आसान शब्दों में
वैज्ञानिकों ने चूहे के दिमाग की गहराई में मौजूद तंत्रिका कोशिकाओं को देखने का नया तरीका बनाया है, जिसमें ऊपर की परतों को हटाना नहीं पड़ता। इस तरीके से करीब 2 मिलीमीटर नीचे की कोशिकाओं की हलचल देखी जा सकती है और पहले के तरीकों के मुकाबले लेज़र की उतनी ही ताकत पर कहीं अधिक संकेत मिलते हैं। इससे दिमाग के कुछ गहरे हिस्सों का अध्ययन आसान हो सकता है, लेकिन हर हिस्से तक पहुँचना अब भी संभव नहीं है।
गहराई ही अकेली चुनौती नहीं
जीवित दिमाग के भीतर रोशनी का गहराई तक पहुँचना आसान नहीं होता। दिमाग के ऊतकों से गुजरते समय रोशनी बिखर जाती है और जिस कोशिका का अध्ययन करना हो, उससे मिलने वाला संकेत पृष्ठभूमि की रोशनी में दब सकता है। ऐसे में उसे अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से कुछ पुराने प्रयोगों में लक्ष्य को साफ़ देखने के लिए उसके ऊपर के ऊतक हटाने पड़े थे। रॉकफेलर विश्वविद्यालय की टीम ने अब ऐसी प्रणाली बनाई है, जिससे चूहे के दिमाग में तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को अधिक गहराई तक देखा जा सकता है और ऊपर की कॉर्टेक्स को हटाए बिना उसकी जाँच की जा सकती है।
गहराई ही अकेली चुनौती नहीं
इस काम के पीछे एक साथ जुड़ी दो मुश्किलें हैं। रोशनी दिमाग के ऊतक में जितनी गहराई तक जाती है, उतनी ही अधिक बिखरती है। नतीजतन, कोशिकाओं से आने वाली प्रतिदीप्ति का असली संकेत पहचानना कठिन होता जाता है। दूसरी ओर, केवल अधिक तेज़ रोशनी भेजकर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता। लेज़र की औसत ताकत बढ़ाने से ऊतक गर्म हो सकता है और उसे नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। इसलिए लक्ष्य ऐसा संकेत पाना है जो उपयोगी हो, लेकिन सुरक्षित रोशनी की सीमा से बाहर न जाए।
प्रतिदीप्ति सूक्ष्मदर्शी में ऐसे अणुओं का इस्तेमाल होता है, जो सक्रिय होने पर रोशनी छोड़ते हैं। दिमाग की तस्वीर लेते समय इनसे मिलने वाले संकेत वैज्ञानिकों को कोशिकाओं की गतिविधि पर नज़र रखने में मदद करते हैं। इनमें तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर कैल्शियम के स्तर में होने वाले बदलाव भी शामिल हैं। मगर ऊतकों में बिखरी हुई रोशनी एक तरह की पृष्ठभूमि की चमक पैदा कर सकती है, जो असली संकेत को ढक देती है। कोशिकाएँ दिमाग की सतह से जितनी दूर होती हैं, यह दिक्कत उतनी ही बढ़ती है और अलग-अलग कोशिकाओं की गतिविधि समझना कठिन हो जाता है।
ऐसी स्थिति में तीन-फोटॉन इमेजिंग का एक संभावित फायदा है। दो-फोटॉन इमेजिंग की तुलना में इससे पृष्ठभूमि की प्रतिदीप्ति कम बनती है, इसलिए सिद्धांत रूप में यह अधिक गहराई तक देखने के लिए बेहतर हो सकती है। लेकिन इस लाभ का इस्तेमाल करने के लिए लेज़र की ऐसी तेज़ पल्स चाहिए, जिससे मापने लायक संकेत मिल सके। यहीं चुनौती आती है: देखने की गहराई बढ़ानी है, मगर ऊतक को सुरक्षित भी रखना है। केवल लेज़र की ऊर्जा बढ़ा देने या उपकरण के किसी एक हिस्से में बदलाव करने से यह संतुलन बनाना संभव नहीं था।
इमेजिंग प्रणाली को नए सिरे से सँवारना
