आसान शब्दों में
1991 में गैलीलियो अंतरिक्ष यान गैस्प्रा नाम के क्षुद्रग्रह के पास से गुज़रा और उसकी तस्वीरें लेकर आया। तस्वीरों से पता चला कि यह गड्ढों से भरा, टेढ़ा-मेढ़ा पथरीला पिंड है। यान उसकी कुछ खूबियाँ जान पाया, लेकिन उसका द्रव्यमान नहीं नाप सका। यह मुलाकात आगे चलकर क्षुद्रग्रहों को करीब से जानने की पहली बड़ी शुरुआत बनी।
क्षुद्रग्रहों की पट्टी में एक तेज़ मुलाकात
29 अक्टूबर 1991 को गैलीलियो बृहस्पति की ओर जा रहा था। बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है और वहाँ पहुँचने से पहले यान को क्षुद्रग्रहों की पट्टी से होकर गुज़रना था। यह पट्टी अंदरूनी ग्रहों की कक्षाओं और बृहस्पति के बीच फैली हुई है। गैलीलियो करीब दो महीने पहले इस क्षेत्र में दाखिल हुआ था। वहाँ से गुज़रते हुए उसे गैस्प्रा के पास से निकलने का दुर्लभ मौका मिला।
गैलीलियो गैस्प्रा से लगभग 990 मील, यानी 1593 किलोमीटर दूर से गुज़रा। एक अन्य विवरण में यह दूरी 1000 मील से कुछ कम, यानी करीब 1601 किलोमीटर बताई गई है। ये दोनों आँकड़े लगभग एक ही तरह की नज़दीकी मुलाकात का अनुमान देते हैं; इनमें कोई बड़ा विरोध नहीं है। क्षुद्रग्रह के मुकाबले यान की रफ़्तार करीब 5 मील प्रति सेकंड, यानी 8 किलोमीटर प्रति सेकंड थी। इसे लगभग 18,000 मील प्रति घंटे की गति के रूप में भी बताया गया है।
इतनी तेज़ रफ़्तार के कारण गैलीलियो गैस्प्रा के पास ठहर नहीं सकता था। उसे थोड़े-से समय में अपने उपकरण उस ओर करने थे, तस्वीरें लेनी थीं और माप जुटाने थे। ऐसी उड़ान में यान किसी पिंड पर उतरता नहीं है और न ही उसकी कक्षा में घूमता है। वह पास से निकलते हुए आँकड़े इकट्ठा करता है और फिर अपने असली लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। इसीलिए कैमरे और दूसरे उपकरणों को सही समय पर काम करना था।
यह सिर्फ़ लंबी अंतरिक्ष-यात्रा के बीच हुआ एक छोटा-सा पड़ाव नहीं था। गैस्प्रा ऐसा पहला क्षुद्रग्रह बना, जिसके पास से कोई अंतरिक्ष यान गुज़रा। इससे पहले ऐसे पिंड दूर से देखने पर रोशनी के छोटे बिंदुओं जैसे लगते थे। गैलीलियो की उड़ान ने दिखाया कि सही मौके पर पास से गुज़रकर उनकी सतह और बनावट के बारे में भी जानकारी जुटाई जा सकती है।
तस्वीरों में दिखा अनगढ़ पथरीला पिंड
गैलीलियो की तस्वीरों में गैस्प्रा किसी गोल गेंद जैसा नहीं दिखा। उसका आकार लंबा और असमान था। एक अनुमान के मुताबिक, वह लगभग 12 मील लंबा और 7 मील चौड़ा था। ज़्यादा बारीकी से किए गए माप में उसके तीन आयाम करीब 20 किलोमीटर, 12 किलोमीटर और 11 किलोमीटर बताए गए। यही माप मील में लगभग 12.4, 7.4 और 6.8 थे। अलग-अलग दिशाओं में उसके आकार का फ़र्क बताता है कि यह चिकना, गोल पिंड नहीं, बल्कि उभरी-धँसी सतह वाला चट्टानी टुकड़ा है।
तस्वीरों में उसकी सतह पर बहुत सारे गड्ढे भी दिखाई दिए। ये गड्ढे दूसरे पिंडों के टकराने से बने निशान हैं। उनकी जगह और फैलाव देखकर वैज्ञानिक गैस्प्रा के पुराने टकरावों के बारे में सुराग पा सकते हैं। नासा के अनुसार, गैस्प्रा अनियमित आकार वाला एक जटिल क्षुद्रग्रह था, जिसकी सतह पर धूल और छोटे चट्टानी टुकड़ों की पतली परत थी। इस तरह तस्वीरों ने सिर्फ़ उसका रूप नहीं दिखाया; उन्होंने पहली बार किसी क्षुद्रग्रह की सतह का बारीक नज़ारा सामने रखा, जिसे दूर से देखने पर पाना संभव नहीं था।
