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सीटी स्कैन में छिपे संकेत: क्या एआई अग्न्याशय का कैंसर पहले पहचान सकता है?

आसान शब्दों में

अग्न्याशय के कैंसर का पता अक्सर तब चलता है, जब बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है। एक नए कंप्यूटर प्रोग्राम ने पुराने सीटी स्कैन में ऐसे बारीक बदलाव पहचाने, जो उस समय डॉक्टरों को नहीं दिखे थे। नतीजे उम्मीद जगाते हैं, लेकिन यह जानने के लिए और जाँच ज़रूरी है कि अस्पतालों में इसका इस्तेमाल सचमुच मददगार और भरोसेमंद होगा या नहीं।

बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ना इतना कठिन क्यों है?

यह शोध अग्न्याशय के नलिकाकार कैंसर पर केंद्रित है। यह कैंसर अग्न्याशय की नलिकाओं में शुरू होता है। इसकी एक बड़ी मुश्किल यह है कि शुरुआती बदलाव न तो मरीज को साफ़ महसूस होते हैं, न ही डॉक्टर को आसानी से दिखाई देते हैं। शुरुआत में लक्षण कम हो सकते हैं या इतने आम हो सकते हैं कि उनसे बीमारी का अंदाज़ा न लगे। साथ ही, अंग के ऊतकों में होने वाले शुरुआती बदलाव चिकित्सा तस्वीरों में बेहद मामूली दिख सकते हैं। जब तक बीमारी के संकेत साफ़ नज़र आते हैं, तब तक कैंसर बढ़ चुका हो सकता है।

इस कैंसर के तेज़ी से बढ़ने के कारण सही समय पर पहचान और भी अहम हो जाती है। बीमारी साफ़ दिखने के बाद की गई जाँच, उन मौकों जितना समय शायद न दे पाए जो निदान से पहले के बदलावों को पकड़ने पर मिल सकता है। इसलिए शोधकर्ता यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि पहले से ली गई तस्वीरों से ऐसी जानकारी कैसे निकाली जाए, जो आम तौर पर उन्हें देखकर जाँच करने पर सामने नहीं आती।

इसका मतलब यह नहीं है कि सीटी स्कैन बेकार है। चुनौती यह है कि तस्वीर में मौजूद कुछ संभावित संकेत आँख से आसानी से नहीं दिखते। अग्न्याशय के ऊतकों में बहुत छोटे अंतर दिखाई दे सकते हैं, जबकि कोई साफ़ गाँठ या बड़ा बदलाव नज़र न आए। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने तस्वीर में किसी स्पष्ट निशान को खोजने तक सीमित रहने के बजाय उसके बारीक रूप और बनावट का विश्लेषण करने का तरीका अपनाया।

अग्न्याशय के ऊतकों को देखने का नया तरीका

शोधकर्ताओं ने अपने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ढाँचे का नाम REDMOD रखा है। यह नाम रेडियोलॉजी से जुड़ी विशेषताओं के आधार पर शुरुआती पहचान करने वाले मॉडल के लिए इस्तेमाल किया गया है। इस तरीके में चिकित्सा तस्वीरों से बारीक गुण निकाले जाते हैं, जैसे ऊतक की बनावट और अलग-अलग हिस्सों के बीच का अंतर। ये बातें आम जाँच में साफ़ न दिखें, फिर भी बीमारी से जुड़ी हो सकती हैं। प्रोग्राम इन्हीं जानकारियों के आधार पर यह आँकता है कि तस्वीर में बीमारी से जुड़े संकेत हैं या नहीं।

इस प्रणाली की एक खास बात यह है कि यह अग्न्याशय को अपने आप पहचानकर उसकी सीमा तय करती है। इससे अग्न्याशय को आसपास के अंगों और ऊतकों से अलग करके देखा जा सकता है। किसी व्यक्ति द्वारा हाथ से अंग की सीमा खींचने पर अलग-अलग विशेषज्ञों के आकलन में फर्क हो सकता है, जिससे विश्लेषण भी बदल सकता है। स्वचालित तरीका तस्वीरों पर एक जैसी प्रक्रिया लागू करता है और फिर अग्न्याशय के भीतर की बारीकियों पर ध्यान देता है।

