आसान शब्दों में
वैज्ञानिकों ने चूहों के दिमाग में एक छोटे केंद्र का अध्ययन किया और पाया कि उसकी सभी कोशिकाएँ एक जैसा संदेश नहीं भेजतीं। कुछ कोशिकाएँ सीखने और फैसले बदलने से जुड़ी दिखीं, जबकि कुछ का संबंध आसपास के संकेतों पर प्रतिक्रिया देने से था। यह समझ आगे चलकर दिमाग पर असर करने वाले इलाजों को अधिक सटीक बनाने में मदद कर सकती है।
एक ही संदेश नहीं, अलग-अलग रास्ते
दिमाग में, मस्तिष्क-तने के पास एक छोटी-सी संरचना होती है, जिसे लोकस कोरूलियस कहा जाता है। आकार में छोटा होने के बावजूद इसकी तंत्रिका कोशिकाएँ नॉरएपिनेफ्रिन नाम का रासायनिक संदेशवाहक बनाती हैं। यह संदेशवाहक ध्यान, मनोदशा और अलग-अलग परिस्थितियों में हमारी प्रतिक्रिया को सँभालने में भूमिका निभाता है। लंबे समय तक माना जाता रहा कि यह संरचना एक ही आम संदेश दिमाग के कई हिस्सों तक भेजती है—मानो कोई लाउडस्पीकर हर दिशा में एक ही बात सुना रहा हो। लेकिन नेचर में छपे नए अध्ययन से एक अलग तस्वीर सामने आती है: यह दरअसल अलग-अलग रास्तों और ठिकानों वाला जाल है, जिसकी हर कोशिका हर अनुभव पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं देती।
आम प्रसारण से खास रास्तों तक
एलन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में दिमाग की तस्वीरें लेने, तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि दर्ज करने, जीन का विश्लेषण करने और चूहों के व्यवहार को परखने के तरीके एक साथ इस्तेमाल किए। उनका सवाल सिर्फ यह नहीं था कि लोकस कोरूलियस की कोशिकाएँ कहाँ हैं। वे यह भी जानना चाहते थे कि उनके तंतु दिमाग के किन हिस्सों तक पहुँचते हैं, किन हालात में कोशिकाएँ सक्रिय होती हैं और क्या अलग-अलग समूहों की अपनी विशिष्ट खूबियाँ हैं।
नतीजों से पता चला कि इस संरचना की कोशिकाएँ एक जैसी नहीं हैं और दिमाग में कोई एक समान संदेश नहीं फैलातीं। कुछ कोशिकाएँ दिमाग के खास हिस्सों से जुड़ती हैं, जबकि दूसरे समूह तंत्रिका तंत्र के अलग-अलग ठिकानों तक अपने तंतु भेजते हैं। यानी नॉरएपिनेफ्रिन कहाँ पहुँचता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कौन-सा तंत्रिका रास्ता ले जा रहा है—न कि इस पर कि कोई संदेश बिना भेदभाव हर जगह फैल रहा है।
लोकस कोरूलियस की लंबाई में ऊपर और नीचे मौजूद कोशिकाओं के बीच साफ अंतर दिखा। इसका ऊपरी, यानी पृष्ठीय, हिस्सा मुख्य रूप से मस्तिष्क की बाहरी परत और अग्रमस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों से जुड़ा था। वहीं निचले, यानी अधर भाग की कोशिकाओं के रास्ते अधिकतर मस्तिष्क-तने और मेरुरज्जु की ओर जाते थे। इससे पता चलता है कि एक ही तंत्रिका संरचना के भीतर मौजूद अलग-अलग समूह अलग क्षेत्रों और कामों पर असर डाल सकते हैं।
इस नक्शे का यह मतलब नहीं कि हर कोशिका सिर्फ एक ही हिस्से से जुड़ती है या हर रास्ते की सीमा बिल्कुल तय है। फिर भी, इससे साफ होता है कि यह व्यवस्था उस पुराने विचार से कहीं अधिक संगठित है, जिसमें एक संदेश सब ओर फैलता हुआ माना जाता था। एक ही रासायनिक संदेश अलग भूमिका निभा सकता है—यह इस पर निर्भर करता है कि वह किस रास्ते से जा रहा है, किन तंत्रिका-जालों तक पहुँचता है और कोशिकाएँ किस समय सक्रिय होती हैं।
सीखने के साथ बदलती कोशिकाओं की प्रतिक्रिया