गैलीलियो के कैमरा दल के सदस्य जोसेफ वीफरका को गैस्प्रा का रूप देखकर लगा कि उसके बनने के इतिहास में कई उथल-पुथल भरी घटनाएँ हुई होंगी। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि आज दिख रहा पिंड किसी पुराने विनाशकारी टकराव के बाद बचा हुआ टुकड़ा हो सकता है। सतह पर मौजूद गड्ढे इस विचार के अनुकूल हैं, लेकिन केवल तस्वीरों के आधार पर उसके पूरे अतीत की कहानी तय नहीं की जा सकती। वैज्ञानिक निशानों को देखते हैं और फिर अनुमान लगाते हैं कि किन घटनाओं ने मिलकर उसका मौजूदा रूप बनाया होगा।
उपकरणों ने क्या बताया और क्या नहीं
गैलीलियो ने केवल आँखों से दिखने वाली रोशनी की तस्वीरें नहीं लीं। उसने अवरक्त रोशनी को मापने वाला एक यंत्र भी इस्तेमाल किया। यह ऐसी रोशनी को मापता है जिसे इंसानी आँख नहीं देख सकती। अलग-अलग पदार्थ इस रोशनी पर अलग ढंग से प्रतिक्रिया करते हैं, इसलिए मिले आँकड़ों से गैस्प्रा की रासायनिक बनावट और उसकी कुछ भौतिक खूबियों की जाँच की जा सकी। तस्वीरों से मिली सतह की जानकारी के साथ इन संकेतों ने यह समझने में मदद की कि यह पिंड किन पदार्थों से बना है।
फिर भी, उपकरणों से जानकारी मिलना यह नहीं बताता कि क्षुद्रग्रह की हर बात पता चल गई। गैलीलियो गैस्प्रा का द्रव्यमान नहीं नाप सका। यान उससे इतनी दूरी पर था कि क्षुद्रग्रह का गुरुत्वाकर्षण उसकी चाल या रास्ते में मापने लायक बदलाव नहीं ला पाया। किसी पास से गुज़रती वस्तु पर गुरुत्वाकर्षण के असर को देखकर आम तौर पर दूसरे पिंड का द्रव्यमान निकाला जाता है। लेकिन जब यह असर यान की गति में साफ़ दिखाई न दे, तो उस तरीके से भरोसेमंद माप करना संभव नहीं होता।
इस सीमा से अंतरिक्ष-अन्वेषण का एक अहम पहलू समझ आता है। किसी मिशन का सफल होना यह नहीं बताता कि एक ही यान हर सवाल का जवाब दे देगा। तस्वीरों से आकार और गड्ढों का पता चलता है; कुछ उपकरण पदार्थों से जुड़े संकेत पढ़ते हैं; जबकि द्रव्यमान जानने के लिए अलग तरह के माप और पास आने की सही परिस्थितियाँ चाहिए। गैलीलियो की उड़ान ने गैस्प्रा को अंतरिक्ष यान से देखा गया पहला क्षुद्रग्रह बनाया, लेकिन उसे हर पहलू से जाना-पहचाना पिंड नहीं बना दिया। यह करीब से जानकारी जुटाने की शुरुआत थी, सभी रहस्यों का अंत नहीं।
बृहस्पति की लंबी यात्रा का एक पड़ाव
गैलीलियो को अक्टूबर 1989 में छोड़ा गया था। बृहस्पति तक पहुँचने में उसकी यात्रा छह साल चली। रास्ते में उसने 1990 में शुक्र और फिर पृथ्वी के पास से उड़ान भरी। इसके अगले साल गैस्प्रा से उसकी मुलाकात हुई। इस तरह क्षुद्रग्रह के पास से गुज़रना यात्रा के लगभग बीच में हुआ एक वैज्ञानिक पड़ाव था। यान का मुख्य काम बृहस्पति और उसके आसपास के तंत्र का अध्ययन करना था, लेकिन रास्ते में दूसरे पिंडों को देखने का अवसर भी मिला।
