आसान शब्दों में
जिगर खून से नुकसानदेह कोलेस्ट्रॉल हटाने में मदद करता है। चूहों और कोशिकाओं पर हुए एक अध्ययन में, खाने से मिलने वाला ज्यादा कोलेस्ट्रॉल जिगर की इस क्षमता को कमजोर करने वाले रास्ते से जुड़ा पाया गया। उस रास्ते के एक एंजाइम को रोकने पर चूहों के खून में कोलेस्ट्रॉल घटा, लेकिन यह तरीका अभी लोगों में आजमाया नहीं गया है।
खून को साफ रखने में जिगर की अहम भूमिका
कम घनत्व वाला लिपोप्रोटीन, जिसे आम तौर पर एलडीएल कहा जाता है, खून में घूमता रहता है। जिगर की कोशिकाएं इसे पकड़कर अपने भीतर ले सकती हैं, जहां इसे आगे संसाधित किया जाता है। इन कोशिकाओं की सतह पर एलडीएल को पहचानने और पकड़ने वाले खास रिसेप्टर होते हैं। इन्हें ऐसे स्वागत-बिंदु समझिए जो एलडीएल के कणों को थामकर कोशिका के भीतर पहुंचाते हैं। रिसेप्टर जितने अधिक उपलब्ध होंगे, जिगर खून से एलडीएल को उतनी ही अच्छी तरह हटा सकेगा।
इसलिए एलडीएल का स्तर सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि खून में कितना कोलेस्ट्रॉल मौजूद है। यह भी मायने रखता है कि जिगर की उसे पकड़ने वाली व्यवस्था कितनी तैयार और सक्रिय है। रिसेप्टरों की संख्या घट जाए या वे कम समय तक टिकें, तो एलडीएल को खून से हटाने की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। इसी बात से यह समझने में मदद मिलती है कि स्टैटिन और पीसीएसके9 को रोकने वाली दवाएं कैसे काम करती हैं। ये दवाएं एलडीएल रिसेप्टरों को बनाए रखने या उनकी उपलब्धता बढ़ाने में मदद करती हैं, जिससे खून से कोलेस्ट्रॉल हटाने की क्षमता को सहारा मिलता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, उपलब्ध दवाओं से हर व्यक्ति को मनचाहा नतीजा नहीं मिलता। कुछ लोगों को अतिरिक्त विकल्पों की जरूरत हो सकती है—या तो मौजूदा इलाज का असर पर्याप्त न होने के कारण, या फिर ऐसी बाधाओं के चलते जिनसे सुरक्षित स्तर तक पहुंचना मुश्किल हो। इसी वजह से वैज्ञानिक एलडीएल रिसेप्टरों की संख्या को प्रभावित करने वाले दूसरे रास्ते खोज रहे हैं, ताकि ध्यान सिर्फ पहले से पहचानी गई प्रक्रियाओं पर न रहे।
‘राल’ प्रोटीन से शुरू होती है प्रक्रिया
नेचर में प्रकाशित अध्ययन में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के स्कूल ऑफ मेडिसिन की टीम ने एक ऐसी प्रक्रिया की जांच की, जिसकी पहले पहचान नहीं हुई थी। इसके लिए चूहों और मानव कोशिकाओं पर प्रयोग किए गए। शोधकर्ताओं ने पाया कि खाने से मिलने वाले कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा ‘राल’ नाम के प्रोटीन को सक्रिय करती है। अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता एलन साल्टील हैं। वे स्कूल में मेडिसिन के प्रोफेसर और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो तथा लॉस एंजिल्स के साझा मधुमेह अनुसंधान केंद्र के निदेशक हैं।
साल्टील और उनकी टीम के लिए ‘राल’ प्रोटीन नया नहीं था; वे पहले वसा कोशिकाओं में इसका अध्ययन कर चुके थे। नए अध्ययन में इस प्रोटीन का संबंध ऐसी घटनाओं की कड़ी से सामने आया जो जिगर की एलडीएल से निपटने की क्षमता को प्रभावित करती है। नतीजों के अनुसार, ‘राल’ की गतिविधि बढ़ने पर उपलब्ध एलडीएल रिसेप्टरों की संख्या घटती है। इससे कोशिकाओं के लिए खून से कोलेस्ट्रॉल पकड़ना कठिन हो जाता है।
