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वैज्ञानिक 80 हज़ार लोगों के खून के नमूनों में ऐसे प्रोटीन खोजेंगे, जिनका संबंध दिमाग़ की सेहत और अल्ज़ाइमर या पार्किंसन जैसी बीमारियों से हो सकता है। नई तकनीक बहुत कम मात्रा में मौजूद प्रोटीन भी पकड़ सकती है। इससे बीमारी शुरू होने से पहले शरीर में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है, लेकिन यह अभी कोई तैयार जाँच या बीमारी की पहचान का तरीका नहीं है।
शुरुआती संकेत खोजने की बड़ी पहल
इस शोध परियोजना का नाम «मध्य आयु में दिमाग़ की सेहत से जुड़े जोखिम और संकेत पहचानने के लिए प्रोटिओमिक्स» है। इसे UKB-PRISM नाम से जाना जाता है। Alamar Biosciences और Nightingale Health ने 2 नवंबर 2026 को इसकी घोषणा की। शोध में यूके बायोबैंक में सुरक्षित रखे गए प्रतिभागियों के नमूनों का इस्तेमाल होगा। यह बायोबैंक शोधकर्ताओं को बड़ी संख्या में लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों और नमूनों का अध्ययन करने का अवसर देता है।
Nightingale Health अपनी प्रयोगशालाओं में माप करने के लिए Alamar का NULISA मंच इस्तेमाल करेगी। लक्ष्य 80 हज़ार प्रतिभागियों के खून के नमूनों में मौजूद सैकड़ों प्रोटीनों को मापना है। शोध केवल किसी एक प्रोटीन पर केंद्रित नहीं है। बड़ी संख्या में प्रोटीनों का एक साथ अध्ययन करने से यह परखा जा सकता है कि क्या कुछ खास प्रोटीन-समूह या उनके मेल दिमाग़ की सेहत अथवा दिमाग़ी बीमारियों के जोखिम से जुड़े हैं।
परियोजना का काम 2027 के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है। इसे माइकल जे. फॉक्स फाउंडेशन फ़ॉर पार्किंसन रिसर्च, अल्ज़ाइमर्स रिसर्च यूके और LifeArc से आर्थिक सहायता मिल रही है। इन संस्थाओं की साझेदारी दिखाती है कि शरीर में मापे जा सकने वाले जैविक संकेतों को समझने में उनकी साझा रुचि है। ऐसे संकेतों से किसी स्वास्थ्य स्थिति या शरीर में हो रहे बदलाव के बारे में जानकारी मिल सकती है।
वैज्ञानिक खून में क्या खोज रहे हैं?
इस परियोजना की अहमियत इस संभावना से जुड़ी है कि अल्ज़ाइमर या पार्किंसन का पता चलने से बहुत पहले ही शरीर में कुछ जैविक बदलाव शुरू हो जाते हैं। अगर उनमें से कुछ बदलाव खून में पहचाने जा सकें, तो शोधकर्ता बीमारी के शुरुआती दौर में चल रही प्रक्रियाओं का अध्ययन कर पाएँगे। इससे उनकी समझ केवल उस समय तक सीमित नहीं रहेगी, जब लक्षण साफ़ दिखाई देने लगते हैं।
दिमाग़ शरीर के बाकी हिस्सों से पूरी तरह अलग-थलग नहीं है। प्रोटीन शरीर के ऊतकों में कई काम करते हैं—वे ऊतकों की मरम्मत में मदद करते हैं और सूजन को काबू में रखने में भी भूमिका निभाते हैं। फिर भी, यह समझ अभी सीमित है कि ये प्रोटीन मिलकर कैसे काम करते हैं और उनका दिमाग़ की सेहत से क्या रिश्ता है। इसलिए वैज्ञानिक सिर्फ़ यह नहीं देखेंगे कि किसी एक प्रोटीन की मात्रा बढ़ी है या घटी है। वे कई तरह के प्रोटीनों और उनके संभावित आपसी संबंधों की पड़ताल करेंगे।
इस तरह के शोध की ज़रूरत उन बीमारियों के बड़े असर से भी समझ आती है, जिन पर यह परियोजना ध्यान दे रही है। इसमें शामिल संस्थाओं के बताए आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में 55 मिलियन से ज़्यादा लोग अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया के अन्य रूपों के साथ जी रहे हैं। पार्किंसन से पीड़ित लोगों की संख्या 12 मिलियन से अधिक है। घोषणा में दिए गए अनुमान बताते हैं कि 2050 तक इन स्थितियों से प्रभावित लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ सकती है। ये आँकड़े बीमारी और उसके अलग-अलग चरणों को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश का महत्व बताते हैं, लेकिन इनका यह मतलब नहीं कि यह परियोजना बढ़ती संख्या को रोक देगी या कोई इलाज देगी।
NULISA कम मात्रा वाले प्रोटीन कैसे पकड़ता है?
