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एक छोटा उपग्रह, एक ब्रिटिश रॉकेट और अंतरिक्ष में अधूरा रह गया वादा

आसान शब्दों में

28 अक्टूबर 1971 को ब्रिटेन ने अपने बनाए रॉकेट से एक उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा। प्रॉस्पेरो नाम का यह छोटा उपग्रह उपकरणों को अंतरिक्ष में परखने के लिए बनाया गया था और रॉकेट के एक हिस्से से टकराने के बाद भी काम करता रहा। उससे नियमित संपर्क 1973 में बंद हो गया, लेकिन वह आज भी पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है।

ऑस्ट्रेलिया के प्रक्षेपण केंद्र से शुरू हुई यात्रा

प्रॉस्पेरो, जिसे एक्स-3 नाम से भी जाना जाता है, 28 अक्टूबर 1971 को दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के वूमेरा परीक्षण केंद्र से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुआ। वूमेरा रॉकेटों के परीक्षण का केंद्र था। वहीं से यह उपग्रह ब्लैक ऐरो नाम के रॉकेट पर सवार होकर कक्षा में पहुँचा। ब्लैक ऐरो ब्रिटेन में बनाया गया था और इसे उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा तक पहुँचाने के लिए तैयार किया गया था। प्रॉस्पेरो पहला ब्रिटिश उपग्रह नहीं था। उससे पहले छह ब्रिटिश उपग्रहों को अमेरिका से नासा के रॉकेटों पर अंतरिक्ष में भेजा जा चुका था। लेकिन इस बार एक खास बात अलग थी: उपग्रह के साथ उसे ले जाने वाला रॉकेट भी ब्रिटेन में बनाया गया था।

इसलिए प्रॉस्पेरो को ब्रिटेन का पहला उपग्रह कहने का मतलब यह नहीं है कि उससे पहले ब्रिटेन ने कभी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा ही नहीं था। खास बात यह थी कि पहली बार ब्रिटिश उपग्रह को उसी देश में बने रॉकेट से कक्षा तक पहुँचाया गया। यह उपलब्धि अब तक दोहराई नहीं गई है। उपग्रह किस देश का है और उसे अंतरिक्ष तक ले जाने वाला रॉकेट कहाँ बना है—इन दोनों बातों में फर्क समझना इस यात्रा की अहमियत जानने के लिए जरूरी है। कक्षा में काम करने वाला उपकरण होना और उसे वहाँ पहुँचाने का अपना साधन होना, एक जैसी उपलब्धियाँ नहीं हैं।

यह ब्लैक ऐरो रॉकेट की चौथी और आखिरी उड़ान थी। इस रॉकेट को आर-3 नाम दिया गया था। इसकी तीन मंजिलें थीं और इसकी ऊँचाई 12.87 मीटर, यानी करीब 13 मीटर थी। इसका डिज़ाइन छोटे ब्लैक नाइट रॉकेट पर आधारित था, जिसका इस्तेमाल रॉकेट से जुड़े शोध में किया गया था। प्रॉस्पेरो का वज़न 66 किलोग्राम था। इससे साफ़ होता है कि इस काम के लिए कोई बहुत बड़ा अंतरिक्ष यान ज़रूरी नहीं था: मकसद एक तय वैज्ञानिक उपकरण को पृथ्वी की कक्षा में पहुँचाना था।

अंतरिक्ष के हालात परखने वाली छोटी प्रयोगशाला

प्रॉस्पेरो को सिर्फ यह दिखाने के लिए नहीं भेजा गया था कि कोई उपग्रह कक्षा तक पहुँच सकता है। उसके काम का मुख्य हिस्सा यह जाँचना था कि अंतरिक्ष का वातावरण उन उपकरणों पर कैसा असर डालता है, जिनका इस्तेमाल संचार उपग्रहों में होता है। पृथ्वी से बहुत दूर काम करने वाले उपकरणों को बिजली बनाने के लिए सौर कोशिकाओं की जरूरत पड़ती है। साथ ही, उनके कामकाज पर नज़र रखने और जानकारी धरती तक भेजने वाली व्यवस्था भी चाहिए। प्रॉस्पेरो ने ऐसे हिस्सों को अंतरिक्ष के असली माहौल में परखने का मौका दिया, जहाँ केवल धरती पर किए गए परीक्षण काफी नहीं होते।

उपग्रह में सौर कोशिकाएँ और दूरमापन के उपकरण भी लगाए गए थे। दूरमापन का मतलब है उपग्रह और उसके उपकरणों की हालत से जुड़ी जानकारी धरती पर भेजना। ये परीक्षण इसलिए अहम थे कि किसी उपग्रह की सफलता केवल कक्षा तक पहुँचने से तय नहीं होती। उसके उपकरणों को काम करते रहना चाहिए और धरती पर बैठे संचालकों तक यह खबर भी पहुँचनी चाहिए कि वे ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। इसीलिए जानकारी मापने और भेजने की व्यवस्था, इस अभियान के प्रयोगों का एक जरूरी हिस्सा थी।

