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सहारा की धूल अमेज़न तक: हवा के साथ जंगल तक पहुँचने वाला अदृश्य पोषण

आसान शब्दों में

उत्तरी अफ्रीका से उड़ने वाली धूल अटलांटिक महासागर पार करके दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों और अमेज़न तक पहुँचती है। इस धूल में फॉस्फोरस भी होता है, जो पौधों के लिए ज़रूरी है। वैज्ञानिकों के अलग-अलग तरीकों से किए गए हिसाब बताते हैं कि कितनी धूल पहुँचती है, इस बारे में अभी पूरी सहमति नहीं है; जंगल के भीतरी हिस्सों में इसकी मात्रा जानने के लिए और माप की ज़रूरत है।

पूरी धूल गिने बिना उसका अंदाज़ा कैसे लगाया जाता है

अमेज़न के पूरे क्षेत्र में गिरने वाली धूल के हर कण को इकट्ठा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए वैज्ञानिक उपग्रहों से मिले आँकड़ों, हवा की जाँच करने वाले ज़मीनी केंद्रों और कंप्यूटर मॉडलों को मिलाकर अनुमान लगाते हैं। इन तरीकों से कहानी के अलग-अलग हिस्से सामने आते हैं: उपग्रह हवा में धूल की परतों को देखते हैं, ज़मीन पर लगे फ़िल्टर बताते हैं कि किसी खास जगह तक वास्तव में क्या पहुँचा, और मॉडल इन जानकारियों के आधार पर बड़े इलाके में धूल के जमाव का हिसाब लगाते हैं।

होंगबिन यू और उनके साथियों के नेतृत्व में हुए एक अध्ययन में 2007–2013 के दौरान कैलिप्सो (CALIPSO) उपग्रह पर लगे लाइडार उपकरण के आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया। यह उपकरण वायुमंडल की ओर प्रकाश की छोटी-छोटी किरणें भेजता है और फिर लौटने वाले प्रकाश का विश्लेषण करके धूल की परतों की मौजूदगी और उनकी ऊँचाई का पता लगाता है। शोधकर्ताओं ने उपग्रह से मिले अवलोकनों को हवा की गति और दिशा से जुड़ी जानकारी के साथ जोड़कर अनुमान लगाया कि कितनी धूल उस क्षेत्र में दाखिल हुई और कितनी वहाँ से बाहर गई। दोनों के बीच के अंतर को उन्होंने जमा हुई धूल की मात्रा माना।

शोध दल का अनुमान था कि हर साल करीब 182 मिलियन टन धूल अफ्रीका के पश्चिमी तट को पार करती है और अमेज़न के ऊपर जमने वाली धूल अपने साथ लगभग 22 हज़ार टन फॉस्फोरस लाती है। लेकिन पूरे अमेज़न क्षेत्र में सालाना जमा होने वाली धूल का औसत अनुमान 27.7 मिलियन टन था, जबकि इसकी अनिश्चितता की सीमा 8 से 48 मिलियन टन तक फैली हुई थी। इसका मतलब है कि 27.7 मिलियन टन कोई सीधा और बिल्कुल सटीक माप नहीं था; यह एक बीच का अनुमान था, जिसके आसपास असल मात्रा इससे काफी कम या अधिक हो सकती थी।

यू और उनके साथियों के नतीजे 2015 में “भूभौतिकीय शोध पत्र” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुए। इसी दल के एक अन्य अध्ययन ने “पर्यावरण के दूरसंवेदी अध्ययन” नाम की पत्रिका में कैलिप्सो के सात साल के रिकॉर्ड के आधार पर अटलांटिक पार धूल के परिवहन को मापा। अध्ययन में शामिल अलग-अलग वर्षों में धूल की मात्रा बदलती रही। फिर भी, सात साल का रिकॉर्ड यह तय करने के लिए काफी लंबा नहीं था कि कई दशकों में धूल का जमाव लगातार बढ़ा है या घटा है।

