आसान शब्दों में
दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के समुद्र से मिली एक छोटी मछली देखने में समुद्री घोड़े जैसी लगती है, लेकिन यह समुद्री घोड़ों की करीबी, मगर अलग शाखा की मछली है। वैज्ञानिकों ने संग्रहालयों में रखे 7 पुराने नमूनों की जाँच करके यह बात जानी। यह खोज बताती है कि समुद्र में रहने वाली कुछ प्रजातियाँ लंबे समय तक अनदेखी रह सकती हैं—कभी समुद्र की गहराई में, तो कभी संग्रहालय की अलमारी में।
दिखने में एक जैसी, रिश्ते में अलग
पहली नज़र में यह मछली किसी नन्हे समुद्री घोड़े जैसी लग सकती है। इसकी लंबाई अंगूठे जितनी ही है और शरीर की बनावट भी उसी परिचित समूह की याद दिलाती है। लेकिन हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के संग्रहालयों में रखे नमूनों की दोबारा जाँच से पता चला कि यह मछली और इससे मिलती-जुलती 2 प्रजातियाँ समुद्री घोड़ों के वंश की नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने इनके लिए अलग वंश Australyichthys का नाम दिया। इस शोध का विवरण Journal of Lost Species में प्रकाशित हुआ।
इस नए वर्गीकरण का आधार बनी प्रजाति का नाम Australyichthys aegis है। इसका आम नाम हेलमेटनुमा माथे वाली समुद्री मियोबिया रखा गया है, जो इसके सिर पर मौजूद गुंबदनुमा उभार की ओर इशारा करता है। इसका वैज्ञानिक नाम यूनानी पौराणिक कथाओं में एजिस नाम के रक्षात्मक कवच से जुड़ा है। सिर पर दिखने वाला हड्डी का उभार भी ढाल या कवच जैसा लगता है। ये दोनों नाम मछली की कुछ पहचानने योग्य विशेषताएँ बताते हैं, लेकिन केवल नाम या बाहरी रूप से यह तय नहीं होता कि उसका असली रिश्ता दूसरी मछलियों से क्या है।
इस समूह में 2 और प्रजातियाँ भी हैं: A. minotaur, जिसे बैल-गर्दन वाली समुद्री मियोबिया कहा जाता है, और A. paradoxus, यानी विरोधाभासी समुद्री मियोबिया। पहले इन तीनों प्रजातियों को समुद्री घोड़ों के वंश में रखा गया था, क्योंकि उनका बाहरी रूप ऐसा वर्गीकरण करने के लिए उकसाता था। मगर एक जैसा दिखना हमेशा करीबी रिश्तेदारी का प्रमाण नहीं होता। अलग-अलग जीवों में मिलती-जुलती विशेषताएँ तब भी विकसित हो सकती हैं, जब वे समान माहौल या जीवन-शैली के अनुकूल ढल रहे हों।
इसलिए वर्गीकरण को ठीक करना अहम है। ये तीनों प्रजातियाँ Hippocampus वंश से नहीं, बल्कि उससे करीबी एक अलग शाखा से जुड़ी हैं। शोध के नतीजे बताते हैं कि समुद्री घोड़े जैसी देह-रचना मछलियों के इसी कुल में एक से अधिक बार विकसित हुई हो सकती है। यानी यह समानता अलग-अलग शाखाओं में हुए समान विकास का नतीजा हो सकती है; इससे यह साबित नहीं होता कि इन मछलियों का कोई हाल का साझा पूर्वज था, जिसकी देह समुद्री घोड़े जैसी थी।
संग्रहालय की दराज़ों में छिपे सुराग