शोधकर्ताओं ने ऐसे कामों के दौरान कोशिकाओं की गतिविधि जाँची जिनमें चूहों को फैसले लेने और अपना व्यवहार बदलने की जरूरत थी। जब किसी जानवर को मनचाहा नतीजा नहीं मिला और उसने उसके बाद अपनी पसंद बदली, तो लोकस कोरूलियस के ऊपरी हिस्से की कोशिकाओं का एक समूह अधिक सक्रिय हुआ। ये वही कोशिकाएँ थीं जो मस्तिष्क की बाहरी परत से जुड़ती हैं। यह संबंध बताता है कि इन कोशिकाओं का वास्ता नतीजों से सीखने और अपनी पसंद को नए सिरे से तय करने से हो सकता है—सिर्फ सामान्य सतर्कता का संदेश भेजने से नहीं।
यह बात इसलिए अहम है क्योंकि सीखने के लिए दिमाग को जानवर की उम्मीद और असल में हुए नतीजे के बीच फर्क समझना पड़ता है। फिर वह इस फर्क का इस्तेमाल आगे के व्यवहार को दिशा देने में करता है। पसंद बदलते समय ऊपरी हिस्से की कोशिकाओं की गतिविधि बढ़ना इस बात का संकेत है कि उनका मस्तिष्क की बाहरी परत तक जाने वाला रास्ता इस प्रक्रिया में शामिल हो सकता है। लेकिन केवल इस नतीजे से यह साबित नहीं होता कि सीखने के हर चरण को यही कोशिकाएँ पूरा करती हैं। न ही इससे अपने-आप पता चलता है कि नॉरएपिनेफ्रिन पाने वाले तंत्रिका-जाल इस जानकारी को किस तरह दर्ज करते हैं।
निचले हिस्से की कोशिकाओं के समूह में गतिविधि का समय कुछ अलग था। चूहों द्वारा इनाम मिलने की संभावना बताने वाले संकेतों पर ध्यान न देने से कुछ ही पल पहले इन कोशिकाओं की गतिविधि बढ़ गई। इससे यह संभावना बनती है कि ये कोशिकाएँ आसपास के मौकों या संकेतों पर प्रतिक्रिया देने की तैयारी को सँभालने में शामिल हों। यानी इनका काम शायद मस्तिष्क की बाहरी परत तक जाने वाली कोशिकाओं जैसा नहीं है।
यह फर्क केवल तंत्रिका-तंतुओं के अलग दिशाओं में जाने का नहीं है। गतिविधि के साथ दिखे व्यवहार से काम का बँटवारा होने का संकेत मिलता है: ऊपर का रास्ता खराब नतीजे के बाद फैसला बदलने से जुड़ा था, जबकि नीचे के रास्ते की कोशिकाओं की गतिविधि संभावित इनाम के संकेत पर प्रतिक्रिया न देने से पहले बदली। फिर भी इन नतीजों को चूहों पर किए गए खास प्रयोगों के संदर्भ में ही समझना चाहिए। इनसे यह तय नहीं होता कि रोजमर्रा की हर स्थिति में या इंसानों में भी ये कोशिकाएँ ठीक यही भूमिका निभाती हैं।
कोशिकाओं के जीन भी अलग पहचान दिखाते हैं
दोनों समूहों के बीच फर्क सिर्फ उनकी जगह, तंत्रिका-तंतुओं की दिशा या व्यवहार के दौरान उनकी गतिविधि तक सीमित नहीं था। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ऊपरी और निचले हिस्से की कोशिकाओं में जीन के काम करने के ढंग अलग थे। जीन की गतिविधि का मतलब है कि कोई कोशिका अपने जीनों में मौजूद निर्देशों का इस्तेमाल करके ऐसे अणु बनाती है, जो उसकी बनावट और काम को प्रभावित करते हैं।
इस नतीजे से कोशिकाओं के नक्शे में एक और परत जुड़ती है: अलग-अलग क्षेत्रों तक जाने वाली कोशिकाएँ जीन के स्तर पर भी अलग दिखाई देती हैं। यह बात इस संभावना से मेल खाती है कि ये कोशिकाएँ अलग कामों के लिए विशेष रूप से ढली हों और उनके अणुओं से जुड़े गुण उनकी अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद करें। हालांकि, जीन के अलग निशान मिलने का यह अर्थ नहीं कि शोधकर्ताओं ने कोई तैयार इलाज खोज लिया है या कोई एक जीन हर काम को नियंत्रित करता है। यह जानकारी कोशिकाओं की पहचान को और बारीकी से समझने का आधार देती है।
