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रजोनिवृत्ति के दौरान खून के प्रोटीन में बदलाव: क्या ये दिमाग की सेहत के संकेत हैं?

आसान शब्दों में

एक अध्ययन में पाया गया कि रजोनिवृत्ति के आसपास खून में मौजूद कुछ प्रोटीनों का स्तर बदलता है। इन बदलावों का आगे चलकर सोचने-समझने की क्षमता में कमी और अल्ज़ाइमर से जुड़े डिमेंशिया की आशंका में मामूली बढ़ोतरी से संबंध पाया गया। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि रजोनिवृत्ति बीमारी का कारण है या हर महिला को यह बीमारी होगी।

खून में मौजूद प्रोटीन क्या बता सकते हैं?

प्रोटीन शरीर में कई तरह के काम करते हैं। इनमें से कुछ को खून में मापा जा सकता है और वे शरीर के ऊतकों में चल रही जैविक प्रक्रियाओं के संकेत दे सकते हैं। हालांकि, खून में ऐसा प्रोटीन मिलना जिसका संबंध दिमाग से हो, यह नहीं बताता कि दिमाग के भीतर ठीक-ठीक क्या चल रहा है। न ही इससे यह साबित होता है कि वही प्रोटीन बीमारी की वजह है।

फिर भी, कई प्रोटीनों के स्तर और उनमें दिखने वाले बदलावों को एक साथ देखने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि उम्र के किसी खास पड़ाव या शरीर की किसी जैविक अवस्था के दौरान क्या बदलाव हो रहे हैं। इसी सोच के साथ शोधकर्ताओं ने यह सवाल उठाया कि क्या अंडाशय की गतिविधि में कमी के साथ खून के प्रोटीनों में भी ऐसे बदलाव आते हैं जिन्हें मापा जा सके, और क्या उनका संबंध दिमाग की सेहत तथा उम्र बढ़ने से जुड़ी प्रक्रियाओं से है।

यह कई संस्थानों के शोधकर्ताओं का संयुक्त अध्ययन था, जो 2 नवंबर 2026 को नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित हुआ। काम का नेतृत्व कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैंटा बारबरा और कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ़्रांसिस्को के शोधकर्ताओं ने किया। इसमें टोरंटो के सनीब्रुक रिसर्च इंस्टीट्यूट और अन्य संस्थानों के शोधकर्ता भी शामिल थे। प्रमुख शोधकर्ताओं में सैंटा बारबरा की एमिली जैकब्स और सैन फ़्रांसिस्को के मेमोरी एंड एजिंग सेंटर की कैटलिन कासाटेलो थीं।

शुरुआती पड़ताल: अलग-अलग चरणों में 80 महिलाएँ

अध्ययन के पहले चरण में शोधकर्ताओं ने 80 महिलाओं के खून के सीरम के नमूनों की जाँच की। उनकी उम्र 43 से 58 वर्ष के बीच थी। तय मानकों STRAW+10 के आधार पर प्रतिभागियों को रजोनिवृत्ति से पहले के चरण, रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ने के चरण और रजोनिवृत्ति के बाद के चरण में बाँटा गया। इसके बाद NULISAseq नाम की आधुनिक प्रोटीन-जाँच तकनीक से कई तरह के प्रोटीनों का पता लगाया गया और अलग-अलग समूहों के नतीजों की तुलना की गई।

नतीजों से पता चला कि रजोनिवृत्ति से जुड़े बदलाव किसी एक ही जैविक प्रक्रिया तक सीमित नहीं थे। उनमें सूजन, तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क, शरीर में ऊर्जा और पोषक तत्वों के इस्तेमाल तथा अल्ज़ाइमर से जुड़ी प्रक्रियाओं के संकेत शामिल थे। शोधकर्ताओं ने 16 प्रोटीनों का ऐसा समूह भी पहचाना, जिनका स्तर रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ने के साथ बदला। इन प्रोटीनों का संबंध सूजन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को सँभालने, तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क बनाए रखने और तंत्रिका तंत्र की संरचनाओं की सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों से था।

