आसान शब्दों में
बिल्ली के साथ रहने से मन और शरीर पर क्या असर पड़ता है, यह सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि आप कितने साल से साथ हैं। कुछ अध्ययनों में बिल्ली के पास रहने और उसके साथ प्यार से घुलने-मिलने का बेहतर मनोदशा और स्फूर्ति के साथ संबंध दिखा है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि बिल्ली ही मन को बेहतर बनाती है; हो सकता है कि पहले से प्रसन्नचित्त लोग अपनी बिल्लियों के करीब अधिक रहते हों।
साल गिनने के बजाय नज़दीकी को समझना
किसी व्यक्ति और उसकी बिल्ली के बरसों साथ रहने के बावजूद गहरा रिश्ता न बने, यह संभव है। वहीं, कोई दूसरी बिल्ली रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपने इंसान की पक्की साथी बन सकती है। इस फर्क से एक सवाल उठता है: बिल्ली के साथ रहने का मन पर पड़ने वाला असर साथ बिताए समय से जुड़ा है या इस बात से कि दोनों के बीच कितना अपनापन और मेलजोल है? हाल के कुछ अध्ययनों ने मनोदशा, हार्मोन और गतिविधि को मापकर इसका जवाब तलाशा है। उनसे दिलचस्प संकेत मिले हैं, हालांकि वे शुरुआती हैं और उनकी बड़े पैमाने पर जाँच होना अभी बाकी है।
साल नहीं, पास रहने को मापना
क्योटो विश्वविद्यालय की शोधकर्ता साहो ताकागी के नेतृत्व में हुए एक अध्ययन में बिल्लियों और उनके मालिकों के रिश्ते को देखा गया। टीम ने 29 बिल्लियों और उनके साथ रहने वाले 19 लोगों का एक महीने तक अध्ययन किया। इसके नतीजे आईसाइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए। शोधकर्ताओं ने लोगों से केवल यह नहीं पूछा कि वे अपनी बिल्लियों के बारे में कैसा महसूस करते हैं। उन्होंने मनोदशा से जुड़े सवालों के साथ शरीर के कुछ संकेत भी मापे और घर में बिल्ली तथा उसके मालिक के एक-दूसरे के कितने पास रहने का पता लगाने की कोशिश की।
बिल्लियों के गले में ब्लूटूथ संकेत भेजने वाले छोटे उपकरण लगाए गए थे, जो उनके मालिकों के फोन से संपर्क करते थे। इनसे यह अंदाज़ा लगाया गया कि दोनों कब एक-दूसरे के पास थे; पूरे दिन में साथ बिताए कुल मिनट नहीं गिने गए। यह फर्क अहम है: अध्ययन में घर के भीतर नज़दीकी देखी गई, न कि खेलते हुए बिताए समय या देखभाल के घंटों की गिनती। बिल्लियों और उनके मालिकों के मूत्र के नमूने भी लिए गए। उनमें ऑक्सीटोसिन का स्तर मापा गया, जो सामाजिक जुड़ाव से जुड़ा हार्मोन है। साथ ही, कॉर्टिसोल का स्तर भी मापा गया, जिसका इस्तेमाल तनाव के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया के संकेतक के रूप में किया जाता है।
नतीजों में बिल्ली के शारीरिक रूप से पास रहने और मालिकों की सकारात्मक मनोदशा के कुछ पहलुओं के बीच संबंध दिखा, खासकर स्फूर्ति और सक्रिय महसूस करने के मामले में। लेकिन अच्छे मूड से जुड़ी हर बात में ऐसा संबंध नहीं मिला। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि बिल्ली का पास होना हर तरह की सकारात्मक भावना को बेहतर करता है। बिल्लियों और उनके मालिकों में ऑक्सीटोसिन का स्तर भी मिलते-जुलते ढंग से बदलता दिखा। साथ ही, जिन बिल्लियों में इस हार्मोन का स्तर अधिक था, उनके मालिकों ने नकारात्मक मनोदशा का स्तर कम बताया।
