आसान भाषा में
चार लोगों की एक टीम पाँच दिन तक पानी के नीचे बनी छोटी प्रयोगशाला में रही। वहाँ उन्होंने ध्यान, पौधों के बीज और पर्यावरण मापने वाले यंत्रों से जुड़े प्रयोग किए और सीमित जगह में साथ मिलकर काम किया। यह अनुभव अंतरिक्ष में रहने जैसा नहीं है, लेकिन इससे लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्राओं की तैयारी में मदद मिल सकती है।
समुद्र के नीचे एक छोटी प्रयोगशाला
फ्लोरिडा के की लार्गो तट के पास, पानी की सतह से करीब 22 फ़ुट यानी लगभग 7 मीटर नीचे, सी स्टार दल ने पाँच दिन एक समुद्री प्रयोगशाला में बिताए। इस दौरान वे सतह पर नहीं आए और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सामान्य रफ्तार से दूर रहे। यह अंतरिक्ष यात्रा नहीं थी, लेकिन इसका मकसद अंतरिक्ष स्टेशन में काम करने से जुड़ी कुछ चुनौतियों को समझना था—जैसे तंग जगह, लगातार चलते जीवन-रक्षक तंत्र, एक साथ कई वैज्ञानिक काम और दल के सदस्यों के बीच सहयोग। इस अनुकरण के दौरान टीम ने दबाव के माहौल में इंसानों के कामकाज, सब्ज़ियों के बीजों की बढ़त और आसपास के पर्यावरण से जुड़े प्रयोग किए।
समुद्र की सतह के नीचे का छोटा ठिकाना
इस अभियान का ठिकाना फ्लोरिडा के की लार्गो के पास स्थित जूल्स नाम की पानी के नीचे की प्रयोगशाला थी। यह करीब 22 फ़ुट, यानी लगभग 7 मीटर की गहराई पर बनी है। दल के चारों सदस्य लगातार पाँच दिन वहीं रहे और इस पूरे समय सतह पर नहीं लौटे। इस तरह वे «एक्वानॉट» कहलाए—यह नाम उन खोजकर्ताओं के लिए इस्तेमाल होता है जो पानी के नीचे, दबाव से जुड़ी विशेष परिस्थितियों में, 24 घंटे से अधिक समय तक रहते हैं।
यहाँ «संतृप्ति» का अर्थ यह नहीं है कि शरीर पानी से भर जाता है। यह एक ऐसी स्थिति का नाम है जो दबाव में साँस लेने से जुड़ी होती है। जब कोई व्यक्ति दबाव वाले पानी के भीतर पर्याप्त समय बिताता है, तो उसके शरीर के ऊतक नाइट्रोजन जैसी निष्क्रिय गैस को सोख लेते हैं। शरीर में इस गैस की मात्रा दबाव और गहराई के अनुसार तय होती है। इसलिए सतह पर लौटना बस थोड़ी देर तैरकर ऊपर आ जाने जैसा नहीं होता। कम दबाव के अनुकूल होने में शरीर को समय लगता है और दबाव घटने से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बना रहता है।
प्रयोगशाला के भीतर दल के चारों ओर पानी की हरी दुनिया थी और जीवन-रक्षक प्रणालियाँ वहाँ रहने के लिए ज़रूरी हालात बनाए रखती थीं। लेकिन इन प्रणालियों के लगातार चलने से शोर भी बना रहता था। रोज़मर्रा के कामों में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें आईं—मसलन, शौचालय की पानी की व्यवस्था में परेशानी। दबाव में लंबे समय तक रहने से जुड़ी सेहत की चिंताएँ भी थीं। प्रयोगशाला से बाहर पानी के भीतर किए गए गोतों को दल के सदस्यों ने अंतरिक्ष में चलने जैसा बताया। इन गोतों में ख़ास सावधानी रखनी पड़ती थी, क्योंकि पानी के नीचे हर समय साफ़ दिखाई नहीं देता था।
काम की नकल, अंतरिक्ष का विकल्प नहीं
इस तरह के अभियानों को अंतरिक्ष-अनुकरण मिशन कहा जाता है। ये धरती पर किए जाने वाले प्रयोग हैं, जिनमें अंतरिक्ष अभियानों की कुछ चुनिंदा स्थितियाँ दोहराने की कोशिश होती है—अंतरिक्ष की हर परिस्थिति की नहीं। समुद्र के नीचे बनी प्रयोगशाला कक्षा में घूमता अंतरिक्ष स्टेशन नहीं है और गोताखोरों को न तो कम गुरुत्वाकर्षण का अनुभव होता है, न ही अंतरिक्ष के निर्वात का। फिर भी, ऐसी जगह में बंद और अलग-थलग रहकर काम करने, दल के कामकाज पर नज़र रखने और तालमेल व आत्मनिर्भरता माँगने वाली प्रक्रियाओं का अभ्यास करने का मौका मिलता है।