कायेन के फ़िल्टरों से बदला धूल का अनुमान

एक अलग तरह की जाँच दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित फ्रेंच गयाना की राजधानी कायेन में हुई। वहाँ स्थानीय वायु गुणवत्ता संस्था एटीएमओ गयाने (ATMO Guyane) ने 2002 और 2017 के बीच हवा में मौजूद कणों पर नज़र रखी। 2014 में एक ऊँचे, पेड़ों से घिरे स्थान पर फ़िल्टरों का इस्तेमाल शुरू किया गया, ताकि हवा में मौजूद महीन कणों को जमा किया जा सके। एक ही फ़िल्टर में अटलांटिक से आई समुद्री नमक की बूँदें और अफ्रीका से महासागर पार करके आए खनिज धूल के कण—दोनों हो सकते थे। इसलिए सहारा की धूल का सही हिसाब लगाने से पहले शोधकर्ताओं को फ़िल्टर में मौजूद अलग-अलग चीज़ों को अलग करना पड़ा।

मियामी विश्वविद्यालय के जोसेफ़ प्रोस्पेरो और उनके साथियों ने इस्तेमाल किए जा चुके फ़िल्टरों को धोकर उनमें से नमक हटाया। फिर उन्होंने बची हुई सामग्री को गर्म करके खनिज धूल को अलग किया। इन नमूनों से वैज्ञानिक जाँच सकते थे कि मॉडल का अनुमान हवा में वास्तव में मिली धूल से कितना मेल खाता है। दल ने नासा के मेर्रा-2 (MERRA-2) मॉडल का इस्तेमाल किया और पाया कि मौसम के साथ माप में होने वाले बदलावों को मॉडल ने लगभग उसी तरह दिखाया, जैसा कायेन में देखा गया था।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने मॉडल की मदद से अमेज़न के बहुत बड़े इलाके में जमने वाली धूल का अनुमान लगाया। अध्ययन के दायरे में सबसे दक्षिण में स्थित इलाके को भी शामिल करने पर कुल मात्रा 10.4 मिलियन टन सालाना निकली। लेकिन शोधकर्ताओं को पूरा भरोसा नहीं था कि उस इलाके में मिले सभी कण अफ्रीका से ही आए थे। उस हिस्से को हिसाब से निकाल देने पर कुल मात्रा घटकर 8 मिलियन टन रह गई। इसीलिए नतीजे को किसी एक पक्के आँकड़े के बजाय आम तौर पर 8 से 10 मिलियन टन की सीमा के रूप में बताया जाता है।

प्रोस्पेरो और उनके दल का अध्ययन 2020 में “वैश्विक जैव-भू-रासायनिक चक्र” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ। उनका अनुमान उपग्रह से निकले औसत अनुमान से काफी कम था, लेकिन 2015 के अध्ययन में बताई गई अनिश्चितता की सीमा के भीतर ही आता था। इस अंतर को समझना ज़रूरी है: दोनों आँकड़ों में फर्क होने का यह मतलब नहीं कि समय के साथ धूल की मात्रा ज़रूर बदल गई। अलग-अलग अध्ययन अलग वर्षों और इलाकों को देखते हैं, और उनके हिसाब लगाने के तरीके भी अलग हो सकते हैं। यह भी फर्क पड़ता है कि किसी अध्ययन में अमेज़न तक पहुँची धूल किसे माना गया है।

रोशनी के संकेत से धूल का वज़न ज़्यादा क्यों लग सकता है

जैस्पर कूक और उनके साथियों ने 2021 में कुछ अनुमानों के बीच के अंतर की एक और वजह सुझाई। अपेक्षाकृत बड़े कण अटलांटिक पार करते समय जल्दी नीचे गिर जाते हैं, जबकि बहुत महीन कण हवा में अधिक देर तक टिके रहते हैं और आगे का सफ़र जारी रखते हैं। एक टन महीन धूल बड़े कणों की इतनी ही मात्रा के मुकाबले अधिक रोशनी रोक सकती है। कुछ उपग्रह-आधारित हिसाबों में इस अंतर को ठीक से ध्यान में नहीं रखा गया था। इसलिए रोशनी से मिलने वाला संकेत यह आभास दे सकता है कि हवा में असल से कहीं अधिक धूल है।

कूक के दल ने 2004–2008 के दौरान वर्षावन पर सालाना करीब 8.5 मिलियन टन धूल जमने का अनुमान लगाया। लेकिन उनके अध्ययन में हर स्रोत से आई धूल शामिल थी, सिर्फ अफ्रीका से आई धूल नहीं। यह शोध “वायुमंडलीय रसायन और भौतिकी” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इसलिए इस आँकड़े की दूसरे अनुमानों से सीधी तुलना करना ठीक नहीं होगा, जब तक यह न देखा जाए कि दोनों में किन स्रोतों, किन वर्षों और कितने बड़े इलाके को शामिल किया गया है।

