आसान शब्दों में
ट्यूमर की सभी कोशिकाएँ एक जैसी नहीं होतीं। कुछ कोशिकाएँ आसपास के माहौल के हिसाब से अपना व्यवहार बदल सकती हैं, जिससे कैंसर फैल सकता है या इलाज का असर कम हो सकता है। वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसी कोशिकाएँ कहाँ होती हैं और कौन-से संकेत उन्हें बदलते हैं, ताकि भविष्य में इस बदलाव को रोकने के रास्ते खोजे जा सकें।
ट्यूमर एक जैसी कोशिकाओं का ढेर नहीं
किसी ट्यूमर को बाहर से देखने पर वह एक ही तरह की गाँठ लग सकता है, लेकिन उसके भीतर मौजूद कोशिकाएँ अलग-अलग काम कर सकती हैं और आसपास के माहौल पर अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकती हैं। कुछ कोशिकाएँ बढ़ने या आसपास की कोशिकाओं से मिलने वाले संकेतों का जवाब देने में अपने पास की कोशिकाओं से अलग होती हैं। इसलिए पूरे ट्यूमर का औसत रूप बताने से उन छोटे समूहों की पहचान नहीं हो पाती जिनका व्यवहार अहम है—मसलन, वे कोशिकाएँ जो कैंसर के फैलने की शुरुआत में मदद करती हैं या इलाज का असर कम कर सकती हैं।
कैंसर कोशिकाओं की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने की क्षमता को फेनोटाइपिक लचक कहा जाता है। यह आनुवंशिक बदलावों का दूसरा नाम नहीं है। इसका मुख्य विचार यह है कि कोशिका अपने काम करने के ढंग और व्यवहार को बदल सकती है, भले ही इसके पीछे कोई नया आनुवंशिक बदलाव न हो। इससे ट्यूमर को समझना और पेचीदा हो जाता है। शोधकर्ताओं को केवल यह नहीं पूछना पड़ता कि कोशिका किस प्रकार की है, बल्कि यह भी जानना होता है कि वह इस समय किस अवस्था में है, उसके आसपास क्या मौजूद है और कौन-से संकेत उसे उस अवस्था की ओर ले जा रहे हैं।
बड़ी आँत और मलाशय के कैंसर में इस लचक पर ध्यान देना खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध बीमारी के बढ़ने, दूसरी जगहों पर फैलने और इलाज का असर न होने की आशंका से हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि लचीली अवस्था में मौजूद हर कोशिका आगे फैल ही जाएगी या इलाज से बच जाएगी। फिर भी, ऐसी अवस्थाओं का अध्ययन यह समझने में मदद कर सकता है कि ट्यूमर किस तरह बढ़ता है और बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालता रहता है। शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि कोशिकाओं को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने के लिए कौन-सी चीजें नियंत्रित करती हैं और ऊतक के किन हिस्सों में यह बदलाव होता है।
शोध के केंद्र में कोशिकाओं की तीन अवस्थाएँ
इस शोध में कैंसर कोशिकाओं की ऊतक को फिर से बनाने और सूजन से जुड़ी अवस्थाओं के साथ-साथ ऐसी अवस्था पर भी ध्यान दिया गया है जिसमें ऊतक को फिर से बनाने और मूल कोशिकाओं, दोनों के गुण मिलते हैं। ऊतक को फिर से बनाने वाली अवस्था का मतलब ऐसी कोशिकीय प्रक्रिया से है जो कोशिकाओं के बढ़ने और ऊतक को फिर से बनाने की क्षमता से जुड़ी होती है। सूजन से जुड़ी अवस्था में कोशिका का व्यवहार सूजन के संकेतों से जुड़ा होता है। तीसरी, मिश्रित अवस्था में ऊतक को फिर से बनाने वाली अवस्था के साथ मूल कोशिकाओं जैसे कुछ गुण भी दिखाई देते हैं; इसे किसी एक सरल श्रेणी में समेटना ठीक नहीं होगा।
इन अवस्थाओं में दिलचस्पी की एक और वजह है। मरीजों के ट्यूमर में देखी गई ऊतक को फिर से बनाने और सूजन से जुड़ी अवस्थाओं वाली कोशिकाएँ उन कोशिकाओं जैसी लगती हैं जिन्हें पहले चूहों के नमूनों में दूर के अंगों में कैंसर फैलने की शुरुआत करने वाली कोशिकाओं के रूप में पहचाना गया था। यह समानता शोध के लिए तुलना का आधार देती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि मनुष्य और चूहे की कोशिकाएँ हर लिहाज से एक जैसी हैं। इसके बजाय, इससे वैज्ञानिक जाँच सकते हैं कि प्रयोगशाला के नमूनों में दिखने वाले गुण मरीजों के नमूनों में सचमुच मौजूद कोशिकीय अवस्थाओं से मेल खाते हैं या नहीं।
