आसान शब्दों में
नई पड़ताल बताती है कि आर्कटिक में सर्दियों के दौरान जितनी बर्फ़ बची रहने का अंदाज़ा लगाया गया था, असल में उससे कम हो सकती है। वैज्ञानिकों ने समुद्र तल में हज़ारों साल से सुरक्षित रासायनिक निशानों की तुलना 27 जलवायु मॉडलों से की। इससे बर्फ़ के भविष्य का अनुमान बेहतर हो सकता है और यह समझने में मदद मिल सकती है कि ध्रुवों के बदलाव दूर के इलाकों की बर्फ़बारी और बारिश से कैसे जुड़े हैं।
आर्कटिक की सर्दी का असर दूर तक
गर्मियों में समुद्री बर्फ़ का कम होना अक्सर चर्चा में रहता है, लेकिन सर्दियों की कहानी भी उतनी ही अहम है। ठंड के महीनों में आर्कटिक महासागर पर बर्फ़ हर साल अपने सबसे बड़े फैलाव तक पहुँचती है। यह फैलाव तय करने में भूमिका निभाता है कि समुद्र के पानी से कितनी गर्मी और नमी हवा में जाती है। इसलिए सर्दियों की बर्फ़ का सही अंदाज़ा लगाना केवल मौसम के नक्शे का छोटा-सा ब्यौरा नहीं है; इससे यह समझने में मदद मिलती है कि आर्कटिक में हो रहे बदलाव उसकी सीमाओं से बाहर मौसम के ढर्रों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
सर्दियों का आर्कटिक, सिर्फ़ आर्कटिक का मामला नहीं
समुद्री बर्फ़ समुद्र के पानी और हवा के बीच एक परत की तरह काम करती है। जब बर्फ़ का फैलाव घटता है, तो समुद्र की सतह का बड़ा हिस्सा खुल जाता है और पानी से हवा में गर्मी तथा नमी जाने का तरीका बदल जाता है। वैज्ञानिकों के लिए ये बदलाव अहम हैं, क्योंकि इनका संबंध बहुत दूर के इलाकों के मौसम में होने वाले फेरबदल से हो सकता है। हालांकि, ध्रुव की हालत और किसी इलाके के स्थानीय मौसम के बीच का रिश्ता पेचीदा है; इसे किसी एक आसान नियम से नहीं समझाया जा सकता।
पहले के कुछ अध्ययनों में ध्रुवीय बर्फ़ के घटने को ब्रिटेन, उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सर्दियों के अधिक ठंडा होने और ज़्यादा बर्फ़बारी से जोड़ा गया है। इसलिए बर्फ़ का बेहतर अनुमान लगाने का मतलब केवल यह जानना नहीं है कि आगे चलकर आर्कटिक महासागर कैसा दिखेगा। इससे उन जलवायु जोखिमों की अधिक साफ़ तस्वीर बनाने में भी मदद मिल सकती है, जिनका असर आबादी वाले इलाकों पर पड़ सकता है। नए नतीजे इन रिश्तों को बेहतर समझने का रास्ता खोलते हैं, न कि किसी एक साल के मौसम की पक्की भविष्यवाणी करते हैं।
यह सवाल इसलिए भी अहम है कि हाल के वर्षों में सर्दियों की समुद्री बर्फ़ के फैलाव में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज हुए हैं। मार्च 2025 में साल का सबसे बड़ा फैलाव आधुनिक रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे कम स्तर पर था। 2026 में आर्कटिक फिर उसी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा। साल का अधिकतम फैलाव उस क्षेत्र को कहते हैं जहाँ तक ठंड के मौसम की चरम अवधि में बर्फ़ फैलती है; इसका मतलब गर्मियों में मौजूद बर्फ़ की मात्रा या बर्फ़ के कुल आयतन से नहीं है।