हालाँकि, यह प्रोग्राम कैंसर को उसी तरह नहीं देखता जैसे डॉक्टर किसी साफ़ गाँठ को पहचानते हैं। इस अध्ययन से यह भी साबित नहीं होता कि प्रोग्राम द्वारा निकाला गया हर संकेत निश्चित रूप से ट्यूमर की मौजूदगी बताता है। शोधकर्ताओं ने यह परखा कि तस्वीरों का विश्लेषण उन मरीजों में ऐसे ढर्रे पहचान सकता है या नहीं, जिनमें बाद में बीमारी का निदान हुआ। इसलिए इन नतीजों को उम्मीद जगाने वाले चेतावनी संकेत समझना चाहिए, न कि डॉक्टर की जाँच का साबित विकल्प।

बीमारी साफ़ दिखने से पहले की तस्वीरें

इस अध्ययन में कई अस्पतालों में इलाज करा चुके 219 मरीजों के पेट के सीटी स्कैन शामिल किए गए। जब ये स्कैन किए गए थे, तब अनुभवी रेडियोलॉजिस्टों को उनमें अग्न्याशय के कैंसर का कोई सबूत नहीं दिखा था। लेकिन बाद में इन सभी मरीजों में कैंसर का निदान हुआ। इससे शोधकर्ताओं को निदान से पहले की तस्वीरों पर लौटकर यह जाँचने का मौका मिला कि क्या प्रोग्राम ऐसे संकेत पकड़ सकता है, जो उस समय किसी की नज़र में नहीं आए थे।

इन तस्वीरों और कैंसर के निदान के बीच का समय सभी मरीजों के लिए एक जैसा नहीं था। 87 मरीजों, यानी समूह के 40%, का सीटी स्कैन निदान से 3 से 12 महीने पहले किया गया था। अगले समूह में 76 मरीज थे, जो कुल का 35% थे; उनका स्कैन निदान से 12 से 24 महीने पहले हुआ था। बाकी 56 मरीज, यानी 25%, के स्कैन निदान से 24 महीने से भी पहले किए गए थे। कुछ मामलों में स्कैन और निदान के बीच का अंतर करीब तीन साल तक था।

करीब दो-तिहाई मरीजों में, यानी 64% मामलों में, कैंसर अग्न्याशय के सिर वाले हिस्से में शुरू हुआ था। इससे अध्ययन में शामिल लोगों के ट्यूमर की जगह का पता चलता है, लेकिन यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि प्रोग्राम के नतीजे बीमारी की हर जगह या हर मरीज पर समान रूप से लागू होंगे। स्कैन और निदान के बीच अलग-अलग समय का अंतर होने से शोधकर्ता यह भी जाँच पाए कि प्रोग्राम कई समयावधियों में संकेत खोज सकता है या नहीं।

तुलना के लिए शोधकर्ताओं ने 1243 ऐसे लोगों के स्कैन भी इस्तेमाल किए, जिन्हें स्कैन के बाद तीन साल तक निगरानी में रखने पर अग्न्याशय का कैंसर नहीं हुआ। उम्र, लिंग और जाँच की तारीखों के आधार पर इस समूह का मिलान कैंसर वाले मरीजों के समूह से किया गया, ताकि दोनों की तुलना अधिक एकसमान हो। अध्ययन में शामिल कैंसर मरीजों की औसत उम्र 69 वर्ष थी और उनकी उम्र 34 से 88 वर्ष के बीच थी। तुलना वाले समूह की औसत उम्र 64 वर्ष थी और उनकी उम्र भी 34 से 88 वर्ष के बीच थी।