उपग्रह में अंतरिक्ष में मौजूद बहुत छोटे कणों का पता लगाने वाला यंत्र भी था। ऐसे यंत्र यह दर्ज करते हैं कि बहुत छोटे कण अंतरिक्ष यान से टकराए हैं या नहीं। इससे वैज्ञानिक अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अंतरिक्ष में मौजूद बारीक कण उपग्रहों के लिए कितने खतरनाक हो सकते हैं। सवाल व्यावहारिक था: कोई कण बहुत छोटा दिख सकता है, लेकिन अगर वह उपग्रह के रास्ते में आ जाए, तो यह जानना जरूरी है कि उससे कितना नुकसान हो सकता है। सौर कोशिकाओं और संचार उपकरणों के परीक्षण के साथ इस यंत्र ने यह भी जाँचा कि अंतरिक्ष में उपग्रह और उसके उपकरण कितने समय तक काम कर सकते हैं।

अंडाकार कक्षा और रॉकेट से हुई टक्कर

ब्लैक ऐरो ने प्रॉस्पेरो को अंडाकार कक्षा में पहुँचाया, जिसकी ऊँचाई पृथ्वी की सतह से 522 से 1300 किलोमीटर के बीच थी। इसलिए उपग्रह हर समय एक ही ऊँचाई पर नहीं घूमता था। अपने रास्ते के एक हिस्से में वह कक्षा के निचले छोर के करीब आता और फिर ऊँचे छोर तक जाकर अपनी परिक्रमा पूरी करता। ये आँकड़े बताते हैं कि प्रॉस्पेरो किस तरह के रास्ते पर घूम रहा था और उसकी कक्षा कितनी ऊँचाई तक फैली हुई थी।

उपग्रह को कक्षा तक पहुँचाने का काम सफल रहा, लेकिन रॉकेट के आखिरी हिस्से से अलग होने की प्रक्रिया बिना किसी परेशानी के नहीं हुई। प्रॉस्पेरो रॉकेट से अलग होकर दूर जाने के बाद उसके आखिरी हिस्से से टकरा गया। इस टक्कर में उसके चार रेडियो एंटीना में से एक टूट गया। नुकसान के बावजूद उपग्रह काम करता रहा, लेकिन अंतरिक्ष में पहुँचने के कुछ ही समय बाद उसके एक अहम हिस्से को नुकसान पहुँचा था। यह घटना याद दिलाती है कि रॉकेट का कक्षा तक पहुँचना ही पूरी प्रक्रिया नहीं है; उपग्रह को उससे अलग करने के दौरान भी खतरे हो सकते हैं।

एक एंटीना टूटने पर भी प्रॉस्पेरो ने अपना काम जारी रखा। उसकी उड़ान के नतीजों को समझते समय यह बात खास मायने रखती है: उपग्रह के उपकरण का एक हिस्सा खराब हुआ, फिर भी अभियान तुरंत रुक नहीं गया। यह पूरी नाकामी नहीं बनी और न ही कक्षा में किए जा रहे परीक्षणों का महत्व खत्म हुआ। उलटे, यह टक्कर भी उस उड़ान के इतिहास का हिस्सा बन गई—उस सफल प्रक्षेपण और उपग्रह के काम करते रहने के साथ।

कक्षा तक पहुँचा रॉकेट, फिर भी बंद हुआ कार्यक्रम

ब्लैक ऐरो ने इस उड़ान में वह काम कर दिखाया, जिसके लिए उसे बनाया गया था। फिर भी वह आगे चलकर लगातार इस्तेमाल होने वाला प्रक्षेपण रॉकेट नहीं बना। प्रॉस्पेरो को ले जाना उसकी चौथी और आखिरी उड़ान थी। पूरे कार्यक्रम में दो उड़ानें सफल रहीं और दो नाकाम। यानी कुल चार उड़ानों के बाद कार्यक्रम बंद कर दिया गया, जबकि प्रॉस्पेरो की उड़ान में रॉकेट ने अपना उपग्रह कक्षा में पहुँचा दिया था।