रॉकफेलर विश्वविद्यालय की न्यूरोटेक्नोलॉजी और बायोफिज़िक्स प्रयोगशाला के प्रमुख अलीपाशा विज़िरी की टीम ने उपकरण की अलग-अलग तयशुदा सेटिंगों को जस का तस मानने के बजाय यह जाँचा कि उसके हिस्सों के बीच बेहतर तालमेल कैसे बनाया जाए। शोधकर्ताओं ने अपनी प्रणाली का नाम TrUDI रखा, जो अत्यंत गहरी तीन-फोटॉन इमेजिंग का संक्षिप्त नाम है। इस काम के नतीजे नेचर मेथड्स पत्रिका में प्रकाशित हुए। अध्ययन में चूहे के दिमाग के भीतर करीब 2 मिलीमीटर की गहराई पर, कोशिका के स्तर की स्पष्टता के साथ, तंत्रिका कोशिकाओं के समूहों की गतिविधि दर्ज की गई।
टीम ने लेज़र, प्रकाशीय उपकरणों और संकेत पकड़ने की व्यवस्था में बदलाव तय करने के लिए कंप्यूटर मॉडल का सहारा लिया। मकसद केवल सबसे अधिक गहराई तक पहुँचना नहीं था। लेज़र की तेज़ पल्स कैसी हो, रोशनी ऊतक से होकर किस तरह गुज़रे और फिर कैसे इकट्ठी की जाए, तस्वीर कितनी तेज़ी से ली जाए और उसका फैलाव कितना हो—इन सभी बातों के बीच सही संतुलन बनाना ज़रूरी था। डिज़ाइन में लेज़र के सुरक्षित इस्तेमाल की सीमाओं का भी ध्यान रखा गया। साथ ही, कैल्शियम में होने वाले बदलाव इतने ठीक से मापे जाने चाहिए थे कि एक कोशिका की गतिविधि को दूसरी से अलग पहचाना जा सके।
इस तरीके की बुनियादी बात यह है कि पूरे उपकरण का प्रदर्शन किसी एक हिस्से से तय नहीं होता। लेज़र का चुनाव प्रकाशीय प्रणाली के अनुकूल होना चाहिए और स्कैन करने तथा संकेत दर्ज करने का तरीका तंत्रिका संकेतों के समय के साथ मेल खाना चाहिए। इन हिस्सों में तालमेल न हो तो उपयोगी फोटॉन बेकार जा सकते हैं या अनचाही रोशनी बढ़ सकती है—भले ही हर हिस्सा अलग-अलग अच्छी तरह काम कर रहा हो। इसी कारण टीम ने किसी एक जानी-पहचानी सेटिंग को बदलने के बजाय पूरी प्रणाली को एक साथ बेहतर बनाने की कोशिश की।
लेज़र की ताकत बढ़ाए बिना कहीं अधिक संकेत
अध्ययन का सबसे उल्लेखनीय संख्यात्मक नतीजा यह है कि लेज़र की समान ताकत पर TrUDI से पहले के तरीकों की तुलना में करीब 250 गुना अधिक प्रतिदीप्ति फोटॉन पकड़े जा सके। अधिक फोटॉन मिलने का अर्थ है कि संकेत के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध होती है। यह इसलिए अहम है कि इसका समाधान लेज़र की औसत ताकत बढ़ाना नहीं था—जिससे ऊतक गर्म हो सकता है या उसे नुकसान पहुँच सकता है।
इस नतीजे का मतलब यह नहीं है कि हर जगह और हर परिस्थिति में हर संकेत ठीक 250 गुना मज़बूत हो गया है। न ही इसका अर्थ है कि अब दिमाग के सभी हिस्से देखे जा सकते हैं। इसका आशय यह है कि प्रणाली के अलग-अलग हिस्सों में तालमेल बैठाने से प्रयोग के दौरान पकड़ी जा सकने वाली प्रतिदीप्ति की मात्रा बढ़ी। इससे उन गहराइयों पर भी अलग-अलग कोशिकाओं की गतिविधि पहचानना संभव हुआ, जहाँ पहुँचना पहले कठिन था। फिर भी उपयोगी माप इस बात पर निर्भर करता है कि तस्वीर किस जगह ली जा रही है, वहाँ के ऊतक में रोशनी का व्यवहार कैसा है और सुरक्षित इस्तेमाल की सीमा क्या है।
शोधकर्ताओं ने लक्ष्य कोशिकाओं को उत्तेजित करने का एक तरीका भी जोड़ा, ताकि पूरे क्षेत्र पर लगातार रोशनी न डालनी पड़े। इस तरीके में लेज़र तभी चालू होता है, जब स्कैन उन कोशिकाओं के ऊपर से गुजरता है जिन्हें पहले से चुना गया हो। बाकी जगहों पर लेज़र का इस्तेमाल इसी तरह नहीं किया जाता। रोशनी को खास कोशिकाओं तक सीमित रखने से उसका इस्तेमाल अधिक चुनिंदा ढंग से किया जा सकता है। यह उन सुधारों का हिस्सा है जिनका उद्देश्य ऊतक तक पहुँचने वाली रोशनी की मात्रा का ध्यान रखते हुए संकेत को बेहतर बनाना है।
1.2 मिलीमीटर की पुरानी सीमा से करीब 2 मिलीमीटर तक
