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पशुओं में पाया जाने वाला वायरस इंसान तक पहुँचा—क्या यह चिंता की बात है।

आसान शब्दों में

फ्रांस में एक ऐसे व्यक्ति की मौत हुई, जिसके शरीर में शमोंडा नाम का वायरस मिला। यह वायरस अब तक जानवरों में ही जाना जाता था। अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि यह लोगों के बीच फैल रहा है। फिर भी इस घटना से पता चलता है कि कुछ संक्रमण कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए गंभीर हो सकते हैं और उन पर नज़र रखना ज़रूरी है।

वायरस की खोज के छह दशक बाद सामने आया असाधारण मामला

शमोंडा वायरस पहली बार 1965 में नाइजीरिया की गायों में पाया गया था। तब से इसके बारे में जानकारी मुख्य रूप से जानवरों में होने वाली बीमारी से जुड़ी रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, फ्रांस में सामने आया मामला इस वायरस से इंसान के संक्रमित होने का पहला दर्ज मामला है। यह इससे जुड़ी पहली ज्ञात मानवीय मृत्यु भी है। चिकित्सा पत्रिका यूरोसर्विलांस में प्रकाशित इस मामले का विवरण इसलिए अहम है कि इससे जानवरों में पहचाने जाने वाले खतरे के साथ-साथ इंसानों के संक्रमित होने की संभावना पर भी ध्यान गया है। हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि इंसानों में संक्रमण आम है।

मरीज़ 61 साल के एक पुरुष थे, जिनका ल्योन के एक सरकारी अस्पताल में रक्त कैंसर का इलाज चल रहा था। उनका स्टेम सेल प्रत्यारोपण भी हुआ था। ऐसे इलाज के बाद रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमज़ोर हो सकती है। उनके मस्तिष्क में सूजन हुई, जिसे मस्तिष्कशोथ कहा जाता है। इसके बाद उनमें तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याएँ दिखीं, जिनमें अंधापन और उलझन शामिल थे। रिपोर्ट लिखने वाले शोधकर्ताओं का मानना है कि इन लक्षणों के पीछे वायरस हो सकता है।

बाद में उनकी हालत और बिगड़ी और वे कोमा में चले गए। 9 अक्टूबर 2026 को जीवनरक्षक मशीनें बंद करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस एक रिपोर्ट से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आम लोगों के साथ भी ऐसा होगा। लेकिन इससे यह ज़रूर पता चलता है कि बहुत कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्ति में दुर्लभ संक्रमण भी बेहद गंभीर हो सकता है। यह इस वायरस से हुई पहली ज्ञात मृत्यु है, पर इसका मतलब यह नहीं कि हर संक्रमित व्यक्ति की मौत होगी। इंसानों में इसके असर के बारे में जानकारी अभी बहुत सीमित है।

पशुओं का वायरस इंसान तक कैसे पहुँचा?

शुरुआती सबूत खून चूसने वाले छोटे कीड़ों की ओर इशारा करते हैं। इन्हें काटने वाली मिज मक्खियाँ कहा जाता है और ये क्यूलिकोइड्स समूह की हैं। फ्रांस के स्वास्थ्य और कृषि मंत्रालयों को संदेह है कि उस व्यक्ति को देश के पूर्वी हिस्से में किसी कीड़े के काटने से संक्रमण हुआ होगा। उस इलाके में कई जानवरों में वायरस पाया गया था। फ्रांस के इस मामले की जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूरोपीय रोग रोकथाम एवं नियंत्रण केंद्र को दी गई है।

मरीज़ तक वायरस किस रास्ते पहुँचा, इसकी जाँच अभी जारी है। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि उन्हें संक्रमण किसी दूसरे व्यक्ति से लगा। ल्योन अस्पताल के विषाणु विशेषज्ञ ग्रेगोरी डिएस्त्रा, जो रिपोर्ट तैयार करने वालों में शामिल थे, कहते हैं कि अभी के सबूत यह नहीं दिखाते कि शमोंडा इंसानों में ज़्यादा फैलने लगेगा। उन्होंने एक संभावना रखी है: हो सकता है कि तंत्रिका संबंधी लक्षण आने से कई हफ्ते पहले वायरस शरीर में पहुँचा हो और अपेक्षाकृत लंबी ऊष्मायन अवधि के दौरान बढ़ता रहा हो।

