह संभावना भी बताते हैं कि कुछ उत्पाद इतने लुभावने हो सकते हैं कि लोग उन्हें बार-बार खाने लगें। आसानी से मिलना, कुछ किस्मों का लंबे समय तक खराब न होना और खास लोगों को ध्यान में रखकर किया गया प्रचार—ये सभी बातें उन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लगातार मौजूद रख सकती हैं। लेकिन इन खूबियों का असर समझने के लिए उस बात में फ़र्क करना ज़रूरी है जो सुनने में सही लगती है और उस बात में जो कारण-परिणाम के रूप में साबित हो चुकी है। केवल खाने की श्रेणी तय करने से स्वास्थ्य से जुड़े सभी सवालों के जवाब नहीं मिलते।

सहमति बनाना इतना कठिन क्यों है?

एक व्यावहारिक मुश्किल यह है कि कंपनियों के लिए पैकेट पर हर उत्पाद को बनाने के सभी तरीकों की जानकारी देना ज़रूरी नहीं है। सामग्री की सूची से कुछ संकेत मिल सकते हैं, जैसे मिलाए गए रंग या कृत्रिम मिठास देने वाले पदार्थ, गाढ़ापन बढ़ाने वाली चीज़ें या ऐसे रासायनिक नाम जिन्हें ग्राहक आसानी से न पहचान पाएँ। लेकिन यह सूची खाने को तैयार करने के दौरान अपनाए गए हर औद्योगिक कदम का पूरा ब्योरा नहीं होती। इसलिए इसे निर्माण प्रक्रिया की सही-सही जानकारी का विकल्प नहीं माना जा सकता।

एक और समस्या वर्गीकरण की प्रकृति से जुड़ी है: प्रसंस्कृत और बिना प्रसंस्करण वाले खाने के बीच हमेशा कोई एक वैज्ञानिक सीमा साफ़ तौर पर मौजूद नहीं होती। नियम बनाने वालों को काम चलाने के लिए एक सीमा चुननी पड़ती है। लेकिन उस सीमा के कारण कुछ ऐसे उत्पाद शामिल हो सकते हैं जिन्हें कई लोग उस श्रेणी का हिस्सा नहीं मानते, या कुछ ऐसे उत्पाद बाहर रह सकते हैं जिन्हें दूसरे लोग उसमें रखना चाहें। परिभाषा का इस्तेमाल कानूनों और पैकेट पर दी जाने वाली जानकारी में जितना ज़्यादा होगा, उतना ही ज़रूरी होगा कि उसकी वजह समझाई जाए और उसका बचाव किया जा सके।

पौधों से बने कुछ विकल्प इस उलझन को दिखाते हैं। जुलाई में छपे एक लेख में लैंड्री और उनके एक सहलेखक ने इस संभावना पर चर्चा की कि सोया से बने टिक्के जैसे प्रसंस्कृत मांस-विकल्प कुछ लोगों को आगे चलकर साबुत वनस्पति खाद्य पदार्थ—मसलन फलियाँ और दालें—अपनाने में मदद कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर प्रसंस्कृत विकल्प फायदेमंद है। यह केवल दिखाता है कि किसी उत्पाद को बनाने के तरीके के आधार पर आँकने से उसके संभावित उपयोग या पूरे खानपान में उसकी जगह और पोषण मूल्य की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

ताज़ा भोजन तक पहुँचने की क्षमता में अंतर को भी ध्यान में रखना चाहिए। जिन परिवारों को पर्याप्त भोजन जुटाने में कठिनाई होती है, वे लंबे समय तक रखा जा सकने वाला पैकेटबंद खाना या जमे हुए भोजन पर निर्भर हो सकते हैं, क्योंकि ये आसानी से मिलते हैं या इन्हें सँभालकर रखना सरल होता है। लैंड्री का मानना है कि संघीय नीति बनाते समय ऐसे परिवारों पर उसके असर का ध्यान रखा जाना चाहिए। वर्गीकरण ऐसा कलंक न बन जाए जो उन लोगों को दोषी ठहराए जिनके पास खाने के कई विकल्प ही नहीं हैं। खानपान बेहतर करने की नीति तब सफल नहीं होगी जब वह कीमत, उपलब्धता और रोज़मर्रा की परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करे।

खाद्य उद्योग भी इस चर्चा में असरदार पक्ष है। नेस्ले कहती हैं कि कंपनियों का विरोध काफ़ी रहा है। टाइली के मुताबिक, सबकी सहमति से परिभाषा तय करने की कोशिश को रोकने के लिए अलग-अलग सरकारी स्तरों पर संगठित दबाव डाला गया। इस मुद्दे की संवेदनशीलता का एक कारण इन उत्पादों का व्यावसायिक महत्व और उनसे होने वाला मुनाफ़ा भी है। आधिकारिक परिभाषा से यह बदल सकता है कि उत्पादों के नियम कैसे बनें, उनका प्रचार कैसे हो या ग्राहकों को उनके बारे में कौन-सी जानकारी दी जाए। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, केनेडी की योजना को उद्योग के विरोध का सामना करना पड़ा और व्हाइट हाउस में संभावित कानूनी नतीजों को लेकर भी चिंता थी। इन वजहों से यह कोशिश अटक गई।

अभी ग्राहक क्या कर सकते हैं?