इस तरह के ठिकानों का एक और फायदा यह है कि कुछ वैज्ञानिक परियोजनाएँ अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर दल भेजे बिना की जा सकती हैं। वहाँ दल के सदस्यों की संख्या, उपलब्ध समय और किए जा सकने वाले काम सीमित होते हैं। पानी के नीचे के केंद्र कुछ प्रशिक्षण और शुरुआती प्रयोगों के लिए वास्तविक कामकाजी जगह दे सकते हैं। फिर भी, अनुकरण से मिले नतीजों को उसकी सीमाओं को ध्यान में रखकर समझना चाहिए। वे आगे जाँचने लायक सवाल या मुश्किलें सामने ला सकते हैं, लेकिन उनसे यह अपने-आप साबित नहीं होता कि अंतरिक्ष में इंसान की प्रतिक्रिया भी बिल्कुल वैसी ही होगी।
इस अभियान की अगुआई खगोलजीवविज्ञानी और अन्वेषक मिखाइला मोसेलोवा ने दल प्रमुख के रूप में की। इससे पहले वह चंद्रमा और मंगल से जुड़े 40 अंतरिक्ष-अनुकरण अभियानों का नेतृत्व कर चुकी थीं। सी स्टार दल के अन्य सदस्य भी गोताखोरी और अनुकरण मिशनों का अनुभव रखते थे। मोसेलोवा के मुताबिक, इस अनुभव से अभियान अपेक्षाकृत आसानी से चला। दल के सदस्यों ने वैज्ञानिक काम और रोज़मर्रा के संचालन की ज़िम्मेदारियाँ बाँटीं। ऐसी जगह में, जहाँ से आसानी से बाहर नहीं निकला जा सकता, उन्हें लगातार एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाए रखना था।
क्या दबाव में ध्यान और प्रतिक्रिया की रफ्तार बदलती है।
मोसेलोवा की एक परियोजना में लंबे अभियानों से जुड़े व्यावहारिक सवाल पर ध्यान दिया गया: क्या अलग पर्यावरणीय दबाव में रहने और काम करने से सोचने-समझने की क्षमता और प्रतिक्रिया देने की रफ्तार बदलती है। यह काम चेक गणराज्य के उच्च दबाव चिकित्सा केंद्र, ओस्त्रावा विश्वविद्यालय के चिकित्सा संकाय और ओस्त्रावा नगर अस्पताल के सहयोग से किया गया। इसका मकसद अभियान के दौरान दल के सदस्यों के संज्ञानात्मक परीक्षणों में उनके प्रदर्शन और प्रतिक्रिया देने में लगने वाले समय पर नज़र रखना था।
दल के सदस्यों को लगा कि प्रयोगशाला में रहते हुए उनकी प्रतिक्रियाएँ, वहाँ जाने से पहले की तुलना में, धीमी थीं। यह प्रयोग के दौरान दर्ज की गई एक अनुभव-आधारित टिप्पणी है, प्रकाशित संख्यात्मक नतीजा नहीं। उपलब्ध जानकारी में यह नहीं बताया गया कि परीक्षणों में कितने लोग शामिल हुए, बदलाव कितना था या सांख्यिकीय विश्लेषण में उसका असर कितना निकला। इसलिए इसे छोटे अनुकरण से मिला शुरुआती संकेत मानना चाहिए, इस बात का पक्का सबूत नहीं कि केवल दबाव ही सोचने की रफ्तार घटाता है।
लंबे अभियानों की योजना बनाते समय यह सवाल अहम हो जाता है, क्योंकि अलग-थलग जगह में काम पूरा करने के लिए ध्यान, सही फैसले और रोज़मर्रा की घटनाओं पर समय से प्रतिक्रिया देना ज़रूरी होता है। प्रयोगशाला में असर डालने वाली बातें सिर्फ़ दबाव तक सीमित नहीं थीं। सीमित जगह, लगातार शोर, वैज्ञानिक काम और सुरक्षा को लेकर सतर्कता—ये सभी साथ-साथ मौजूद थे। इसलिए कामकाज में दिखे किसी भी बदलाव को समझने के लिए पूरे माहौल पर विचार करना होगा। अलग-अलग कारकों का असर मापे बिना किसी एक कारण को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा।
दबाव में बदलाव की परीक्षा लेते बीज
