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जब पीठ का पुराना दर्द उठता है, तो दिमाग में भी कुछ बदलता है।

आसान शब्दों में

पीठ के लंबे समय से चले आ रहे दर्द की एक खास बात यह है कि शरीर हिलाने पर दर्द बढ़े, तो दिमाग की एक ऐसी गतिविधि भी तेज़ हो सकती है जो भीतर के विचारों और यादों से जुड़ी है। थोड़ी देर के लिए होने वाले गर्मी के दर्द में इसका उलटा देखा गया। इससे दर्द को समझने में मदद मिलती है, लेकिन यह किसी नए इलाज के सफल होने का सबूत नहीं है।

लंबे समय का दर्द सिर्फ़ उस पल की तकलीफ़ नहीं

कमर के निचले हिस्से का दर्द दुनिया भर में बहुत आम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे दुनियाभर में दिव्यांगता का सबसे बड़ा कारण बताता है। अगर यह दर्द 12 सप्ताह से ज़्यादा बना रहे, तो इसे पुराना या दीर्घकालिक दर्द माना जाता है। कुछ लोगों के लिए रोज़मर्रा की साधारण हरकतें भी अचानक दर्द का दौरा शुरू कर सकती हैं। ऐसे में समस्या केवल उस दर्द को कम करने की नहीं रह जाती जो आता है और फिर चला जाता है।

इसका यह मतलब नहीं कि दर्द काल्पनिक है या व्यक्ति उसे मन में बना रहा है। शरीर में दर्द का एहसास वास्तविक होता है। लेकिन लंबे समय तक दर्द झेलने के अनुभव में यह चिंता भी शामिल हो सकती है कि दर्द फिर लौट आएगा, पहले के दौरों की यादें और ऐसी गतिविधियों से बचने की कोशिश जो दर्द बढ़ा सकती हैं। इसलिए शोधकर्ता दिमाग को केवल पीठ से आए संकेत आगे पहुँचाने वाला तंत्र नहीं मानते। दिमाग दर्द को समझने और उसे ध्यान तथा पुराने अनुभवों के साथ जोड़ने में भी हिस्सा लेता है।

फिर भी, यह पता लगाना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती रहा है कि शरीर हिलाने से पुराने दर्द का दौरा पड़ने पर दिमाग के कौन-से तंत्र बदलते हैं। अलग-अलग और नियंत्रित परिस्थितियों में दर्द का अध्ययन करने से यह ज़रूरी नहीं कि उस समय की पूरी तस्वीर मिले जब कोई हरकत सीधे मरीज की परेशानी से जुड़ी हो। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने शरीर की हरकत से उठने वाले दर्द की तुलना गर्मी से पैदा होने वाले थोड़ी देर के दर्द से की।

शरीर की हरकत और गर्मी से होने वाले दर्द की तुलना

इस अध्ययन में कमर के निचले हिस्से में लंबे समय से दर्द झेल रहे 114 लोगों ने हिस्सा लिया। हर व्यक्ति का पैर उठाने का परीक्षण किया गया। यह एक चिकित्सकीय तरीका है, जिससे कुछ मरीजों में पीठ का दर्द उभर सकता है। परीक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने दिमाग में खून के बहाव के बदलावों पर नज़र रखी। इसके लिए उन्होंने धमनियों में घूमते खून को चिह्नित करने वाली कार्यात्मक चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे संक्षेप में एएसएल कहा जाता है।

इस तकनीक से खून के बहाव को मापकर दिमाग की गतिविधि के तौर-तरीकों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है और इसके लिए किसी रंगीन पदार्थ का इंजेक्शन देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह बात इसलिए अहम थी कि शोधकर्ता दर्द शुरू करने वाली हरकत के दौरान दिमाग की प्रतिक्रिया देखना चाहते थे, न कि प्रयोग खत्म होने के बाद केवल प्रतिभागियों की बताई बातों पर निर्भर रहना। इस परीक्षण में शरीर की हरकत, दर्द में बदलाव और दिमाग की गतिविधि का शारीरिक माप—तीनों को एक साथ देखा गया।