इस खोज का अहम विचार यह है कि खाने से मिलने वाला ज्यादा कोलेस्ट्रॉल सिर्फ शरीर में पहुंचने वाले कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नहीं बढ़ा सकता, बल्कि जिगर की कोशिकाओं में एलडीएल हटाने वाले औजारों को नियंत्रित करने के तरीके को भी बदल सकता है। समय के साथ यह प्रक्रिया उन रिसेप्टरों की संख्या घटा सकती है जिनकी जिगर को एलडीएल के कण पकड़ने के लिए जरूरत होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोलेस्ट्रॉल से भरपूर हर भोजन के तुरंत बाद शरीर में कोई साफ बदलाव दिखेगा। अध्ययन में प्रयोगों के दौरान देखी गई एक जैविक प्रक्रिया का वर्णन है; लोगों की सेहत के लिए इसका क्या मतलब है, यह जानने के लिए मानव परीक्षण जरूरी होंगे।
रिसेप्टर घटने में शामिल एंजाइम
‘राल’ से जुड़ी गतिविधियों का पीछा करते हुए शोधकर्ताओं ने इस प्रक्रिया में एक और घटक पहचाना—कैथेप्सिन ए नाम का एंजाइम, जिसे संक्षेप में सीटीएसए कहा जाता है। नतीजों से पता चला कि यह एंजाइम उस प्रक्रिया में योगदान देता है जिसके आखिर में एलडीएल रिसेप्टरों की संख्या कम हो जाती है। इससे सीटीएसए इलाज का एक संभावित लक्ष्य बन गया है। अगर इसकी गतिविधि रोकी जा सके, तो मुमकिन है कि रिसेप्टर ज्यादा समय तक बने रहें और जिगर की कोशिकाएं कोलेस्ट्रॉल हटाने की अपनी क्षमता का कुछ हिस्सा वापस पा लें।
वैज्ञानिकों ने इस संभावना को परखने के लिए एक छोटा रासायनिक यौगिक इस्तेमाल किया, जो सीटीएसए को रोकता है। चूहों में एंजाइम की गतिविधि रोकने के बाद एलडीएल रिसेप्टर ज्यादा स्थिर रहे और खून में घूम रहे एलडीएल का स्तर काफी घट गया। इस नतीजे से यह रास्ता महज एक सैद्धांतिक विचार नहीं रह जाता। इससे संकेत मिलता है कि इसकी किसी एक कड़ी पर असर डालने से प्रयोग में शामिल जानवरों में कोलेस्ट्रॉल हटने से जुड़े माप वास्तव में बदल सकते हैं।
फिर भी, चूहों में सफल प्रयोग को लोगों के लिए प्रभावी इलाज का सबूत नहीं समझना चाहिए। अध्ययन यह नहीं कहता कि इस दवा ने मरीजों का कोलेस्ट्रॉल घटाया है। न ही इसमें इस बात का कोई चिकित्सकीय प्रमाण है कि सीटीएसए को रोकना इस मकसद के लिए सुरक्षित और असरदार है। फिलहाल उपलब्ध नतीजे एक आशाजनक जैविक आधार और शुरुआती, यानी उपचार से पहले के प्रयोगों का संकेत देते हैं। वे आगे जांच के लायक हैं, लेकिन अभी इलाज की सलाह नहीं बनते।
मौजूदा दवाओं से अलग एक संभावित निशाना
इस खोज की अहमियत इसलिए भी है कि अध्ययन के मुताबिक ‘राल’ और सीटीएसए वाला रास्ता कोलेस्ट्रॉल घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले जाने-पहचाने इलाजों के काम करने के तरीकों से अलग है। जिन लोगों को मौजूदा दवाओं से पर्याप्त फायदा नहीं मिलता, उनके लिए यह अंतर खास मायने रख सकता है। सैद्धांतिक तौर पर इससे उसी तरीके को दोहराने के बजाय इलाज की एक अतिरिक्त रणनीति तलाशने का रास्ता खुलता है।