इस काम में शोधकर्ताओं ने तंत्रिका-जोड़ों से लेकर जीवित दिमाग की गतिविधि, व्यवहार और जीन से जुड़ी खूबियों तक कई स्तरों की जाँच की। इस तरीके की खासियत यह है कि हर तरह का आँकड़ा एक अलग सवाल का जवाब देता है: कोशिकाएँ कहाँ जाती हैं, कब सक्रिय होती हैं, उनकी खास पहचान क्या है और उनकी गतिविधि का जानवर के व्यवहार से क्या संबंध है। इन जवाबों को साथ देखने पर लोकस कोरूलियस की बनावट का चित्र केवल शरीर-रचना के नक्शे से कहीं अधिक साफ हो जाता है।
एक तंत्रिका-तंतु की असाधारण लंबी यात्रा
रास्तों का नक्शा बनाते हुए शोधकर्ताओं को कुछ कोशिकाओं के आकार के बारे में भी एक उल्लेखनीय बात पता चली। उन्होंने पूरे दिमाग की तस्वीरें लेकर लगभग 35,000 तंत्रिका कोशिकाओं की जाँच की और करीब 400,000 कोशिकाओं के जीन संबंधी आँकड़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने कुछ जटिल तंत्रिका कोशिकाओं की पूरी बनावट भी दोबारा तैयार की, जिसमें उनके लंबे तंतु शामिल थे।
तंत्रिका कोशिका से दूसरी कोशिकाओं तक संदेश पहुँचाने वाले तंतुओं को अक्षतंतु कहा जाता है। अध्ययन में की गई माप के अनुसार, लोकस कोरूलियस की कोशिकाओं के अक्षतंतुओं की औसत लंबाई करीब 35 सेंटीमीटर थी। शोधकर्ताओं ने जिन अक्षतंतुओं की पूरी बनावट तैयार की, उनमें से एक की कुल लंबाई 70.32 सेंटीमीटर निकली। यह चूहे में मापी गई किसी एक तंत्रिका कोशिका के सबसे लंबे हिस्सों में से एक था।
चूहे के दिमाग के आकार को देखते हुए इतनी लंबाई चौंका सकती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह कोशिका अपना रासायनिक संदेश दिमाग के हर हिस्से में भेजती है। जिस कोशिका का अक्षतंतु काफी दूर तक गया, वह नॉरएपिनेफ्रिन को मस्तिष्क की बाहरी परत के बड़े क्षेत्र तक पहुँचाता था। फिर भी उसका रास्ता चुनिंदा था: वह अनुमस्तिष्क, मस्तिष्क-तने या मेरुरज्जु तक नहीं गया। इससे दूरी और पहुँच के फैलाव के बीच का अहम फर्क समझ आता है—कोई कोशिका लंबा रास्ता तय करके बड़े क्षेत्र को तो ढक सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह पूरे तंत्रिका तंत्र को निशाना बना रही है।
यह बात अध्ययन के मुख्य विचार को और मजबूत करती है। किसी अक्षतंतु का लंबा होना यह नहीं बताता कि उसका संदेश बिना किसी तय दिशा के हर जगह फैल रहा है। कोशिका किन क्षेत्रों तक पहुँचती है, इसकी सीमाएँ बनी रहती हैं। इससे लगता है कि लोकस कोरूलियस का जाल एक जैसी कोशिकाओं से नहीं बना, जो सभी एक ही काम करें; इसमें अलग-अलग जुड़ावों वाले कोशिका-समूह शामिल हैं।
नई जानकारी चिकित्सा के लिए क्यों अहम है
नॉरएपिनेफ्रिन का संबंध ध्यान और मनोदशा को सँभालने से है। इसलिए अवसाद, चिंता और ध्यान-अभाव तथा अति-सक्रियता विकार से निपटने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कुछ दवाएँ इस तंत्र पर असर डालती हैं। अल्ज़ाइमर रोग के शुरुआती दौर में जिन दिमागी कोशिकाओं का क्षय शुरू हो सकता है, उनमें लोकस कोरूलियस की कोशिकाएँ भी शामिल हैं। इन वजहों से इस व्यवस्था को समझना चिकित्सा-अनुसंधान के लिए अहम हो जाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस अध्ययन में किसी इलाज की जाँच हुई या इन बीमारियों के उपचार का कोई नया तरीका साबित हुआ।