पुराने दर्द की तुलना एक अलग तरह की पीड़ा से करने के लिए प्रतिभागियों को पिंडली पर गर्मी देकर पैदा किया गया असहज, लेकिन नुकसान न पहुँचाने वाला एहसास भी दिया गया। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना उस छोटी-सी जलन से की जो गलती से गर्म सतह छू लेने पर हो सकती है। इस तरह वे दिमाग की प्रतिक्रिया में फर्क देख सके—एक ओर पुरानी समस्या से जुड़ी हरकत के साथ उठने वाला दर्द और दूसरी ओर गर्मी से पैदा हुआ अलग तथा थोड़ी देर रहने वाला दर्द।

दिमाग का वह जाल जिसकी प्रतिक्रिया उलटी निकली

अध्ययन में ध्यान दिमाग के उस तंत्र पर गया जिसे डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क या डीएमएन कहा जाता है। इसे कभी-कभी अपने बारे में सोचने से जुड़ा तंत्र भी कहा जाता है। यह ललाट, पार्श्व और कनपटी के हिस्सों में मौजूद आपस में जुड़े क्षेत्रों का समूह है। जब ध्यान बाहर की किसी चीज़ के बजाय भीतर की ओर जाता है—जैसे अपनी यादों, पहचान, भावनाओं या विचारों के बारे में सोचते समय—तो आम तौर पर इसकी गतिविधि बढ़ जाती है। इसके उलट, किसी बाहरी काम या घटना पर ध्यान टिकाने पर इसकी गतिविधि घटने लगती है।

पैर उठाने से जब कमर का दर्द उभरा, तब इस तंत्र की गतिविधि बढ़ गई। लेकिन गर्मी से हुए दर्द के दौरान इसकी गतिविधि कम हुई। यह बदलाव उस आम तौर-तरीके के अनुरूप था जो तेज़ और थोड़ी देर के दर्द के दौरान दिमाग की प्रतिक्रिया में देखा जाता है। इसलिए दोनों तरह के दर्द में फर्क केवल यह नहीं था कि एहसास कितना तेज़ था; भीतर की ओर ध्यान देने से जुड़े इस तंत्र की गतिविधि किस दिशा में बदली, यह भी अलग था।

आम तौर पर डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की गतिविधि घटने से ध्यान किसी तत्काल खतरे या बाहरी चीज़ की ओर जा सकता है। लेकिन पुराने दर्द के दौरे में दिखाई दिया ढर्रा इसके उलट था। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के चिकित्सा विद्यालय में एनेस्थीसिया के प्रोफ़ेसर और अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता फ़ादेल ज़ैदान ने बताया कि दर्द के दौरे के दौरान टीम ने इस तंत्र को सक्रिय होते देखा, जबकि आम तौर पर दर्द के दौरान हुए अध्ययनों में इसकी गतिविधि घटती है। यह नतीजा संकेत देता है कि लंबे समय के दर्द के दौरे में केवल शरीर से आए दर्द के संकेतों को समझने से आगे की प्रक्रियाएँ भी शामिल हो सकती हैं।

हालाँकि, अपने बारे में सोचने से जुड़े तंत्र का सक्रिय होना यह साबित नहीं करता कि दर्द किसी व्यक्ति की पहचान बदल देता है। इसका यह अर्थ भी नहीं कि मरीज जान-बूझकर दर्द को अपने व्यक्तित्व से जोड़ता है। यह प्रतिभागियों के एक समूह में दिमाग की गतिविधि से जुड़ा नतीजा है। इससे संकेत मिलता है कि पुराने दर्द के प्रति दिमाग की प्रतिक्रिया उन प्रणालियों के साथ जुड़ सकती है जो भीतर के अनुभव को समझने में भाग लेती हैं। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस जुड़ाव का क्या अर्थ है, यह जानने के लिए मरीजों के अनुभवों और दिमाग की तस्वीरों को लंबे समय तक साथ रखकर अध्ययन करना होगा।