गैस्प्रा के बाद गैलीलियो 1992 में एक बार फिर पृथ्वी के पास से गुज़रा और 1993 में क्षुद्रग्रह इडा के नज़दीक पहुँचा। जुलाई 1994 में गैलीलियो ऐसी स्थिति में था कि टूटकर बिखरते धूमकेतु शूमेकर-लेवी 9 को देख सकता था। धूमकेतु के टुकड़े बाद में बृहस्पति से टकराए। आखिरकार गैलीलियो 1995 में बृहस्पति तक पहुँचा। घटनाओं का यह क्रम दिखाता है कि पृथ्वी से बृहस्पति तक का सफ़र सीधा रास्ता नहीं था। बीच में अलग-अलग खगोलीय पिंडों से मुलाकातें और अवलोकन हुए, जिनमें गैस्प्रा पहला क्षुद्रग्रह था।
गैस्प्रा की मुलाकात इडा से पहले हुई, इसलिए उसका महत्व सिर्फ़ उस एक पिंड से जुड़ी जानकारी तक सीमित नहीं था। इस उड़ान ने साबित किया कि किसी दूर के ग्रह की ओर जा रहा यान रास्ते में किसी क्षुद्रग्रह के पास से गुज़रकर वैज्ञानिक काम भी कर सकता है। करीब 1000 मील की दूरी से ली गई तस्वीरों ने ऐसी बारीकियाँ दिखाईं जो दूर से देखने पर पकड़ में नहीं आतीं। लक्ष्य छोटा था और उसे देखने का समय भी कम, मगर इस अनुभव ने यह विचार परखा कि ग्रहों के बीच की यात्राओं के रास्ते में दूसरे पिंडों का अध्ययन किया जा सकता है।
पहली तस्वीरों से सीधे पहुँचने तक
गैलीलियो के बाद क्षुद्रग्रहों की खोज और अध्ययन के तरीके आगे बढ़े। बाद के कुछ यान इन पिंडों की सतह तक पहुँचे। इनमें नीर यान का इरोस पर उतरना भी शामिल है। कुछ अभियानों ने क्षुद्रग्रहों से नमूने इकट्ठा किए और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाए। नासा का ओसिरिस-रेक्स और जापान के हायाबुसा यान ऐसे अभियानों के उदाहरण हैं। एक अलग तरह के प्रयोग में डार्ट मिशन ने जानबूझकर एक क्षुद्रग्रह से टक्कर की, ताकि उन तरीकों को आज़माया जा सके जो भविष्य में पृथ्वी को संभावित टक्कर के खतरे से बचाने में मदद कर सकते हैं।
बाद की ये उपलब्धियाँ गैलीलियो की ऐतिहासिक उड़ान का महत्व कम नहीं करतीं; वे दिखाती हैं कि उसके बाद क्या-क्या संभव हुआ। शुरुआत में यान ने तेज़ी से गुज़रते हुए क्षुद्रग्रह की तस्वीरें लीं। आगे चलकर यान सतह पर उतरे, नमूने पृथ्वी तक लाए गए और टक्कर के असर को परखने वाले प्रयोग भी हुए। गैस्प्रा पहला क्षुद्रग्रह था, जिसके पास से कोई अंतरिक्ष यान गुज़रा। इसने यह भी दिखाया कि पास से उड़ान भरने पर क्या देखा जा सकता है और किन बातों को मापना फिर भी मुश्किल रहता है।
निष्कर्ष
29 अक्टूबर 1991 को गैलीलियो ने गैस्प्रा के पास से उड़ान भरकर पहली बार किसी क्षुद्रग्रह का अंतरिक्ष यान से दौरा किया। वह उससे लगभग 990 मील, यानी 1593 किलोमीटर दूर से गुज़रा; एक अन्य अनुमान में दूरी 1000 मील से कुछ कम, करीब 1601 किलोमीटर बताई गई है। यान की गति लगभग 5 मील प्रति सेकंड या 8 किलोमीटर प्रति सेकंड थी, जिसे करीब 18,000 मील प्रति घंटे भी बताया गया। तस्वीरों ने गड्ढों से भरा, लंबा और अनियमित पिंड दिखाया। उसके आकार के अलग-अलग माप सामने आए और अवरक्त रोशनी को मापने वाले उपकरण ने उसकी बनावट और कुछ खूबियों की पड़ताल की। लेकिन गैस्प्रा का गुरुत्वाकर्षण यान का रास्ता मापने लायक नहीं बदल पाया, इसलिए उसका द्रव्यमान नहीं जाना जा सका। अक्टूबर 1989 में शुरू हुई यात्रा के बाद गैलीलियो 1995 में बृहस्पति पहुँचा। बीच की इस छोटी मुलाकात ने क्षुद्रग्रहों को पास से देखने की राह खोली और आगे चलकर तस्वीरें लेने, उतरने, नमूने लाने तथा टक्कर के खतरे से बचाव के तरीके जाँचने वाले अभियानों की नींव रखी।