यह संभावना समझाती है कि किसी असामान्य मस्तिष्कशोथ को किसी खास वायरस से जोड़ना क्यों कठिन हो सकता है। कीड़े के काटने या उसके संपर्क में आने और बीमारी शुरू होने के बीच समय बीत सकता है। संक्रमण के लक्षण दूसरी बीमारियों जैसे भी लग सकते हैं, खासकर तब जब मरीज़ रक्त कैंसर का इलाज करा रहा हो और उसका स्टेम सेल प्रत्यारोपण हुआ हो। इसलिए केवल एक मामला मिलने से संक्रमण फैलने का रास्ता तय नहीं किया जा सकता, न ही यह आंका जा सकता है कि ऐसा दोबारा होने की कितनी आशंका है।

कई तरह के जानवरों में पाया जाने वाला वायरस

शमोंडा केवल गायों में नहीं पाया जाता। भेड़, बकरी, घोड़े और अल्पाका में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। जानवरों में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। इनमें बुखार, दस्त और दूध का उत्पादन कम होना शामिल हैं। यह वायरस कई प्रजातियों को संक्रमित कर सकता है, लेकिन जानवरों के बीच यह बहुत तेज़ी से फैलता हुआ नहीं दिखता। वयस्क जानवरों में इससे आम तौर पर मौत भी नहीं होती। हालांकि, गर्भवती पशुओं में संक्रमण का अलग खतरा है: वायरस गर्भस्थ शिशु तक पहुँच सकता है, जिससे गर्भपात, मृत शिशु का जन्म या जन्मजात विकृतियाँ हो सकती हैं।

कुछ अफ्रीकी देशों और जापान में यह वायरस दर्ज किया गया है। इस साल गर्मियों में पहली बार यूरोप में इसकी मौजूदगी की खबर आई। उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक, यूरोप के 14 देशों में मवेशियों में वायरस पाया गया है। इसी साल पहले इसके दो नए आनुवंशिक समूह मिले, जिन्हें SHAV-EU1 और SHAV-EU2 नाम दिया गया। जाँच में मृत व्यक्ति के मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी के आसपास के द्रव, पेशाब और लार के नमूनों में पहले समूह SHAV-EU1 के निशान मिले। दूसरे नमूनों में भी इसके संकेत पाए गए।

वायरस के इन आनुवंशिक समूहों का पता लगाना केवल नामकरण का काम नहीं है। जानवरों, कीड़ों और इंसानों के नमूनों में वायरस की आनुवंशिक सामग्री की तुलना से उसके फैलने के रास्तों और उसमें आए बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है। फिर भी, इंसानी नमूने में किसी आनुवंशिक समूह का मिलना अपने-आप यह नहीं बताता कि व्यक्ति कहाँ या कब संक्रमित हुआ। इससे यह भी साबित नहीं होता कि वायरस लगातार इंसानों के बीच फैल रहा है। इन सवालों के जवाब के लिए एक अकेले मामले से कहीं अधिक आँकड़ों की ज़रूरत है।

इसके फैलने की आशंका के बारे में क्या पता है?

शमोंडा सिम्बू समूह का और ऑर्थोबुन्यावायरस वंश का वायरस है। इसी समूह और वंश में ओरूपूचे वायरस भी आता है, जिसे स्लॉथ बुखार के नाम से भी जाना जाता है। 1960 से 2025 के बीच लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में ओरूपूचे के लगभग 94 लाख मानवीय संक्रमण हुए। यह उदाहरण दिखाता है कि एक ही आनुवंशिक समूह के कुछ वायरस इंसानों में बीमारी का बड़ा बोझ पैदा कर सकते हैं। लेकिन इससे यह नहीं माना जा सकता कि शमोंडा भी उसी तरह फैलेगा। वर्गीकरण में समानता का मतलब यह नहीं कि दोनों वायरस इंसानों को संक्रमित करने या उनके बीच फैलने की एक जैसी क्षमता रखते हैं।