एक खास बात यह है कि जिगर में पहुँचे कैंसर के फैलावों में मूल ट्यूमर जैसी कुछ विविधता फिर से उभर सकती है। यानी कोशिकाओं के जिगर तक पहुँचने के बाद वहाँ का ट्यूमर उन कोशिकाओं की सीधी-सादी या एकरूप नकल बन जाए, यह जरूरी नहीं। नई जगह पर भी कोशिकाओं की कई अलग-अलग अवस्थाएँ उभर सकती हैं। इसलिए केवल मूल ट्यूमर का विश्लेषण करना काफी नहीं; जिगर में बने फैलाव का अध्ययन भी जरूरी है।
यह बात कोशिकाओं की विविधता पैदा होने के तरीके पर कई सवाल उठाती है। क्या मूल ट्यूमर से अलग-अलग अवस्थाओं वाली कोशिकाएँ जिगर तक जाती हैं? क्या वहाँ पहुँचने के बाद कोशिकाएँ अपनी अवस्था बदलती हैं? और नई जगह का माहौल उन्हें फिर से ढालने में क्या भूमिका निभाता है? उपलब्ध शोध-विवरण इन सवालों के संख्यात्मक जवाब या नमूनों की कुल संख्या नहीं देता। फिर भी, इससे स्पष्ट है कि मूल ट्यूमर और जिगर में बने फैलाव की तुलना इस घटना को समझने के लिए अहम है।
कोशिकाओं के काम को दिशा देने वाले संकेत: एपी-1 और एनएफ-कप्पा-बी
इन कोशिकीय अवस्थाओं को नियंत्रित करने में एपी-1 और एनएफ-कप्पा-बी नाम के प्रोटीन की भूमिका बताई गई है। ये ऐसे प्रोटीन हैं जो जीनों के समूहों को चालू करने या उनकी गतिविधि घटाने में मदद करते हैं। इस तरह वे कोशिका के काम करने के तरीके को दिशा दे सकते हैं। इन प्रोटीनों की भूमिका ऊतक को फिर से बनाने या सूजन से जुड़े गुणों के उभरने को समझने में मदद कर सकती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कोई एक प्रोटीन पूरे ट्यूमर के व्यवहार को अकेले समझा देता है।
इन प्रोटीनों की पहचान इसलिए अहम है कि वे कोशिकाओं को मिलने वाले बाहरी संकेतों और जीनों की गतिविधि में होने वाले बदलावों के बीच कड़ी का काम कर सकते हैं। अगर आसपास का माहौल किसी कोशिका को एक खास अवस्था की ओर धकेलता है, तो उन अणुओं को समझना उपयोगी हो सकता है जो उस संकेत को कोशिका के भीतर बदलाव में बदलते हैं। इससे ऐसे संभावित बिंदु सामने आ सकते हैं जिन पर आगे शोध किया जा सके। फिर भी, यह अभी जाँच का विषय है। किसी प्रोटीन की भूमिका सामने आ जाने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि उसे रोकना मरीजों के लिए सुरक्षित या असरदार इलाज होगा।
इस तस्वीर में फाइब्रोब्लास्ट, मैक्रोफेज और टी कोशिकाओं से आने वाले संकेत भी शामिल हैं। ट्यूमर केवल कैंसर कोशिकाओं से नहीं बना होता; उसके आसपास दूसरी तरह की कोशिकाएँ भी रहती हैं और स्थानीय माहौल को आकार देने में उनकी भूमिका हो सकती है। शोध में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि ये अलग-अलग कोशिकाएँ कैंसर की विभिन्न अवस्थाओं से किस तरह जुड़ती हैं। साथ ही, वैज्ञानिक यह भी देख रहे हैं कि क्या उनके बीच आने-जाने वाले संकेत किसी खास अवस्था को बनाए रखते हैं या कोशिकाओं को दूसरी अवस्था अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
ट्यूमर के भीतर कोशिका की जगह भी मायने रखती है
किसी नमूने में एक कोशिकीय अवस्था मौजूद है, इतना जानना ही काफी नहीं होता; वह कहाँ मौजूद है, इससे भी उसके महत्व का पता चलता है। शोध-विवरण के अनुसार, ध्यान में रखी गई अवस्थाएँ ट्यूमर के आक्रामक किनारे पर पाई गईं। यह वह हिस्सा है जहाँ कैंसर का ऊतक पास के उस ऊतक से मिलता है जिसकी ओर ट्यूमर बढ़ रहा होता है। इन कोशिकाओं को ऐसे माहौल में भी पाया गया है जिसमें प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दबाने वाले गुण मौजूद हैं। इसलिए शोध का सवाल कोशिका की पहचान तक सीमित नहीं है; उसमें कोशिका की जगह और उसके आसपास की परिस्थितियाँ भी शामिल हैं।