इस वंश का पता किसी खोजी गोताखोरी या मछली को उसके प्राकृतिक ठिकाने में सीधे देखने से नहीं चला। अब तक इसकी जानकारी सिर्फ 7 नमूनों से मिली है। ये नमूने समुद्र की तलहटी को छूने वाले जालों या तल खुरचने वाले औज़ारों में संयोग से फँसकर बाहर आए थे। इन्हें लगभग 65 साल के दौरान अलग-अलग मौकों पर इकट्ठा किया गया और इनके मिलने की जगहें ऑस्ट्रेलिया के समुद्रतट पर एक-दूसरे से 2500 किलोमीटर से अधिक दूर थीं। करीब 2 दशकों से कोई नया नमूना नहीं मिला है।
ये नमूने ऑस्ट्रेलिया की कई संस्थाओं के संग्रह में रखे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलियाई संग्रहालय, म्यूज़ियम्स विक्टोरिया और राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान संगठन शामिल हैं, जिसे संक्षेप में सीएसआईआरओ कहा जाता है। A. aegis का अब तक ज्ञात एकमात्र नमूना 2006 में दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के स्पेंसर खाड़ी के मुहाने पर, गैम्बियर द्वीपों के पास मिला था। तल खुरचने वाला औज़ार छोटी खोलदार जीव-प्रजातियों—ब्रैकियोपोड नाम के जीवों—को जमा कर रहा था, मछलियों को नहीं।
मैदानी अभियान का मकसद उन बिना रीढ़ वाले जीवों का अध्ययन करना था। इसीलिए मछली को गलती से दक्षिण ऑस्ट्रेलिया संग्रहालय के बिना रीढ़ वाले जीवों के संग्रह में रख दिया गया। इस तरह रीढ़ वाली एक मछली ऐसी सामग्री के बीच सुरक्षित पड़ी रही, जहाँ किसी को उसके होने की उम्मीद नहीं थी। संग्रहालय के नमूनों की दोबारा जाँच के बाद ही उसकी अहमियत सामने आई। यह कहानी दिखाती है कि वैज्ञानिक खोज के लिए हमेशा नया नमूना जुटाना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी ज़रूरी सुराग सालों से किसी दराज़ में रखा होता है, बस उसका नाम या वर्गीकरण गलत होता है।
पकड़े जाने के बाद मछलियों को सुरक्षित रख दिया गया, लेकिन उनकी संख्या कम होने और उन्हें जीवित न देखे जाने के कारण उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं गया। नमूने इतने कम हों तो हर एक का महत्व असाधारण हो जाता है, क्योंकि वही किसी पूरे समूह के बारे में उपलब्ध जानकारी का बहुत छोटा हिस्सा होता है। ऐसे में किसी नमूने को बेकार बची हुई सामग्री मानकर काटना या उसका कोई हिस्सा बिना सोचे-समझे नष्ट करना ठीक नहीं होगा।
बिना काटे हड्डियों की त्रिआयामी तस्वीर
इसी वजह से शोधकर्ताओं ने एक खास तरह के सूक्ष्म एक्स-रे स्कैन का सहारा लिया। इस तकनीक में एक्स-रे की मदद से शरीर के भीतर की कई परतदार तस्वीरें बनाई जाती हैं और छोटी-छोटी हड्डियों की बारीकियाँ भी देखी जा सकती हैं। इन तस्वीरों से नमूनों के कंकालों के त्रिआयामी चित्र बनाए गए और उनकी हड्डियों की बनावट की तुलना असली समुद्री घोड़ों से की गई। इस तरीके से नमूनों को खोले या नुकसान पहुँचाए बिना उनके भीतर की संरचना देखना मुमकिन हुआ।
