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बिना तेज़ गर्मी के बनी जेल: क्या इससे ज़्यादा दमदार लिथियम बैटरियाँ मिलेंगी?

आसान शब्दों में

शोधकर्ताओं ने बैटरी के अंदर मौजूद तरल को कमरे के तापमान पर ही जेल में बदलने का तरीका खोजा है। इससे बैटरी बनाते समय तेज़ गर्मी से होने वाला नुकसान कम हो सकता है। बड़े नमूने में भी अच्छी ऊर्जा क्षमता दिखी, लेकिन ठंड में इसका प्रदर्शन बेहतर करना अभी बाकी है।

बैटरी बनाने की प्रक्रिया को आसान बनाने की ज़रूरत क्यों?

लिथियम-आयन पर चलने वाली आम बैटरियाँ अब उस सीमा के करीब पहुँच रही हैं जहाँ उनकी ऊर्जा जमा करने की क्षमता को और बढ़ाना व्यावहारिक रूप से कठिन होता जा रहा है। इनके भीतर मौजूद तरल को लेकर भी चिंता रहती है, क्योंकि वह रिस सकता है और आग पकड़ सकता है। दूसरी ओर, अर्धठोस इलेक्ट्रोलाइट वाली लिथियम धातु बैटरियाँ अधिक ऊर्जा और बेहतर सुरक्षा का आकर्षक रास्ता दिखाती हैं। मगर इनके निर्माण में एक बारीक मुश्किल आती है: शुरुआती तरल को बैटरी के भीतर एकसमान जेल में कैसे बदला जाए, जबकि इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए दी गई गर्मी इलेक्ट्रोड को नुकसान न पहुँचाए?

लिथियम धातु बैटरियों की खासियत उनके एनोड की बहुत ऊँची सैद्धांतिक क्षमता है। यह क्षमता 3860 मिलीएम्पियर-घंटा प्रति ग्राम तक पहुँचती है। इनके साथ 250 मिलीएम्पियर-घंटा प्रति ग्राम से अधिक क्षमता वाले, लिथियम और मैंगनीज़ से भरपूर कैथोड भी लगाए जा सकते हैं। इन खूबियों को एक ही सेल में जोड़ने पर पारंपरिक लिथियम बैटरियों से अधिक ऊर्जा जमा करने की संभावना बनती है। पारंपरिक तकनीक की व्यावहारिक ऊर्जा घनत्व करीब 300 वॉट-घंटा प्रति किलोग्राम तक पहुँच रही है।

हालाँकि, केवल ऊँचे आँकड़े किसी बैटरी को सफल नहीं बना देते। लिथियम धातु और इलेक्ट्रोलाइट के बीच स्थिर और एकसमान परतें बनना ज़रूरी है। इलेक्ट्रोलाइट वह माध्यम है जो दोनों इलेक्ट्रोडों के बीच आयन पहुँचाता है। परतें अगर टेढ़ी-मेढ़ी या असमान बनें, तो इलेक्ट्रोड खराब हो सकते हैं या सेल को बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज करने पर वह अपनी क्षमता खो सकता है। इसी वजह से शोधकर्ता सेल के भीतर ही इलेक्ट्रोलाइट तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू की जाती है, जो तरल मिश्रण को अर्धठोस जेल में बदल देती है और उसे बैटरी की अंदरूनी सतहों के संपर्क में लाती है।

पहले इस्तेमाल होने वाले एक तरीके में सामग्री को 60 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर गर्म किया जाता था। इसमें एआईबीएन नाम का रासायनिक पदार्थ प्रतिक्रिया शुरू करने में मदद करता है। गर्मी से प्रतिक्रिया तेज़ हो जाती है, लेकिन जेल अचानक जम सकता है और इस दौरान गर्मी तथा गैस इकट्ठा होने की आशंका बढ़ती है। इससे एनोड और कैथोड पर असमान परतें बन सकती हैं और इलेक्ट्रोड की सामग्री खराब हो सकती है। चुनौती यह है कि प्रतिक्रिया शुरू करने के लिए पर्याप्त गर्मी मिले, पर इतनी नहीं कि वही संरचना बिगड़ जाए जिसकी रक्षा इलेक्ट्रोलाइट को करनी है।

भट्ठी की तेज़ गर्मी के बिना प्रतिक्रिया शुरू करना

शोधकर्ताओं ने 20 जुलाई 2026 को ईसाइंस पत्रिका में ऑनलाइन प्रकाशित अध्ययन में कमरे के तापमान पर काम करने वाली एक नई विधि पेश की। चीन के थियानजिन में नानकाई विश्वविद्यालय और हाईहे टिकाऊ रासायनिक रूपांतरण प्रयोगशाला की टीम ने मुक्त-मूलक बहुलकीकरण को आसान बनाने का तरीका अपनाया। उनका उद्देश्य बैटरी के सारे घटक बदलना नहीं था। इसके बजाय, उन्होंने मोनोमर अणुओं में प्रतिक्रिया शुरू करना आसान बनाया, ताकि ऊँचे तापमान पर निर्भर हुए बिना जेल वहीं बन सके जहाँ उसकी ज़रूरत है।