इसके बावजूद सर्दियों की बर्फ़ में आगे होने वाले बदलावों का अनुमान लगाना उतना आसान नहीं, जितना मॉडलों की बड़ी संख्या देखकर लग सकता है। ठंड के महीनों में बर्फ़ का फैलाव कितना होगा, इसका हिसाब लगाते समय जलवायु मॉडल एक-दूसरे से काफ़ी अलग नतीजे दे सकते हैं। मॉडल किसी सामान्य दिशा पर सहमत हों, लेकिन बर्फ़ के क्षेत्रफल को लेकर अलग-अलग अनुमान दें, तो भविष्य की संभावित तस्वीर का दायरा बड़ा बना रहता है। इससे नतीजों की तुलना करना और सबसे संभावित बदलाव का अंदाज़ा लगाना कठिन हो जाता है।
समुद्र तल के नीचे सुरक्षित पुराने सुराग
आधुनिक दौर के रिकॉर्ड पर ही निर्भर रहने के बजाय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और मेक्सिको के गणितीय अनुसंधान केंद्र, जिसे संक्षेप में CIMAT कहा जाता है, के शोधकर्ताओं ने समुद्र तल में पुरानी जलवायु के छोड़े हुए निशान खोजे। उन्होंने मध्य होलोसीन के समय की समुद्री तलछट का अध्ययन किया, जो करीब 6,000 साल पुरानी है। उस दौर में पृथ्वी की कक्षा में छोटे बदलावों के कारण आर्कटिक आज की ठंडी स्थितियों के मुकाबले अधिक गर्म और कम बर्फ़ से ढका हुआ था।
पुरानी तलछट समुद्र की तस्वीर जस की तस नहीं सँभालती, लेकिन उसमें उन जीवों के रासायनिक निशान सुरक्षित रह सकते हैं जो कभी वहाँ रहते थे। ऐसा ही एक जैविक अणु IP25 है, जिसे समुद्री बर्फ़ से जुड़ी शैवाल बनाती हैं। जब इन शैवाल के अवशेष तलछट में दबकर रह जाते हैं, तो उनका निशान शोधकर्ताओं को अतीत में बर्फ़ की मौजूदगी का अंदाज़ा लगाने में मदद कर सकता है। दल ने इस संकेतक का अब तक का सबसे बड़ा आँकड़ा-संग्रह तैयार किया और उसमें खुले पानी में रहने वाले जीवों के छोड़े दूसरे रासायनिक निशान भी जोड़े।
बर्फ़ से जुड़े संकेतों की तुलना खुले पानी के संकेतों से करने पर, केवल एक निशान के सहारे बनाई गई तस्वीर के मुकाबले अधिक संतुलित जानकारी मिलती है। बर्फ़ से जुड़ी शैवाल का निशान बर्फ़ीली परिस्थितियों का संकेत देता है, जबकि दूसरे रासायनिक निशान खुले समुद्र की परिस्थितियों के बारे में बताते हैं। इन दोनों तरह के सुरागों की मदद से शोधकर्ताओं ने हज़ारों साल पहले आर्कटिक के कुछ हिस्सों में बर्फ़ की हालत का अनुमान लगाया और फिर उस पुराने दौर का इस्तेमाल जलवायु मॉडलों की जाँच के लिए किया।
मध्य होलोसीन का समय इसलिए उपयोगी है, क्योंकि यह अधिक गर्म और कम बर्फ़ वाले आर्कटिक का वास्तविक उदाहरण देता है, न कि कंप्यूटर से निकला हुआ केवल एक नतीजा। उस समय गर्मी बढ़ने का कारण पृथ्वी की कक्षा में प्राकृतिक बदलाव थे, जबकि आज का गर्म होना मानवीय गतिविधियों से जुड़ा है। फिर भी शोध दल का ध्यान इस बात पर था कि गर्मी के जवाब में बर्फ़ कैसे बदलती है। बर्फ़ बनने और पिघलने के पीछे काम करने वाली बुनियादी भौतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन अलग-अलग जलवायु हालात में भी किया जा सकता है।
27 जलवायु मॉडलों की जाँच कैसे हुई?