हालांकि, किसी लक्ष्य को नया पहचान लेने का यह अर्थ नहीं कि उसका इलाज तैयार हो चुका है। यह जान लेना कि कोई प्रक्रिया एलडीएल रिसेप्टर घटाने में शामिल है, अपने आप में सही खुराक, इलाज की अवधि या उन लोगों की पहचान नहीं बताता जिन्हें इससे फायदा हो सकता है। उपलब्ध नतीजे यह भी स्पष्ट नहीं करते कि सीटीएसए को रोकना अकेले उपयोगी होगा या किसी दूसरी दवा के साथ। इन सवालों के जवाब के लिए खास तौर पर तैयार किए गए परीक्षण चाहिए, जिनमें लोगों में असर की जांच के साथ संभावित दुष्प्रभावों पर भी नजर रखी जाए।
एक नई प्रक्रिया की खोज और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के हर मामले की वजह तय कर देने के बीच फर्क समझना भी जरूरी है। एलडीएल का स्तर कई तरह के कारकों से प्रभावित हो सकता है। यह अध्ययन उनमें से एक रास्ते पर ध्यान देता है—खाने से मिलने वाले कोलेस्ट्रॉल का जिगर की एलडीएल हटाने की क्षमता पर असर। इसलिए यह खोज कोलेस्ट्रॉल के नियमन की व्यापक समझ में एक नई कड़ी जोड़ सकती है, लेकिन पूरी कहानी को किसी एक प्रोटीन या एंजाइम तक सीमित नहीं करती।
पहले जांची गई दवा से कुछ रास्ता आसान हो सकता है
किसी जैविक लक्ष्य की खोज से उसके लिए उपयुक्त दवा तैयार करने तक आम तौर पर कई साल लगते हैं। शोधकर्ताओं को ऐसा यौगिक खोजना पड़ता है जो उस लक्ष्य पर असर करे, फिर बड़े स्तर पर जांच से पहले उसकी सुरक्षा और दूसरी विशेषताओं को परखना होता है। इस मामले में टीम के पास सावधानी से उम्मीद करने की एक वजह थी: सीटीएसए को रोकने वाली एक प्रयोगात्मक दवा पहले ही बनाई जा चुकी थी। उसे संभावित रूप से दिल की विफलता के इलाज के लिए विकसित किया जा रहा था, लेकिन रणनीतिक कारणों से उस कार्यक्रम को रोक दिया गया।
कार्यक्रम बंद होने से पहले यह दवा पहले चरण के चिकित्सकीय परीक्षण तक पहुंच गई थी। इस चरण का मुख्य उद्देश्य लोगों में दवा की सुरक्षा का आकलन करना होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, दवा सुरक्षा जांच में खरा उतरी थी। लोगों में पहले किए गए परीक्षणों की जानकारी होने से विकास के कुछ पहलुओं में शुरुआत से काम करने की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि दवा एलडीएल घटाती है या इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल के अनुकूल है।
टीम का मानना है कि इस यौगिक को कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के खिलाफ संभावित असर जांचने के लिए दूसरे चरण के परीक्षण तक ले जाया जा सकता है। दूसरे चरण का काम शुरुआती सुरक्षा जांच से अलग होता है: इसमें देखा जाता है कि इलाज मरीजों में असर दिखाता है या नहीं, साथ ही उसकी सुरक्षा पर निगरानी जारी रहती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह नहीं कहा गया है कि ऐसा परीक्षण शुरू हो चुका है। इसके शुरू होने का कोई अनुमानित समय भी नहीं दिया गया है।
किसी दूसरी बीमारी के इलाज के लिए किए गए पुराने परीक्षण में दवा का सुरक्षित रहना अपने आप यह गारंटी नहीं देता कि कोलेस्ट्रॉल घटाने में इसके फायदे और जोखिम का संतुलन भी ठीक होगा। नए परीक्षणों में खुराक, इलाज की अवधि या भाग लेने वाले लोगों की विशेषताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए आगे बढ़ने पर ऐसे चिकित्सकीय परीक्षण की रूपरेखा बनानी होगी जो असर, सहनशीलता और खुराक से जुड़े सवालों के जवाब दे। पुराने नतीजों को इन सवालों का अंतिम जवाब नहीं माना जा सकता।
क्या पता चला है और क्या अभी अनसुलझा है?