टीम ने पेंटा एरिथ्रिटॉल टेट्रा एक्रिलेट नाम का एक एक्रिलेट यौगिक चुना, जिसे संक्षेप में पीईटीईए कहा जाता है। यही मोनोमर आपस में जुड़कर बहुलक का जाल बनाते हैं। बहुलकीकरण शुरू करने के लिए शोधकर्ताओं ने एआईबीएन का इस्तेमाल किया और उसमें टीपीएफपीबी नाम का सक्रियक मिलाया। इस सक्रियक की एक अहम विशेषता उसका अधिकतम इलेक्ट्रोस्टैटिक सतही विभव, यानी ईएसपीमैक्स, ऊँचा होना है। यह गुण बताता है कि अणु की सतह पर आवेश किस तरह फैला है और वह दूसरे अणुओं के साथ कैसे प्रतिक्रिया कर सकता है।

टीम की रासायनिक व्याख्या के अनुसार, टीपीएफपीबी पीईटीईए के कार्बोनिल समूह से जुड़ता है। इस जुड़ाव से मोनोमर के भीतर इलेक्ट्रॉनों का बँटवारा बदल जाता है और दो कार्बन परमाणुओं के बीच मौजूद दोहरा बंध प्रतिक्रिया में हिस्सा लेने के लिए अधिक तैयार हो जाता है। सरल शब्दों में कहें तो सक्रियक प्रतिक्रिया के लिए सही जगह तैयार कर देता है, इसलिए बहुलक की श्रृंखलाएँ बनने की शुरुआत के लिए तेज़ गर्मी की बड़ी मात्रा नहीं चाहिए। यहाँ मकसद सिर्फ किसी बर्तन में जेल बनाना नहीं, बल्कि बैटरी के घटकों के बीच मौजूद बारीक छिद्रों और खाली जगहों में उसे तैयार करना है।

कई तरह के मापों से इस व्याख्या को समर्थन मिला। बोरॉन-11 के नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद विश्लेषण में, घटकों के साथ प्रतिक्रिया के बाद बोरॉन का संकेत माइनस 0.07 से बदलकर प्लस 0.66 भाग प्रति दस लाख हो गया। घनत्व फलन सिद्धांत की गणनाओं से यह भी पता चला कि प्रतिक्रिया शुरू करने की ऊर्जा बाधा 0.46 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट से घटकर 0.11 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट रह गई। शोधकर्ताओं का व्यावहारिक लक्ष्य इसी बदलाव से कमरे के तापमान पर बहुलकीकरण कराना था। उन्होंने इस प्रक्रिया को छोटे बर्तनों में और बटन के आकार के छोटे सेल में परखा।

सेल के भीतर क्या बदला?

जाँच का एक अहम हिस्सा इलेक्ट्रोलाइट और हर इलेक्ट्रोड के बीच बनने वाली सीमा-परतों का अध्ययन था। ये परतें केवल दो अलग-अलग सामग्रियों की मिलन-रेखा नहीं होतीं; इन पर बनने वाली महीन परतें आयनों के आवागमन और रासायनिक प्रतिक्रियाओं की स्थिरता को प्रभावित करती हैं। कमरे के तापमान पर तैयार इलेक्ट्रोलाइट वाले सेल को आरटी-क्यूएसई कहा गया। इनमें लिथियम फ्लोराइड से भरपूर और अधिक एकसमान मध्यवर्ती परतें दिखाई दीं। इनमें लिथियम और ठोस इलेक्ट्रोलाइट के बीच की परत, जिसे एसईआई कहते हैं, और कैथोड तथा इलेक्ट्रोलाइट के बीच की परत, यानी सीईआई, शामिल थीं।

इन परतों का एकसमान होना इसलिए अहम है कि इससे लिथियम की आवाजाही अधिक फैली हुई रह सकती है, बजाय इसके कि वह कुछ ही जगहों पर जमा हो। लिथियम को बार-बार जमा करने और फिर हटाने के परीक्षण में सेल 1200 घंटे से अधिक समय तक स्थिर रहा। इस परीक्षण में धारा घनत्व 0.5 मिलीएम्पियर प्रति वर्ग सेंटीमीटर और प्रति वर्ग सेंटीमीटर क्षमता 1.0 मिलीएम्पियर-घंटा थी। यह नतीजा इन्हीं तय शर्तों वाले परीक्षण का है; अकेले इसके आधार पर हर तरह के इस्तेमाल में बैटरी की उम्र का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। फिर भी, यह दिखाता है कि इस प्रयोग में बनी सीमा-परत लंबे समय तक चलने वाले चक्रों को सह सकी।