पुराने समय में बर्फ़ की हालत का पुनर्निर्माण करने के बाद शोधकर्ताओं ने उस दौर के सबूतों की तुलना 27 जलवायु मॉडलों से मिली गणनाओं से की। जलवायु मॉडल एक कंप्यूटर आधारित औज़ार है, जो समुद्र, हवा और बर्फ़ जैसी चीज़ों के आपसी असर का हिसाब लगाता है। फिर इसी हिसाब से अतीत का अनुकरण किया जाता है या भविष्य की संभावनाएँ समझी जाती हैं। लेकिन हर मॉडल एक-सा सटीक नहीं होता; कुछ मॉडल पुराने हालात को दूसरों से बेहतर दिखा सकते हैं।
दल ने इसके लिए एक सांख्यिकीय तरीका अपनाया, जिसे बेयसियन वेटिंग कहा जाता है। आसान शब्दों में, जिन मॉडलों के नतीजे तलछट से मिले सबूतों के ज़्यादा करीब थे, उन्हें कुल अनुमान में अधिक वज़न दिया गया; जो उनसे दूर थे, उनका असर घटाया गया। इसका मतलब यह नहीं था कि एक मॉडल चुनकर बाकी सभी को छोड़ दिया गया। इसके बजाय, पुराने सबूतों से मेल के आधार पर अलग-अलग मॉडलों के योगदान की मात्रा बदली गई।
इस तरह की जाँच अतीत के बारे में हमारी जानकारी को भविष्य के अनुमान से जोड़ती है। हर मॉडल के नतीजे को बराबर भरोसेमंद मानने के बजाय, यह तरीका पुराने जलवायु रिकॉर्ड का उपयोग करके देखता है कि बर्फ़ की प्रतिक्रिया बताने में कौन-से मॉडल बेहतर हैं। उचित वज़न तय करने के बाद शोधकर्ताओं ने यही तरीका आधुनिक दौर के अनुकरण और भविष्य के परिदृश्यों पर भी लागू किया।
इस कदम के पीछे यह विचार है कि समुद्री बर्फ़ को नियंत्रित करने वाली भौतिक प्रक्रियाएँ केवल इसलिए पूरी तरह नहीं बदल जातीं कि गर्मी बढ़ने का कारण या समय अलग है। इसलिए दल ने माना कि अतीत की कसौटी पर मॉडलों को मिले वज़न से हाल के अतीत और भविष्य के अनुमान भी बेहतर हो सकते हैं। इससे अनिश्चितता खत्म नहीं होती; बल्कि अलग-अलग मॉडलों पर भरोसे का बँटवारा एक स्वतंत्र सबूत के आधार पर बदला जाता है।
मॉडल शायद बर्फ़ का फैलाव ज़्यादा आँक रहे थे
जाँच में पता चला कि जलवायु मॉडलों को एक साथ देखने पर वे सर्दियों में समुद्री बर्फ़ का फैलाव पुराने सबूतों से ज़्यादा दिखाते थे। यानी मॉडल बर्फ़ के फैलाव का अनुमान ज़रूरत से ज़्यादा लगा रहे थे: मध्य होलोसीन के दौरान उनमें उतनी बर्फ़ बनी हुई दिखाई गई, जितनी जलवायु के पुराने पुनर्निर्माण से संकेत नहीं मिलता।
जब शोधकर्ताओं ने मॉडलों को मिले वज़न का इस्तेमाल ऐतिहासिक दौर के अनुकरण में किया, तो नतीजों में यह झुकाव दूर हो गया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्कॉट ध्रुवीय अनुसंधान संस्थान की प्रमुख शोधकर्ता क्रिस्टल फू के अनुसार, भविष्य के अनुमानों में बर्फ़ का फैलाव पहले के अनुमानों से करीब एक मिलियन वर्ग किलोमीटर कम निकला। इसका यह मतलब नहीं कि किसी एक साल में ठीक इतना क्षेत्र बर्फ़ से खाली हो जाएगा। यह पहले के अनुमानों और वज़न बदलने के बाद मिले भविष्य के अनुमानों के बीच का अंतर है।
