आसान शब्दों में
चमगादड़ सिर्फ रात में उड़ने वाले डरावने जीव नहीं हैं। वे कीड़े खाते हैं, पौधों के परागण में मदद करते हैं और अपने समूह के भूखे साथियों को भोजन भी देते हैं। उनकी सुनने की क्षमता, लंबी उम्र और शरीर की खास खूबियाँ वैज्ञानिकों को प्रकृति और इंसानों के बारे में नई बातें समझने में मदद कर सकती हैं।
अँधेरे में उड़ते पंख
सूरज ढलते ही आसमान में छोटे-छोटे पंख फड़फड़ाने लगते हैं। चमगादड़ पेड़ों और खेतों के बीच ऐसी फुर्ती से उड़ते हैं कि उन्हें देख पाना अक्सर मुश्किल होता है। लोककथाओं में उन्हें डरावनेपन और खून चूसने वाले जीवों से जोड़ा गया है। कुछ प्रजातियों की आदतों और कुछ के अनोखे रूप ने शायद इस छवि को बढ़ावा दिया हो, लेकिन इससे इस जीव की पूरी कहानी नहीं पता चलती। चमगादड़ 5 करोड़ वर्ष से भी अधिक समय से धरती पर हैं और अलग-अलग वातावरण तथा भोजन के अनुसार ढलने में सफल रहे हैं।
अंटार्कटिका को छोड़कर चमगादड़ दुनिया के हर महाद्वीप में पाए जाते हैं। वे एक जैसी आदतों वाले जीवों का समूह नहीं हैं। कुछ कीड़े पकड़कर खाते हैं, कुछ फूलों का रस पीते हैं, तो कुछ मछलियों या मेंढकों का शिकार करते हैं। कुछ प्रजातियाँ खून भी पीती हैं। उनके खानपान, शरीर की खूबियों और सामाजिक व्यवहार में दिखने वाला यह फर्क बताता है कि प्रकृति में उनकी भूमिका कितनी अहम है। उनके अध्ययन से वैज्ञानिकों को उम्र बढ़ने और बीमारियों से जुड़े सवालों के जवाब खोजने में भी मदद मिल सकती है।
अँधेरे में काम आते पंख और आवाज़ें
चमगादड़ ही ऐसे स्तनधारी हैं जिनमें सचमुच उड़ने की क्षमता विकसित हुई है। कुछ दूसरे जीव हवा में फिसलकर आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन वे चमगादड़ों की तरह पंख फड़फड़ाकर उड़ नहीं सकते। उड़ने की क्षमता से चमगादड़ों को रात में भोजन खोजने और दूर-दूर तक जाने का रास्ता मिला। कई प्रजातियाँ आसपास की चीज़ों का पता लगाने के लिए प्रतिध्वनि का सहारा लेती हैं: वे आवाज़ निकालती हैं और लौटकर आने वाली गूँज से अपने आसपास की तस्वीर समझती हैं।
आवाज़ से रास्ता पहचानना भले ही साधारण लगे, लेकिन चमगादड़ के लिए यह बहुत सटीक काम करता है। उड़ते समय लौटती गूँज उसे आसपास की चीज़ों का पता देती है और अँधेरे में छिपे छोटे शिकार को ढूँढ़ने में मदद करती है। कुछ चमगादड़ केवल हलचल पहचानने तक सीमित नहीं रहते। वे दूसरे जानवरों की आवाज़ें सुनकर उनका इस्तेमाल शिकार खोजने में करते हैं। ऐसे में शिकार की आवाज़ महज़ पृष्ठभूमि का शोर नहीं रहती; वह उसकी जगह बताने वाला संकेत बन जाती है और शिकारी को यह समझने में मदद करती है कि सामने का जीव खाने लायक है या नहीं।
चमगादड़ इंसानों के लिए भी उपयोगी हैं, भले ही उनकी मदद अक्सर नज़र न आए। कीड़े खाने वाली प्रजातियाँ उनकी संख्या घटाती हैं, जिनमें मच्छर भी शामिल हैं। दुनिया भर के किसानों को मिलने वाली इस प्राकृतिक मदद का सालाना मूल्य अरबों डॉलर आँका जाता है। फूलों का रस खोजने वाली प्रजातियाँ उष्णकटिबंधीय पौधों के परागण में भी हाथ बँटाती हैं। इस तरह रात में सक्रिय चमगादड़ ऐसे प्राकृतिक रिश्तों का हिस्सा हैं, जो खेती और कुछ पौधों के बने रहने में मदद करते हैं।
बदनाम छवि से कहीं बड़ा संसार
