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जब शरीर की सूजन रोकने वाली ढाल पर ही हमला हो जाए।

आसान शब्दों में

आंतों की लंबे समय तक रहने वाली बीमारी सबको एक ही वजह से नहीं होती। एक बड़े अध्ययन में कुछ मरीजों के शरीर में ऐसे तत्व मिले जो सूजन को शांत करने वाले प्रोटीन का काम रोक देते हैं। यह खोज आगे चलकर ऐसे मरीजों की पहचान और उनके लिए बेहतर इलाज चुनने में मदद कर सकती है।

आंतों की सूजन के पीछे छिपी अलग-अलग वजहें

आंतों की सूजन की पुरानी बीमारी का कोई एक ऐसा कारण नहीं है जो हर मरीज पर लागू हो। मिलते-जुलते लक्षण शरीर के भीतर चल रही अलग-अलग प्रक्रियाओं से पैदा हो सकते हैं। न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन से पता चलता है कि कुछ मरीजों में प्रतिरक्षा तंत्र की एक खास गड़बड़ी हो सकती है: उनके शरीर में ऐसी एंटीबॉडी बनती हैं जो सूजन को काबू में रखने में मदद करने वाले प्रोटीन का काम रोक देती हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि यही बीमारी की वजह सभी मरीजों में है, लेकिन इससे ऐसे मरीजों के एक समूह की संभावित वजह सामने आती है, जिन्हें जैविक तौर पर पहचाना जा सकता है।

प्रतिरक्षा तंत्र का संदेश अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचता

आंतों की सूजन की बीमारी में मुख्य रूप से दो लंबे समय तक रहने वाली स्थितियां शामिल हैं—क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस। अध्ययन में दिए गए अनुमान के अनुसार, ब्रिटेन में करीब 500,000 लोग इन दोनों बीमारियों के साथ जी रहे हैं और दुनिया भर में ऐसे मरीजों की संख्या लाखों में है। इनके लक्षण अक्सर किशोरावस्था या वयस्क जीवन के शुरुआती वर्षों में उभरने लगते हैं। बीमारी कई साल तक बनी रह सकती है और मरीज को बार-बार इलाज तथा चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।

सामान्य तौर पर इंटरल्यूकिन-10 नाम का प्रोटीन—जिसे संक्षेप में IL-10 कहा जाता है—प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाओं को सूजन की प्रतिक्रिया काबू में रखने का संकेत देता है। कई स्थितियों में सूजन शरीर के लिए जरूरी होती है, लेकिन अगर प्रतिरक्षा तंत्र लगातार बहुत तेज प्रतिक्रिया करता रहे और उसे ठीक से रोका न जाए, तो वह शरीर की रक्षा करने के बजाय ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकता है। IL-10 को शरीर के भीतर की शांत करने वाली व्यवस्था की तरह समझा जा सकता है। यह प्रतिरक्षा तंत्र को पूरी तरह बंद नहीं करता, बल्कि उसे जरूरत से ज्यादा सक्रिय होने से रोकने में मदद करता है।

अध्ययन में जिस समस्या पर ध्यान दिया गया, वह यह है कि कुछ लोगों के शरीर में ऐसी एंटीबॉडी बनती हैं जो IL-10 से चिपककर उसका असर निष्क्रिय कर देती हैं। जब यह प्रोटीन अपना काम नहीं कर पाता, तो कोशिकाएं उस संकेत से वंचित हो जाती हैं जो सूजन को नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसके चलते आंतों में प्रतिरक्षा तंत्र का माहौल ऐसा हो सकता है जिसमें सूजन लंबे समय तक बनी रहे और उसे काबू करना कठिन हो जाए। यह सिर्फ एंटीबॉडी मौजूद होने की बात नहीं है: शोधकर्ताओं ने पाया कि ये एंटीबॉडी सूजन रोकने में खास भूमिका निभाने वाले प्रोटीन के काम में बाधा डालती हैं।

बीमारी की बड़ी तस्वीर में मरीजों का एक खास समूह

अध्ययन दल ने आंतों की सूजन की बीमारी से पीड़ित 4,900 से अधिक लोगों की जांच की। इनमें से करीब 3.5% लोगों में IL-10 को निष्क्रिय करने वाली एंटीबॉडी का स्तर ऊंचा पाया गया। ये एंटीबॉडी क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस, दोनों से पीड़ित लोगों में मिलीं। इसके उलट, अध्ययन में तुलना के लिए शामिल स्वस्थ लोगों में ऐसी एंटीबॉडी नहीं मिलीं।