यह अंतर मामूली नहीं है, क्योंकि करीब एक मिलियन वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आर्कटिक के नक्शे में बड़ा बदलाव दिखा सकता है। अगर पहले का अनुमान सर्दियों में बर्फ़ की अधिक चौड़ी परत बनाए रखता था, तो अब कम हुए अनुमान से उन जगहों की तस्वीर बदलती है जहाँ बर्फ़ का फैलाव घट सकता है। अधिक सटीक नक्शों से शोधकर्ताओं को यह पहचानने में मदद मिलती है कि कौन-से इलाके बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं और ऐतिहासिक जाँच के आधार पर संभावित परिवर्तन का दायरा कैसे बताया जाए।
फिर भी इस नतीजे को किसी तय भविष्य के लिए बर्फ़ की मात्रा का पक्का जवाब नहीं समझना चाहिए। अध्ययन ने कई मॉडलों के साथ काम करने का तरीका बेहतर किया और अनिश्चितता के कुछ पहलुओं को घटाया, लेकिन इससे जलवायु अनुमान रोज़ या साल-दर-साल की पक्की भविष्यवाणी नहीं बन जाते। नतीजा सबूतों और गणनाओं पर आधारित एक अनुमान है; पुराने रिकॉर्ड और मॉडलों, दोनों से क्या-क्या जाना जा सकता है, इसकी सीमाएँ बनी रहती हैं।
अनिश्चितता का दायरा घटाना
पुरानी जलवायु का अध्ययन दो तरह की अनिश्चितताओं से जूझता है। अतीत की हालत का पुनर्निर्माण पूरी तरह निश्चित नहीं होता और मॉडलों से भविष्य का अनुमान लगाने में भी संदेह बना रहता है। इसीलिए कभी-कभी भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड से मिले पुराने सबूतों की सीधे आधुनिक अनुमान से तुलना करना मुश्किल होता है। फू ने बताया कि बीते दशकों में पुराने जलवायु रिकॉर्ड का भंडार बढ़ा है, लेकिन उसे भविष्य के अनुमानों से जोड़ना जटिल बना रहा है, क्योंकि तुलना के दोनों पक्षों में अनिश्चितता रहती है।
यहाँ अपनाई गई वज़न देने की विधि दोनों पक्षों को करीब लाने का एक तरीका देती है। इसमें पुराने सबूतों के सहारे मॉडलों के प्रदर्शन को परखा जाता है और फिर उस जाँच का इस्तेमाल भविष्य के अनुमान बनाते समय किया जाता है। अध्ययन के मुताबिक, कुछ अनुमानों में संभावित नतीजों का दायरा 85% तक घटा। यह आँकड़ा दल द्वारा जाँची गई कुछ स्थितियों पर लागू होता है; इसका अर्थ यह नहीं कि आर्कटिक की जलवायु के हर पहलू में अनिश्चितता उतनी ही कम हो गई।
संभावनाओं का दायरा घटाना तब भी काम का है, जब सारे संदेह दूर न हों। जब अलग-अलग नतीजों के बीच का अंतर कम होता है, तो वैज्ञानिक अधिक साफ़ तौर पर चर्चा कर पाते हैं कि किन जगहों पर बर्फ़ घटने की आशंका है और उस तस्वीर पर कितना भरोसा किया जा सकता है। अध्ययन में शामिल CIMAT के मार्को एक्विनो-लोपेज़ ने कहा कि पुराने सबूतों की मदद से उन इलाकों के अधिक स्पष्ट नक्शे बनाए जा सकते हैं जहाँ सर्दियों की बर्फ़ गायब हो सकती है। इससे यह भी बेहतर ढंग से समझ आता है कि कौन-सी बातें अब भी अज्ञात हैं।
यह नतीजा यह भी दिखाता है कि भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड केवल बीती हुई घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है। तलछट में बचे शैवाल के अवशेष और रासायनिक निशान, जब सांख्यिकीय औज़ारों और मॉडलों के साथ पढ़े जाते हैं, तो आज की जलवायु के अध्ययन में इस्तेमाल होने वाले मॉडलों की व्यावहारिक जाँच बन जाते हैं। इस तरह बीते समय के जलवायु अनुभवों से सीख मिलती है, साथ ही यह बात ध्यान में रहती है कि उनके कारण और हालात आज की दुनिया से अलग थे।
यूरोप के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है?