NULISA नाम ऐसी तकनीक के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसमें एंटीबॉडी को डीएनए की छोटी कड़ियों से जोड़ा जाता है। एंटीबॉडी पहचानने वाले औज़ार की तरह काम करती हैं और नमूने में अपने लक्ष्य प्रोटीन से जुड़ती हैं। उनसे जुड़ी डीएनए की छोटी कड़ी बाद में इस पकड़ को ऐसी निशानी में बदलने में मदद करती है, जिसे पढ़ा जा सकता है।
लक्ष्य प्रोटीनों से एंटीबॉडी के जुड़ने के बाद नमूने को पहले पकड़ने और फिर अलग करने की प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है। इससे माप में बाधा डाल सकने वाले कुछ अनचाहे संकेत हटाने में मदद मिलती है। इसके बाद प्रोटीनों से जुड़ी निशानियों को अगली पीढ़ी की डीएनए अनुक्रमण तकनीक से पढ़ा जाता है। इस तरह यह मंच प्रोटीन को पहचानने के लिए शरीर की रोगों से लड़ने वाली प्रणाली पर आधारित तरीके और डीएनए अनुक्रम पढ़ने की विधि, दोनों का मेल करता है।
इस तकनीक की अधिक संवेदनशीलता इसलिए अहम है कि दिमाग़ और नसों के धीरे-धीरे खराब होने से जुड़े कुछ प्रोटीन खून में बेहद कम मात्रा में मिलते हैं। अगर जाँच का औज़ार इतनी कम मात्रा को अलग से पहचान न सके, तो संकेत छूट सकता है या दूसरे संकेतों के साथ गड्डमड्ड हो सकता है। इसके उलट, बहुत से नमूनों में सैकड़ों प्रोटीन मापने से वैज्ञानिक संभावित संकेतों की कहीं बड़ी सूची परख सकते हैं और बड़े आँकड़ा-समूह में उनके मेल की तुलना कर सकते हैं।
फिर भी, किसी प्रोटीन को पकड़ पाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह किसी खास बीमारी का भरोसेमंद संकेत है। माप को उसके पूरे संदर्भ में समझना ज़रूरी है। शोधकर्ताओं को यह भी जाँचना होगा कि सामने आए पैटर्न दोबारा दिखाई देते हैं या नहीं और उनका दिमाग़ की सेहत से सचमुच संबंध है या नहीं। इसलिए यह परियोजना शोध और जाँच के लिए सामग्री जुटाती है; यह हर प्रतिभागी के बारे में कोई पक्का चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं देती।
माप से बीमारी के जोखिम को समझने तक
Alamar की संस्थापक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और निदेशक मंडल की अध्यक्ष यूलिंग लू का मानना है कि हज़ारों लोगों में इन संकेतों को मापने की सुविधा से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि बीमारी से जुड़े बदलाव कब शुरू होते हैं और क्यों। इस सोच का खास पहलू लक्षण आने से पहले के समय पर ध्यान देना है। सवाल केवल यह नहीं है कि बीमारी की पहचान होने के बाद बीमारी की पहचान किन बातों से होती है, बल्कि यह भी है कि क्या नमूनों में ऐसे संकेत मौजूद हैं जो आगे चलकर जैविक बदलावों की शुरुआत समझने में मदद दें।
यूके बायोबैंक के उप मुख्य वैज्ञानिक एडम लेवांडोव्स्की ने बताया है कि प्रोटीन शरीर में कई तरह के काम करते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के साथ कैसे काम करते हैं और दिमाग़ पर उनका क्या असर पड़ता है, इस बारे में बहुत कुछ अब भी अज्ञात है। इससे साफ़ होता है कि प्रोटीनों को मापना केवल अलग-अलग रासायनिक पदार्थों की मात्रा की सूची बनाना नहीं है। बड़ा लक्ष्य उन अणुओं और उनके कामकाज के जाल की तस्वीर बनाना है, जिसका दिमाग़ की सेहत से संबंध हो सकता है।
माइकल जे. फॉक्स फाउंडेशन में उपचार-संबंधी शोध के लिए जैविक संकेतों की प्रमुख वैज्ञानिक सामंथा हॉटन को उम्मीद है कि ये आँकड़े संभावित जैविक संकेतों की जाँच और आगे के उपचार-संबंधी शोध को दिशा देने में मदद करेंगे। इसका अर्थ है कि नतीजे शोधकर्ताओं को यह चुनने में मदद दे सकते हैं कि किन संकेतों की और जाँच होनी चाहिए, या भविष्य के अध्ययनों में कौन से सवाल पूछे जाने चाहिए। इससे अपने आप यह साबित नहीं होगा कि कोई खास इलाज असरदार है।