2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में शिरोंग वांग और उनके साथियों ने महाद्वीप के भीतर तक पहुँचकर जाँच की। उन्होंने अपने मॉडल को कायेन और ब्राज़ील के मानाउस के पास स्थित अमेज़न टॉल टावर वेधशाला में हवा के माप से परखा। उनके अनुमान के मुताबिक, 2013–2017 के दौरान हर साल लगभग 10 मिलियन टन अफ्रीकी धूल जमा हुई, जिसमें 1.7 मिलियन टन की अनिश्चितता थी—यानी मात्रा इससे 1.7 मिलियन टन कम या ज़्यादा हो सकती थी। उनके हिसाब से इस धूल के साथ करीब 8500 टन फॉस्फोरस हर साल पहुँचा। ये नतीजे “वायुमंडलीय रसायन और भौतिकी” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुए।

मौसम और धूल का स्रोत तय करते हैं उसका रास्ता

दक्षिण अमेरिका तक धूल साल भर एक जैसी मात्रा में नहीं पहुँचती। प्रोस्पेरो के मॉडल के मुताबिक, कायेन के पास जमा हुई धूल का 89% हिस्सा फरवरी से मई के बीच पहुँचा। इस दौरान बारिश हवा में मौजूद कणों को नीचे लाकर ज़मीन पर जमा करने में मदद करती है। उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों में उष्णकटिबंधीय बारिश का क्षेत्र उत्तर की ओर खिसक जाता है। तब धूल के कुछ बादलों के रास्ते कैरेबियाई क्षेत्र और दक्षिणी अमेरिका के अधिक पास हो जाते हैं।

मॉडल के नतीजे बताते हैं कि धूल का सबसे अधिक जमाव दक्षिण अमेरिका के उत्तर और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में होता है, जबकि मध्य अमेज़न के कुछ इलाकों तक इसकी मात्रा काफी कम पहुँचती है। इसलिए पूरे अमेज़न में जमा धूल का कुल आँकड़ा यह नहीं बताता कि किसी एक जंगल या मिट्टी तक कितनी धूल पहुँची। बारिश कहाँ होती है, धूल का बादल कितनी ऊँचाई पर है और हवा किस दिशा में बह रही है—ये सभी बातें तय करती हैं कि कण आखिर कहाँ गिरेंगे।

उत्तरी अफ्रीका भी धूल का कोई एक जैसा स्रोत नहीं है। 2020 के एक अध्ययन ने रेगिस्तानी इलाकों की तुलना की और पाया कि मॉरिटानिया तथा माली में फैले एल-रक़ीब क्षेत्र की धूल के अमेज़न तक पहुँचने का रास्ता चाड के बोडेले अवसाद की धूल के मुकाबले अधिक अनुकूल है। सर्दियों के अलग-अलग मौसमों में धूल कहाँ से आई थी, इसका संकेत भी बदलता रहा। कायेन में इकट्ठे किए गए कणों के रासायनिक विश्लेषण से पता चला कि 2014 की सर्दियों में धूल का बड़ा हिस्सा उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका से आया था, जबकि 2016 की सर्दियों में उसका संबंध मध्य उत्तरी अफ्रीका के इलाकों से था। अलग-अलग वर्षों में हुए बदलाव पर यह अध्ययन 2022 में “भूभौतिकीय शोध पत्र” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

फॉस्फोरस: थोड़ी-सी मात्रा, पर असर की संभावना

धूल की अहमियत सिर्फ इस बात में नहीं है कि वह खनिज कण लाती है। उसमें फॉस्फोरस भी होता है, जो पौधों के लिए ज़रूरी तत्व है। अमेज़न की मिट्टी में कई पोषक तत्व कम हैं, इसलिए फॉस्फोरस का पहुँचना मायने रखता है। जंगल में पत्तियाँ सड़कर मिट्टी में फॉस्फोरस का कुछ हिस्सा वापस पहुँचा देती हैं, जिसे जड़ें फिर सोख सकती हैं। लेकिन बारिश कुछ फॉस्फोरस को नालों और नदियों तक बहा ले जाती है, और वह जंगल के स्थानीय चक्र से बाहर निकल जाता है। यू के दल का अनुमान था कि अफ्रीकी धूल से आने वाला फॉस्फोरस लगभग उतना ही है, जितना फॉस्फोरस अमेज़न क्षेत्र से इस तरह बहकर निकल जाता है।