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने केवल बर्फ़ के फैलाव पर ध्यान नहीं दिया। जब उन्होंने बारिश और बर्फ़बारी के अनुमानों में बदले हुए मॉडल-वज़न शामिल किए, तो संकेत मिले कि मौजूदा मॉडल भविष्य में दक्षिण-पूर्वी ग्रीनलैंड में बर्फ़बारी और भूमध्यसागरीय इलाके में बारिश का अनुमान भी कम लगा सकते हैं। ये मॉडल से निकली संभावनाएँ हैं, इस बात की पुष्टि नहीं कि हर इलाके में हर मौसम में एक तय मात्रा में बढ़ोतरी होगी।
ग्रीनलैंड में बर्फ़बारी इसलिए अहम है, क्योंकि उसका संबंध द्वीप पर जमा होने वाली बर्फ़ और पिघलने वाली बर्फ़ के कुल संतुलन से है। वहाँ अधिक बर्फ़ जमा होना बर्फ़ीली चादर की स्थिरता पर असर डाल सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों को यह बेहतर समझना होगा कि उस क्षेत्र में वर्षा और हिमपात कैसे बदलेंगे; केवल आर्कटिक के आसपास की समुद्री बर्फ़ मापना काफ़ी नहीं है। नतीजे बताते हैं कि सर्दियों की बर्फ़ को मॉडल में बेहतर दिखाने से क्षेत्र में बर्फ़बारी के कुछ अनुमानों पर फिर से विचार करने में मदद मिल सकती है।
भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बारिश बढ़ने की संभावना दक्षिणी यूरोप के लिए अहम है, जहाँ बाढ़ का जोखिम रहता है। यह अध्ययन अकेले यह नहीं बता सकता कि किसी खास शहर में बारिश कब होगी या कितनी होगी। लेकिन यह उन कारणों में एक और वजह जोड़ता है जिनके चलते ध्रुवीय बदलावों और दूर के इलाकों में बारिश के रिश्ते का अध्ययन करने वाले मॉडलों को बेहतर बनाना ज़रूरी है। किसी क्षेत्र का मौसम कई कारकों से प्रभावित होता है, फिर भी आर्कटिक के असर का सटीक हिसाब पूरी तस्वीर समझने में मदद करता है।
इस तरह सवाल आर्कटिक से आगे तक जाता है, लेकिन उसका मूल मुद्दा वही रहता है: सर्दियों में कितनी बर्फ़ है, यह जानना उन बदलावों को समझने का हिस्सा है जो गर्म होती दुनिया में दूसरे इलाकों को भी प्रभावित कर सकते हैं। नए नतीजे यह साबित नहीं करते कि यूरोप में बर्फ़बारी या बारिश का हर बदलाव समुद्री बर्फ़ घटने के कारण होगा। वे इतना संकेत ज़रूर देते हैं कि मौजूदा कुछ अनुमान संभावित बदलावों की पूरी सीमा नहीं दिखा रहे होंगे।
भविष्य का अनुमान सुधारने में अतीत की मदद
इस काम की खास बात केवल यह नहीं है कि इसमें भविष्य के लिए बर्फ़ का कम अनुमान सामने आया। यह उस रास्ते को भी दिखाता है जिससे ऐसे अनुमानों की जाँच की जा सकती है। शुरुआत समुद्र तल में सुरक्षित प्राकृतिक सामग्री से होती है; फिर पुराने पर्यावरण का पुनर्निर्माण किया जाता है और उसकी तुलना 27 मॉडलों के अनुकरण से होती है। जाँच के नतीजों के आधार पर आधुनिक और भविष्य की जलवायु का अनुमान लगाते समय मॉडलों के वज़न में बदलाव किया जाता है।