इंडियाना विश्वविद्यालय के चिकित्सा महाविद्यालय की विषाणु विशेषज्ञ नताशा टिल्स्टन-लोनल कहती हैं कि ऐसी तुलना करते समय सावधानी बरतना ज़रूरी है। वह बताती हैं कि शमोंडा से मिलता-जुलता श्मालेनबर्ग वायरस मवेशियों में बहुत फैला हुआ है, लेकिन इंसानों को संक्रमित करने के लिए इसकी पहचान नहीं हुई है। मौजूदा जानकारी के आधार पर उनका मानना है कि शमोंडा से इंसानों में संक्रमण की आशंका भी सीमित हो सकती है। टिल्स्टन-लोनल ने नई रिपोर्ट तैयार करने में हिस्सा नहीं लिया था।

फिर भी, अब तक संक्रमण कम दिखना अपने-आप में सवाल का अंतिम जवाब नहीं है, खासकर जब इंसानी मामलों की निगरानी पूरी न हो। कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्ति को मस्तिष्कशोथ हो सकता है, लेकिन उसकी वजह का पता न चले। यह भी संभव है कि मरीज़ों की जाँच में ऐसे अनजाने वायरसों को खोजा ही न जाए। जर्मनी के फ्रेडरिक लोएफ़्लर संस्थान के पशु चिकित्सक और विषाणु वैज्ञानिक मार्टिन बेयर बताते हैं कि कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में कुछ अन्य ऑर्थोबुन्यावायरस संक्रमणों के साथ भी बिना स्पष्ट वजह वाला मस्तिष्कशोथ देखा गया है। इनमें जेम्सटाउन कैन्यन वायरस और काश वैली वायरस शामिल हैं।

कीड़े और मौसम संक्रमण के फैलाव को कैसे प्रभावित करते हैं?

सिम्बू समूह के वायरस मुख्य रूप से काटने वाली मिज मक्खियों के ज़रिए फैलते हैं। बेयर के मुताबिक, ये कीड़े संक्रमण को तेज़ी से फैला सकते हैं, खास तौर पर गर्मियों और पतझड़ में, जब उनके सक्रिय रहने के लिए मौसम अनुकूल होता है। सर्दियों में संक्रमण का चक्र धीमा पड़ जाता है, क्योंकि ऐसे कीड़ों की संख्या बहुत कम हो जाती है। बेयर यह भी बताते हैं कि लगभग 12 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर वायरस ठीक से बढ़ नहीं पाता।

मौसम का यह असर समझने में मदद करता है कि वायरस नए इलाकों में कब दिखाई दे सकते हैं और निगरानी किन समयों में बढ़ानी चाहिए। लेकिन इससे इंसानों के लिए खतरे का पूरा जवाब नहीं मिलता। किसी इलाके में वायरस और उसे फैलाने वाला कीड़ा एक साथ मौजूद हों, तो इसका यह मतलब नहीं कि वहाँ इंसानी संक्रमण ज़रूर होंगे। इसी तरह, एक मामला मिलने से यह साबित नहीं होता कि कीड़े बार-बार लोगों को संक्रमित कर रहे हैं। यूरोपीय रोग रोकथाम एवं नियंत्रण केंद्र के एक प्रवक्ता का कहना है कि वायरस के फैलने के तरीकों और इंसानी संक्रमण में वाहक कीड़ों की भूमिका को बेहतर ढंग से समझने की ज़रूरत है।

अभी निगरानी क्यों ज़रूरी है?