इस अध्ययन में उम्र और हार्मोन से जुड़ी अवस्था के असर को अलग-अलग समझने की कोशिश भी की गई। जब शोधकर्ताओं ने महिलाओं की उम्र को ध्यान में रखा, तब प्रोटीनों में दिख रहे बदलावों का संबंध उनके हार्मोन के संकेतों और रजोनिवृत्ति के चरण से अधिक निकट लगा, न कि केवल उनकी उम्र से। इसका मतलब यह नहीं कि उम्र का दिमाग की सेहत पर असर नहीं पड़ता। बल्कि नतीजे संकेत देते हैं कि इस जीवन-चरण में होने वाली हर बात को केवल बीते वर्षों के आधार पर नहीं समझा जा सकता और हार्मोन में बदलाव के साथ शरीर में ऐसे जैविक परिवर्तन भी हो सकते हैं जिन्हें मापा जा सके।

बड़े समूह में नतीजों की दोबारा जाँच

पहले चरण में शामिल 80 महिलाओं की संख्या सीमित थी, इसलिए शोधकर्ताओं ने यह मानकर नहीं चला कि शुरुआती नतीजे सभी पर लागू होंगे। उन्होंने दूसरे, कहीं बड़े समूह के आँकड़ों में भी प्रोटीनों के स्तर में इसी तरह के बदलावों की जाँच की। इसके लिए यूके बायोबैंक में शामिल 2,814 महिलाओं की जानकारी देखी गई। उम्र में एक-दूसरे के करीब, लेकिन रजोनिवृत्ति के अलग-अलग चरणों में मौजूद महिलाओं की तुलना की गई। इस चरण में प्लाज़्मा के प्रोटीन Olink तकनीक से मापे गए, जो पहले समूह में इस्तेमाल तकनीक से अलग थी।

दूसरे समूह की जाँच ने इस बात का समर्थन किया कि रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ने के साथ प्रोटीनों में बदलाव आते हैं। इससे तस्वीर में सूजन के संकेतों और अपघटन से जुड़ी प्रक्रियाओं का पहलू भी जुड़ा। अपघटन उन प्रक्रियाओं को कहते हैं जिनमें कोशिकाओं या ऊतकों के कुछ हिस्से टूटते हैं। परिणामों में कोशिकाओं और अंगों की उम्र बढ़ने से जुड़े कुछ संकेतों के तेज होने से मेल खाते बदलाव भी दिखाई दिए। इस समग्र तस्वीर में दिमाग भी शामिल था।

अलग तकनीक और स्वतंत्र समूह में इसी तरह के संकेतों का दोबारा मिलना इस भरोसे को बढ़ाता है कि शुरुआती नतीजे केवल छोटे समूह में हुई संयोगवश बात नहीं थे। फिर भी, प्रोटीनों के स्तर में इन बदलावों को उम्र बढ़ने की तेज़ प्रक्रिया से जुड़ा कहना यह साबित नहीं करता कि रजोनिवृत्ति से गुजर रही हर महिला के अंग एक ही रफ़्तार से बूढ़े हो रहे हैं। न ही इससे यह पता चलता है कि प्रोटीनों में आया बदलाव सीधे ऊतकों को नुकसान पहुँचा रहा है। बात सिर्फ इतनी है कि उम्र बढ़ने से जुड़ी कई जैविक गतिविधियों के संकेत एक दिशा में बदले और इस संबंध को बेहतर ढंग से समझने के लिए और शोध की ज़रूरत है।

16 साल तक चली सोचने-समझने की क्षमता की पड़ताल

यह देखने के लिए कि प्रोटीनों के ये संकेत बाद के जीवन में होने वाली बातों से भी जुड़े हैं या केवल जाँच में दिखने वाला बदलाव हैं, शोधकर्ताओं ने बड़ी उम्र की महिलाओं के 4 स्वतंत्र समूहों के आँकड़ों का अध्ययन किया। इन समूहों में कुल 11,925 महिलाएँ थीं और उनकी औसत उम्र अलग-अलग समूहों में 60.7 से 72.1 वर्ष के बीच थी। शोधकर्ताओं ने रजोनिवृत्ति से जुड़े प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के अंकों की तुलना सोचने-समझने की क्षमता की जाँचों और डिमेंशिया से संबंधित जानकारी से की।