ट्यूमर का आक्रामक किनारा कैंसर कोशिकाओं और पास के ऊतकों के बीच होने वाली बातचीत को समझने के लिए उपयोगी जगह हो सकती है, क्योंकि यही वह मोर्चा है जहाँ ट्यूमर आगे बढ़ता है। लेकिन वहाँ किसी कोशिका को देख लेना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसी ने प्रतिरक्षा को दबाने वाला माहौल बनाया है या ऊतक पर हमले के लिए वही अकेले जिम्मेदार है। इसलिए शोधकर्ताओं को कोशिका की जगह को उसकी पहचान और दूसरी कोशिकाओं के साथ होने वाले संकेतों के मेल में समझना होगा। केवल एक स्थानिक तस्वीर देखकर कारण और असर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
प्रतिरक्षा को दबाने वाला माहौल इस विषय में एक और पहलू जोड़ता है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कैंसर कोशिकाएँ कैसे फैलती या बढ़ती हैं; यह भी समझना जरूरी है कि ट्यूमर और उसके आसपास की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के बीच संतुलन कैसा है। अगर कैंसर कोशिकाओं की अवस्थाओं और मैक्रोफेज, टी कोशिकाओं तथा फाइब्रोब्लास्ट के बीच संबंधों को समझा जा सके, तो फैलाव के साथ मौजूद माहौल के कुछ पहलू साफ हो सकते हैं। लेकिन ऐसे संबंधों की पहचान से यह तय नहीं हो जाता कि उन्हें बदलने से कैंसर का फैलना रुक जाएगा। इस समझ को इलाज में बदलने के लिए और सबूत तथा जाँच की जरूरत होगी।
नई तकनीकें नमूनों में छिपी जानकारी कैसे दिखाती हैं
इस काम में एक-एक कोशिका के स्तर पर कई तरह की जैविक जानकारी का विश्लेषण और ऊतक में जीनों की गतिविधि का स्थानिक चित्रण, दोनों साथ इस्तेमाल किए जाते हैं। पहली विधि से कोशिकाओं को एक-एक करके समझा जा सकता है, न कि पूरे नमूने का औसत मानकर। दूसरी विधि यह जानने में मदद करती है कि जीनों की गतिविधि के अलग-अलग नमूने ऊतक के किस हिस्से में दिखाई देते हैं। दोनों तरीकों को साथ रखने से शोधकर्ता यह जान सकते हैं कि कोशिका किस अवस्था में है और ऊतक में कहाँ मौजूद है।
इन दोनों तरह की जानकारी को जोड़ना इसलिए जरूरी है कि कोशिकाओं के बीच संकेत किसी खाली जगह में काम नहीं करते। यह जानने से कि कुछ कोशिकाओं में अणुओं का एक खास मेल मौजूद है, अपने आप यह पता नहीं चलता कि वे फाइब्रोब्लास्ट, मैक्रोफेज या टी कोशिकाओं के पास हैं या नहीं। इससे यह भी स्पष्ट नहीं होता कि वे ट्यूमर के आक्रामक किनारे पर हैं या किसी दूसरे हिस्से में। कोशिका की जगह की जानकारी मिलने पर उसकी आणविक अवस्था को ऊतक के संदर्भ में देखा जा सकता है। इससे ऐसे संबंध सामने आ सकते हैं जो कोशिकाओं को उनकी जगह से अलग करके देखने पर नजर नहीं आते।
शोध में बड़ी आँत और मलाशय के कैंसर से पीड़ित मरीजों के मूल ट्यूमर और जिगर में बने फैलावों के नमूने शामिल हैं। इन दोनों जगहों की तुलना से यह जाँचा जा सकता है कि फैलने के दौरान कोशिकीय अवस्थाएँ बदलती हैं या नहीं और जिगर में कोशिकाओं की विविधता किस तरह फिर से बनती है। शोध की घोषणा में मरीजों या नमूनों की संख्या नहीं दी गई है, इसलिए अध्ययन के समूह का आकार या ये नमूने सभी मरीजों का कितना प्रतिनिधित्व करते हैं, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उन्नत विश्लेषण तकनीकें अपनाने के बाद भी नतीजों को दूसरे अध्ययनों में जाँचना जरूरी रहता है।
कोशिकाओं का नक्शा बनाने से इलाज के संभावित रास्तों तक