यह जाँच खास तौर पर ज़रूरी थी, क्योंकि पहले का वर्गीकरण मुख्य रूप से मछली के बाहर से दिखने वाले रूप पर आधारित था। जबकि शरीर के भीतर की बनावट रिश्तेदारी पहचानने के ज़्यादा पक्के सुराग दे सकती है। समुद्री घोड़ों के कंकाल में कुछ खास लक्षण होते हैं। इनमें पेट के हिस्से को सहारा देने वाली आपस में जुड़ी कठोर हड्डी की पट्टियों का ढाँचा और सिर पर हड्डी का एक विशिष्ट मुकुट शामिल है, जिसे कोरोनेट कहा जाता है।
Australyichthys की एक्स-रे तस्वीरों में समुद्री घोड़ों के पेट पर मिलने वाला हड्डियों का पिंजरा नहीं दिखा। सिर पर उनका खास मुकुट भी नहीं मिला। इसके बजाय पेट को सहारा देने वाली हड्डियों की एक अलग बनावट दिखी, जो समुद्री घोड़ों में ज्ञात नहीं है। ये अंतर मछली के रूप की कोई मामूली बात नहीं हैं। शरीर के भीतर मौजूद यही बनावट उन दो समूहों को अलग पहचानने में मदद करती है, जो विकास की अलग-अलग राहों पर आगे बढ़े।
इस तकनीक से शोधकर्ता कंकाल की हड्डियों की एक-एक करके तुलना कर सके और दुर्लभ नमूनों को उनकी मौजूदा हालत में सुरक्षित रख पाए। संग्रहालयों की वस्तुओं पर काम करते समय बिना नुकसान पहुँचाने वाली तकनीकों की अहमियत यहाँ साफ दिखाई देती है। किसी पूरी प्रजाति का एक ही नमूना उपलब्ध हो, तब भी तस्वीरों और डिजिटल विश्लेषण से उससे काफी जानकारी हासिल की जा सकती है। इसके लिए नमूने का हिस्सा निकालने या उसे चीरकर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
एक नमूने से मिला आनुवंशिक सुराग
आनुवंशिक जाँच सिर्फ एक नमूने पर की जा सकी। यह A. aegis के नमूने को एथेनॉल में सुरक्षित रखने के कारण संभव हुआ। वंश के बाकी नमूनों को फॉर्मेलिन में रखा गया था। संरक्षण के इस फर्क का नतीजे पर सीधा असर पड़ा: एथेनॉल में रखा नमूना ऐसा था कि उससे आनुवंशिक सामग्री पढ़ी जा सकती थी, जबकि बाकी नमूनों की हालत डीएनए निकालने के लिए ठीक नहीं थी।
नमूने से मिली आनुवंशिक जानकारी की तुलना दूसरी मछलियों से की गई। विश्लेषण से पता चला कि A. aegis असली समुद्री घोड़ों के समूह से बाहर है, हालांकि उसकी शाखा उनके सबसे करीब है। यह नतीजा हड्डियों की तस्वीरों से मिले संकेतों से मेल खाता है: मछली समुद्री घोड़ों की करीबी है, लेकिन खुद समुद्री घोड़ा नहीं। जब कंकाल और आनुवंशिक जाँच, दोनों से एक ही बात सामने आए, तो समूहों को अलग मानने का आधार ज़्यादा मजबूत हो जाता है। सिर्फ बाहरी रूप पर भरोसा करना कम भरोसेमंद हो सकता है, क्योंकि मिलती-जुलती बनावट का विकास दूर-दूर के जीवों में भी हो सकता है।
इन नतीजों के आधार पर तीनों प्रजातियों के लिए अलग वंश का नाम ज़रूरी हो गया। Australyichthys नाम इस तरह बनाया गया है कि उसमें दक्षिण और मछली, दोनों का संकेत है; यह ऑस्ट्रेलिया में इनके मिलने के अनुकूल है। इन्हें समुद्री घोड़ों के वंश से अलग रखने का अर्थ यह नहीं कि उनकी बाहरी समानता झूठी थी। वे सचमुच समुद्री घोड़ों जैसी दिखती हैं, लेकिन शोध से मालूम हुआ कि केवल इस समानता के आधार पर उन्हें एक ही समूह में रखना ठीक नहीं।
