आसान शब्दों में
दुनिया के कई शहरों के नीचे की ज़मीन धीरे-धीरे धँस रही है, और कुछ जगहों पर यह हर साल कई इंच तक धँस सकती है। इसकी एक बड़ी वजह ज़मीन के भीतर से बहुत अधिक पानी निकालना है। इससे इमारतों और रास्तों को नुकसान पहुँच सकता है और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन पानी का इस्तेमाल घटाकर और दूसरे स्रोत अपनाकर इस गिरावट को रोकने में मदद मिल सकती है।
दुनिया के कई शहरों में दिखा ज़मीन का खिसकना
हर दिन शहर की सड़कों से गुज़रते हुए ज़मीन स्थिर दिखाई देती है, लेकिन इमारतों और सड़कों के नीचे की ज़मीन धीरे-धीरे बदल रही हो सकती है। लोगों को यह बदलाव महसूस न हो, फिर भी उपग्रहों से मिले माप बताते हैं कि यह किसी एक शहर या छोटे-से इलाके तक सीमित नहीं है। कई महाद्वीपों में फैली इस घटना पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि इसके असर समय के साथ बढ़ते जाते हैं। न्यू ऑरलियन्स, मेक्सिको सिटी, जकार्ता और रोम जैसे शहरों में माप के दौरान कुछ जगहों पर हर साल कई इंच तक ज़मीन का धँसाव दर्ज किया गया है।
बड़े सर्वेक्षण से सामने आई वैश्विक तस्वीर
नेचर सिटीज़ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस समस्या की व्यापक तस्वीर पेश की। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 2014 से 2023 के बीच उपग्रहों से जुटाए गए रडार आँकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में 465 शहरी क्षेत्रों को शामिल किया गया, जिनमें से हर एक की आबादी 10 लाख से अधिक थी। शोधकर्ताओं ने हर शहर के लिए एक ही औसत आँकड़ा निकालने के बजाय अपेक्षाकृत छोटे हिस्सों का भी अध्ययन किया। इन हिस्सों का आकार कुछ घरों के बराबर था, जिससे एक ही शहर के अलग-अलग इलाकों के बीच का अंतर समझना संभव हुआ।
अध्ययन करने वाली टीम में लीजन वांग समेत कई शोधकर्ता शामिल थे। इसके नतीजे 12 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुए। उनसे पता चला कि ज़मीन का धँसना दुनिया भर के शहरों से जुड़ी समस्या है, न कि कुछ ही शहरों की स्थानीय परेशानी। अध्ययन के आँकड़ों में शामिल लगभग आधे शहरों पर इस विषय में पहले कभी अंतरिक्ष से मिले रडार आँकड़ों की मदद से शोध नहीं हुआ था। यानी इस सर्वेक्षण ने उन जगहों के बारे में जानकारी बढ़ाने के साथ-साथ कई ऐसे इलाकों की शुरुआती निगरानी भी की, जो पहले के शोध में शामिल नहीं थे।
दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम और मध्य एशिया, और उत्तरी अमेरिका में ज़मीन का धँसाव अधिक साफ़ दिखाई दिया। यह दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में भी दर्ज हुआ, जबकि इन दोनों क्षेत्रों में इस विषय पर उतना अध्ययन नहीं हुआ है। इसलिए किसी इलाके में कम दर्ज मामलों को इस बात का सबूत नहीं मानना चाहिए कि वहाँ ज़मीन नहीं धँस रही। हो सकता है कि वहाँ माप और शोध कम हुए हों, न कि समस्या वास्तव में कम हो।
रडार आँखों से न दिखने वाली हलचल कैसे पकड़ता है
उपग्रह एक ही जगह की रडार तस्वीरें अलग-अलग समय पर लेते हैं। फिर वैज्ञानिक उन तस्वीरों में लौटकर आने वाले संकेतों की तुलना करते हैं। ज़मीन की ऊँचाई में बहुत छोटा-सा बदलाव भी संकेत के आने-जाने में लगने वाले समय को बदल देता है। बार-बार माप लेकर और उनकी तुलना करके वैज्ञानिक ज़मीन की सतह में धीरे-धीरे हो रही हलचल का अंदाज़ा लगा सकते हैं। यह तरीका मिलीमीटर के स्तर तक बदलाव पकड़ सकता है। यानी एक इंच के लगभग पच्चीसवें हिस्से जितना छोटा अंतर भी संकेत के लौटने के समय में नज़र आ सकता है।