निदान से औसतन 475 दिन पहले मिले संकेत

निदान से पहले ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करते हुए REDMOD ने ऐसे चित्र-संबंधी गुण पहचाने, जिनका बाद में अग्न्याशय के कैंसर से संबंध था। इन संकेतों की पहचान और मरीजों के चिकित्सकीय निदान के बीच औसतन 475 दिन का अंतर था। यानी प्रोग्राम ने उन तस्वीरों में ऐसे ढर्रे पकड़े, जिन्हें उस समय कैंसर का साफ़ सबूत नहीं माना गया था, जबकि मरीजों का निदान बाद में हुआ।

इस समय-अंतर का महत्व यह है कि अगर आगे के शोध में ये संकेत अस्पतालों में इस्तेमाल के योग्य साबित होते हैं, तो चिंता पैदा करने वाले मामलों की जाँच के लिए डॉक्टरों को अधिक समय मिल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, बीमारी सीमित होने या शुरुआती दौर में पकड़ में आने पर इलाज और जीवित रहने की संभावना बेहतर हो सकती है। उन्होंने ऐसे गणितीय आकलनों का हवाला दिया, जिनमें अनुमान है कि सीमित जगह तक रहे ट्यूमर का अनुपात 10% से बढ़ाकर 50% करने पर जीवित रहने की दर दोगुने से भी अधिक हो सकती है। यह एक मॉडल से निकला अनुमान है, REDMOD के अध्ययन में किया गया इलाज का परीक्षण नहीं।

पुरानी तस्वीर में कोई ढर्रा पहचान लेना और यह साबित करना दो अलग बातें हैं कि उस ढर्रे के कारण जल्दी इलाज करने से मरीज की सेहत बेहतर होगी। अध्ययन में तस्वीरों के विश्लेषण की तुलना मरीजों के बाद के परिणामों से की गई, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि शुरुआती पहचान के लिए प्रोग्राम इस्तेमाल करने से बीमारी की दिशा बदलेगी या मरीज अधिक समय तक जीवित रहेंगे। यह जानने के लिए असल इलाज की परिस्थितियों में प्रोग्राम का परीक्षण करना होगा और देखना होगा कि जाँच तथा इलाज के फैसलों से मरीजों को क्या लाभ हुआ।

अध्ययन में रेडियोलॉजिस्टों से बेहतर प्रदर्शन

इस अध्ययन में प्रोग्राम की संवेदनशीलता 73% थी, जबकि तस्वीरें पढ़ने वाले रेडियोलॉजिस्टों की संवेदनशीलता 39% रही। संवेदनशीलता बताती है कि जाँच वास्तव में बीमारी वाले लोगों को कितनी अच्छी तरह पहचानती है और कितने मामलों को अनदेखा कर सकती है। इस तरह, शोधकर्ताओं द्वारा जाँची गई तस्वीरों के समूह में प्रोग्राम ने उन मरीजों के मामलों को पकड़ने की अधिक क्षमता दिखाई, जिनमें बाद में कैंसर का निदान हुआ।

निदान से दो साल से अधिक पहले ली गई तस्वीरों में यह अंतर और साफ़ था। इस समूह में प्रोग्राम ने 68% मामलों में बीमारी से जुड़े संकेत पहचाने, जबकि रेडियोलॉजिस्टों के लिए यह अनुपात 23% था। इससे यह संभावना सामने आती है कि निदान से काफी पहले की तस्वीरों में, जब संकेत बहुत हल्के हों, कंप्यूटर से किया गया विश्लेषण खास तौर पर मददगार हो सकता है। फिर भी यह नतीजा इसी अध्ययन के समूह का है। इससे यह गारंटी नहीं मिलती कि हर अस्पताल या मरीजों के हर समूह में प्रोग्राम का प्रदर्शन वैसा ही होगा।

शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि प्रोग्राम उन लोगों की तस्वीरों को कितनी अच्छी तरह पहचानता है, जिन्हें बाद में कैंसर नहीं हुआ। उन्होंने इसे कई अस्पतालों के 539 मरीजों के एक अलग समूह पर परखा। उस समूह में प्रोग्राम ने 81% से कुछ अधिक तस्वीरों को कैंसर-मुक्त बताया। इसे शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के NIH-PCT नाम के आँकड़ा समूह पर भी जाँचा गया। उसमें 80 लोग शामिल थे और प्रोग्राम ने 87.5% तस्वीरों को ऐसा वर्गीकृत किया जिनमें अग्न्याशय का कैंसर नहीं दिखता।