इस वजह से रॉकेट और उपग्रह की कहानी के नतीजे अलग-अलग दिखाई देते हैं। एक तरफ, इस उड़ान ने साबित किया कि ब्रिटेन अपना कक्षीय रॉकेट बना सकता है और उसे ऑस्ट्रेलिया के एक प्रक्षेपण केंद्र से उड़ाकर ब्रिटिश उपग्रह को अंतरिक्ष में पहुँचा सकता है। दूसरी तरफ, यह कार्यक्रम लंबे समय तक जारी नहीं रहा और इस उपलब्धि से ब्रिटेन की ओर से नियमित रूप से रॉकेट छोड़ने का सिलसिला शुरू नहीं हुआ। ब्लैक ऐरो की उड़ानों के कुल नतीजों में एक अहम सफलता के साथ दो नाकाम उड़ानें भी शामिल हैं। चौथी उड़ान के बाद कार्यक्रम बंद हो गया और यह उपलब्धि अकेली ही रह गई।

ब्रिटेन के अंतरिक्ष इतिहास में प्रॉस्पेरो की खास जगह इस बात से बनी कि एक ही अभियान में उपग्रह और उसे ले जाने वाले रॉकेट—दोनों ब्रिटिश थे। उससे पहले के छह ब्रिटिश उपग्रह अमेरिका से छोड़े गए रॉकेटों पर पहुँचे थे। ब्लैक ऐरो ने इस बार ब्रिटेन को अपना प्रक्षेपण साधन दिया, लेकिन कार्यक्रम बंद होने के बाद यह काम फिर नहीं दोहराया गया। इसीलिए प्रॉस्पेरो ब्रिटिश रॉकेट से कक्षा में पहुँचाया गया पहला और अब तक का अकेला ब्रिटिश उपग्रह बना हुआ है।

संपर्क थमा, लेकिन उपग्रह कक्षा में बना रहा

प्रॉस्पेरो करीब दो साल तक कक्षा में काम करता रहा। उससे नियमित संपर्क 1973 में बंद हो गया। मगर नियमित संदेश मिलने बंद होने का मतलब यह नहीं था कि उपग्रह गायब हो गया या पृथ्वी पर लौट आया। वह कक्षा में घूमता रहा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 1996 तक हर साल कम से कम एक बार उससे संपर्क किया गया। इस तरह, नियमित कामकाज का दौर खत्म होने के कई साल बाद भी उपग्रह और धरती के बीच कभी-कभार संपर्क बना रहा।

नियमित संपर्क बंद होना और अंतरिक्ष यान का कक्षा से बाहर हो जाना, दो अलग बातें हैं। पहली बात का मतलब है कि मिशन के दौरान की तरह धरती के केंद्रों को लगातार कामकाज की खबरें मिलना बंद हो गईं। दूसरी का मतलब होता कि उपग्रह कक्षा में रहना छोड़ देता, लेकिन प्रॉस्पेरो के साथ ऐसा नहीं हुआ। सेवा खत्म होने के बाद भी वह अंतरिक्ष में बना रहा। उसका कामकाजी सफर तो बहुत पहले खत्म हो चुका था, फिर भी वह पृथ्वी की कक्षा में मौजूद रहा।

प्रॉस्पेरो का कक्षा में बने रहना यह सवाल भी उठाता है कि मिशन पूरा होने के बाद अंतरिक्ष में छूट जाने वाली वस्तुओं की जिम्मेदारी किसकी है। कोई पुराना उपग्रह उपयोगी न रहे, तब भी वह पृथ्वी के चारों ओर घूमता रह सकता है। इसी सिलसिले में स्कॉटलैंड की नई अंतरिक्ष कंपनी स्काईरोरा ने 2021 में प्रॉस्पेरो को वापस लाने और उसकी कक्षा से बाहर निकालने की योजना घोषित की। कंपनी के मुताबिक, इसके लिए एक और यान को उसके पास भेजना भर काफी नहीं होगा। योजना में एक ऐसे अंतरिक्ष यान को प्रॉस्पेरो तक पहुँचाना शामिल था, जो उसे पकड़कर खींच सके और फिर कक्षा से बाहर निकालते हुए पृथ्वी के वायुमंडल में वापस ला सके।

कंपनी ने इस विचार को अंतरिक्ष में छोड़ी गई वस्तुओं की जिम्मेदारी और कक्षा के टिकाऊ इस्तेमाल से जोड़ा। योजना की घोषणा करते समय स्कॉटलैंड की अंतरिक्ष कंपनी स्काईरोरा के संस्थापक और प्रमुख वोलोदिमिर लेविकिन ने कहा कि प्रॉस्पेरो को वापस लाना इस बात का संकेत होगा कि अंतरिक्ष में भेजी गई वस्तुओं की जिम्मेदारी ली जानी चाहिए। उन्होंने इसे अंतरिक्ष के टिकाऊ इस्तेमाल के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का तरीका भी बताया। हालांकि, यह 2021 में घोषित की गई योजना थी; केवल योजना की घोषणा से यह साबित नहीं होता कि उपग्रह को वापस लाने का काम वास्तव में पूरा हो गया।