चारों समूहों में एक जैसा रुझान दिखा। प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के इस रूप में अधिक अंक पाने वाली महिलाओं का औसत प्रदर्शन सोचने-समझने की जाँचों में कमजोर था। सबसे बड़े समूह में, प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के इस रूप का अधिक होना 16 साल तक की अवधि में अल्ज़ाइमर से जुड़े डिमेंशिया का पता चलने की आशंका में मामूली बढ़ोतरी से भी जुड़ा था। यह बात कि ऐसा संबंध 4 स्वतंत्र समूहों में दिखाई दिया, आगे जाँचने लायक संकेत है। लेकिन इससे किसी एक महिला के भविष्य के बारे में पक्की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

यहाँ संबंध और कारण के बीच का फर्क समझना ज़रूरी है। अध्ययन में साथ-साथ दिखने वाले बदलाव मिले: रजोनिवृत्ति का चरण कुछ प्रोटीन बदलावों से जुड़ा था और उन बदलावों का आगे के समय में सोचने-समझने की क्षमता तथा डिमेंशिया के जोखिम से संबंध दिखाई दिया। लेकिन अध्ययन यह साबित नहीं करता कि हार्मोन में बदलाव ने ही उन प्रोटीनों को पैदा किया, या कि प्रोटीनों ने बीमारी को जन्म दिया। डिमेंशिया पर कई कारकों का असर पड़ता है। अधिकांश महिलाओं को अल्ज़ाइमर नहीं होता और इन नतीजों से यह तय नहीं किया जा सकता कि किसे यह बीमारी होगी।

मध्य आयु पर शोधकर्ताओं की नज़र क्यों है?

मध्य आयु के नतीजे इसलिए अहम हैं क्योंकि शरीर में मापे जा सकने वाले कुछ बदलाव याददाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में साफ़ कमी दिखने से कई साल पहले शुरू हो सकते हैं। यह जीवन-चरण शोधकर्ताओं को यह समझने का मौका दे सकता है कि जोखिम बढ़ाने वाली बातें और दिमाग को सहारा देने वाली परिस्थितियाँ कैसे बनती हैं। ऐसी परिस्थितियाँ दिमाग को अपने कामकाज बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। अध्ययन का संकेत है कि रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ने का दौर दिमाग की सेहत को समझने के लिए उपयोगी हो सकता है—इसलिए नहीं कि इससे बीमारी होना तय है, बल्कि इसलिए कि इस समय शरीर में ऐसे बदलाव होते हैं जिनका समय के साथ अध्ययन किया जा सकता है।

इस विषय में दिलचस्पी एक बड़े संदर्भ से भी जुड़ी है। अल्ज़ाइमर से पीड़ित लोगों में करीब दो-तिहाई महिलाएँ हैं और महिलाएँ अपने जीवन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रजोनिवृत्ति के बाद बिताती हैं। ये आँकड़े अपने आप में यह नहीं बताते कि महिलाओं और पुरुषों में बीमारी के अंतर की वजह क्या है। न ही ये साबित करते हैं कि इस अंतर के पीछे रजोनिवृत्ति ही है। लेकिन ये इस बात को रेखांकित करते हैं कि महिलाओं के दिमाग की सेहत को जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर समझना ज़रूरी है, खासकर मध्य आयु में, जब हार्मोन में बदलाव शुरू होते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में प्रोटीनों के स्तर में बदलाव का यह रूप ऐसे जैविक संकेतों या इलाज के संभावित लक्ष्यों की पहचान में मदद कर सकता है जिनकी जाँच करना उपयोगी हो। एक विचार यह भी है कि आगे चलकर खून की ऐसी जाँच विकसित की जाए जो जोखिम का अनुमान लगाने में मदद करे—कुछ वैसे ही जैसे दिल की बीमारियों के जोखिम को समझने के लिए कुछ प्रयोगशाला जाँचों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह अभी भविष्य के शोध से जुड़ी संभावना है। फिलहाल यह न तो इस्तेमाल के लिए तैयार जाँच है और न ही अल्ज़ाइमर का निदान करने का मान्य तरीका। इससे पहले यह समझना होगा कि कौन-से प्रोटीन सबसे उपयोगी हैं, उनकी जाँच कितनी सटीक है और क्या अलग-अलग तरह की आबादी में भी नतीजे दोहराए जा सकते हैं।

अध्ययन से क्या निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए?

