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क्या मतिभ्रम के अलावा भी दिमाग़ में नई कड़ियाँ बन सकती हैं?

आसान शब्दों में

चूहों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि साइलोसाइबिन दिमाग़ की कोशिकाओं के बीच नए संपर्क बनाने और कुछ पुराने संपर्कों को बदलने में मदद कर सकता है। इसका असर इस बात पर भी निर्भर था कि दिमाग़ पहले से स्वस्थ था या तनाव से प्रभावित। चूहों में मतिभ्रम से जुड़ा एक व्यवहार इस बदलाव से अलग पाया गया, लेकिन यह अभी साबित नहीं हुआ है कि इंसानों में भी ऐसा ही होगा।

जीवित दिमाग़ के छोटे संपर्कों को देखने की नई खिड़की

इस अध्ययन का नेतृत्व कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा क्रूज़ के शोधकर्ताओं ने किया। इसके नतीजे 1 अक्टूबर 2026 को नेचर न्यूरोसाइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए। लेखकों में जैकब बेकर, एमिली कोगन, शाओरोंग मा, जो लू और यी ज़ू शामिल थे। आम तौर पर प्रयोग के बाद दिमाग़ के ऊतक की जाँच की जाती है, लेकिन इस टीम ने दो-फोटॉन सूक्ष्मदर्शी चित्रण की मदद से कई हफ्तों तक जीवित चूहों के दिमाग़ में तंत्रिका कोशिकाओं के बदलाव देखे।

शोधकर्ताओं ने खास तौर पर डेंड्राइटिक स्पाइन पर नज़र रखी। ये तंत्रिका कोशिकाओं की शाखाओं पर मौजूद छोटे उभार होते हैं, जिनके ज़रिए कोशिकाएँ दूसरी कोशिकाओं से आने वाले कई संकेत ग्रहण करती हैं। इन्हें ऐसे संपर्क-बिंदु समझा जा सकता है जो समय के साथ बदलते रहते हैं: नए उभार बन सकते हैं, पुराने संपर्क मिट सकते हैं और कुछ उभार बढ़कर अधिक स्थिर आकार ले सकते हैं। हर उभार को अलग-अलग समय पर देखने से शोधकर्ताओं को बदलावों का क्रम समझने में मदद मिली। सभी संपर्कों का औसत निकालने से उनके बीच के अलग-अलग बदलाव छिप सकते थे।

साइलोसाइबिन देने के बाद पहले 24 घंटों में नए उभार बनने की दर साफ़ तौर पर बढ़ी। बदलाव केवल उभारों की संख्या तक सीमित नहीं था। टीम ने यह भी देखा कि कुछ नए उभार पहले छोटे और कम स्थिर थे, लेकिन बाद में बड़े, मशरूम जैसे आकार लेने लगे। ऐसा परिपक्व आकार संपर्क को सहारा देने वाले घटकों और तंत्रिका कोशिकाओं के बीच रासायनिक संदेश ग्रहण करने वाले ग्राहियों की मौजूदगी से जुड़ा है। इनमें एएमपीए ग्राही भी शामिल हैं।

नया संपर्क दिखाई देने का यह अर्थ नहीं कि वह आगे भी बना रहेगा या स्थायी भूमिका निभाएगा। इसलिए यह देखना ज़रूरी था कि बने हुए उभारों का आगे क्या हुआ। टीम के नतीजों से पता चला कि साइलोसाइबिन के बाद बने कुछ संपर्क परिपक्व हुए और कई हफ्तों तक बने रहे। इससे ऐसा टिकाऊ ढाँचागत बदलाव अलग पहचाना जा सका जो केवल कोशिका पर उभारों की कुछ समय के लिए हुई बढ़ोतरी भर नहीं था। फिर भी, यह खुला सवाल बना हुआ है कि हर संपर्क का बने रहना दिमाग़ के कामकाज और व्यवहार के लिए क्या मायने रखता है।