दुनिया में चमगादड़ों की करीब 1500 प्रजातियाँ पहचानी जा चुकी हैं। ज्ञान और वर्गीकरण बेहतर होने के साथ यह संख्या बढ़ भी सकती है। स्तनधारियों में प्रजातियों की संख्या के मामले में चमगादड़ों से आगे केवल चूहों और गिलहरियों जैसे जीव हैं। इनकी विविधता उनके रहन-सहन और भोजन के तरीकों में साफ दिखती है: कुछ खून पीते हैं, कुछ फूलों का रस लेते हैं, कई कीड़ों का शिकार करते हैं और कुछ मछलियाँ या मेंढक खाते हैं।
इसी विविधता के कारण चमगादड़ों की सभी प्रजातियों के बारे में एक ही तरह का फैसला करना ठीक नहीं है। कुछ चमगादड़ों का खून पीना यह नहीं बताता कि यह पूरे समूह में आम बात है; असल में ज़्यादातर प्रजातियाँ ऐसा नहीं करतीं। दूसरे जानवरों को खाने वाले चमगादड़ों में भी भोजन ढूँढ़ने और उसे पकड़ने के तरीके अलग-अलग होते हैं। हर प्रजाति को अपने भोजन और रहने की जगह से जुड़ी अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
इसका एक दिलचस्प उदाहरण झालरदार होंठों वाला चमगादड़ है, जिसका वैज्ञानिक नाम Trachops cirrhosus है। यह मेंढक खाता है, लेकिन हर मेंढक सुरक्षित भोजन नहीं होता। कुछ मेंढक ज़हरीले होते हैं, जबकि कुछ इतने बड़े हो सकते हैं कि शिकारी के लिए खतरा बन जाएँ। इसलिए यह चमगादड़ रात में मेंढकों की तेज़ आवाज़ें सुनता है, जो वे जोड़ीदार को बुलाने के लिए निकालते हैं। इन आवाज़ों से उसे शिकार की जगह का पता चलता है। साथ ही, उनसे मिली जानकारी उसे मेंढक के आकार या उसके ज़हरीले होने का अंदाज़ा लगाने में भी मदद कर सकती है।
इस तरह चमगादड़ अपने शिकार के संकेत को ही शिकार पकड़ने का औज़ार बना लेता है। वह सिर्फ आवाज़ की दिशा में नहीं जाता, बल्कि उस संकेत से यह भी परखता है कि हमला करने पर उसे किस तरह के जीव का सामना करना पड़ सकता है। यह उदाहरण दिखाता है कि किसी जानवर की इंद्रियाँ उसकी ज़रूरतों के अनुसार कैसे काम आती हैं। मेंढक की आवाज़ अपनी जाति के दूसरे मेंढकों से संपर्क करने के लिए होती है, लेकिन पास का शिकारी उसी आवाज़ को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
छोटा शरीर, कई दशकों की उम्र
कई जानवरों में उम्र और शरीर के आकार का एक रिश्ता दिखता है। उदाहरण के लिए, व्हेल और हाथी आम तौर पर चूहों और छछूँदरों जैसे छोटे जीवों से अधिक समय तक जीते हैं। चमगादड़ इस आम चलन से अलग हैं। वे सबसे छोटे स्तनधारियों में गिने जाते हैं, फिर भी कुछ प्रजातियाँ कई दशक तक जीवित रह सकती हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक उनके शरीर के आकार को देखते हुए उनकी उम्र को असाधारण रूप से लंबा मानते हैं।
वैज्ञानिकों की दिलचस्पी सिर्फ उनकी उम्र के रिकॉर्ड में नहीं है। वे यह समझना चाहते हैं कि चमगादड़ लंबा जीवन कैसे जीते हैं। जिन बातों पर शोध हो रहा है, उनमें डीएनए की मरम्मत करने की उनकी क्षमता और शरीर में वायरस मौजूद होने पर भी बीमार न पड़ने की उनकी क्षमता शामिल हैं। इसका यह मतलब नहीं कि चमगादड़ों को बीमारियाँ नहीं होतीं। बल्कि उनके शरीर में काम करने वाले तरीकों को समझकर वैज्ञानिक जान सकते हैं कि कुछ चुनौतियों से वे दूसरे जानवरों से अलग ढंग से कैसे निपटते हैं।
डबलिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और आयरिश बैट रिसर्च सेंटर की संस्थापक शोधकर्ता एमा टिलिंग, उम्र बढ़ने को समझने की व्यापक कोशिश के तहत इन खूबियों का अध्ययन करती हैं। इसका मकसद यह मान लेना नहीं है कि चमगादड़ों में होने वाली हर बात सीधे इंसानों पर लागू की जा सकती है। इसके बजाय, दोनों की तुलना से शरीर में होने वाली ऐसी प्रक्रियाएँ सामने आ सकती हैं जिनकी आगे पड़ताल की जानी चाहिए। इससे समय के साथ कोशिकाओं की देखभाल और उन्हें नुकसान से बचाने के बारे में नई जानकारी मिलने की संभावना है।
जीन में छिपे पुराने सफर के सुराग
चमगादड़ों का अध्ययन सिर्फ यह नहीं बताता कि वे आज कैसे जीते हैं। उनके डीएनए से वैज्ञानिक उनके विकास का पुराना इतिहास भी जोड़ने की कोशिश करते हैं। सितंबर में 130 से अधिक वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने Nature पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित किया। इसमें चमगादड़ों के सभी 21 समूहों की आनुवंशिक जानकारी का अध्ययन किया गया। आनुवंशिक जानकारी को जीवाश्मों से मिले सबूतों के साथ मिलाकर शोधकर्ताओं ने यह समझने का नया तरीका पेश किया कि चमगादड़ों की शुरुआत कहाँ हुई होगी।
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि चमगादड़ों की शुरुआत संभवतः यूरोप में हुई और फिर वे अफ्रीका पहुँचे। वहाँ से वे दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैल गए। उनके मूल स्थान को लेकर पहले भी बहस रही है और उत्तर अमेरिका समेत अलग-अलग इलाकों को उनकी शुरुआत की जगह माना गया है। यहाँ जीन और जीवाश्म, दोनों तरह के सबूतों को साथ देखना अहम है, क्योंकि हर तरह की जानकारी कहानी का अलग हिस्सा देती है। आनुवंशिक सामग्री से प्रजातियों के आपसी रिश्तों की तुलना की जा सकती है, जबकि जीवाश्म बताते हैं कि उनके पूर्वज किसी खास समय और जगह पर मौजूद थे।
इस नतीजे का यह अर्थ नहीं कि महाद्वीपों के बीच चमगादड़ों के पूरे सफर की हर बात अब पता चल गई है। फिर भी, इससे उनके भौगोलिक इतिहास की शुरुआत के बारे में पहले की धारणा बदलती है। यह भी दिखता है कि कुछ चुनी हुई प्रजातियों के बजाय चमगादड़ों के सभी समूहों का अध्ययन करने से कितनी मदद मिलती है। व्यापक तुलना वैज्ञानिकों को उनके अलग-अलग समूहों के रिश्ते समझने और यह जानने का बेहतर मौका देती है कि समय के साथ वे कैसे अलग-अलग शाखाओं में बँटे और दुनिया में फैले।
पहचान और संपर्क में गंध का काम
चमगादड़ों की कुछ खूबियाँ आसानी से दिखाई नहीं देतीं। इनमें से एक है खास गंध पैदा करना। Mammal Review पत्रिका में 2021 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार, अब तक पहचानी गई चमगादड़ों की करीब 9% प्रजातियों में ऐसी ग्रंथियाँ या शरीर की दूसरी संरचनाएँ हैं जो गंध पैदा करती हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पहलू पर अभी बहुत कम अध्ययन हुआ है। इसलिए मौजूदा प्रतिशत शायद चमगादड़ों की पूरी क्षमता नहीं दिखाता।
झालरदार होंठों वाले चमगादड़ के नर इसका एक साफ उदाहरण हैं। वे अपनी बाँहों पर सुनहरे रंग का एक पदार्थ लगाते हैं, जिसकी गंध तेज़ और कस्तूरी जैसी बताई जाती है। माना जाता है कि यह गंध मादाओं को आकर्षित करने में भूमिका निभाती है। यह व्यवहार चमगादड़ों के जीवन का एक और पहलू सामने लाता है: संपर्क और जोड़ी बनाने में ऐसे रासायनिक संकेत भी काम आ सकते हैं जिन्हें इंसान आसानी से महसूस नहीं कर पाते। इनके साथ-साथ चमगादड़ आवाज़ें सुनते और निकालते भी हैं।