बिल्ली को कितने समय से पाल रहे हैं, इससे मनोदशा का भरोसेमंद अनुमान नहीं लगा। यानी साथ रहने की अवधि का बेहतर या बदतर मूड से कोई स्थिर संबंध नहीं दिखा। शुरुआती विश्लेषण में एक से अधिक बिल्लियाँ पालने और कुछ नकारात्मक भावनाओं के बीच संबंध दिखा था, लेकिन घरों के बीच के फर्क को ध्यान में रखने के बाद यह संबंध नहीं रहा। इससे पता चलता है कि विश्लेषण में घर से जुड़ी दूसरी बातों को शामिल करने पर नतीजों की समझ बदल सकती है। केवल दो चीज़ों के बीच दिखाई देने वाले संबंध को देखकर पक्का निष्कर्ष निकालना इसलिए ठीक नहीं।
नतीजे क्या बताते हैं और क्या नहीं
यह अध्ययन नज़दीकी के विचार को केवल निजी एहसास तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे दर्ज किए जा सकने वाले संकेत के रूप में देखता है। फिर भी उपकरण से मिली जानकारी को अपने आप प्यार या गहरे मेलजोल का माप नहीं माना जा सकता। उससे यह पता नहीं चलता कि बिल्ली दुलार चाह रही थी, मालिक के पास सो रही थी या कमरे के दूसरे कोने में बैठी थी। यह भी साफ नहीं होता कि पास आने की पहल किसने की या उस समय दोनों कैसा महसूस कर रहे थे। इसलिए इस माप को रिश्ते की पूरी तस्वीर नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा समझना चाहिए।
सबसे अहम बात यह है कि ये नतीजे केवल संबंध दिखाते हैं। यानी आँकड़ों में दो बातें साथ-साथ दिखाई दीं, लेकिन उनसे यह तय नहीं होता कि पहले कौन-सी हुई या एक ने दूसरी को जन्म दिया। हो सकता है कि बिल्ली का पास रहना उसके मालिक को अधिक सक्रिय करे और दिन के कुछ पहलुओं को बेहतर बनाए। यह भी हो सकता है कि जो लोग पहले से अधिक स्फूर्त महसूस करते हैं, वे अपनी बिल्लियों के पास बैठने और उनसे घुलने-मिलने के लिए ज्यादा तैयार रहते हों। इंसान और बिल्ली का स्वभाव, घर की बनावट और वहाँ मौजूद दूसरे जानवर भी नज़दीकी तथा मनोदशा—दोनों पर असर डाल सकते हैं।
अध्ययन में शामिल लोगों और बिल्लियों की संख्या भी सावधानी बरतने की वजह है। हार्मोन के आँकड़े 29 में से केवल 24 बिल्लियों के लिए उपलब्ध थे। वहीं, 19 बिल्ली-मालिकों में 16 महिलाएँ थीं। इन सीमित संख्याओं से अध्ययन का महत्व खत्म नहीं होता, लेकिन इसके नतीजों को हर बिल्ली-मालिक या अलग-अलग समाजों और रहने की परिस्थितियों पर लागू करना मुश्किल होता है। विश्वविद्यालय ने भी साफ किया कि शोध में संबंध सामने आए हैं, कारण और असर का पक्का प्रमाण नहीं।
थोड़ी देर का मेलजोल भी स्फूर्ति से जुड़ सकता है
बिल्ली के पास रहने और स्फूर्त महसूस करने के बीच दिखा संबंध जापान में 2023 में हुए एक प्रयोग से भी मेल खाता है। इसमें बिल्लियाँ पालने वाले 32 लोगों ने हिस्सा लिया। ताकुमी नागासावा की टीम ने उनसे दो में से एक स्थिति में दस मिनट बिताने को कहा: अपनी बिल्ली के साथ बातचीत करना या उससे अलग रहकर आराम करना। इसके बाद शोधकर्ताओं ने लोगों की स्फूर्ति और आनंद की भावना में हुए बदलाव के साथ उनकी हृदय गति से जुड़े आँकड़े भी देखे।