टीम ने परमाणु बल सूक्ष्मदर्शी और डीएमटी विश्लेषण की मदद से एसईआई परत के यांत्रिक गुणों की तुलना भी की। डीएमटी का पूरा नाम डेराजागिन–मुलर–टोपोरोव विश्लेषण है। कमरे के तापमान पर तैयार इलेक्ट्रोलाइट से बनी परत का मापा गया मान, ऊँचे तापमान पर तैयार नमूने की परत से अधिक था। इससे पता चलता है कि मापी गई परत कितनी कड़ी थी। यह गुण इस बात को प्रभावित कर सकता है कि चार्ज और डिस्चार्ज के दौरान इलेक्ट्रोड का आकार बदलने पर परत अपना जुड़ाव और अखंडता कितनी अच्छी तरह बनाए रखती है।

अंतर लिथियम और मैंगनीज़ से भरपूर कैथोड, यानी एलआरएमओ, में भी दिखाई दिया। निरीक्षणों से पता चला कि कमरे के तापमान पर तैयार इलेक्ट्रोलाइट वाले सेल में इसकी क्रिस्टलीय संरचना अधिक स्थिर रही। तुलना में बताई गई खाली जगहें या रिक्तियाँ इसमें नहीं दिखीं। इसके उलट, गर्मी से बहुलकीकरण किए गए नमूने की सतह अधिक अस्त-व्यस्त और उसकी सीमा-परतें कम एकसमान दिखाई दीं। अल्ट्रासाउंड से की गई जाँच में इलेक्ट्रोलाइट का कैथोड के भीतर बेहतर ढंग से पहुँच पाना भी दिखा। यह बात खास तौर पर मोटे कैथोड के लिए मायने रखती है, क्योंकि वहाँ केवल बाहरी सतह का इलेक्ट्रोलाइट से संपर्क होना पर्याप्त नहीं होता।

छोटे सेल से 9.53 एम्पियर-घंटा की बैटरी तक

शोधकर्ताओं ने अपनी जाँच बटन-सेलों तक सीमित नहीं रखी। उन्होंने 4 मिलीएम्पियर-घंटा प्रति वर्ग सेंटीमीटर की क्षमता वाला एलआरएमओ कैथोड तैयार किया। 100 चक्रों के बाद भी उसने अपनी क्षमता का 95.1% बनाए रखा। यह माप बताता है कि तय परीक्षण परिस्थितियों में बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज करने के दौरान सेल कितना स्थिर रहा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर व्यावसायिक बैटरी अपने आप यही नतीजा देगी। सेल की बनावट और आकार, तापमान, चार्ज करने की गति और कई दूसरे कारक प्रदर्शन को बदल सकते हैं।

बड़े आकार की ओर बढ़ने का सबसे खास कदम 9.53 एम्पियर-घंटा क्षमता वाला थैलीनुमा सेल बनाना था। इसमें ऐसा कैथोड था जिसकी क्षमता 10 मिलीएम्पियर-घंटा प्रति वर्ग सेंटीमीटर से अधिक थी। इस स्तर पर यह परखा जा सकता है कि इलेक्ट्रोलाइट घने कैथोड के अंदर तक पहुँचता है या नहीं, न कि सिर्फ पतली परतों में काम करता है। सेल की ऊर्जा घनत्व 656.6 वॉट-घंटा प्रति किलोग्राम दर्ज की गई और शुरुआती कूलॉम्बिक दक्षता 94.4% रही। शुरुआती दक्षता से पता चलता है कि पहले चक्र में डाले गए आवेश की मात्रा की तुलना में कितनी मात्रा वापस हासिल की जा सकती है। इस तरह यह शुरुआत में होने वाली ऊर्जा-हानि का एक संकेत देती है।

इन आँकड़ों पर ध्यान देने की वजह यह है कि ये किसी अकेली सामग्री के परीक्षण से नहीं, बल्कि एक थैलीनुमा सेल से मिले और उसमें अधिक क्षमता वाला कैथोड लगा था। फिर भी, ऊर्जा घनत्व को अध्ययन की तय शर्तों में तैयार किए गए प्रयोगशाला सेल का नतीजा समझना चाहिए। इसे कारों, विमानों या बिजली ग्रिड की बैटरियों के लिए सीधे प्रदर्शन की गारंटी नहीं माना जा सकता। सफल प्रयोगशाला सेल से तैयार उत्पाद तक पहुँचने के लिए बार-बार एक जैसी गुणवत्ता से निर्माण करना, गर्मी सँभालना, सुरक्षा, बैटरी की उम्र और लागत पर काम करना होगा। साथ ही, असली इस्तेमाल जैसी परिस्थितियों में भी प्रदर्शन की जाँच करनी होगी।