इस तरीके का बड़ा लाभ यह है कि इससे शहर के बहुत बड़े हिस्से पर नज़र रखी जा सकती है और यह भी देखा जा सकता है कि एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक धँसाव कितना बदलता है। पूरे शहर का औसत किसी ऐसे इलाके की तेज़ गिरावट छिपा सकता है, जो आसपास के हिस्सों से अधिक नीचे जा रहा हो। इसी तरह, कोई छोटा हिस्सा अपने पड़ोस के इलाकों से अलग गति से भी खिसक सकता है। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के भू-विज्ञान के विशेषज्ञ रोलैंड बर्गमान ने इस काम को शहरों के भीतर ज़मीन के धँसाव की सबसे व्यापक और व्यवस्थित पड़तालों में से एक बताया। वह अध्ययन दल का हिस्सा नहीं थे, लेकिन उनकी यह बात बताती है कि दुनिया भर के मापों को एक साथ देखने का क्या महत्व है।
रडार से मिली तस्वीर अपने आप यह नहीं बताती कि हर जगह ज़मीन एक ही वजह से धँस रही है। इससे यह पता चलता है कि कहाँ और किस तरह ज़मीन में बदलाव हो रहा है, लेकिन वजह समझने के लिए उस जगह की मिट्टी और पानी के इस्तेमाल जैसी स्थितियों पर भी ध्यान देना पड़ता है। यही वजह है कि उपग्रहों से मिले माप और स्थानीय जानकारी को साथ देखना उपयोगी है। उपग्रह समस्या का फैलाव और उसका रूप दिखाते हैं, जबकि स्थानीय हालात यह समझने में मदद करते हैं कि ज़मीन को प्रभावित करने वाली ताकतें कौन-सी हैं।
शहरों के नीचे का पानी और बढ़ता दबाव
शहरों में ज़मीन की सतह नीचे जाने के कई कारण हो सकते हैं। मिसाल के लिए, न्यूयॉर्क में ऊँची इमारतों का भारी वज़न नीचे की नरम मिट्टी को दबा सकता है। फिर भी अध्ययन और उसके नतीजों पर चर्चा करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, सबसे आम वजह ज़मीन के भीतर से पानी निकालना है। पानी की आपूर्ति करने वाली सेवाएँ, कारखाने और पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए पंपों पर निर्भर दूसरे संस्थान ऐसा करते हैं।
ज़मीन के भीतर के पानी को मिट्टी के कणों के बीच मौजूद खाली जगहों को भरने और उन्हें सहारा देने वाले हिस्से की तरह समझा जा सकता है—कुछ उसी तरह, जैसे तकिए के भीतर की हवा उसे आकार देती है। जब बड़ी मात्रा में पानी निकाल लिया जाता है, तो पानी से भरी मिट्टी की हालत बदल जाती है। धीरे-धीरे ज़मीन की परतें दब सकती हैं और सतह नीचे बैठने लगती है। यह बदलाव अचानक या इतना साफ़ नहीं होता कि उसे उसी पल आँखों से देखा जा सके। अक्सर यह धीरे-धीरे होता है और लगातार लिए गए माप इसे पकड़ लेते हैं—उस समय से पहले, जब इसके असर से साफ़ नुकसान होने लगे।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि किसी शहर को एक दिन में कितने पानी की ज़रूरत है। यह भी मायने रखता है कि पानी कहाँ से आता है और लंबे समय तक उसकी आपूर्ति कैसे की जाती है। अगर घर, सार्वजनिक सेवाएँ और उद्योग शहर के नीचे से पानी निकालने पर निर्भर हों, तो लगातार बढ़ती माँग ज़मीन पर भी दबाव डाल सकती है। न्यूयॉर्क का उदाहरण बताता है कि इमारतों का वज़न भी योगदान दे सकता है। फिर भी हर शहर के हालात अलग होते हैं, इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं कि दुनिया के हर इलाके में ज़मीन धँसने की वजह एक ही है।