आराम करने के बाद लोगों में स्फूर्ति और आनंद के संकेत घटे, लेकिन बिल्लियों के साथ समय बिताने के बाद ऐसी गिरावट नहीं दिखी। हृदय की धड़कन से मिली जानकारी भी इसी तरह के नतीजे से मेल खाती थी। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि बिल्लियों का असर केवल इंसान को शांत करने तक सीमित नहीं हो सकता। उनके साथ मेलजोल व्यक्ति को जगा और सक्रिय भी कर सकता है—यानी उसमें चौकन्नेपन और स्फूर्ति का एहसास बढ़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति हर परिस्थिति में बिल्ली के साथ समय बिताकर ज्यादा सक्रिय महसूस करेगा। इस खास प्रयोग में थोड़ी देर का मेलजोल, बिना बातचीत के आराम करने से अलग प्रतिक्रिया से जुड़ा था।
यह प्रयोग क्योटो के अध्ययन में एक और पहलू जोड़ता है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि बिल्ली तनाव कम करने या आराम पाने में मदद करती है या नहीं; यह भी पूछा जा सकता है कि उसके साथ समय बिताने से ऊर्जा या आनंद की भावना बढ़ती है या नहीं। फिर भी, किसी खास प्रयोग में बिताए गए दस मिनट रोज़मर्रा में बिल्ली के साथ होने वाले हर तरह के मेलजोल की नुमाइंदगी नहीं करते। थोड़े समय के बदलाव को देखकर लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य पर असर होने का दावा भी नहीं किया जा सकता।
बिल्ली की पहल और कोमल स्पर्श का महत्व
एक और अध्ययन इस विचार को बल देता है कि किसी जानवर का केवल आसपास होना ही नहीं, बल्कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है, यह भी मायने रखता है। 2021 में पीयरजे पत्रिका में प्रकाशित शोध में 30 महिलाओं में उनकी बिल्लियों के साथ समय बिताने से पहले और बाद में ऑक्सीटोसिन का स्तर मापा गया। फिर इन बदलावों की तुलना उस दूसरी स्थिति से की गई, जिसमें प्रतिभागियों ने किताब पढ़ते हुए समय बिताया था।
सभी प्रतिभागियों को एक साथ देखने पर बिल्ली के साथ बैठने के बाद ऑक्सीटोसिन का स्तर किताब पढ़ने के बाद जितना नहीं बढ़ा। लेकिन मुलाकात के दौरान क्या हुआ, इससे तस्वीर बदली। जब बिल्ली खुद पास आई, तब हार्मोन का स्तर अधिक बढ़ा। प्यार से सहलाने और हल्के आलिंगन के समय भी बढ़ोतरी ज्यादा थी। इसके उलट, जब मेलजोल के दौरान बिल्ली ने खरोंचा या संपर्क खुरदरा हो गया, तब ऑक्सीटोसिन का स्तर घटा। यानी बिल्ली का बस मौजूद होना हर बार एक जैसी प्रतिक्रिया के लिए काफी नहीं था; प्रतिक्रिया का संबंध संपर्क के तरीके और बिल्ली की अपनी भागीदारी से भी था।
इस नतीजे को हर बिल्ली के लिए एक ही तरह के व्यवहार की सलाह नहीं समझना चाहिए। अलग-अलग बिल्लियों की पसंद अलग होती है। जो स्पर्श एक बिल्ली को आराम दे, वह दूसरी को परेशान कर सकता है। फिर भी यह अध्ययन याद दिलाता है कि रिश्ता दोतरफा होता है। बिल्ली कैसी प्रतिक्रिया देती है और वह खुद पास आना चाहती है या नहीं, यह मेलजोल का अहम हिस्सा है। केवल इंसान के पास मौजूद होना उस आपसी भागीदारी की जगह नहीं ले सकता।