यह नतीजा दिखाता है कि केवल लक्षणों या बीमारी के नाम के आधार पर किया गया वर्गीकरण शरीर के भीतर चल रही हर प्रक्रिया को उजागर नहीं करता। दो लोगों को एक ही बीमारी का निदान मिल सकता है, लेकिन उनकी बीमारी के पीछे काम करने वाला प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ा कारण अलग-अलग हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, अगर 3.5% का अनुपात ब्रिटेन में आंतों की सूजन की बीमारी के प्रसार पर लागू किया जाए, तो वहां 15,000 से 20,000 मरीजों में ये एंटीबॉडी हो सकती हैं। यह अध्ययन में मिली दर और बीमारी के प्रसार के आधार पर लगाया गया अनुमान है; देश के हर मरीज की सीधे जांच करके की गई गिनती नहीं।

इन नतीजों का अर्थ यह नहीं है कि ऐसी एंटीबॉडी वाले सभी लोगों की बीमारी एक ही तरह बढ़ेगी। इसी तरह, एंटीबॉडी न मिलने से यह साबित नहीं होता कि किसी व्यक्ति को आंतों की सूजन की बीमारी नहीं है। अहम बात यह है कि अध्ययन ऐसे मरीजों के एक छोटे समूह की ओर इशारा करता है जिनमें बीमारी की एक खास वजह पहचानी जा सकती है। इससे बीमारी को केवल उसके नाम या लक्षणों की गंभीरता से नहीं, बल्कि उसके पीछे काम कर रहे जैविक कारणों से समझने का रास्ता खुलता है। यह आगे चलकर अहम हो सकता है, क्योंकि कई मरीजों को लगातार राहत देने वाला इलाज मिलने से पहले अलग-अलग उपचार आजमाने पड़ते हैं।

पुराने आनुवंशिक रहस्य की एक कड़ी

अध्ययन के नतीजों ने HLA-DRB1*01:03 नाम के एक आनुवंशिक रूपांतर की ओर भी ध्यान खींचा। इस रूपांतर वाले लोगों में IL-10 को निष्क्रिय करने वाली एंटीबॉडी बनने की संभावना अधिक पाई गई। इससे विरासत में मिली संवेदनशीलता और बाद में पैदा होने वाली प्रतिरक्षा संबंधी गड़बड़ी के बीच संभावित संबंध सामने आता है। यह जीन अकेले बीमारी की वजह नहीं बताता, लेकिन इसके होने पर उस प्रतिक्रिया की संभावना बढ़ सकती है जो सूजन को नियंत्रित करने वाले प्रोटीन को रोकती है।

ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने करीब 30 साल पहले इस आनुवंशिक रूपांतर को आंतों की सूजन की बीमारी के एक गंभीर प्रकार से जोड़ा था। लेकिन केवल आनुवंशिक संबंध की जानकारी से यह साफ नहीं हुआ था कि यह रूपांतर आंतों में सूजन पैदा करने की प्रक्रिया से कैसे जुड़ता है। नया अध्ययन इस कड़ी की एक संभावित व्याख्या देता है: इस रूपांतर वाले कुछ लोगों में IL-10 के खिलाफ एंटीबॉडी बनती हैं और प्रोटीन का काम रुकने से सूजन पर शरीर का स्वाभाविक नियंत्रण कमजोर हो सकता है।

इस व्याख्या की अहमियत यह है कि यह जीन और प्रतिरक्षा तंत्र के बीच एक समझ में आने वाला जैविक क्रम दिखाती है। बात सिर्फ इतनी नहीं रह जाती कि किसी आनुवंशिक रूपांतर और बीमारी के बीच सांख्यिकीय संबंध देखा गया है। फिर भी, इस संबंध को पक्की नियति नहीं समझना चाहिए। किसी व्यक्ति में यह रूपांतर होने का यह अर्थ नहीं कि उसे बीमारी जरूर होगी या उसके शरीर में ये एंटीबॉडी जरूर बनेंगी। अध्ययन मरीजों के एक समूह में काम कर सकने वाली प्रक्रिया की पहचान करता है; यह क्रोहन रोग या अल्सरेटिव कोलाइटिस के हर मामले की पूरी व्याख्या नहीं देता।