अध्ययन में पेश किए गए सबूत दो आपस में जुड़े हिस्सों से आते हैं। मानव कोशिकाओं और चूहों पर हुए प्रयोगों में खाने से मिलने वाले कोलेस्ट्रॉल, ‘राल’ और सीटीएसए की गतिविधि तथा एलडीएल रिसेप्टरों की स्थिति के बीच संबंध सामने आया। इसके बाद एंजाइम को रोकने वाले यौगिक को आजमाया गया। इससे चूहों में रिसेप्टर ज्यादा स्थिर रहे और एलडीएल का स्तर स्पष्ट रूप से घटा। यह शोधकर्ताओं को आगे जांच के लिए एक रास्ता देता है, लेकिन लोगों में इलाज की प्रभावशीलता का प्रमाण नहीं है।
अब यह जानना जरूरी है कि प्रयोगों में दिखा असर मरीजों में भी ऐसा सुधार ला सकता है या नहीं जिसे मापा जा सके। आगे के अध्ययनों को पता लगाना होगा कि किन लोगों को इससे फायदा हो सकता है, असर कितने समय तक बना रहता है और यह उपलब्ध इलाजों के मुकाबले कैसा है या उनके साथ किस तरह काम करता है। प्रकाशित सामग्री में प्रतिभागियों की संख्या या लोगों में कोलेस्ट्रॉल घटाने वाले परीक्षण के नतीजे नहीं दिए गए हैं, क्योंकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस मकसद के लिए दवा का अब तक परीक्षण नहीं हुआ है।
इस शोध में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो; कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को; सैन एंटोनियो स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र; और यूटा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो से शुए फेंग, शुओ झांग, यूची वांग, तुइशा कोरलागुंडा, एलिसा सिट, सात्सुगु साकानी, सी यंग पार्क, चोराइबोन विसेसावापाक, काइली गुयेन, जिमी यांग, हिमानी बोथोलु, कैथरीन दिन्ह, फेलिशिया झू, यूयाओ रेन, बिशेन झांग, पैट्रिक सीक्रिस्ट, झाओ-वेई होंग, प्रीति वीरगंधम, यूलिया स्कुरो-बोगात्को, तातियाना किसेलेवा और अमित आर. मजिथिया शामिल थे। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को से प्रिया जयशंकर, बोसु यांग और एडम रेंस्लो; टेक्सास विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र से लिनमिंग हान और पिंग झाओ; तथा यूटा विश्वविद्यालय से फिलिप एल. एस. एम. गॉर्ड्ट्स ने भी शोध में योगदान दिया।
इस शोध को नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ से P30DK063491, R01DK117551, R01DK128796 और R01DK135289 अनुदानों के जरिए आंशिक वित्तीय सहायता मिली। इसके अलावा, अमेरिकन डायबिटीज़ एसोसिएशन की 1-25-PDF-76 संख्या वाली पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप से भी मदद मिली। ये जानकारियां बताती हैं कि यह कई संस्थानों का साझा शोध था, लेकिन इससे मुख्य नतीजे की प्रकृति नहीं बदलती: यह रास्ता आशाजनक है, जबकि लोगों के लिए इलाज अभी जांच की संभावना भर है।
निष्कर्ष
नेचर में प्रकाशित अध्ययन यह संभावित वजह बताता है कि खाने से मिलने वाला कोलेस्ट्रॉल जिगर की एलडीएल हटाने की क्षमता को कैसे कमजोर कर सकता है। ‘राल’ प्रोटीन के सक्रिय होने का संबंध सीटीएसए एंजाइम वाले ऐसे रास्ते से मिला जो एलडीएल रिसेप्टरों की संख्या घटाने में शामिल है। प्रयोगों में एंजाइम रोकने पर रिसेप्टर ज्यादा स्थिर रहे और चूहों के खून में एलडीएल स्पष्ट रूप से कम हुआ। पहले चरण में सुरक्षा जांच से गुजर चुकी प्रयोगात्मक दवा अब असर की जांच के लिए आगे बढ़ने का संभावित आधार दे सकती है, लेकिन यह अभी लोगों में कोलेस्ट्रॉल घटाने का प्रमाण नहीं है। इसलिए यह खोज इलाज का एक नया रास्ता सुझाती है, तैयार इलाज नहीं। आगे के चिकित्सकीय परीक्षण ही बताएंगे कि यह जैविक रास्ता मरीजों के लिए सचमुच एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है या नहीं।