विकास कभी-कभी एक जैसे रूप बनाता है
जीवविज्ञानी अलग-अलग वंशों में मिलती-जुलती विशेषताओं के उभरने को अभिसारी विकास कहते हैं। ऐसा तब हो सकता है, जब जिन जीवों के पूर्वज करीबी रिश्तेदार न हों, वे मिलती-जुलती देह-रचना की ओर बढ़ें। अक्सर उनकी जीवन-शैली या सामने आने वाली चुनौतियाँ उन्हें समान तरह के हल की ओर ले जाती हैं। इसका यह मतलब नहीं कि एक प्रजाति ने दूसरी की नकल की है। विकास की प्रक्रिया अलग-अलग जीवों में अपने आप मिलते-जुलते रूप बना सकती है।
समुद्री घोड़ों के कुल में पाइपफिश, पाइपफिश से मिलती समुद्री प्रजातियाँ और समुद्री ड्रैगन भी शामिल हैं। माना जाता है कि इस कुल में समुद्री घोड़ों के पूरे विशिष्ट रूप का विकास कम से कम 2 बार हुआ। इस रूप में मुड़ा हुआ सिर, चीज़ों को पकड़ सकने वाली पूँछ और बच्चों को रखने की थैली जैसी विशेषताएँ शामिल हैं। Australyichthys इस चर्चा में एक अहम उदाहरण जोड़ता है: यह समुद्री घोड़े जैसा दिखता है, लेकिन उसके कंकाल की कुछ खास बनावटें इसमें नहीं हैं।
यह अध्ययन अपने आप यह नहीं बताता कि इन मछलियों में समुद्री घोड़े जैसा रूप कैसे आया या किन पर्यावरणीय हालात ने इसमें भूमिका निभाई। लेकिन यह प्रजातियों के आपसी रिश्तों की तस्वीर बदलता है और विकास में एक जैसे रूप बार-बार बनने के बारे में ज़्यादा सटीक सवाल पूछने का रास्ता खोलता है। जब वैज्ञानिक जानते हैं कि मिलती-जुलती बनावट अलग-अलग शाखाओं में उभरी, तो वे जाँच सकते हैं कि क्या साझा जीवन-स्थितियों या दबावों ने इन जीवों को एक जैसा रूप दिया।
फैला हुआ ठिकाना, जिसके बारे में जानकारी बहुत कम
ये नमूने ग्रेट सदर्न रीफ के अलग-अलग हिस्सों में मिले। यह दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के चारों ओर फैला समुद्री क्षेत्र है, जहाँ केल्प के जंगल और चट्टानी प्रवाल-भित्तियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इस पर्यावरण में ऐसी प्रजातियाँ भी रहती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं, जबकि इसके गहरे हिस्सों की अब तक बहुत कम खोज हुई है। Australyichthys के ज्ञात नमूने लगभग 50 से 125 मीटर की गहराई से आए हैं—ऐसे पानी से जहाँ आम तौर पर लोग अपने नियमित गोताखोरी अभियानों में नहीं पहुँचते।
अब तक इनमें से किसी भी मछली को जीवित देखने का पक्का रिकॉर्ड नहीं है। जो भी जानकारी है, वह उन मछलियों से मिली है जो संयोग से जाल या तल खुरचने वाले औज़ार में फँस गई थीं। इसलिए नमूनों से अकेले यह नहीं जाना जा सकता कि मछली अपने ठिकाने में कैसे चलती-फिरती है या कैसा व्यवहार करती है। संग्रहालय में नमूनों का होना अपने आप यह भी नहीं बताता कि समुद्र में उनका फैलाव कितना है या उनकी संख्या कितनी है। नमूने मिलने की जगहों के बीच 2500 किलोमीटर से अधिक की दूरी होने का यह अर्थ नहीं कि मछली पूरे तट पर बराबर फैली हुई है। यह दूरी बस अलग-अलग जगहों से मिले छिटपुट नमूनों के ठिकानों के बीच का फासला बताती है।