नॉरएपिनेफ्रिन की व्यवस्था में बदलाव करने वाली दवाएँ एक ही समय में दिमाग के कई तंत्रिका-जालों पर असर डाल सकती हैं। इसलिए किसी एक रास्ते में फायदेमंद असर के साथ दूसरे रास्तों में अनचाहे असर भी हो सकते हैं। अगर वैज्ञानिक किसी खास लक्षण से जुड़ी कोशिकाओं और उनके संपर्कों की पहचान कर सकें, तो भविष्य में उन पर अधिक सटीक ढंग से असर डालने के तरीके खोजे जा सकते हैं। इससे पूरी व्यवस्था की गतिविधि को बड़े पैमाने पर बदलने की जरूरत कम हो सकती है।
हालाँकि, चूहों में बने इस नक्शे से इंसानों के इलाज तक पहुँचने के लिए कई चरणों में जाँच जरूरी होगी। यह अध्ययन चूहों पर किया गया था और उनके व्यवहार से मिले नतीजे यह साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि इंसानों में भी यही रास्ते ठीक वही काम, उसी स्तर पर करते हैं। इसी तरह, किसी समूह की गतिविधि का एक व्यवहार से जुड़ा होना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि उस समूह को सक्रिय या शांत करने से बीमारी में सुधार होगा। इस काम का सीधा महत्व यह है कि यह आगे के शोध के लिए अधिक स्पष्ट और जाँचे जा सकने वाले सवाल सामने रखता है।
इस शोध को अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों की बीआरएआईएन पहल से सहायता मिली। इस पहल का पूरा नाम है—नवोन्मेषी तंत्रिका-विज्ञान तकनीकों को आगे बढ़ाकर मस्तिष्क पर शोध करने की पहल। यह सहायता इस बात को भी रेखांकित करती है कि अध्ययन में दिमाग की जाँच के कई औज़ारों का सहारा लिया गया—बड़ी संख्या में कोशिकाओं का विश्लेषण करने से लेकर जटिल तंत्रिका-तंतुओं की पूरी बनावट तैयार करने तक।
सीखने की अलग-अलग व्यवस्थाओं के बीच संभावित कड़ी
शोधकर्ताओं ने नॉरएपिनेफ्रिन और डोपामिन की व्यवस्थाओं के बीच कुछ दिलचस्प समानताओं की ओर भी ध्यान दिलाया। डोपामिन दिमाग के बेसल गैन्ग्लिया नाम के हिस्से तक संदेश पहुँचाता है, जो आदतें बनाने में शामिल होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये दोनों व्यवस्थाएँ सीखने में मिलकर काम कर सकती हैं। संभव है कि यह तालमेल दिमाग को एक ही समय में कई तरह की समझ विकसित करने में मदद करे।
इस तुलना से अध्ययन का मुख्य विषय डोपामिन नहीं बन जाता। इसका केंद्र लोकस कोरूलियस की कोशिकाओं की बनावट और उनके रास्ते ही हैं। फिर भी, यह नतीजा एक बड़े सवाल से जुड़ता है: अलग-अलग रासायनिक संदेशवाहक दिमाग में किस तरह तालमेल बिठाते हैं, ताकि वह अनुभवों से सीख सके और अपनी प्रतिक्रिया चुन सके? उनके बीच सहयोग कैसे होता है और उसकी बारीकियाँ क्या हैं, यह अभी आगे के शोध का विषय है। नॉरएपिनेफ्रिन के रास्तों की पहचान भर से इस सवाल का जवाब तय नहीं हो जाता।
निष्कर्ष
नेचर में प्रकाशित एलन इंस्टीट्यूट के अध्ययन से लोकस कोरूलियस की पहले से अधिक बारीक तस्वीर सामने आई है। इस छोटी संरचना में ऐसे कोशिका-समूह हैं जो अपने रास्तों, संपर्कों, गतिविधि और जीन की पहचान में अलग हैं। चूहों में मस्तिष्क की बाहरी परत तक जाने वाली ऊपरी हिस्से की कोशिकाएँ सीखने और पसंद बदलने से जुड़ी दिखीं, जबकि निचले हिस्से की कोशिकाओं का रास्ता अधिकतर मस्तिष्क-तने और मेरुरज्जु की ओर था और उनकी गतिविधि का ढंग अलग था। अध्ययन में बहुत लंबे अक्षतंतु भी मिले: उनकी औसत लंबाई करीब 35 सेंटीमीटर थी और एक की लंबाई 70.32 सेंटीमीटर तक पहुँची। ये नतीजे कोई तैयार इलाज नहीं देते, लेकिन बताते हैं कि नॉरएपिनेफ्रिन दिमाग में किस तरह चुने हुए रास्तों से पहुँच सकता है। यह समझ आगे चलकर दिमागी विकारों का अध्ययन करने और अधिक चुनिंदा उपचारों की संभावना परखने में काम आ सकती है।