एक पदार्थ से आगे की नई डिजाइन सोच

अध्ययन के अनुसार, सक्रियक की अहमियत केवल पीईटीईए की खास प्रतिक्रिया को तेज़ करने तक सीमित नहीं है। टीम ने जिस गुण, यानी ऊँचे ईएसपीमैक्स, का सहारा लिया, वह दूसरे मोनोमर और सक्रियक चुनने में भी मददगार हो सकता है। इससे इलेक्ट्रोड के प्रकार या सेल की बनावट के मुताबिक मिश्रण को बदलने की गुंजाइश खुलती है। मगर यह अभी एक डिजाइन संभावना है, जिसे हर मिश्रण के लिए अलग से परखना होगा। कुछ खास सामग्रियों के साथ मिली सफलता यह साबित नहीं करती कि हर एक्रिलेट मोनोमर या हर सक्रियक भी वैसा ही व्यवहार करेगा।

फिर भी, यह प्रयोग उस समस्या पर सोचने का एक अलग तरीका देता है जिसे अक्सर गर्मी बढ़ाकर हल करने की कोशिश की जाती रही है। मोनोमर को गर्म करके प्रतिक्रिया के लिए मजबूर करने के बजाय, उसकी आणविक संरचना में ऐसा बदलाव किया जा सकता है कि बहुलकीकरण शुरू करना आसान हो जाए। अगर इस प्रक्रिया को हर बार भरोसेमंद ढंग से नियंत्रित किया जा सके, तो मोटे इलेक्ट्रोडों के भीतर अधिक एकसमान सीमा-परतें बन सकती हैं और सेल के अलग-अलग हिस्सों में जेल जमने का अंतर घट सकता है। बड़े थैलीनुमा सेल बनाते समय यह खास तौर पर अहम है, क्योंकि हर हिस्से तक गर्मी या अन्य घटकों को समान रूप से पहुँचाना कठिन हो सकता है।

इस तकनीक के संभावित इस्तेमालों में बिजली से चलने वाले वाहन, कम ऊँचाई पर उड़ने वाले विमान और बड़े बिजली ग्रिड के लिए ऊर्जा भंडारण शामिल हैं। इन क्षेत्रों को अधिक ऊर्जा के साथ बेहतर सुरक्षा का मेल उपयोगी लग सकता है। लेकिन इस शोध से यह साबित नहीं होता कि ऐसे इस्तेमाल के लिए बैटरियाँ अभी तैयार हैं। मोटे इलेक्ट्रोडों का कम तापमान पर प्रदर्शन सुधारने की ज़रूरत बनी हुई है। शोधकर्ताओं ने इस कमी पर काम करने के लिए कैथोड में बदलाव और प्लास्टिसाइज़र की बनावट सुधारने की संभावना बताई है। यह समस्या इसलिए अहम है कि मध्यम तापमान में अच्छा चलने वाली बैटरी ठंडे माहौल में भी वैसा ही प्रदर्शन करे, यह तय नहीं है।

निष्कर्ष

यह अध्ययन लिथियम धातु बैटरियों की एक खास चुनौती पर काम करता है: जेल जैसा इलेक्ट्रोलाइट सेल के भीतर इस तरह कैसे बनाया जाए कि तेज़ गर्मी से इलेक्ट्रोड और उनके संपर्क वाली परतें खराब न हों। पीईटीईए और एआईबीएन वाले मिश्रण में टीपीएफपीबी मिलाकर टीम ने कमरे के तापमान पर बहुलकीकरण शुरू किया। इसके साथ प्रतिक्रिया की ऊर्जा बाधा 0.46 से घटकर 0.11 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट हुई और बताए गए परीक्षणों में सीमा-परतें अधिक एकसमान दिखीं।

नतीजे छोटे परीक्षणों से आगे बढ़कर कई स्तरों पर सामने आए: लिथियम जमा करने और हटाने के परीक्षण में 1200 घंटे से अधिक स्थिरता, 4 मिलीएम्पियर-घंटा प्रति वर्ग सेंटीमीटर क्षमता वाले कैथोड में 100 चक्रों के बाद 95.1% क्षमता और 9.53 एम्पियर-घंटा के थैलीनुमा सेल में 656.6 वॉट-घंटा प्रति किलोग्राम ऊर्जा घनत्व तथा 94.4% शुरुआती कूलॉम्बिक दक्षता। ये आँकड़े इस तरीके को बड़े आकार तक ले जाने की संभावना दिखाते हैं, लेकिन व्यावसायिक बैटरी की गारंटी नहीं हैं। रोज़मर्रा के इस्तेमाल के करीब पहुँचने से पहले ठंड में प्रदर्शन सुधारना और बड़े पैमाने पर निर्माण की मजबूती साबित करना अब भी ज़रूरी है।