इस अध्ययन से पहले तीन-फोटॉन इमेजिंग के ज़रिए मस्तिष्क की गतिविधि दर्ज करने वाले प्रयोग करीब 1.2 मिलीमीटर की गहराई तक पहुँचते थे। यह उस सैद्धांतिक गहराई से कम था, जहाँ तक यह तकनीक पहुँच सकती है—यानी 2 मिलीमीटर से भी अधिक। TrUDI के नतीजे दिखाते हैं कि लेज़र, प्रकाशीय उपकरणों और संकेत दर्ज करने की व्यवस्था को एक साथ बेहतर करके इमेजिंग को इस अधिक गहरे दायरे के करीब लाया जा सकता है। पहले के प्रदर्शन को ऐसी पक्की सीमा मानने की ज़रूरत नहीं, जिसे पार न किया जा सके।
टीम ने चूहों पर इस प्रणाली का परीक्षण किया और करीब 2 मिलीमीटर की गहराई पर सेरेब्रल कॉर्टेक्स तथा हिप्पोकैम्पस में तंत्रिका कोशिकाओं के समूहों की गतिविधि दर्ज की। देखने का क्षेत्र करीब 230 × 230 वर्ग माइक्रोमीटर था और रिकॉर्डिंग की दर 8.6 हर्ट्ज़ तक पहुँची। ये आँकड़े बताते हैं कि उपलब्धि केवल किसी गहरे हिस्से की स्थिर तस्वीर लेने तक सीमित नहीं थी। इसमें सीमित क्षेत्र के भीतर समय के साथ बदलती तंत्रिका गतिविधि भी दर्ज की गई।
यह समझना ज़रूरी है कि ये आँकड़े उपकरण की क्षमता के बारे में क्या बताते हैं। 230 × 230 वर्ग माइक्रोमीटर का क्षेत्र ऊतक का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है, जबकि 8.6 हर्ट्ज़ यह बताता है कि आँकड़े कितनी बार दर्ज किए जाते हैं। इसलिए यह नहीं मानना चाहिए कि तकनीक एक ही बार में पूरा दिमाग दिखा सकती है या बिना किसी सीमा के हर तंत्रिका घटना दर्ज कर सकती है। इसकी मदद से गहरे स्थानों में कोशिकाओं के समूहों की जाँच की जा सकती है, लेकिन प्रयोग बनाते समय देखने के क्षेत्र और समय से जुड़ी इन सीमाओं को ध्यान में रखना होगा।
ऊपर की कॉर्टेक्स को बचाए रखना क्यों अहम है
किसी गहरे हिस्से का अध्ययन करने के लिए उसके ऊपर का ऊतक हटाने से उस हिस्से के आसपास की शारीरिक स्थिति बदल सकती है। ऐसे में उसकी तुलना बिना किसी हस्तक्षेप वाले दिमाग से करना अधिक जटिल हो जाता है। इसके उलट, ऊपर की परतों के पार देखकर शोधकर्ता कुछ गहरे तंत्रिका परिपथों की गतिविधि का अध्ययन कर सकते हैं और कॉर्टेक्स को सलामत रख सकते हैं। इससे प्रयोग से जुड़े हर असर से छुटकारा नहीं मिलता, लेकिन जहाँ रोशनी लक्ष्य तक पहुँच सकती है, वहाँ ऊपर का ऊतक हटाए बिना गतिविधि देखने का विकल्प मिलता है।
यह क्षमता वैज्ञानिकों के लिए यह समझने में उपयोगी हो सकती है कि अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाओं के समूह गहरे दिमागी क्षेत्रों में अपनी गतिविधि का तालमेल कैसे बनाते हैं। अब निगरानी को केवल दिमाग की सतह तक सीमित रखने की ज़रूरत नहीं है। शोधकर्ता कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस में अधिक गहराई पर मौजूद कोशिकाओं को देख सकते हैं और उपलब्ध इमेजिंग क्षेत्र में उनकी गतिविधि के साथ-साथ होने वाले बदलावों का अध्ययन कर सकते हैं। फिर भी यह मापने का एक नया औज़ार भर है। यह प्रणाली अपने आप तंत्रिका परिपथों का काम नहीं समझाती, लेकिन ऐसे आँकड़े दे सकती है जिनसे अधिक सटीक सवाल और प्रयोग तैयार किए जा सकें।