इस वंश को लुप्तप्राय नहीं, बल्कि खोई हुई प्रजातियों की श्रेणी में रखा जाता है। यहाँ खोई हुई कहने का मतलब यह है कि उसके बारे में जानकारी और प्रत्यक्ष अवलोकन बहुत कम हैं; इसका मतलब यह नहीं कि वह विलुप्त हो चुकी है। वैज्ञानिकों को इसके बारे में जानकारी कुछ ही संग्रहालयों में रखे नमूनों से मिली है, उन्होंने किसी जीवित मछली को नहीं देखा और करीब 2 दशकों से कोई नया नमूना भी नहीं मिला। इसलिए इस समूह की तलाश के लिए खास तौर पर मैदानी खोज की ज़रूरत है: ऐसी जाँच जिसमें शोधकर्ता इसे जान-बूझकर ढूँढ़ें, न कि किसी और मकसद से लगाए गए मछली पकड़ने के जाल या तल खुरचने वाले औज़ार में इसके संयोग से फँसने का इंतज़ार करें।
यह फर्क उस क्षेत्र में खास मायने रखता है, जिसकी गहराई की अब तक ठीक से खोज नहीं हुई। हाल के वर्षों में कोई मछली दिखाई न देना इस बात का सबूत नहीं कि वह गायब हो गई है। मुमकिन है कि अब तक निगरानी के लिए ऐसे औज़ार इस्तेमाल न किए गए हों जो सही गहराई या सही जगह तक पहुँच सकें। यदि यह मछली जीवित मिलती है, तो वैज्ञानिक उसके रूप, व्यवहार और पर्यावरण को सीधे दर्ज कर पाएँगे। फिर वे इन नई टिप्पणियों को उन पुराने नमूनों से जोड़ सकेंगे, जिनके आधार पर अभी उसका वर्गीकरण किया गया है।
निष्कर्ष
संग्रहालयों में रखे 7 नमूनों की जाँच ने उन तीन छोटी मछलियों के बारे में वैज्ञानिकों की समझ बदल दी, जिन्हें लंबे समय तक समुद्री घोड़े जैसा माना गया था। बारीक एक्स-रे तस्वीरों से पता चला कि इनमें समुद्री घोड़ों की कुछ खास हड्डी वाली बनावटें नहीं हैं और इनके कंकाल में एक अलग ढाँचा है। वहीं, एक प्रजाति से मिले डीएनए ने दिखाया कि ये मछलियाँ समुद्री घोड़ों की करीबी, मगर अलग शाखा से जुड़ी हैं। इस तरह Australyichthys नाम का नया वंश सामने आया—जिसके नमूने अलग-अलग संग्रहालयों में रखे थे और जिनमें से कुछ का वर्गीकरण गलत था।
यह कहानी केवल वैज्ञानिक नाम बदलने की नहीं है। यह दिखाती है कि सीमित सबूतों से ज्ञान कैसे बनता है और जीवन-वृक्ष की अलग शाखाओं में एक जैसा रूप विकसित हो जाए तो सिर्फ बाहरी बनावट के आधार पर किया गया वर्गीकरण कैसे चूक सकता है। यह ग्रेट सदर्न रीफ की गहराइयों के बारे में हमारी जानकारी में बड़ी कमी भी उजागर करती है। इस वंश के बारे में जानकारी 7 नमूनों पर टिकी है, जिन्हें लगभग 65 साल के दौरान 2500 किलोमीटर से अधिक लंबे तटीय फैलाव के अलग-अलग स्थानों से जमा किया गया था। करीब 2 दशकों से कोई नया नमूना नहीं मिला। इसे खोई हुई प्रजाति कहना विलुप्त होने की घोषणा नहीं है; जीवित मछली को ढूँढ़ने और उसका जीवन समझने के लिए उस ठिकाने में सोच-समझकर खोज करनी होगी, जिसके बारे में अब तक हमें बस बिखरे हुए सुराग मिले हैं।