दुर्लभ बीमारियों से बड़ी आबादी तक पहुंची खोज

यह शोध केवल आम बीमारियों के मरीजों को देखकर शुरू नहीं हुआ था। एक दशक से भी अधिक समय तक वैज्ञानिकों ने ऐसे दुर्लभ आनुवंशिक विकारों का अध्ययन किया जिनमें शरीर सूजन को नियंत्रित नहीं कर पाता। पहले के अध्ययनों में गंभीर आंतों की सूजन से पीड़ित छोटे बच्चों में IL-10 जीन या इस प्रोटीन को पहचानने वाले रिसेप्टर की गड़बड़ियां सामने आई थीं। प्रोटीन का काम रुकने या उसके संदेश को ग्रहण करने की प्रक्रिया बिगड़ने से प्रतिरक्षा तंत्र को काबू में रखने वाली व्यवस्था प्रभावित होती है।

बाद में शोधकर्ताओं ने अल्सरेटिव कोलाइटिस से पीड़ित दो छोटी बच्चियों में IL-10 को निष्क्रिय करने वाली एंटीबॉडी पाई। यह खोज इसलिए अहम थी कि एंटीबॉडी का असर कुछ आनुवंशिक गड़बड़ियों जैसा लग रहा था। दोनों ही स्थितियों में IL-10 का रास्ता सूजन को नियंत्रित करने का अपना सामान्य काम नहीं कर पाता। इन दुर्लभ मामलों से शोधकर्ताओं के मन में एक बड़ा सवाल उठा: क्या यही प्रक्रिया बड़ी उम्र के और अधिक आम मरीजों के किसी हिस्से में भी मौजूद है?

मौजूदा अध्ययन इस सवाल का जवाब देता है। इसमें 4,900 से अधिक मरीजों के बड़े समूह में एंटीबॉडी मिलीं और बीमारी से पीड़ित लोगों में इनकी मौजूदगी का अनुमान 3.5% लगाया गया। इस तरह, दुर्लभ मरीजों में मिली सीमित जानकारी से आगे बढ़कर यह सबूत सामने आया कि IL-10 को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया आंतों की सूजन की बीमारी वाले ऐसे समूह के लिए मायने रख सकती है जिसकी पहचान संभव है। शोध का यह क्रम यह भी दिखाता है कि किसी दुर्लभ विकार का अध्ययन अधिक आम बीमारियों को समझने में मदद देने वाला जैविक सिद्धांत उजागर कर सकता है।

जांच और इलाज में क्या बदल सकता है?

इस खोज का एक व्यावहारिक नतीजा ऐसा रक्त परीक्षण विकसित करना हो सकता है जिससे IL-10 को निशाना बनाने वाली एंटीबॉडी का पता चल सके। इससे डॉक्टरों को यह जानने में मदद मिल सकती है कि किसी खास मरीज में यह गड़बड़ी मौजूद है या नहीं। तब इलाज चुनते समय केवल लक्षणों के आधार पर अलग-अलग दवाएं आजमाने के बजाय बीमारी के संभावित कारण को भी ध्यान में रखा जा सकेगा। हालांकि, अध्ययन इस संभावना की नींव रखता है; इसका यह मतलब नहीं कि ऐसा परीक्षण नियमित इस्तेमाल के लिए तैयार है या उसकी चिकित्सकीय उपयोगिता पहले ही साबित हो चुकी है।

अगर जांच विकसित हो जाए और उसकी सटीकता की पुष्टि हो जाए, तो इससे उन मरीजों की पहचान हो सकती है जिनके लिए एंटीबॉडी को सीधे निशाना बनाने वाला या उन्हें बनाने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं पर असर करने वाला इलाज उपयोगी हो। यह तरीका पूरे प्रतिरक्षा तंत्र को व्यापक रूप से दबाने से अलग होगा, क्योंकि इसमें उस खास गड़बड़ी पर ध्यान दिया जाएगा जिसे इस समूह में सूजन का कारण माना जा रहा है। लेकिन असरदार और सुरक्षित इलाज चुनने के लिए अभी और काम करना होगा। मौजूदा नतीजे अपने आप यह साबित नहीं करते कि एंटीबॉडी को निशाना बनाने से बीमारी ठीक हो जाएगी या लंबे समय तक शांत रहेगी।