दिमाग़ की शुरुआती हालत से बदलता है असर

प्रयोग की एक अहम बात यह थी कि साइलोसाइबिन ने हर हालत में संपर्कों की संख्या बेतरतीब ढंग से नहीं बढ़ाई। बदलाव का ढंग इस पर निर्भर था कि दिमाग़ की स्थिति पहले कैसी थी। स्वस्थ चूहों में नए उभार अधिक बने, लेकिन इसके साथ ही अगले तीन हफ्तों में पहले से मौजूद कुछ संपर्क भी हट गए। यानी बदलाव लगातार और बिना सीमा बढ़ोतरी का नहीं था; इसमें कुछ संपर्क बनने और कुछ मिटने, दोनों की प्रक्रिया शामिल थी।

इस संतुलन को समझने का एक तरीका यह है कि तंत्रिका कोशिकाओं के जाल को हमेशा ज़्यादा-से-ज़्यादा संपर्कों की ज़रूरत नहीं होती। हर पुराने संपर्क को बनाए रखते हुए नए संपर्क जोड़ना ज़रूरी नहीं कि दिमाग़ के लिए बेहतर हो। कौन-से संपर्क जुड़ते हैं और कौन-से हटते हैं, इसमें बदलाव करना भी जाल को व्यवस्थित रखने का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, इस अध्ययन में चूहों के दिमाग़ की बनावट में बदलाव देखा गया; इससे अपने-आप यह पता नहीं चलता कि इंसानों की सोच या मनोदशा पर इसका क्या असर पड़ता है।

टीम ने ऐसे चूहों पर भी प्रयोग किया जिन्हें लंबे समय तक अप्रत्याशित, हल्के तनाव में रखा गया था। तनाव के कुछ पहलुओं और तंत्रिका कोशिकाओं के संपर्कों में गड़बड़ी का अध्ययन करने के लिए इस तरह का प्रयोगात्मक मॉडल इस्तेमाल किया जाता है। इन चूहों में तनाव के साथ कुछ तंत्रिका कोशिकाओं के संपर्क लगातार कम होते देखे गए थे। साइलोसाइबिन देने के बाद उनमें नए उभार बनने की दर उन चूहों की तुलना में अधिक थी जिन्हें तनाव से प्रभावित नहीं किया गया था। प्रयोग के दौरान पहले से मौजूद संपर्कों का और नुकसान भी रुक गया।

इस तुलना से यह साबित नहीं होता कि दवा तनाव से हुआ हर नुकसान ठीक कर देती है। न ही इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इंसानों में अवसाद का इलाज इसी तरह काम करेगा। फिर भी, नतीजे बताते हैं कि दिमाग़ की शुरुआती हालत मायने रख सकती है: प्रभावित तंत्रिका-जाल की प्रतिक्रिया किसी स्वस्थ जाल जैसी हो, यह ज़रूरी नहीं। इसलिए साइलोसाइबिन को ऐसा स्विच मानना ठीक नहीं होगा जो हर दिमाग़ में तंत्रिका-संपर्कों को एक ही तरह से बढ़ा देता है। प्रयोग में दिखा बदलाव इस बात के अनुसार अलग था कि तंत्रिका-जाल किस स्थिति में था।

जुड़ाव में बदलाव और मतिभ्रम के संकेत को अलग करके देखना

इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक अलग सवाल पूछा: क्या दिमाग़ की बनावट में होने वाले बदलाव के लिए वही प्रक्रिया ज़रूरी है जो मतिभ्रम से जुड़े असर पैदा करती है? उन्होंने सेरोटोनिन के 2ए प्रकार के ग्राहियों पर ध्यान दिया, जिन्हें संक्षेप में 5-एचटी2ए कहा जाता है। ये ग्राही दिमाग़ की बाहरी परत की पाँचवीं परत में मौजूद पिरामिड के आकार की कोशिकाओं में पाए गए। ये कोशिकाएँ दिमाग़ की बाहरी परत से आगे संकेत पहुँचाने वाले तंत्रिका-जाल का हिस्सा हैं। हालांकि, अध्ययन में इसी खास तरह की कोशिकाओं के ग्राहियों की भूमिका जाँची गई थी, पूरे दिमाग़ की हर कोशिका की नहीं।