एक दूसरी परियोजना में यह देखा गया कि समुद्री केंद्र तक पहुँचाए जाने के दौरान दबाव बदलने पर बीजों पर क्या असर पड़ता है। स्वास्थ्य और सुरक्षा अधिकारी ब्रांडी नूनेज़ ने कुछ केल और सलाद में इस्तेमाल होने वाली छोटी पत्तेदार सब्ज़ियों के बीज पहले से तैयार किए, ताकि अभियान शुरू होने से पहले उनमें अंकुरण शुरू हो सके। कुछ दूसरे बीजों ने पानी के नीचे ही अंकुरित होना शुरू किया। टीम ने उन समूहों की तुलना की जिन्हें अलग-अलग तरीकों से पहुँचाया गया था: एक समूह में दबाव धीरे-धीरे बदला गया, जबकि दूसरे को केंद्र तक नीचे जाते समय अचानक बदलाव का सामना करना पड़ा।
पौधों की कटाई के बाद दल ने उन बीजों को नुकसान पहुँचने के संकेत देखे जिन्हें दबाव में अचानक बदलाव झेलना पड़ा था। इस तरह के नुकसान को कभी-कभी दबाव से होने वाली क्षति कहा जाता है और इसका संबंध हवा के दबाव में तेज़ बदलाव से हो सकता है। यह अवलोकन दिखाता है कि दबाव वाले ठिकाने तक जीवित सामग्री पहुँचाने के छोटे-से-छोटे तरीक़े भी मायने रख सकते हैं। लेकिन उपलब्ध जानकारी में बीजों की संख्या, अंकुरण का अनुपात या नुकसान के कोई संख्यात्मक माप नहीं दिए गए हैं। इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि असर कितना बड़ा था या क्या इसे पौधों की दूसरी किस्मों पर भी लागू किया जा सकता है।
इस प्रयोग का लक्ष्य केंद्र के भीतर बड़ी मात्रा में सब्ज़ियाँ उगाना नहीं था। मकसद अपेक्षाकृत नियंत्रित हालात में छोटे पौधों की प्रतिक्रिया देखना था। केल और सलाद में इस्तेमाल होने वाली छोटी पत्तेदार सब्ज़ियों से कम समय में बीजों और पौधों की बढ़त पर नज़र रखी जा सकती है। वे ठिकाने के माहौल का असर जाँचने के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण भी देती हैं। ऐसे परीक्षण आगे और विस्तार से यह समझने में मदद कर सकते हैं कि पौधों को कैसे पहुँचाया जाए और धरती की आम परिस्थितियों से अलग जगहों पर उनके बीज कैसे अंकुरित होते हैं।
सेंसर, पानी में संतुलन और प्रयोगशाला से बाहर का काम
दल के उपप्रमुख पॉल बकन ने इस बात से जुड़ा काम किया कि आसपास के दबाव में बड़े बदलाव होने पर सामान ले जाने वाले डिब्बों के भीतर दबाव को कैसे व्यवस्थित रखा जाए। अभियान की विशेषज्ञ जेन बेंट ने इंटरस्टेलर परफ़ॉर्मेंस लैब्स के साथ मिलकर ऐसा वर्गीकरण तैयार करने में सहयोग दिया, जिससे अनुकरण अभियानों में पर्यावरण और दल के सदस्यों के आपसी व्यवहार से जुड़े कारकों का विश्लेषण किया जा सके। इन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों से पता चलता है कि यह केंद्र सिर्फ़ एक प्रयोग करने की जगह नहीं था; यहाँ रोज़मर्रा के संचालन के कई पहलुओं को परखा गया।
प्रयोगशाला के बाहर पानी के भीतर किए गए गोतों के दौरान दल ने पानी में शरीर को संतुलित रखने के परीक्षण भी किए। इसमें शरीर की गति को इस तरह संतुलित किया जाता है कि वह पानी में आसानी से न ऊपर उठे, न नीचे जाए। इसके साथ ही उन्होंने स्लोवाकिया के स्कूलों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए पर्यावरणीय सेंसरों की जाँच की। इन यंत्रों से ठिकाने के भीतर रहने की परिस्थितियों की अतिरिक्त जानकारी मिली, जो सोचने-समझने की क्षमता पर नज़र रखने वाली परियोजना के काम आई। दल ने जूल्स प्रयोगशाला के आसपास पर्यावरण-संरक्षण के काम में मदद के लिए पानी के भीतर इस्तेमाल होने वाला पानी खींचने का उपकरण भी चलाया।