इस अध्ययन के नतीजे यह नहीं कहते कि रजोनिवृत्ति से अल्ज़ाइमर होता है। न ही खून में किसी एक प्रोटीन का बढ़ा हुआ स्तर यह बताता है कि आगे चलकर डिमेंशिया ज़रूर होगा। अध्ययन यह भी साबित नहीं करता कि हार्मोन का स्तर बदलने या कोई खास इलाज लेने से बीमारी को रोका जा सकता है, क्योंकि इसमें बचाव के लिए किसी इलाज की जाँच नहीं हुई और न ही अलग-अलग उपचारों के असर की तुलना की गई।

यह अध्ययन किसी महिला को उसका निजी जोखिम बताने का तरीका भी नहीं देता। इसमें जो संकेत मिले, वे समूहों के स्तर पर थे; किसी एक व्यक्ति के लिए हर प्रोटीन बदलाव का मतलब अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए नतीजों को किसी व्यक्ति की बीमारी का पक्का संकेत मानना ठीक नहीं होगा।

कई सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। एक ही महिला में समय के साथ ये संकेत कैसे बदलते हैं? हार्मोन के उतार-चढ़ाव और उनसे जुड़े लक्षणों का कितना असर होता है, और सूजन या उम्र बढ़ने पर असर डालने वाले दूसरे कारक कितनी भूमिका निभाते हैं? क्या खून में दिखने वाले प्रोटीनों के स्तर में बदलाव का यह रूप दिमाग की सेहत के अलग-अलग रास्तों में फर्क बता सकता है, या यह पूरे शरीर में होने वाले सामान्य बदलावों का संकेत भर है? इन सवालों के जवाब के लिए लंबे समय तक महिलाओं का अध्ययन करना, बार-बार माप लेना और प्रोटीनों के नतीजों को तंत्रिका तंत्र के कामकाज से अधिक बारीकी से जोड़ना होगा।

इसी दिशा में सैंटा बारबरा और सैन फ़्रांसिस्को की टीमें मध्य आयु से आगे के जीवन तक महिलाओं का लंबे समय तक अध्ययन करने वाली एक राष्ट्रीय परियोजना शुरू करने पर काम कर रही हैं। इसमें समय के साथ हार्मोन, प्रोटीन, लक्षणों और तंत्रिका तंत्र में होने वाले बदलावों पर नज़र रखने की योजना है। इस तरह के अध्ययन से घटनाओं का क्रम बेहतर समझा जा सकेगा: कौन-सा बदलाव पहले दिखाई देता है, कौन-से बदलाव साथ-साथ होते हैं और आगे चलकर कौन-सी बातें बेहतर क्षमता बनाए रखने या अधिक जोखिम से जुड़ती हैं।

निष्कर्ष

अध्ययन में रजोनिवृत्ति की ओर बढ़ने और खून के प्रोटीनों में बदलाव के बीच संबंध मिला। ये प्रोटीन सूजन, तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज और उम्र बढ़ने से जुड़ी प्रक्रियाओं के संकेत देते हैं। शुरुआत में 43 से 58 वर्ष की 80 महिलाओं की जाँच की गई। इसके बाद 2,814 महिलाओं के समूह में नतीजों को परखा गया और फिर 11,925 महिलाओं वाले 4 समूहों में प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के अंकों की तुलना की गई। इन समूहों की औसत उम्र 60.7 से 72.1 वर्ष के बीच थी।

प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के इस रूप में अधिक अंक का संबंध सोचने-समझने की क्षमता के कमजोर औसत प्रदर्शन और 16 साल तक की निगरानी के दौरान अल्ज़ाइमर से जुड़े डिमेंशिया की आशंका में मामूली बढ़ोतरी से था। फिर भी, यह संबंध कारण साबित नहीं करता और न ही किसी महिला के बीमार होने की पक्की भविष्यवाणी करता है। इन नतीजों की अहमियत यह है कि वे मध्य आयु में महिलाओं के दिमाग की सेहत का अध्ययन करने का एक नया रास्ता सुझाते हैं। प्रोटीनों के स्तर में बदलाव के इस रूप को जाँच या इलाज संबंधी फैसलों में इस्तेमाल करने से पहले और शोध करना ज़रूरी है।