सबसे बड़ी चिंता: अलग-अलग इलाकों का अलग गति से धँसना
अगर पूरे शहर की ज़मीन लगभग एक जैसी गति से नीचे जाए, तो यह उन स्थितियों से कम ख़तरनाक लग सकता है जिनमें शहर के कुछ हिस्से दूसरों की तुलना में तेज़ी से धँसते हैं। बर्गमान के मुताबिक, अगर शहर की पूरी सतह बिना किसी बड़े अंतर के करीब एक इंच नीचे चली जाए, तो यह ज़रूरी नहीं कि अपने आप में बड़ी समस्या हो। लेकिन जब एक मोहल्ला पास के दूसरे मोहल्ले से तेज़ी से नीचे जाने लगे, तो ऊँचाई में फर्क पैदा होता है। इससे इमारतों और दूसरी संरचनाओं पर बराबर दबाव नहीं पड़ता। इसलिए केवल यह जानना काफी नहीं कि पूरा शहर कितना धँसा है; यह भी देखना ज़रूरी है कि धँसाव कहाँ हो रहा है और अलग-अलग जगहों के बीच कितना अंतर है।
समय के साथ दबाव जमा होने पर इमारतों की नींव में दरारें पड़ सकती हैं, सीवर की पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो सकती हैं और मेट्रो की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ज़मीन की ऊँचाई में बदलाव बाढ़ की समस्या भी बढ़ा सकता है, क्योंकि नीचे बैठे इलाकों में पानी जमा होने की आशंका अधिक रहती है। ये सभी नुकसान एक साथ दिखें, ऐसा ज़रूरी नहीं। शुरुआत में बदलाव बहुत धीमा हो सकता है, लेकिन शहर के अलग-अलग हिस्सों के बीच ऊँचाई का अंतर बढ़ने पर उससे निपटना कठिन होता जाता है।
जकार्ता इस बात का गंभीर उदाहरण है कि ज़मीन का धँसाव और बाढ़ का खतरा एक-दूसरे से कैसे जुड़ सकते हैं। वहाँ समस्या इतनी बढ़ गई कि इंडोनेशिया ने बोर्नियो द्वीप पर नई राजधानी बनाने का काम शुरू किया। इसका मतलब यह नहीं है कि हर प्रभावित शहर को कहीं और बसना पड़ेगा। लेकिन यह दिखाता है कि जब ज़मीन का धँसाव दूसरे खतरों के साथ जुड़ता है, तो धीरे-धीरे चलने वाली भूवैज्ञानिक प्रक्रिया शहरों की योजना और उनके भविष्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
कुछ शहरों ने धँसाव को आगे बढ़ने से रोका
ज़मीन की परतें एक बार दब जाएँ, तो उन्हें पहले जैसी ऊँचाई पर लौटाना बहुत मुश्किल हो सकता है। वांग के अनुसार, ज़मीन का धँसना समय के साथ जमा होने वाली प्रक्रिया है और इसे पलटना काफी कठिन है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शहर इस समस्या को कम करने के लिए कुछ नहीं कर सकते। ज़मीन को पहले जैसी ऊँचाई पर लौटाना भले संभव न हो, फिर भी आगे का धँसाव रोका जा सकता है। समस्या को बढ़ने से रोकना और पहले से खोई हुई ऊँचाई वापस पाना—इन दोनों में फर्क समझना ज़रूरी है, ताकि शहर अपनी नीतियों के लिए हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य तय कर सकें।
टोक्यो में पहले ज़मीन आज के कई शहरों की तुलना में अधिक तेज़ी से धँस रही थी। वर्जीनिया टेक के भू-विज्ञान के विशेषज्ञ और अध्ययन की समीक्षा करने वाले विशेषज्ञों में शामिल मनूचेहर शिरज़ाई के मुताबिक, शहर ने ज़मीन के नीचे से पानी निकालने पर नियंत्रण लगाने वाली नीतियाँ अपनाईं और सतह पर मौजूद पानी के दूसरे स्रोतों की ओर रुख किया। इससे वहाँ समस्या का बढ़ना रुक गया। यह अनुभव दिखाता है कि पानी की माँग और उसके स्रोत का बेहतर प्रबंधन भी समाधान का हिस्सा हो सकता है। ज़मीन के धँसाव को ऐसी अनिवार्य घटना मानने की ज़रूरत नहीं, जिसे बदला ही न जा सके।