इस काम में शिक्षा और जानकारी साझा करने का पहलू भी शामिल था। दल के सदस्यों ने स्लोवाकिया के कोज़्मिक रीगन नाम के अंतरिक्ष-अनुकरण केंद्र के दल से संपर्क किया और उन्हें अपने समुद्री ठिकाने का दौरा कराया। बातचीत के दौरान कुछ सदस्य पानी में उतरे और एक प्रदर्शनात्मक गोता लगाकर दिखाया कि प्रयोगशाला के बाहर काम कैसा होता है। इस तरह अभियान में वैज्ञानिक अवलोकन, उपकरणों की जाँच और पानी के नीचे बने ठिकाने की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के कुछ पहलुओं को दिखाना—तीनों शामिल थे।
सतह पर लौटने के लिए भी चाहिए तैयारी
पाँच दिन पूरे होने पर दल के सदस्यों ने आख़िरी बार गोताखोरी के उपकरण पहने और प्रयोगशाला से बाहर निकले। वे सीधे सतह पर नहीं आए। इसके बजाय, वे झील के भीतर लंबा रास्ता तय करते हुए ऊपर की ओर बढ़े, ताकि उनका शरीर घटते दबाव के साथ धीरे-धीरे तालमेल बैठा सके। गहराई करीब 22 फ़ुट ही थी, फिर भी संतृप्ति की स्थिति में रहने के बाद दबाव घटने से जुड़ी समस्या का जोखिम बना रहता है। इसलिए वापसी के दौरान धीरे-धीरे और सावधानी से आगे बढ़ना ज़रूरी था।
ऊपर आना उस अभियान का आख़िरी चरण था जिसमें दल ने बंद माहौल के आदी होने और फिर खुले वातावरण में लौटने—दोनों का अनुभव किया। सदस्यों ने ताज़ी हवा ली और धूप महसूस की, लेकिन फ्लोरिडा की गर्मी में देर तक रहना जल्दी ही असहज हो गया। मोसेलोवा के शब्दों में, घर लौटने पर दो उलट भाव एक साथ थे: परिचित भोजन, आराम और घर वापस आने की राहत; और उस दल तथा साझा अनुभव की याद, जिसे पीछे छोड़कर वे लौटे थे।
मोसेलोवा ने एक एहसास को «गहराई से देखने का असर» नाम दिया। यह उस अनुभव से मिलता-जुलता है जिसके बारे में कुछ अंतरिक्ष यात्री कक्षा से पूरी पृथ्वी को देखकर बताते हैं। प्रयोगशाला में उन्होंने पानी को चीरती सूरज की किरणें देखीं, जो उस दूरी तक पहुँची थीं जहाँ वह खुद नहीं जा सकती थीं। उन्हें लगा कि उनका रोज़मर्रा का जीवन एक साथ पास भी है और दूर भी। यह कोई ऐसा वैज्ञानिक परीक्षण नहीं था जिसमें मनोवैज्ञानिक बदलाव को किसी तय पैमाने से मापा गया हो। फिर भी, यह बयान दिखाता है कि अलगाव और आसपास के दृश्य ने उनके अपने ग्रह को देखने के नज़रिए को कैसे प्रभावित किया और उसकी बेहतर देखभाल करने की इच्छा जगाई।
निष्कर्ष
करीब 7 मीटर की गहराई पर पाँच दिन चला सी स्टार अभियान, अलग-थलग ठिकाने में रहने और काम करने की कुछ ज़रूरतों को परखने का व्यावहारिक तरीका था। इसमें प्रतिक्रिया की रफ्तार पर नज़र रखी गई, अलग-अलग दबाव में पहुँचाए गए बीजों की जाँच हुई और सेंसर, पानी में संतुलन तथा अन्य उपकरणों से जुड़े काम किए गए। शुरुआती टिप्पणियों में दल के सदस्यों को अपनी प्रतिक्रियाएँ धीमी लगीं और अचानक दबाव-बदलाव से गुज़रे बीजों में नुकसान के संकेत दिखे। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन नतीजों को ठीक-ठीक मापने के लिए ज़रूरी आँकड़े नहीं हैं। पानी के नीचे के केंद्र अंतरिक्ष की जगह नहीं ले सकते, लेकिन वहाँ प्रशिक्षण और उपयोगी शुरुआती प्रयोग किए जा सकते हैं। यह अभियान याद दिलाता है कि कठिन वातावरण में सफलता सिर्फ़ वैज्ञानिक प्रयोगों पर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के कामों की छोटी-छोटी बातों पर भी निर्भर करती है।