इन नतीजों को संवेदनशीलता से अलग पैमानों पर मापा गया है, इसलिए सभी आँकड़ों को एक ही संख्या में समेटना या उन्हें प्रोग्राम के प्रदर्शन का एक ही पहलू मानना ठीक नहीं होगा। संवेदनशीलता बताती है कि बीमारी वाले लोगों में कितनों को पहचाना गया, जबकि कैंसर-मुक्त समूह के नतीजे यह दिखाते हैं कि बिना बीमारी वाली तस्वीरों को प्रोग्राम कितनी अच्छी तरह पहचानता है। असल इस्तेमाल के लिए दोनों तरह के नतीजों को साथ समझना ज़रूरी है, क्योंकि बीमारी को न पकड़ पाना और गलत चेतावनी देना, दोनों ही अलग-अलग चिकित्सकीय फैसलों की वजह बन सकते हैं।

क्या समय के साथ संकेत एक जैसे रहे?

शोधकर्ताओं ने यह भी जाँचा कि एक ही व्यक्ति के बार-बार लिए गए स्कैन में प्रोग्राम के नतीजे कितने स्थिर रहते हैं। जब कुछ महीनों के अंतर पर किए गए स्कैनों की तुलना की गई, तो 90 से 92% मामलों में प्रोग्राम के नतीजे एक-दूसरे से मेल खाते थे। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि विश्लेषण में दिखने वाला ढर्रा लगातार मौजूद हो सकता है, न कि दो तस्वीरों के बीच का कोई अस्थायी अंतर।

फिर भी, बार-बार की जाँच के नतीजों का मेल यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि हर स्थिर ढर्रा कैंसर का पक्का संकेत है। इससे प्रोग्राम के नतीजों की एकरूपता का समर्थन तो मिलता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये ढर्रे उन लोगों में बीमारी का सही अनुमान लगा सकते हैं, जिनकी जाँच के समय यह पता न हो कि आगे उन्हें बीमारी होगी या नहीं। इसका जवाब पाने के लिए पहले से तय योजना के तहत मरीजों पर आगे चलकर निगरानी करनी होगी। केवल उन लोगों की पुरानी तस्वीरों का विश्लेषण काफी नहीं है, जिनके बारे में बाद में पता चला कि उन्हें कैंसर हुआ था।

अस्पतालों में इस्तेमाल से पहले क्या बाकी है?

अध्ययन के नतीजे उम्मीद जगाते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने प्रोग्राम को रोज़मर्रा के इलाज में तुरंत अपनाने की सलाह नहीं दी। उनकी बताई सीमाओं में एक यह थी कि अध्ययन में शामिल लोगों की जातीय पृष्ठभूमियों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था। किसी चिकित्सा उपकरण को परखते समय यह कमी अहम है, क्योंकि अलग-अलग आबादी के समूहों में उसका प्रदर्शन बदल सकता है। इसलिए यह मानकर नहीं चला जा सकता कि एक खास समूह में मिले नतीजे अपने आप सभी लोगों पर लागू होंगे।

आगे के अध्ययनों में प्रोग्राम को ऐसे समूहों में परखना चाहिए, जिनके अंतिम निदान की जानकारी मिलने से पहले ही जाँच शुरू की जाए और फिर एक स्पष्ट योजना के तहत उनकी निगरानी हो। उन लोगों की जाँच करना खास तौर पर अहम हो सकता है जिनमें बीमारी का खतरा अधिक है। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनका वजन बिना किसी स्पष्ट वजह के घट रहा हो या जिन्हें हाल ही में मधुमेह का निदान मिला हो। लेकिन इन समूहों का उल्लेख करने का अर्थ यह नहीं है कि ऐसा कोई भी लक्षण रखने वाला व्यक्ति कैंसर से पीड़ित है। शोधकर्ताओं का आशय इतना है कि शुरुआती पहचान की उपयोगिता जाँचते समय इन लोगों पर अध्ययन करना उचित हो सकता है।