खून का दुर्लभ भोजन और जान बचाने वाली साझेदारी
खून पीने वाले चमगादड़ों का लोककथाओं में खास स्थान है, लेकिन वे चमगादड़ों की विविध दुनिया का एक छोटा-सा हिस्सा हैं। आम वैम्पायर चमगादड़, जिसका वैज्ञानिक नाम Desmodus rotundus है, जब पक्षियों या स्तनधारियों का खून पीता है, तो पहले उनकी त्वचा पर छोटा घाव करता है और फिर खून चाटता है। उसकी लार में ऐसा पदार्थ होता है जो खून को जल्दी जमने से रोकता है, ताकि वह भोजन करते समय बहता रहे।
इस पदार्थ ने चिकित्सा क्षेत्र का ध्यान खींचा है, क्योंकि खून का जमना रोकना उन थक्कों से निपटने में काम आ सकता है जो मस्तिष्काघात का कारण बनते हैं। वैज्ञानिकों ने यह संभावना देखी कि इससे ऐसा इलाज बनाया जा सके जो थक्कों को रोके और दिमाग में खून बहने का खतरा भी कम करे। लेकिन करीब एक दशक पहले, उम्मीद के मुताबिक नतीजे न मिलने के बाद इस इलाज को विकसित करने का काम रुक गया। फिर भी, हाल की एक समीक्षा में इस विचार पर आगे सोचने की गुंजाइश बताई गई। इससे यह बात साफ होती है कि कोई दिलचस्प पदार्थ मिल जाना अपने आप में सफल दवा तैयार होने की गारंटी नहीं है।
इन चमगादड़ों का एक और असाधारण व्यवहार भूखे साथी की मदद करना है। अगर वैम्पायर चमगादड़ लगातार करीब दो रातों तक भोजन पाने में नाकाम रहे, तो उनकी जान जा सकती है। उनके शरीर में इतनी ऊर्जा जमा नहीं रहती कि वे लंबे समय तक भोजन का इंतज़ार कर सकें। शोध से पता चलता है कि उनकी बस्ती के दूसरे चमगादड़ उनके साथ भोजन बाँट सकते हैं। वे अपने पेट में जमा खून वापस निकालकर भूखे साथी को देते हैं।
भोजन देने वाले चमगादड़ के लिए यह मदद आसान नहीं होती, लेकिन इससे उसका पड़ोसी बच सकता है। यह याद दिलाता है कि जीवित रहने का दारोमदार हमेशा एक जीव की अपनी ताकत पर ही नहीं होता। कुछ पशु-समूहों में साथियों का सहयोग जीवन और मृत्यु के बीच फर्क पैदा कर सकता है। साथ ही, इस व्यवहार को चमगादड़ों की सभी प्रजातियों पर लागू नहीं करना चाहिए। इसके सबूत वैम्पायर चमगादड़ों और उनके सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में मिले हैं।
निष्कर्ष
चमगादड़ों में कई ऐसी खूबियाँ एक साथ मिलती हैं जिन्हें देखकर हैरानी होती है। वे सचमुच उड़ने वाले अकेले स्तनधारी हैं, उनकी कुछ प्रजातियाँ गूँज से रास्ता पहचानती हैं और वे कीड़ों की संख्या घटाने तथा पौधों के परागण में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी करीब 1500 प्रजातियों के भोजन और तौर-तरीके भी एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। कोई मेंढक की आवाज़ सुनकर उसका पता लगाता है, तो कहीं चमगादड़ अपनी बस्ती के साथी के साथ भोजन बाँटते हैं।
उनका अध्ययन ऐसे सवालों की ओर भी ले जाता है जो चमगादड़ों की दुनिया से आगे जाते हैं। छोटा-सा जीव कई दशक तक कैसे जीता है? डीएनए की मरम्मत और वायरस के साथ उसके व्यवहार से क्या सीखा जा सकता है? जीन और जीवाश्मों को मिलाकर उसके पुराने इतिहास के बारे में क्या पता चलता है? ये सवाल चमगादड़ों को कोई चमत्कारी जीव नहीं बनाते, लेकिन यह जरूर बताते हैं कि उनका अध्ययन क्यों मायने रखता है। डरावनी कहानियों से परे, वे प्रकृति के अहम हिस्से हैं और उनके बारे में जानना इंसानी ज्ञान को भी आगे बढ़ा सकता है।