जब तक संघीय स्तर पर कोई साझा कसौटी तय नहीं होती, ग्राहक इस विचार को अपने पूरे खानपान को समझने का एक तरीका मान सकते हैं। इसे हर खाने की चीज़ को अच्छा या बुरा ठहराने की परीक्षा न बनाएँ। इस बात पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है कि चीनी, नमक या संतृप्त वसा से भरपूर चीज़ें कितनी बार खाई जाती हैं और दिन भर का खाना कितना विविध है। किसी एक भोजन या सामग्री को बाकी खानपान से अलग करके आँकने की ज़रूरत नहीं।

टाइली कहती हैं कि दिन भर में कोई व्यक्ति क्या खाता है, इसे देखना ब्रेड की एक स्लाइस या तुरंत तैयार होने वाले नूडल्स के एक कप की श्रेणी पर उलझने से ज़्यादा उपयोगी हो सकता है। बड़ा सवाल यह है कि बताए गए गुणों वाले उत्पाद भोजन में कितनी बार आते हैं और क्या खाने में सब्ज़ियाँ, फलियाँ और साबुत अनाज शामिल करने की गुंजाइश है। यह तरीका किसी स्वास्थ्य समस्या का पता लगाने का उपाय नहीं है और न ही सही खानपान की सलाह की जगह लेता है। लेकिन इससे खाने को केवल अच्छा या बुरा, और खाने योग्य या पूरी तरह मना—इन दो खानों में बाँटने की आदत कम हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कभी-कभार मिठाई या तुरंत बनने वाला भोजन खा लेने पर घबराने की ज़रूरत नहीं है। अहम बात यह है कि कौन-सी चीज़ें नियमित रूप से खाने का हिस्सा बन रही हैं, न कि किसी खास मौके पर एक उत्पाद खा लेना। वर्गीकरण के चलते यह हकीकत भी नज़रअंदाज़ नहीं होनी चाहिए कि लंबे समय तक रखे जा सकने वाले और आसानी से इस्तेमाल होने वाले उत्पाद कुछ परिवारों के लिए काम के विकल्प हैं—खासकर तब, जब ताज़ा खाने की चीज़ें महँगी हों या मिलती ही न हों।

निष्कर्ष

अमेरिका अति-प्रसंस्कृत खाने की परिभाषा तय करने की कोशिश इसलिए कर रहा है क्योंकि लोगों के रोज़मर्रा के भोजन में इनका हिस्सा बड़ा है। साफ़ परिभाषा से स्कूलों के खाने, पैकेट पर दी जाने वाली जानकारी और उत्पादों की निगरानी से जुड़ी नीतियाँ बनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन सीमा खींचना आसान नहीं है: वर्गीकरण के तरीके अलग-अलग हैं, पैकेट पर निर्माण प्रक्रिया की जानकारी सीमित है और कुछ उत्पादों में औद्योगिक प्रसंस्करण के साथ उपयोगी पोषण गुण भी हो सकते हैं। वहीं, कुछ लोग आर्थिक और व्यावहारिक वजहों से लंबे समय तक टिकने वाले खाने पर निर्भर रहते हैं।

इन खाद्य पदार्थों और कुछ लंबे समय तक रहने वाली बीमारियों तथा मानसिक स्वास्थ्य के संकेतकों के बीच मिले संबंध आगे शोध करने की अहम वजह हैं। फिर भी, इनसे यह तय नहीं होता कि संबंध की वजह प्रसंस्करण है, सामग्री है या कोई और पहलू। वैज्ञानिक मतभेदों, व्यावसायिक दबाव और संभावित कानूनी नतीजों के बीच अगस्त में घोषित संघीय योजना आगे नहीं बढ़ पाई। जब तक कोई साफ़ साझा कसौटी सामने नहीं आती, तब तक पूरे खानपान की आदतों पर ध्यान देना और किसी एक चीज़ को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर चिंता न करना ही इस व्यापक श्रेणी को समझने का संतुलित तरीका है।