इस शोध-दिशा का दूरगामी मकसद ऐसे तरीके ढूँढ़ना है जो कैंसर कोशिकाओं के बदलने की क्षमता कम करें या उन्हें ऐसी अवस्थाओं में जाने से रोकें जिनका संबंध बीमारी के फैलने से हो सकता है। अगर वैज्ञानिक उन संकेतों को पहचान पाएँ जो ऊतक को फिर से बनाने या सूजन से जुड़ी अवस्थाओं को बढ़ावा देते हैं, और यह भी समझ पाएँ कि आसपास की कौन-सी कोशिकाएँ इसमें योगदान देती हैं, तो आगे की जाँच के लिए कुछ संभावित लक्ष्य मिल सकते हैं। इससे ऐसे इलाजों के बारे में सोचने में मदद मिल सकती है जो केवल कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने पर नहीं, बल्कि उन्हें बदलने की क्षमता देने वाली प्रक्रियाओं को रोकने पर भी ध्यान दें।
यहाँ संभावित शब्द को ध्यान में रखना जरूरी है। किसी कोशिकीय अवस्था या उसे नियंत्रित करने वाले प्रोटीन की पहचान से यह साबित नहीं होता कि उसे निशाना बनाने से कैंसर का फैलाव रुक जाएगा। इससे अपने आप यह भी तय नहीं होता कि सबसे अच्छा इलाज कौन-सा होगा। कैंसर कोशिकाएँ एक से अधिक अवस्थाएँ अपना सकती हैं और इलाज के प्रति उनकी प्रतिक्रिया मूल ट्यूमर और फैलाव में अलग हो सकती है। इसलिए आणविक और स्थानिक नक्शे इस पूरी व्यवस्था को समझने की दिशा में एक कदम हैं, किसी तैयार इलाज की घोषणा नहीं।
लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी से जुड़े बार्ट्स कैंसर इंस्टीट्यूट में मिरजाना एफ़्रेमोवा इस शोध-दिशा का नेतृत्व कर रही हैं। उन्होंने मई 2020 में कैंसर के विकास केंद्र में अपनी प्रयोगशाला शुरू की थी। उनकी प्रयोगशाला उन गैर-आनुवंशिक प्रक्रियाओं पर काम करती है जो कैंसर की शुरुआत, उसके फैलाव और इलाज के प्रति उसके प्रतिरोध में भूमिका निभा सकती हैं। एफ़्रेमोवा ने ऑस्ट्रिया की मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ इंसब्रुक से कंप्यूटेशनल बायोलॉजी में पीएचडी की है। इसके बाद उन्होंने वेलकम सैंगर इंस्टीट्यूट में टीखमान की प्रयोगशाला में शोध किया। उनका यह अनुभव कोशिकाओं के आँकड़ों का विश्लेषण करने और ट्यूमर के विकास को समझने वाले इस संयुक्त काम के लिए उपयोगी पृष्ठभूमि देता है।
एफ़्रेमोवा इस विषय पर गुरुवार, 19 नवंबर 2026 को सीधा प्रसारित होने वाली वैज्ञानिक संगोष्ठी में बात करेंगी। कार्यक्रम प्रशांत समय के अनुसार 08:00 बजे, अमेरिका के पूर्वी तट के समय के अनुसार 11:00 बजे और ग्रीनविच समय के अनुसार 16:00 बजे होगा। प्रस्तुति के बाद सवाल-जवाब का सत्र भी रखा गया है। बातचीत का मुख्य विषय यह होगा कि मूल ट्यूमर और जिगर में बने फैलावों के नमूने कैंसर कोशिकाओं की अवस्थाओं, उन्हें नियंत्रित करने वाले कारकों और ऊतक के भीतर उनकी जगह के बारे में क्या बताते हैं।
निष्कर्ष
फेनोटाइपिक लचक का अध्ययन बड़ी आँत और मलाशय के कैंसर की जटिलता का एक अहम पहलू सामने लाता है। कैंसर कोशिकाएँ अलग-अलग अवस्थाएँ अपना सकती हैं और इनमें से कुछ अवस्थाओं का संबंध ऊतक को फिर से बनाने, सूजन और बीमारी के फैलने से हो सकता है। ऐसी कोशिकाएँ ट्यूमर के आक्रामक किनारे पर, प्रतिरक्षा को दबाने वाले माहौल में भी देखी गई हैं। एक-एक कोशिका का विश्लेषण और स्थानिक चित्रण साथ इस्तेमाल करने से वैज्ञानिक मूल ट्यूमर और जिगर में बने फैलावों की कोशिकाओं, उनके संकेतों और उनकी जगह को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। एपी-1 और एनएफ-कप्पा-बी के साथ फाइब्रोब्लास्ट, मैक्रोफेज और टी कोशिकाओं की भूमिका पर ध्यान देना इस दिशा में उपयोगी है। यह शोध अभी कोई तैयार इलाज नहीं देता, लेकिन इससे ऐसे सवाल और संभावित रास्ते सामने आते हैं जिनकी जाँच करके भविष्य में ट्यूमर की बदलने और फैलने की क्षमता को सीमित करने के तरीके खोजे जा सकते हैं।