वैज्ञानिकों की पहली प्राथमिकता यह पता लगाना है कि फ्रांस का मामला बेहद दुर्लभ अपवाद था या कम गंभीर संक्रमण पहले भी हुए, लेकिन उनकी पहचान नहीं हो सकी। डिएस्त्रा का सुझाव है कि फ्रांस में कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के पुराने, संभालकर रखे गए नमूनों की जाँच की जाए। उनमें वायरस के निशान मिलें, तो ऐसे संक्रमणों का पता चल सकता है जो उस समय दर्ज नहीं हुए थे। इस तरीके से लोगों में वायरस के संपर्क का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। इसके लिए सही तरह के नमूने और ऐसे परीक्षण चाहिए जो शमोंडा को उससे मिलते-जुलते वायरसों से अलग पहचान सकें।

एक और अहम कदम जानवरों की निगरानी का दायरा बढ़ाना है। इसमें मवेशियों के साथ-साथ उन पशुओं के गर्भस्थ शिशुओं की जाँच भी शामिल हो सकती है जिनका गर्भपात हुआ हो। वायरस फैलाने वाले कीड़ों पर नज़र रखना भी ज़रूरी है। केवल पशुओं की जाँच से वायरस के फैलने के पूरे चक्र का पता नहीं चल सकता। मिज मक्खियों में इसकी मौजूदगी खोजने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि वायरस किन जगहों पर है और किस मौसम में कीड़े अधिक सक्रिय हैं। इंसानी नमूनों की आनुवंशिक जाँच से यह भी पता चल सकता है कि लोगों और जानवरों में मिले वायरस आपस में जुड़े हैं या नहीं, और क्या उनमें कोई ऐसा बदलाव आया है जिस पर आगे ध्यान देना चाहिए।

टिल्स्टन-लोनल इंसानों में शमोंडा के खिलाफ शरीर में बनी एंटीबॉडी के बारे में अधिक जानकारी जुटाने की सलाह देती हैं। एंटीबॉडी मिलना इस बात का संकेत हो सकता है कि व्यक्ति पहले वायरस के संपर्क में आया था, भले ही उस समय उसकी बीमारी को शमोंडा संक्रमण के रूप में दर्ज न किया गया हो। अगर पुराने संपर्क के सबूत मिलते हैं, तो उनसे यह समझने में मदद मिलेगी कि संक्रमण आम तौर पर बिना साफ़ लक्षणों के रहता है या कुछ खास लोगों, जैसे कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों, के लिए ज़्यादा गंभीर खतरा बनता है। फिलहाल शमोंडा संक्रमण से बचाव के लिए जानवरों या इंसानों का कोई टीका उपलब्ध नहीं है।

ये सभी उपाय निगरानी और समझ बढ़ाने के साधन हैं; ये इस बात का सबूत नहीं कि इंसानों में महामारी बस शुरू होने वाली है। मौजूदा वैज्ञानिक आकलन में लोगों के बीच बढ़ते फैलाव का कोई संकेत नहीं है। फिर भी, इससे उन संक्रमणों की संभावना खारिज नहीं होती जिनकी पहचान नहीं हो पाई, और निगरानी बढ़ने पर खतरे के बारे में समझ बदल भी सकती है। यहाँ संभावना और हकीकत के बीच का फर्क अहम है: यह वायरस जानवरों में जाना जाता है, लेकिन इंसानों में इसके व्यवहार की जानकारी अब तक केवल एक दर्ज मामले पर आधारित है।

निष्कर्ष

फ्रांस में 61 साल के एक व्यक्ति की मौत ने शमोंडा वायरस से इंसान के संक्रमित होने का पहला ज्ञात मामला सामने ला दिया। कई दशकों से यह वायरस जानवरों और उन्हें काटने वाले कीड़ों से जुड़ा माना जाता था। मरीज़ को जानलेवा मस्तिष्कशोथ हुआ, लेकिन अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि संक्रमण इंसानों के बीच फैल रहा है या बड़े पैमाने पर बीमारी पैदा कर रहा है। यह जानने के लिए कि मामला पूरी तरह अपवाद था या किसी पहले से छिपे खतरे का संकेत, संक्रमण के स्रोत की जाँच, कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के पुराने नमूनों का अध्ययन, कीड़ों और जानवरों की निगरानी और वायरस के आनुवंशिक बदलावों पर नज़र रखना ज़रूरी है।