बिल्लियाँ अपने मालिकों से जुड़ सकती हैं
कुछ बिल्लियाँ स्वतंत्र दिखाई देती हैं या खुद से मेलजोल कम करती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बिल्लियाँ मजबूत लगाव बना ही नहीं सकतीं। 2019 में करंट बायोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि करीब 65% बिल्लियों और बिल्ली के बच्चों ने अपने मालिकों के साथ सुरक्षित जुड़ाव के संकेत दिखाए। अध्ययन में की गई तुलना में यह हिस्सा इंसानी शिशुओं में देखी गई दर के बहुत करीब था।
इसका मतलब यह नहीं कि हर बिल्ली अपना लगाव एक ही तरह से दिखाएगी या बिल्ली और बच्चे का देखभाल करने वाले व्यक्ति से रिश्ता हर पहलू में एक जैसा होता है। लेकिन यह नतीजा उस आम धारणा को चुनौती देता है कि बिल्लियाँ स्वभाव से अलग-थलग रहती हैं और इंसानों से जुड़ती नहीं। लगाव कभी शांत व्यवहार में दिख सकता है, तो कभी कुछ खास समय पर पास आने की इच्छा में। इसके लिए बिल्ली का लगातार साथ-साथ रहना या हर बार इंसान की पहल पर साफ प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं।
सभी शोध एक ही नतीजे पर नहीं पहुँचते
हर अध्ययन में एक जैसी तस्वीर नहीं दिखती। 2003 में स्विट्ज़रलैंड में सैकड़ों लोगों को शामिल करके किए गए एक अध्ययन में बिल्ली की मौजूदगी और खराब मनोदशा में कमी के बीच संबंध मिला। यह संबंध उस कमी के करीब था जो किसी मानव साथी की मौजूदगी से जुड़ी थी। लेकिन सकारात्मक मनोदशा में सुधार का संबंध बिल्ली से नहीं, बल्कि साथी से था। अपने पालतू जानवरों से लोगों का लगाव भी अकेले यह नहीं समझा पाया कि उनकी नकारात्मक मनोदशा क्यों कम थी।
यह शोध क्योटो वाले अध्ययन से अलग था, क्योंकि इसमें लोगों से पूछा गया कि वे अपनी बिल्लियों से कितना जुड़ाव महसूस करते हैं। क्योटो के अध्ययन में उपकरणों से दर्ज की गई शारीरिक नज़दीकी पर ध्यान था। इसलिए दोनों अध्ययन एक ही चीज़ को नहीं परखते। फिर भी, उनकी तुलना से पता चलता है कि लगाव का एहसास हमेशा मनोदशा में मिलने वाले फायदे के बराबर नहीं होता। उदासी या परेशानी में कमी और खुशी या स्फूर्ति जैसी सकारात्मक भावनाओं का बढ़ना भी अलग-अलग बातें हैं।
बिल्लियों के नतीजों की तुलना कुत्तों पर हुए शोध से करने पर भी फर्क दिखाई देता है, हालांकि इससे यह नहीं निकलता कि एक जानवर दूसरे से बेहतर है। स्वीडन में 2019 के एक अध्ययन में 58 कुत्तों और उनके मालिकों पर नज़र रखी गई। बालों के नमूनों से दोनों में लंबे समय के तनाव का स्तर मापा गया और उनके बीच संबंध मिला। क्योटो के अध्ययन में बिल्लियों और उनके मालिकों के कॉर्टिसोल के बीच ऐसा मजबूत संबंध नहीं दिखा। इससे यह संकेत मिल सकता है कि बिल्लियों और इंसानों में तनाव के संकेतक एक ही तरह से मेल नहीं खाते। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि बिल्लियाँ अपने मालिकों की हालत से प्रभावित नहीं होतीं या उनके व्यवहार पर प्रतिक्रिया नहीं देतीं।
सबूत अभी शुरुआती क्यों हैं