यह भी तय करना होगा कि प्रोग्राम के नतीजे का इस्तेमाल डॉक्टर इलाज के फैसले में कैसे करेंगे। क्या किसी संदिग्ध संकेत के बाद और जाँच की जाएगी? संकेत मिलने पर उसकी पुष्टि किस तरह होगी? अगला कदम उठाने से पहले नतीजे पर कितना भरोसा होना चाहिए? अध्ययन इन सवालों का जवाब नहीं देता। इसके अलावा, कुछ खास तस्वीरों पर प्रोग्राम का प्रदर्शन यह नहीं बताता कि उसे अस्पताल के रोज़मर्रा के काम में शामिल करने से पूरी प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा। स्कैनर बदलने या आँकड़े जुटाने की परिस्थितियाँ अलग होने पर नतीजे कितने बदलेंगे, यह भी अभी साफ़ नहीं है।

इसलिए REDMOD अभी जाँच के दौर में है, यह ऐसा तैयार परीक्षण नहीं है जो रेडियोलॉजिस्ट की जगह ले सके। आगे चलकर यह डॉक्टरों को उन तस्वीरों की समीक्षा में मदद दे सकता है, जिनकी बारीकियाँ पकड़ना मुश्किल हो। लेकिन इसकी असल उपयोगिता जानने के लिए अलग-अलग तरह के लोगों वाले समूहों में इसका सीधा परीक्षण करना होगा। इसमें ऐसे लोग भी शामिल होने चाहिए जिनमें निगरानी शुरू करते समय कैंसर के पक्के संकेत न हों।

निष्कर्ष

REDMOD के नतीजे बताते हैं कि सीटी स्कैन की बहुत बारीक बातों का विश्लेषण अग्न्याशय के कैंसर से जुड़े ऐसे ढर्रे पहचान सकता है, जो चिकित्सकीय निदान से औसतन 475 दिन पहले मौजूद थे। बाद में कैंसर का निदान पाने वाले 219 मरीजों की तस्वीरों में प्रोग्राम की संवेदनशीलता 73% रही, जबकि रेडियोलॉजिस्टों के लिए यह 39% थी। निदान से दो साल से अधिक पहले की तस्वीरों में प्रोग्राम ने 68% मामले पहचाने, जबकि रेडियोलॉजिस्टों ने 23% पहचाने। 539 लोगों के समूह में प्रोग्राम ने 81% से अधिक तस्वीरों को कैंसर-मुक्त बताया और 80 लोगों वाले NIH-PCT समूह में यह अनुपात 87.5% था। एक ही मरीज की बार-बार ली गई तस्वीरों के नतीजे 90 से 92% मामलों में मेल खाते थे।

इन आँकड़ों के बावजूद यह तरीका अभी नियमित इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं है। इसे आगे ऐसे अध्ययनों में परखना होगा, जिनमें अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग शामिल हों और जिनकी जाँच शुरू होने के बाद से ही तय योजना के तहत निगरानी की जाए। खास ध्यान उन लोगों पर दिया जा सकता है जिन्हें बीमारी का खतरा अधिक हो, जैसे जिनका वजन बिना वजह घट रहा हो या जिन्हें हाल में मधुमेह का निदान मिला हो। अगर आगे की जाँचों में यह साबित हुआ कि ये संकेत भरोसेमंद हैं और बीमारी को सचमुच पहले पकड़ने में मदद करते हैं, तो यह तरीका ऐसे कैंसर पर ध्यान देने का समय बदल सकता है जिसे शुरुआती दौर में पहचानना मुश्किल है। फिलहाल यह शोध का उत्साहजनक कदम है, लेकिन चिकित्सा में इस्तेमाल से पहले इसकी और पुष्टि ज़रूरी है।