चीन में बीजिंग और उसके पास स्थित तियानजिन ने ज़मीन के नीचे से पानी निकालना बंद किया और उसकी जगह यांग्त्से नदी के आसपास के इलाके से लाया गया सतह पर मौजूद पानी इस्तेमाल किया। इस बदलाव के बाद उस क्षेत्र के कुछ हिस्सों में ज़मीन का धँसना रुक गया। इससे यह साबित नहीं होता कि पानी को दूर से लाना हर शहर के लिए सही रास्ता होगा। फिर भी यह एक उदाहरण है कि कुछ जगहों पर ज़मीन के नीचे के पानी पर निर्भरता घटाने से समस्या की दिशा बदली जा सकती है।
समय रहते चेतावनी मिले तो कदम उठाने का मौका रहता है
ज़मीन के धँसाव की एक मुश्किल बात यह है कि इसकी शुरुआत धीमी होती है। इसलिए यह अचानक आने वाले खतरों जितना दिखाई नहीं देता, जबकि इसका नुकसान समय के साथ बढ़ सकता है। इसी वजह से बार-बार बनाए गए नक्शे और सटीक माप काम के हैं। इनसे पता लगाया जा सकता है कि कौन-से मोहल्ले तेज़ी से खिसक रहे हैं और यह भी देखा जा सकता है कि उठाए गए कदम धँसाव घटा रहे हैं या नहीं। अलग-अलग इलाकों में होने वाले बदलाव की जानकारी से उन जगहों पर खास ध्यान देना भी संभव होता है, जहाँ बुनियादी ढाँचे पर दबाव पड़ने की आशंका अधिक है।
शिरज़ाई का मानना है कि ज़्यादातर जगहों पर कार्रवाई के लिए अब भी पर्याप्त समय है, लेकिन इस मौके का लाभ उठाने के लिए कदम उठाने होंगे। शुरुआत शहर के पानी के स्रोतों को समझने और ज़मीन में हो रहे बदलावों पर नज़र रखने से की जा सकती है। इसके बाद पानी निकालने के नियमों की समीक्षा और जहाँ संभव हो, उपयुक्त विकल्पों की तलाश की जा सकती है। अध्ययन हर शहर के लिए एक जैसा हल नहीं देता, लेकिन यह समस्या के पैमाने को अधिक साफ़ करता है। मापों को नज़रअंदाज़ करने से समस्या गायब नहीं हो जाती।
10 लाख से अधिक आबादी वाले 465 शहरी क्षेत्रों के आँकड़े उपलब्ध होने से स्थानीय अनुभवों से आगे बढ़कर इस विषय पर बड़े पैमाने पर तुलना करना संभव होता है। जब अलग-अलग क्षेत्रों के शहरों को 2014 से 2023 तक एक ही तरीके से देखा जाता है, तो यह समझना आसान होता है कि ज़मीन का धँसाव किसी एक भौगोलिक सीमा तक बँधा नहीं है। साथ ही, लगभग आधे शहरों पर पहले शोध न हुआ होना यह नहीं बताता कि खतरा केवल उन्हीं जगहों पर है जहाँ पहले से माप लिए गए हैं।
निष्कर्ष
उपग्रहों से मिले माप बताते हैं कि न्यू ऑरलियन्स, मेक्सिको सिटी, जकार्ता और रोम समेत दुनिया के कई बड़े शहरों के नीचे की ज़मीन धँस रही है। नेचर सिटीज़ में प्रकाशित अध्ययन ने 10 लाख से अधिक आबादी वाले 465 शहरी क्षेत्रों में 2014 से 2023 के बीच ज़मीन की हलचल का विश्लेषण किया। कुछ जगहों पर हर साल कई इंच तक धँसाव दर्ज हुआ। सबसे अहम चिंता यह है कि शहर के अलग-अलग मोहल्ले एक ही गति से नहीं धँसते; इससे इमारतों, सीवर और मेट्रो को नुकसान पहुँच सकता है और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। धँसी हुई ज़मीन को पहले जैसी ऊँचाई पर लौटाना कठिन है, लेकिन टोक्यो, बीजिंग और तियानजिन के अनुभव बताते हैं कि ज़मीन के नीचे से पानी निकालने पर नियंत्रण और पानी के दूसरे स्रोत अपनाकर आगे का धँसाव रोका जा सकता है। यह खतरा धीरे-धीरे बढ़ता है, मगर समय रहते इसकी निगरानी करने से शहरों को नुकसान बढ़ने से पहले कदम उठाने का मौका मिलता है।