मध्य होलोसीन में गर्मी बढ़ने का कारण आज के कारण से अलग था, इसलिए दोनों के बीच फ़र्क समझना ज़रूरी है। उस पुराने दौर में पृथ्वी की कक्षा में बदलाव से गर्मी बढ़ी थी, जबकि मौजूदा गर्मी मानवीय गतिविधियों से जुड़ी है। फिर भी फू ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तापमान बढ़ने पर बर्फ़ पिघलती है, चाहे गर्मी का स्रोत कुछ भी हो। इसका यह अर्थ नहीं कि पुराने समय की जलवायु की हर बात को सीधे आज पर लागू किया जा सकता है। पुराने रिकॉर्ड से यह जाँचा जा सकता है कि मॉडल बर्फ़ की प्रतिक्रिया को कितनी अच्छी तरह दिखाते हैं।
यह अध्ययन नेचर जियोसाइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इसके कुछ हिस्से के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान और कैम्ब्रिज कोष से वित्तीय मदद मिली। क्रिस्टल फू कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गिरटन कॉलेज से जुड़ी हैं। इस काम में पुराने समुद्री तलछट के आँकड़ों को ध्रुवीय बर्फ़ के अनुमानों की विश्वसनीयता पर चल रही चर्चा के केंद्र में रखा गया है, न कि उन्हें भविष्य के जलवायु अनुमानों से अलग कोई जानकारी मानकर छोड़ दिया गया है।
निष्कर्ष
समुद्र तल में सुरक्षित पुराने सबूतों की 27 जलवायु मॉडलों से तुलना करने पर संकेत मिला कि आर्कटिक की सर्दियों की बर्फ़ का फैलाव मॉडल शायद ज़्यादा आँक रहे थे। रासायनिक निशानों में समुद्री बर्फ़ से जुड़ी शैवाल का बनाया IP25 भी शामिल था। इन निशानों से करीब 6,000 साल पहले के उन हालात की जाँच हो सकी, जब पृथ्वी की कक्षा में बदलावों के कारण आर्कटिक अधिक गर्म और कम बर्फ़ से ढका था।
अतीत के सबूतों से बेहतर मेल खाने वाले मॉडलों को अधिक वज़न देने पर ऐतिहासिक अनुकरण में बर्फ़ का फैलाव ज़्यादा दिखाने वाला झुकाव दूर हो गया। भविष्य के अनुमानों में बर्फ़ का क्षेत्रफल पहले के अनुमानों से करीब एक मिलियन वर्ग किलोमीटर कम हुआ और कुछ संभावित नतीजों का दायरा 85% तक घटा। इस सुधार का असर दक्षिण-पूर्वी ग्रीनलैंड में बर्फ़बारी और भूमध्यसागरीय इलाके में बारिश के अनुमानों पर भी पड़ सकता है, जो वहाँ की बर्फ़ीली चादर और बाढ़ के जोखिम को समझने के लिए मायने रखते हैं। ये संकेत मॉडलों से मिले हैं, किसी स्थानीय बदलाव की पक्की गारंटी नहीं। फिर भी, पृथ्वी के पुराने जलवायु रिकॉर्ड का सहारा लेकर भविष्य के अनुमान बेहतर करना अधिक संतुलित और उपयोगी तस्वीर बनाने की दिशा में अहम कदम है।