टीम ने जीन में लक्षित बदलाव करके उन कोशिकाओं में इन ग्राहियों की मौजूदगी बदली। फिर उन्होंने नए उभार बनने और उनके परिपक्व होने की तुलना चूहों के सिर झटकने की प्रतिक्रिया से की। चूहों पर किए जाने वाले शोध में इस व्यवहार को मतिभ्रम से जुड़े असर का एक प्रयोगात्मक संकेत माना जाता है। लेकिन यह किसी चूहे के सचेत अनुभव का बयान नहीं है और इसकी सीधी तुलना इंसान के मतिभ्रम के वर्णन से नहीं की जा सकती।

जब पाँचवीं परत की पिरामिड कोशिकाओं में 5-एचटी2ए ग्राही दोबारा मौजूद कराए गए, तब साइलोसाइबिन नए उभार बनने और उनके परिपक्व होने को बढ़ा सका, जबकि सिर झटकने की प्रतिक्रिया नहीं दिखी। दूसरी ओर, जब उन कोशिकाओं से ये ग्राही हटा दिए गए, तो टीम द्वारा देखे जा रहे ढाँचागत बदलाव नहीं हुए, लेकिन सिर झटकने की प्रतिक्रिया बनी रही। इस तरह जीन में किए गए बदलाव ने दो रास्तों को अलग दिखाया: एक इन कोशिकाओं के संपर्कों की नई बनावट से जुड़ा था, जबकि दूसरे का व्यवहारगत संकेत उन कोशिकाओं में इन ग्राहियों के बिना भी दिखाई दिया।

इस तरह के नतीजे को कभी-कभी दोहरा पृथक्करण कहा जाता है। इसका मतलब है कि किसी एक कारक में अलग-अलग दिशाओं में बदलाव करके यह दिखाया जा सकता है कि दो घटनाएँ एक-दूसरे पर उस सरल तरीके से निर्भर नहीं हैं, जैसा पहले माना जा सकता था। अध्ययन के अनुसार, पाँचवीं परत की कोशिकाओं में सेरोटोनिन 2ए ग्राहियों को सक्रिय करना प्रयोग में मापे गए तंत्रिका-संपर्कों के नए रूप बनने के लिए ज़रूरी भी था और पर्याप्त भी। लेकिन सिर झटकने वाले व्यवहार के लिए इन कोशिकाओं में उन ग्राहियों का होना ज़रूरी नहीं था। इसका अर्थ यह नहीं कि शोधकर्ताओं ने मतिभ्रम के बिना काम करने वाली तैयार दवा खोज ली है; उन्होंने एक ऐसी कोशिकीय प्रक्रिया की पहचान की है जो आगे की खोज में मदद कर सकती है।

इलाज की दिशा में इन नतीजों का क्या अर्थ हो सकता है?

मानसिक स्वास्थ्य के इलाज में साइलोसाइबिन की भूमिका का अध्ययन किया जा रहा है। इसमें ऐसे अवसाद के मामले भी शामिल हैं जिनका इलाज मुश्किल होता है। लेकिन चूहों में मिले नतीजों से इंसानों के लिए इलाज का लाभ साबित करने तक पहुँचने के लिए अलग और ठोस प्रमाण चाहिए। इस प्रयोग में तंत्रिका-संपर्कों की बनावट में बदलाव देखा गया, तनाव का एक प्रयोगात्मक मॉडल इस्तेमाल किया गया और चूहों के व्यवहार को मापा गया। इसमें न तो मरीजों का इलाज किया गया और न ही इंसानों में इलाज के नतीजों की तुलना हुई। इसलिए इसे इस बात का प्रमाण नहीं मानना चाहिए कि नए उभारों का बनना अकेले अवसाद के लक्षण घटाने के लिए काफी है।