डिमेंशिया के दुर्लभ रूपों की पहचान की संभावना
इन आँकड़ों में उन स्थितियों को समझने की संभावना भी है, जिनकी पहचान करना अक्सर आसान नहीं होता। LifeArc के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सैम बैरेल ने कहा है कि यह शोध-संसाधन डिमेंशिया के दुर्लभ रूपों की अधिक सटीक पहचान करने की दिशा में आधार तैयार करने में मदद कर सकता है। ऐसी स्थितियों की पहचान मुश्किल होने की एक वजह यह है कि उनके लक्षण दूसरी बीमारियों के लक्षणों से मिलते-जुलते हो सकते हैं। इस समानता के कारण उनमें अंतर करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
बड़ी संख्या में प्रोटीनों के माप से शोधकर्ता जाँच सकते हैं कि क्या अलग-अलग बीमारियों के साथ अलग तरह के प्रोटीन-पैटर्न दिखते हैं, या कुछ संकेत संभावित बीमारियों की पहचान में छँटाई करने में मददगार हो सकते हैं। लेकिन यह अभी शोध की एक संभावना है, पहले से तय नतीजा नहीं। घोषणा में यह नहीं कहा गया है कि अध्ययन से तुरंत अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली जाँच तैयार हो जाएगी। न ही यह दावा है कि मापे गए प्रोटीन अकेले किसी व्यक्ति में डिमेंशिया का प्रकार बता देंगे।
यहाँ तीन अलग चरणों का फर्क समझना ज़रूरी है। पहले किसी ऐसे संकेत की खोज होती है जिसे मापा जा सके। फिर यह जाँचना होता है कि उसका किसी स्वास्थ्य स्थिति से सचमुच संबंध है या नहीं। आखिर में यह साबित करना पड़ता है कि उस संकेत का इस्तेमाल करने से बीमारी की पहचान या इलाज से जुड़े फैसले बेहतर होते हैं। UKB-PRISM का मुख्य काम बड़ा आँकड़ा-समूह तैयार करना और प्रोटीनों को मापना है। इससे आगे की जाँच को सहारा मिल सकता है, लेकिन शोध के नतीजों को चिकित्सा में इस्तेमाल करने के लिए और सबूत चाहिए।
विश्लेषण पूरा होने के बाद भी उपयोगी रहेंगे आँकड़े
परियोजना पूरी होने पर उसके नतीजे केवल इसी शोध दल तक सीमित नहीं रहेंगे। योजना है कि पूरा आँकड़ा-समूह दुनिया भर के मान्यता प्राप्त शोधकर्ताओं को यूके बायोबैंक के शोध-विश्लेषण मंच के ज़रिए उपलब्ध कराया जाए। इसका मतलब है कि दूसरे वैज्ञानिक भी तय पहुँच-नियमों के तहत इन आँकड़ों का अध्ययन कर सकेंगे और ऐसे सवाल पूछ पाएँगे जो शुरुआती विश्लेषणों तक सीमित न हों।
80 हज़ार नमूनों में सैकड़ों प्रोटीनों के माप वाला आँकड़ा-समूह कई तरह की तुलनाएँ संभव कर सकता है। इससे अलग-अलग शोध दल प्रोटीनों और दिमाग़ की सेहत के बीच अलग संबंधों की जाँच कर सकेंगे। मान्यता प्राप्त शोधकर्ताओं को यह संसाधन उपलब्ध होने से वे नतीजों का नए सिरे से विश्लेषण कर पाएँगे और नए पैटर्न खोज सकेंगे। इस तरह समझ किसी एक रिपोर्ट या एक शोध-सवाल पर ही निर्भर नहीं रहेगी।
लेकिन नमूनों की बड़ी संख्या को इस बात की गारंटी नहीं मानना चाहिए कि कोई निर्णायक संकेत ज़रूर मिल जाएगा। बड़ा आँकड़ा-समूह खोज का दायरा बढ़ाता है, पर किसी नतीजे की अहमियत माप की गुणवत्ता, आँकड़ों में दिखने वाले संबंध की मजबूती और उस नतीजे की पुष्टि हो पाने पर निर्भर करती है। इसी तरह, किसी प्रोटीन में बदलाव दिखने से यह साबित नहीं होता कि उसी बदलाव ने बीमारी पैदा की। वह बीमारी से जुड़ा हो सकता है या शरीर में चल रहे किसी दूसरे बदलाव का संकेत हो सकता है, जिसकी आगे जाँच करनी होगी।
अभी क्या उम्मीद की जा सकती है?