किसी खास गहराई तक पहुँच पाना और उस गहराई पर मौजूद हर संरचना को देख पाना एक ही बात नहीं है। किसी क्षेत्र का आकार और स्थान, साथ ही उसके आसपास के ऊतकों की विशेषताएँ, यह तय करती हैं कि उसकी इमेजिंग संभव होगी या नहीं। विज़िरी ने बताया कि स्ट्रायटम के कुछ हिस्से अब भी इस तरीके की पहुँच से बाहर हैं। दिमाग के और भी दूर स्थित कई गहरे केंद्रों के अध्ययन के लिए ऐसे तरीके चाहिए जिनमें शरीर के भीतर हस्तक्षेप करना पड़ता है। इसलिए करीब 2 मिलीमीटर तक पहुँचने का मतलब यह वादा नहीं है कि शोधकर्ता दिमाग का कोई भी चुना हुआ हिस्सा देख पाएँगे।
क्या साबित हुआ है और क्या अभी अनसुलझा है
यह अध्ययन दिखाता है कि गहरी इमेजिंग को बेहतर बनाने के लिए पूरी प्रणाली के हिस्सों का तालमेल नए सिरे से बैठाया जा सकता है; लेज़र को बस और तेज़ करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। TrUDI में प्रकाशीय उत्तेजना, उपकरण की क्षमता और आँकड़े इकट्ठा करने के तरीके को एक-दूसरे के अनुरूप बनाया गया। इस दौरान संकेत की गुणवत्ता और तापमान, समय तथा जगह से जुड़ी सीमाओं का भी ध्यान रखा गया। इस तरीके से पकड़ी गई प्रतिदीप्ति बढ़ी और जीवित चूहों के दिमाग में करीब 2 मिलीमीटर की गहराई पर कोशिका-स्तर की रिकॉर्डिंग की जा सकी।
लेकिन इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि यह तकनीक दिमाग की तस्वीर लेने के सभी तरीकों की जगह ले सकती है या हर प्रयोग में शल्य-हस्तक्षेप की ज़रूरत खत्म कर देती है। कुछ गहरे लक्ष्य इसकी बताई गई पहुँच से परे हैं और स्ट्रायटम के कुछ हिस्से भी अब तक नहीं देखे जा सकते। इसके अलावा, तस्वीर एक तय क्षेत्र में ली जाती है और रिकॉर्डिंग की दर भी सीमित है। इस प्रणाली का महत्व यह है कि यह अध्ययन के स्थान के ऊपर की कॉर्टेक्स को बनाए रखते हुए, रोशनी से देखे जा सकने वाले दिमागी क्षेत्र का दायरा बढ़ाती है—न कि यह हर तकनीकी सीमा मिटा देती है।
इस क्षेत्र में अगला कदम यह होगा कि इस औज़ार से तंत्रिका-विज्ञान के खास सवालों की जाँच की जाए और पता लगाया जाए कि यह दूसरे क्षेत्रों तथा प्रयोगों के लिए कितना उपयोगी है। अभी का अध्ययन यह दिखाता है कि सोच-समझकर किए गए, एक-दूसरे से जुड़े सुधारों के ज़रिए तीन-फोटॉन इमेजिंग की सैद्धांतिक सीमा के करीब पहुँचना संभव है। इसका परीक्षण चूहों में किया गया है। मौजूदा आँकड़े अकेले यह तय नहीं करते कि यही क्षमता और गहरे लक्ष्यों तक या अलग तरह की प्रयोग-व्यवस्थाओं में भी पहुँच पाएगी या नहीं।
निष्कर्ष
रॉकफेलर विश्वविद्यालय की न्यूरोटेक्नोलॉजी और बायोफिज़िक्स प्रयोगशाला की टीम ने TrUDI नाम की प्रणाली बनाई है, जिससे चूहे के दिमाग में गहराई पर तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि देखी जा सकती है और लक्ष्य के ऊपर की कॉर्टेक्स हटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेज़र, प्रकाशीय उपकरणों और रिकॉर्डिंग व्यवस्था में तालमेल बैठाकर शोधकर्ताओं ने लेज़र की समान ताकत पर करीब 250 गुना अधिक प्रतिदीप्ति फोटॉन पकड़े। उन्होंने करीब 2 मिलीमीटर की गहराई पर कोशिका-स्तर की गतिविधि दर्ज की, जबकि पहले की रिकॉर्डिंग करीब 1.2 मिलीमीटर तक पहुँचती थी। परीक्षण में कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस शामिल थे; देखने का क्षेत्र 230 × 230 वर्ग माइक्रोमीटर और रिकॉर्डिंग दर 8.6 हर्ट्ज़ थी। यह दिमाग के अध्ययन के औज़ारों को बेहतर बनाने की अहम उपलब्धि है, लेकिन इससे हर गहरे हिस्से को देखना संभव नहीं होता और कुछ जगहों पर अब भी हस्तक्षेप वाले तरीकों की ज़रूरत पड़ती है।