फिर भी, ये नतीजे दवा पर आगे के शोध के लिए एक अहम संभावना सामने रखते हैं। अगर यह समझा जा सके कि कौन-से संकेत कोशिकाओं को नए संपर्क बनाने और उन्हें परिपक्व करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो ऐसे रासायनिक पदार्थ विकसित करना संभव हो सकता है जो मतिभ्रम पैदा किए बिना दिमाग़ की बनावट में बदलाव की क्षमता को बढ़ाएँ। अभी यह केवल शोध की संभावना है, न कि उपलब्ध दवा या इंसानों में साबित इलाज। किसी खास तरह की कोशिका में अहम ग्राहियों की पहचान हो जाना भी मंज़िल तक पहुँचने के लिए काफी नहीं है। किसी भी नए पदार्थ की सुरक्षा और असर जाँचना होगा, दिमाग़ के अलग-अलग कामों पर उसका प्रभाव समझना होगा और फिर नियंत्रित मानवीय परीक्षणों में नतीजों की पुष्टि करनी होगी।

यह अध्ययन इसलिए भी उपयोगी है कि इसमें इलाज के बाद केवल एक बार माप लेने के बजाय बदलाव के समयक्रम को देखा गया। 24 घंटों में नए उभार दिखना और फिर उनमें से कुछ के परिपक्व होने तथा कई हफ्तों तक बने रहने का पता लगना, प्रतिक्रिया के अलग-अलग चरणों पर सवाल उठाने का मौका देता है। बदलाव शुरू करने वाली चीज़ क्या है? कौन-से संपर्क टिके रहते हैं? और तनाव से प्रभावित दिमाग़ में नए संपर्क जोड़ने तथा पुराने हटाने का संतुलन अलग क्यों होता है? अध्ययन इन सभी सवालों के जवाब नहीं देता, लेकिन जीवित दिमाग़ की बनावट को सीधे देखकर अब इनकी जाँच करना संभव बनाता है।

इस काम को अमेरिका के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान और राष्ट्रीय वृद्धावस्था संस्थान से सहायता मिली। साइलोसाइबिन राष्ट्रीय नशीली दवाओं के दुरुपयोग संस्थान के दवा उपलब्ध कराने के कार्यक्रम के ज़रिए दिया गया। इन जानकारियों से पता चलता है कि यह बुनियादी शोध का काम था, जिसमें जीवित दिमाग़ की तस्वीरें लेने और जीन में लक्षित बदलाव करने की विधियाँ मिलाई गईं। इसका मकसद किसी इलाज के इस्तेमाल की घोषणा करना नहीं, बल्कि पहले उसके पीछे की प्रक्रिया समझना था। अध्ययन की सीमाएँ ध्यान में रखना ज़रूरी है: चूहा इंसान के मानसिक अनुभव का पूरा नमूना नहीं है और सिर झटकने का संकेत चेतना या अनुभूति का सीधा माप नहीं है।

निष्कर्ष

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा क्रूज़ के इस अध्ययन से साइलोसाइबिन के असर की अधिक बारीक तस्वीर सामने आती है। दवा देने के 24 घंटों के भीतर नए उभार बढ़े, उनमें से कुछ परिपक्व हुए और कई हफ्तों तक बने रहे। संपर्कों के बनने और हटने का संतुलन इस बात के अनुसार बदला कि दिमाग़ स्वस्थ था या लंबे तनाव से प्रभावित। जीन में बदलाव करके शोधकर्ताओं ने यह भी दिखाया कि दिमाग़ की बाहरी परत की पाँचवीं परत की कोशिकाओं में संपर्कों का नया रूप बनना, चूहों के सिर झटकने के संकेत से अलग किया जा सकता है। ये नतीजे दिमाग़ में बदलाव की एक संभावित प्रक्रिया समझने और आगे के शोध की दिशा तय करने में मदद करते हैं; वे इंसानों के लिए इलाज का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। लाभ और सुरक्षा की पुष्टि के लिए इंसानों पर सीधे चिकित्सकीय परीक्षण ज़रूरी होंगे।