शरीर के एहसास को समझने वाले हिस्सों से मज़बूत जुड़ाव

नतीजे केवल दोनों तरह के दर्द के दौरान उस तंत्र की गतिविधि की तुलना तक सीमित नहीं थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन प्रतिभागियों का पीठ दर्द ज़्यादा तेज़ था, उनमें डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क और प्राथमिक देह-संवेदी प्रांतस्था के बीच जुड़ाव अधिक मज़बूत था। दिमाग का यह हिस्सा शरीर से आने वाले संवेदन संकेतों को समझने में शामिल होता है, जिनमें पीठ से जुड़े संकेत भी आते हैं।

पैर उठाने के परीक्षण के दौरान दर्द जितना तेज़ था, दिमाग के एहसास और हरकत से जुड़े कुछ क्षेत्रों में गतिविधि भी उतनी ही अधिक देखी गई। इन आपसी संबंधों से यह साबित नहीं होता कि दिमाग का कोई खास हिस्सा दर्द पैदा करता है। लेकिन वे संकेत देते हैं कि दर्द के दौरे की तीव्रता के साथ एहसास और हरकत सँभालने वाली दिमागी प्रणालियों में ऐसे बदलाव जुड़े हैं जिन्हें मापा जा सकता है। यह बदलाव अपने बारे में सोचने से जुड़े तंत्र में आए परिवर्तन के साथ दिखाई दिए।

टीम ने यह भी दर्ज किया कि परीक्षण के दौरान दिल की धड़कन जितनी तेज़ हुई, उससे दर्द के दौरे की तीव्रता का भरोसेमंद अंदाज़ा मिलता था। शरीर का यह माप प्रतिभागी के अपने दर्द के बयान में एक और जानकारी जोड़ता है, लेकिन यह दर्द का आकलन करने की जगह नहीं लेता और न ही दिल की धड़कन को अपने आप में बीमारी पहचानने का तरीका बनाता है। इसकी अहमियत यह दिखाने में है कि व्यक्ति के अपने अनुभव की तीव्रता और शरीर की मापी जा सकने वाली प्रतिक्रिया एक ही समय पर बदल रही थीं।

दर्द का असर उस पल के बाद भी कैसे बना रह सकता है

दिमाग की गतिविधि का यह ढर्रा कुछ हद तक समझा सकता है कि पुराने दर्द की तकलीफ़ केवल उस एक मिनट तक क्यों सीमित नहीं रहती जब व्यक्ति को दर्द महसूस होता है। अगला दौरा पड़ने की चिंता, पहले के दर्दनाक दौरों की याद और किसी खास हरकत से डर—ये सब दिन बिताने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं। कभी-कभी व्यक्ति पहले के बुरे अनुभव या दर्द लौटने की आशंका के चलते अपनी आम गतिविधियों में हिस्सा लेने से हिचकता है।

इन पहलुओं का अर्थ यह नहीं कि दर्द का शारीरिक पक्ष महत्वहीन है। बल्कि वे बताते हैं कि शरीर का दर्द एक बड़े अनुभव का हिस्सा है। दर्द का संकेत मौजूद हो सकता है, लेकिन व्यक्ति उसे कैसे समझता है, उस पर कितना ध्यान देता है और उससे जुड़ी भावनाएँ तथा आशंकाएँ उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ने वाले असर को आकार दे सकती हैं। यह बात उस नतीजे से मेल खाती है कि हरकत से उठे दर्द के दौरान भीतर की ओर ध्यान देने से जुड़ा तंत्र अधिक सक्रिय था। फिर भी, केवल इस अध्ययन से यह नहीं पता चलता कि हर व्यक्ति में ये जुड़ाव कैसे बनते हैं। न ही यह साबित होता है कि पीठ दर्द से जूझ रहे सभी लोग एक जैसे अनुभव से गुज़रते हैं।