फिर भी, इस तुलना का यह अर्थ नहीं है कि जंगल में फॉस्फोरस की पूरी व्यवस्था को धूल ही समझाती है या धूल में मौजूद सारा फॉस्फोरस पेड़ों की जड़ों तक पहुँचता है। इसकी आपूर्ति में दूसरे स्रोत भी शामिल हैं। एरन बार्कले और उनके साथियों के एक अध्ययन में पाया गया कि दक्षिण अफ्रीका में वनस्पति में लगी आग भी फॉस्फोरस को कायेन तक पहुँचा सकती है। उसमें से कुछ फॉस्फोरस पानी में आसानी से घुलने वाले रूप में होता है। ये नतीजे 2019 में “राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की कार्यवाही” नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुए।

मानाउस के उत्तर में पुराने, प्राकृतिक जंगल में किए गए एक मैदानी प्रयोग से संकेत मिलता है कि फॉस्फोरस बढ़ने पर वहाँ के पौधों की बढ़त प्रभावित हो सकती है। शोधकर्ताओं ने प्रयोग के लिए चुने गए कुछ हिस्सों की मिट्टी में फॉस्फोरस मिलाया। दो साल बाद, इन हिस्सों में बहुत महीन जड़ों का उत्पादन उन हिस्सों से 29% अधिक था, जहाँ फॉस्फोरस नहीं डाला गया था। लेकिन इस प्रयोग ने सिर्फ फॉस्फोरस डालने के असर की जाँच की थी। इससे यह पता नहीं चला कि उस जगह तक रेगिस्तानी धूल से कितना फॉस्फोरस पहुँचा या पेड़ों ने उसमें से कितना सोखा।

इसी वजह से प्रोस्पेरो और उनके साथियों ने जंगल के भीतर और अधिक माप लेने की ज़रूरत बताई है। इन मापों में हवा में मौजूद कणों और बारिश के पानी की जाँच भी शामिल होनी चाहिए। तट के पास लिए गए नमूने उपयोगी हैं, लेकिन वे अकेले यह नहीं बता सकते कि तट से दूर जंगल में क्या हो रहा है। अमेज़न के भीतरी इलाकों में सीधे माप लेने से अफ्रीकी धूल और फॉस्फोरस के दूसरे स्रोतों को अलग पहचानने में मदद मिलेगी। इससे यह भी समझा जा सकेगा कि एक जगह से दूसरी जगह और एक मौसम से दूसरे मौसम के बीच धूल का जमाव कैसे बदलता है।

निष्कर्ष

उपग्रहों और ज़मीनी मापों से मिले सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि उत्तरी अफ्रीका की धूल अटलांटिक पार करके दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों तक पहुँचती है और अपने साथ फॉस्फोरस लाती है। लेकिन यह मात्रा कितनी है, इसका जवाब मापने के तरीके और अध्ययन में शामिल इलाके पर निर्भर करता है। 2015 के कैलिप्सो अध्ययन ने सालाना 27.7 मिलियन टन का बीच का अनुमान दिया था, जिसकी सीमा 8 से 48 मिलियन टन तक थी। वहीं, कायेन के माप से जाँचे गए मॉडलों ने अफ्रीकी धूल के जमाव का अनुमान 8–10 मिलियन टन रखा। वांग के 2023 के अध्ययन में 2013–2017 के लिए 10 ± 1.7 मिलियन टन का इससे मिलता-जुलता अनुमान आया। धूल कहाँ गिरती है, यह उसके स्रोत, मौसम और बारिश के रास्ते पर निर्भर करता है। अलग-अलग सालों और तरीकों के आँकड़ों की तुलना भर से यह साबित नहीं होता कि लंबे समय में धूल कम हो रही है। अमेज़न के भीतर हवा और बारिश का माप लेना अब भी ज़रूरी है, ताकि पता चल सके कि इस हवा के साथ आने वाले पोषक तत्वों का कितना हिस्सा जंगल के दूरस्थ इलाकों तक पहुँचता है।