इन अध्ययनों की बनावट और उनके मापने के तरीके अलग-अलग हैं। कुछ में पास रहने को दर्ज किया गया, कुछ में थोड़ी देर की मुलाकात आज़माई गई, तो कुछ ने लगाव के बारे में पूछा या हार्मोन मापे। इसलिए इनके नतीजों को इस तरह जोड़ना ठीक नहीं, मानो हर अध्ययन ने एक ही प्रयोग दोहराया हो। फिर भी, इन शोधों से इस आम दावे की अधिक बारीक समझ मिलती है कि बिल्लियाँ मनोदशा बेहतर करती हैं। कुछ फायदे पास रहने और अच्छे मेलजोल से जुड़े हो सकते हैं; उनका असर स्फूर्ति बढ़ने या नकारात्मक मनोदशा में कमी के रूप में दिख सकता है, लेकिन हर माप में ऐसा नज़र आए, यह जरूरी नहीं।
शरीर के संकेतों को भावनाओं का सीधा माप भी नहीं माना जा सकता। ऑक्सीटोसिन और कॉर्टिसोल पर कई चीज़ों का असर पड़ता है। इनमें से किसी एक का बढ़ना या घटना अपने आप यह तय नहीं करता कि व्यक्ति खुश है या तनाव में। दूसरी ओर, मनोदशा से जुड़े सवालों के जवाब इस बात पर निर्भर करते हैं कि प्रतिभागी अपनी भावनाओं को कैसे समझते हैं और उन्हें कितना ठीक से याद कर पाते हैं। अलग-अलग तरीकों से जानकारी जुटाना उपयोगी है, लेकिन इससे माप की सारी सीमाएँ खत्म नहीं हो जातीं।
इस तस्वीर को साफ करने के लिए बड़े अध्ययनों की जरूरत है, जिनमें अलग-अलग पृष्ठभूमि के बिल्ली-मालिक शामिल हों और जिन पर लंबे समय तक नज़र रखी जाए। साथ ही, मेलजोल के अलग-अलग रूपों को अलग करके देखना होगा—जैसे बिल्ली का खुद पास आना, उसे सहलाना, उसके साथ खेलना या बिना सीधे संपर्क के उसी जगह बैठना। यह जानना भी उपयोगी होगा कि नतीजे बिल्ली और उसके मालिक के स्वभाव या घर में मौजूद दूसरे जानवरों के अनुसार बदलते हैं या नहीं। तब समझा जा सकेगा कि पास होना ही सबसे अहम बात है या यह किसी ऐसे आपसी रिश्ते का संकेत है जिसमें और भी खास बातें शामिल हैं।
निष्कर्ष
कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि बिल्ली और उसके मालिक के रिश्ते का मनोदशा से जुड़ाव, साथ बिताए सालों से अधिक, आपसी नज़दीकी और मेलजोल के तरीके पर निर्भर हो सकता है। क्योटो के अध्ययन में 29 बिल्लियों और 19 मालिकों को एक महीने तक देखा गया। उसमें पास रहने का संबंध स्फूर्ति के कुछ संकेतों से था और बिल्लियों तथा उनके मालिकों के ऑक्सीटोसिन के बीच भी जुड़ाव दिखा। दूसरे शोधों ने बिल्ली की पहल और कोमल स्पर्श के महत्व की ओर ध्यान दिलाया। एक छोटे प्रयोग में बिल्ली के साथ मेलजोल के बाद लोगों में सक्रियता के संकेत भी बने रहे।
फिर भी, इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि बिल्लियाँ ही मनोदशा बेहतर करती हैं या हर बिल्ली और हर व्यक्ति पर एक जैसा असर पड़ता है। नमूने सीमित हैं, मापने के तरीके अलग हैं और कुछ नतीजे सकारात्मक भावनाएँ बढ़ने के बजाय नकारात्मक मनोदशा घटने से जुड़े हैं। फिलहाल सबसे संतुलित बात यही है कि आपसी और सहज नज़दीकी रिश्ते का एक अहम पहलू हो सकती है। केवल यह गिनना कि बिल्ली के साथ कितने साल बिताए, उस रिश्ते की गहराई या उसके असर को समझने के लिए काफी नहीं।