इसीलिए पुराने दर्द के दौरे और गर्मी से दिए गए संकेत की तुलना अहम है: दिमाग ने हर दर्द पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी। थोड़ी देर के दर्द के बाद नेटवर्क की गतिविधि घटी, जबकि हरकत से उठे दर्द के साथ वह बढ़ी। दर्द किस परिस्थिति में हुआ, समस्या कितने समय से चली आ रही है और मरीज के पास उससे जुड़े कौन-से अनुभव हैं—ये बातें इस फर्क को समझाने में मदद कर सकती हैं। लेकिन हर कारक की भूमिका अलग-अलग तय करने के लिए और बड़े पैमाने पर शोध की ज़रूरत है।

इलाज के लिए इन नतीजों का क्या मतलब है

दर्द के कई इलाज उसका एहसास कम करने या दर्द के संकेतों को आगे बढ़ने से रोकने पर ध्यान देते हैं। लेकिन अगर पुराने दर्द के दौरे में दिमाग के वे तंत्र भी शामिल हों जो निजी अनुभव और भीतर के ध्यान से जुड़े हैं, तो केवल दर्द के एहसास को लक्ष्य बनाने वाला तरीका मरीज की परेशानी के हर पहलू को शायद न सँभाल पाए। यह अध्ययन इस संभावना की पड़ताल करने का वैज्ञानिक कारण देता है। इससे यह साबित नहीं होता कि आज के इलाज बेकार हैं या कोई दूसरा इलाज सफल साबित हो चुका है।

ज़ैदान और उनके साथियों ने हाल के काम में दर्द से जुड़े शोध के तहत सजग ध्यान और साइलोसाइबिन नाम के पदार्थ का अध्ययन करने की संभावना पर विचार किया है। सजग ध्यान के अभ्यास में व्यक्ति को मौजूदा पल के विचारों और एहसासों पर ध्यान देना सिखाया जाता है, बिना उन पर तुरंत सही-गलत का फैसला सुनाए। साइलोसाइबिन ऐसा पदार्थ है जिसका मन पर असर पड़ता है और वैज्ञानिक यह देख रहे हैं कि दर्द पुराने अनुभवों, भावनाओं और उम्मीदों से किस तरह जुड़ता है। ये तरीके अभी शोध के दायरे में हैं। अध्ययन में उनका ज़िक्र होना न तो इलाज की सलाह है, न ही इस बात का प्रमाण कि वे पीठ दर्द में असरदार हैं।

इस शोध दिशा का विचार ज़रूरी नहीं कि दर्द के हर संकेत को मिटा देना हो। इसके बजाय यह समझने की कोशिश है कि क्या दिमाग के दर्द से निपटने के तरीके में बदलाव लाया जा सकता है, ताकि दर्द का अनुभव सोच और रोज़मर्रा की गतिविधियों पर उतना हावी न रहे। यह अभी एक परिकल्पना है। इसे जाँचने के लिए सावधानी से किए गए चिकित्सकीय परीक्षण, दूसरे तरीकों से तुलना और प्रतिभागियों पर लंबे समय तक नज़र रखना ज़रूरी होगा। तभी पता चलेगा कि सुधार कितना हुआ, कितने समय तक बना रहा और अलग-अलग लोगों में उसका असर कैसा रहा।

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के चिकित्सा विद्यालय में ज़ैदान की दर्द, स्वास्थ्य और सजगता प्रयोगशाला ऐसे चिकित्सकीय परीक्षण कर रही है जिनमें दिमाग की तस्वीरों का इस्तेमाल होता है। इन परीक्षणों में देखा जा रहा है कि सजग ध्यान या साइलोसाइबिन पर आधारित तरीकों से भीतर की ओर सोचने से जुड़ी दिमागी प्रक्रियाओं में बदलाव आता है या नहीं। शोध का मकसद यह जानना है कि ये तरीके दर्द को महसूस करने के ढंग पर असर डालते हैं या नहीं; यह मान लेना नहीं कि वे दर्द मिटा देते हैं या हर मरीज के लिए सही हैं।