इस संभावना का महत्व इसलिए भी है कि यह बीमारी मरीजों और स्वास्थ्य सेवाओं पर काफी बोझ डाल सकती है। मरीजों को बार-बार अस्पताल जाना पड़ सकता है, प्रतिरक्षा तंत्र की गतिविधि घटाने वाली दवाएं लेनी पड़ सकती हैं और कभी-कभी सर्जरी की जरूरत भी हो सकती है। सही इलाज खोजने में कई बार अलग-अलग उपचार आजमाने पड़ते हैं, और शुरुआती कोशिशों से हर मरीज को लंबे समय तक राहत नहीं मिलती। इसलिए अगर मरीजों के किसी समूह में बीमारी की एक खास वजह का पता चल सके, तो जांच और आगे के इलाज से उसकी उपयोगिता साबित होने पर बेवजह के उपचार आजमाने और गैरजरूरी दखल कम करने में मदद मिल सकती है।

इस काम में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे मरीजों को जल्दी पहचानकर उनकी खास गड़बड़ी के अनुसार इलाज देने से महंगे और लगातार चलने वाले उपचारों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे अस्पताल में भर्ती होने या सर्जरी की जरूरत भी घट सकती है। उनके अनुमान के अनुसार, जैविक दवाओं के इस्तेमाल या अस्पताल में भर्ती और सर्जरी के मामलों में थोड़ी-सी कमी भी ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा को हर साल लाखों पाउंड बचा सकती है। यह एक संभावित लाभ है, अध्ययन में मापा गया वास्तविक आर्थिक नतीजा नहीं। ऐसा लाभ तभी मिल सकेगा जब भरोसेमंद जांच तैयार हो और यह साबित हो कि इस आधार पर चुनी गई उपचार रणनीति मरीजों के नतीजे सचमुच बेहतर करती है।

कई संस्थानों का अध्ययन और जानकारी की सीमाएं

इस शोध में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नफील्ड चिकित्सा विभाग, न्यूकैसल विश्वविद्यालय के अनुवादात्मक और नैदानिक अनुसंधान संस्थान तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अस्पतालों के प्रतिरक्षा विभाग के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने हिस्सा लिया। नतीजे न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए। शोध को ब्रिटेन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एवं देखभाल संस्थान से जुड़े ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और न्यूकैसल के जैव-चिकित्सा अनुसंधान केंद्रों के माध्यम से वित्तीय सहायता मिली।

यह अध्ययन इस समझ को मजबूत करता है कि आंतों की सूजन कोई एक ऐसी बीमारी नहीं है जिसकी हर बार एक ही वजह हो। इसके बजाय, यह कई स्थितियों का समूह हो सकता है जिनके लक्षण एक-दूसरे से मिलते हों, जबकि उन्हें चलाने वाली प्रक्रियाएं अलग हों। इस विचार को आगे जांचना जरूरी है। वैज्ञानिकों को जानना होगा कि संभावित जांच असल चिकित्सा में कैसी काम करती है, एंटीबॉडी का पता चलने से डॉक्टरों के फैसले बदलते हैं या नहीं और इन्हें रखने वाले मरीजों को कौन-सा इलाज सबसे अच्छा असर देता है। साथ ही, 3.5% का आंकड़ा अध्ययन में शामिल समूह के नतीजों को दर्शाता है। अतिरिक्त पुष्टि के बिना इसे हर समुदाय या हर मरीज पर सीधे लागू नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष

अध्ययन ने सूजन पैदा करने वाली एक खास प्रतिरक्षा प्रक्रिया की पहचान की है, जो इसमें शामिल मरीजों में से करीब 3.5% की बीमारी को समझाने में मदद कर सकती है। इन मरीजों में एंटीबॉडी IL-10 को निष्क्रिय कर देती हैं—यह ऐसा प्रोटीन है जो सूजन की प्रतिक्रिया सीमित रखने में मदद करता है। शोध HLA-DRB1*01:03 आनुवंशिक रूपांतर और गंभीर बीमारी के बीच करीब 30 साल पहले देखे गए संबंध की संभावित व्याख्या भी देता है। इस खोज का अर्थ यह नहीं कि नया इलाज तुरंत उपलब्ध हो गया है, लेकिन इससे भविष्य में रक्त जांच और मरीज की जरूरत के अनुसार इलाज का रास्ता खुलता है। बीमारी की वजह को अलग-अलग मरीज समूहों में समझना, उनकी देखभाल बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।