कंपनी की योजनाओं में स्कॉटलैंड के सैक्सावोर्ड अंतरिक्ष अड्डे से अपना स्काईरोरा एक्सएल रॉकेट छोड़ना भी शामिल था। इस तरह, पुराने उपग्रह को वापस लाने की कोशिश और ब्रिटेन में नया प्रक्षेपण साधन विकसित करने का इरादा एक साथ जुड़ते हैं। फिर भी इस कहानी का केंद्र प्रॉस्पेरो ही है: अपेक्षाकृत छोटा उपग्रह, जो कई दशक पहले राष्ट्रीय रॉकेट से कक्षा में पहुँचा और उससे कामकाज का संपर्क टूटने के बाद भी पृथ्वी की परिक्रमा करता रहा।

एक ही उड़ान क्यों बनी ऐतिहासिक मिसाल

प्रॉस्पेरो की उड़ान एक से अधिक तरह की सफलता का उदाहरण है। तकनीकी रूप से, ब्रिटेन के तीन-मंजिला रॉकेट ने एक उपग्रह को कक्षा तक पहुँचाया। वैज्ञानिक रूप से, उपग्रह ने सौर कोशिकाओं, दूरमापन की व्यवस्था और छोटे कणों का पता लगाने वाले यंत्र को अंतरिक्ष में परखा। इतिहास की दृष्टि से, ब्रिटिश उपग्रह और ब्रिटिश रॉकेट का यह मेल उस समय के बाद फिर देखने को नहीं मिला। साथ ही, ब्लैक ऐरो कार्यक्रम का अंत यह दिखाता है कि एक उड़ान की कामयाबी से प्रक्षेपण की पूरी व्यवस्था का लंबे समय तक चलना तय नहीं हो जाता।

उड़ान की छोटी-छोटी बातें इस तकनीकी इतिहास को और दिलचस्प बनाती हैं, लेकिन वे तथ्यों को नहीं बदलतीं। चार में से एक एंटीना टूट गया, फिर भी उपग्रह काम करता रहा। नियमित संपर्क 1973 में बंद हुआ, लेकिन उपग्रह ने कक्षा नहीं छोड़ी। रॉकेट ने अपनी आखिरी उड़ान में उपग्रह को सफलतापूर्वक पहुँचाया, लेकिन कुल चार उड़ानों के बाद कार्यक्रम बंद हो गया और उनमें से केवल दो सफल थीं। इसलिए प्रॉस्पेरो की कहानी सीमित समय में हासिल हुई उपलब्धि की कहानी है—बिना अड़चनों और नाकामियों को छिपाए।

कक्षा में बने रहने के कारण प्रॉस्पेरो की कहानी केवल प्रक्षेपण और वैज्ञानिक परीक्षण तक सीमित नहीं रही। अब यह सवाल भी इससे जुड़ गया है कि मिशन खत्म होने के बाद पुराने अंतरिक्ष यानों का क्या किया जाए। 1971 में वूमेरा से शुरू हुई इस यात्रा को आज केवल बीते दौर की घटना मानकर नहीं पढ़ा जा सकता: प्रॉस्पेरो अब भी कक्षा में है और उसे वापस लाने का विचार पुरानी अंतरिक्ष वस्तुओं से निपटने की चर्चा का हिस्सा बन चुका है। अंतरिक्ष तक पहुँचने से लेकर वहाँ छोड़ी गई वस्तुओं की जिम्मेदारी उठाने तक, इसकी कहानी कई अहम सवाल सामने रखती है।

निष्कर्ष

28 अक्टूबर 1971 को प्रॉस्पेरो, जिसे एक्स-3 भी कहा जाता है, ब्रिटेन में बने ब्लैक ऐरो रॉकेट से कक्षा में पहुँचा और एक अनोखी ब्रिटिश उपलब्धि बन गया। 66 किलोग्राम के इस उपग्रह में सौर कोशिकाओं और दूरमापन की व्यवस्था को परखने के साथ-साथ छोटे कणों का पता लगाने वाला यंत्र भी था। वह पृथ्वी से 522 से 1300 किलोमीटर की ऊँचाई वाली कक्षा में गया। रॉकेट का आखिरी हिस्सा उससे टकराया और उसके चार एंटीना में से एक टूट गया, फिर भी उपग्रह 1973 में नियमित संपर्क बंद होने तक काम करता रहा। 1996 तक उससे कभी-कभार संपर्क होने की जानकारी है। ब्लैक ऐरो कार्यक्रम चार उड़ानों—दो सफल और दो नाकाम—के बाद बंद हो गया, जबकि प्रॉस्पेरो कक्षा में बना रहा। उसकी यात्रा ब्रिटेन के प्रक्षेपण इतिहास की अकेली मिसाल है और 2021 में घोषित उसे वापस लाने की योजना अंतरिक्ष में छोड़ी गई वस्तुओं की जिम्मेदारी पर ध्यान दिलाती है।