अध्ययन की सीमाएँ और आगे की राह

यह अध्ययन एक खास परीक्षण के दौरान 114 मरीजों के दिमाग की प्रतिक्रिया का उपयोगी विवरण देता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क का सक्रिय होना ही दर्द के बने रहने की वजह है। प्रयोगशाला में दिमाग की माप अकेले यह नहीं बता सकती कि कोई मरीज कई हफ्तों या महीनों तक किस तरह की ज़िंदगी जी रहा है। दर्द की तीव्रता और दिमाग की गतिविधि के बीच संबंध दिखना और कारण-परिणाम का रिश्ता साबित करना अलग बातें हैं। इसी तरह, इस संबंध को बदल सकने वाला इलाज तय करना भी इस अध्ययन से संभव नहीं है।

आगे के शोध में यह जाँचना होगा कि क्या यही ढर्रा दूसरे समूहों में भी दिखाई देता है, समय के साथ इसमें कैसे बदलाव आता है और इसका लक्षणों के सुधरने या बिगड़ने से क्या संबंध है। सुझाए गए तरीकों पर कोई व्यावहारिक राय बनाने से पहले उन्हें उचित चिकित्सकीय परीक्षणों में परखना भी ज़रूरी है। दिमाग की तस्वीरें दर्द के दौरे के दौरान भीतर हो रही गतिविधियों की झलक देती हैं, लेकिन वे अपने आप में इलाज का तैयार नुस्खा नहीं हैं।

यह अध्ययन 5 अक्टूबर 2026 को ब्रिटिश जर्नल ऑफ एनेस्थीसिया में प्रकाशित हुआ। इसे कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के चिकित्सा विद्यालय से जुड़े मॉर्गन जियानूला, जॉन डीन, कोनन चेन, डैनियल बैरोज़, गैब्रिएल रेनियर और थॉमस लियू ने फ़ादेल ज़ैदान के साथ मिलकर किया। अध्ययन के कुछ हिस्से के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के अधीन राष्ट्रीय पूरक और एकीकृत स्वास्थ्य केंद्र से अनुदान R01AT009693 मिला। कुछ सहायता विश्वविद्यालय के सैनफ़ोर्ड इंस्टीट्यूट फ़ॉर कंपैशन एंड कंपैशन साइंस से भी मिली। शोधकर्ताओं ने बताया कि उनके बीच हितों का कोई टकराव नहीं था।

निष्कर्ष

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो की टीम के नतीजे बताते हैं कि हरकत से उठने वाले पुराने कमर दर्द के दौरान दिमाग की प्रतिक्रिया गर्मी से होने वाले थोड़ी देर के दर्द से अलग हो सकती है। पहले मामले में भीतर के अनुभवों से जुड़े नेटवर्क की गतिविधि बढ़ी, जबकि दूसरे में वह घटी। दर्द की तीव्रता का संबंध एहसास और हरकत सँभालने वाले दिमागी क्षेत्रों में बदलाव से भी था। अधिक तेज़ दर्द वाले लोगों में अपने बारे में सोचने से जुड़े नेटवर्क और शरीर के एहसास सँभालने वाले हिस्से का जुड़ाव भी मज़बूत था। ये नतीजे किसी नए इलाज की सफलता साबित नहीं करते, लेकिन वे पुराने दर्द को ऐसा अनुभव समझने में मदद करते हैं जो ध्यान, यादों और आशंकाओं से भी जुड़ सकता है। अब ऐसे शोध की ज़रूरत है जो शारीरिक दर्द के साथ-साथ यह भी जाँचे कि उसका असर लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कैसे पड़ता है।