फिलहाल इस परियोजना का सबसे अहम काम यह परखना है कि क्या बहुत संवेदनशील तकनीक से बड़ी संख्या में खून के नमूनों में कई तरह के प्रोटीन मापे जा सकते हैं। इसके बाद तैयार होने वाला संसाधन दिमाग़ की सेहत से जुड़े संकेतों का अध्ययन करने में काम आ सकता है। इससे अल्ज़ाइमर, पार्किंसन और डिमेंशिया के दूसरे रूपों पर आगे किन सवालों की जाँच होनी चाहिए, यह तय करने में मदद मिल सकती है—खासकर लक्षण दिखने से पहले के समय को लेकर।
लेकिन प्रयोगशाला में मिले किसी संकेत से अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली जाँच तक पहुँचने का रास्ता लंबा है। शोधकर्ताओं को यह पता करना होगा कि संकेत किसी बीमारी को दूसरी स्थितियों से अलग पहचानता है या नहीं, अलग-अलग लोगों की जाँच में उसका अर्थ उपयोगी रहता है या नहीं, और क्या उससे बीमारी की पहचान की सटीकता सचमुच बढ़ती है। घोषणा में न तो माप के नतीजे दिए गए हैं और न ही किसी ऐसे संकेत का ज़िक्र है जिसकी उपयोगिता साबित हो चुकी हो। अध्ययन अभी पूरा नहीं हुआ है और इसे 2027 के अंत तक पूरा करने की उम्मीद है।
इसलिए इस पहल की अहमियत किसी तैयार शुरुआती जाँच की घोषणा में नहीं, बल्कि शोध के लिए एक बड़ा आधार तैयार करने में है। अगर विश्लेषण से पता चला कि कुछ प्रोटीन या उनके समूह खास ध्यान देने लायक हैं, तो आगे के अध्ययनों में उनकी पुष्टि की जा सकती है। वे नतीजे बीमारी के कामकाज या जैविक संकेतों पर होने वाले शोध को दिशा दे सकते हैं। इन संभावनाओं का असली महत्व आँकड़ों से सामने आने वाली जानकारी और बाद के अध्ययनों में उसकी पुष्टि से तय होगा।
निष्कर्ष
UKB-PRISM परियोजना में 80 हज़ार खून के नमूनों को NULISA मंच से जाँचा जाएगा, ताकि बहुत कम मात्रा में मौजूद ऐसे प्रोटीनों का पता लगाया जा सके जिनका संबंध दिमाग़ की सेहत और दिमाग़ तथा नसों के धीरे-धीरे खराब होने से हो सकता है। Nightingale Health, Alamar की तकनीक से माप करने का काम करेगी और तीन संस्थाएँ इस काम को आर्थिक सहायता दे रही हैं। परियोजना 2027 के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है, जिसके बाद मान्यता प्राप्त शोधकर्ताओं को आँकड़े उपलब्ध कराए जाएँगे। यह संसाधन जैविक संकेतों की जाँच और आगे के शोध को दिशा देने में उपयोगी हो सकता है, लेकिन अभी अल्ज़ाइमर या पार्किंसन का पहले से पता लगाने वाली कोई पक्की जाँच नहीं है। इसकी असली उपयोगिता आगे मिलने वाले नतीजों और उनकी स्वतंत्र पुष्टि पर निर्भर करेगी।