सरल शब्दों में
सफेद बौना आकार में छोटा, लेकिन बेहद भारी तारकीय अवशेष होता है। माना जाता था कि उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का करीब 1.4 गुना से अधिक नहीं हो सकता, लेकिन नए कंप्यूटर मॉडल बताते हैं कि शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र कुछ सफेद बौनों को इससे कहीं अधिक द्रव्यमान हासिल करने में मदद कर सकता है। ऐसा हुआ तो कुछ असामान्य रूप से चमकीले तारकीय विस्फोटों की वजह समझने में मदद मिल सकती है।
कल्पना कीजिए कि कोई वस्तु आकार में पृथ्वी जितनी हो, लेकिन उसमें सूर्य के बराबर या उससे भी अधिक पदार्थ समाया हो। सफेद बौना ऐसा ही तारकीय अवशेष है। कई तारे अपना नाभिकीय ईंधन खर्च करने और बाहरी परतें छोड़ने के बाद इसी अंतिम अवस्था में पहुँचते हैं। ब्रह्मांड के पैमाने पर ये अवशेष बहुत छोटे होते हैं, फिर भी इनके भीतर पदार्थ अत्यधिक सघन होता है। वहाँ कई विशाल बल एक-दूसरे का मुकाबला करते हैं और तय करते हैं कि तारा स्थिर रहेगा या लगातार सिकुड़ता जाएगा।
चंद्रशेखर सीमा लंबे समय से सफेद बौनों का भविष्य समझने में एक अहम कसौटी रही है। इसका मान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1.4 गुना है। यह सीमा उन सफेद बौनों के लिए बताई गई थी जो तेज़ी से नहीं घूमते और जिनके चुंबकीय क्षेत्र बहुत शक्तिशाली नहीं होते। लेकिन नए कंप्यूटर मॉडल एक दिलचस्प संभावना सामने रखते हैं: अगर तारे के भीतर चुंबकीय क्षेत्र काफी मजबूत हो, तो यह सीमा हर सफेद बौने पर एक जैसी लागू नहीं होगी।
प्रसिद्ध सीमा, लेकिन कुछ शर्तों के साथ
चंद्रशेखर सीमा का यह अर्थ नहीं है कि सूर्य के द्रव्यमान का 1.4 गुना द्रव्यमान वाला हर सफेद बौना तुरंत फट जाएगा। न ही हर स्थिति में इस सीमा को ठीक एक ही तरह से मापा जा सकता है। यह एक बुनियादी सैद्धांतिक मान है, जो बताता है कि सामान्य परिस्थितियों वाला सफेद बौना अस्थिर हुए बिना अधिकतम कितना भारी हो सकता है। इस अनुमान में तारे के गुणों से जुड़ी कुछ धारणाएँ शामिल हैं, जैसे उसका चुंबकीय क्षेत्र बहुत शक्तिशाली न होना और उसका बहुत तेज़ी से न घूमना। इसलिए यह संख्या खगोल भौतिकी में एक अहम संदर्भ तो है, लेकिन इसे तारे की परिस्थितियों से अलग कोई सीधा-सादा नियम नहीं माना जा सकता।
यह सीमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत से सफेद बौने मुख्य रूप से कार्बन और ऑक्सीजन से बने होते हैं। अगर इनमें से किसी एक का भीतरी भाग बहुत अधिक दबाव और घनत्व की स्थिति तक पहुँच जाए, तो कार्बन में नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और तेजी से बढ़ सकती है। कुछ परिस्थितियों में इससे प्रकार Ia का सुपरनोवा विस्फोट हो सकता है। यह बेहद चमकीला विस्फोट थोड़े समय में बहुत अधिक ऊर्जा छोड़ता है।
परंपरागत सीमा से अधिक भारी सफेद बौनों की संभावना इस अध्ययन से पहले भी उठाई जा चुकी है। सैद्धांतिक भौतिकविद कई दशकों से ऐसे काल्पनिक पिंडों पर चर्चा करते आए हैं, जिन्हें कभी-कभी चंद्रशेखर सीमा से अधिक भारी सफेद बौना कहा जाता है। खगोलविदों ने ऐसे प्रकार Ia सुपरनोवा भी देखे हैं जो सामान्य मॉडल की अपेक्षा अधिक चमकीले थे। इससे यह संभावना बनी कि विस्फोट से पहले कुछ मूल तारे सूर्य के द्रव्यमान के लगभग 2.8 गुना तक भारी रहे होंगे। फिर भी एक कठिन सवाल बना रहा: कोई सामान्य तारा स्वाभाविक रूप से ऐसी अवस्था तक पहुँच कैसे सकता है?
सामान्य तारे से चुंबकीय अवशेष तक
नया अध्ययन इस सवाल को तारे के पूरे जीवनक्रम के नजरिए से देखता है, न कि उसके इतिहास से अलग करके केवल अधिकतम द्रव्यमान का हिसाब लगाता है। भारतीय विज्ञान संस्थान के भौतिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक तारे की यात्रा का पता लगाया। उन्होंने उसके जीवन के मुख्य दौर से शुरुआत की, जब वह हाइड्रोजन को हीलियम में बदलकर ऊर्जा बनाता है, और फिर उस अवस्था तक मॉडल बनाया जिसमें वह सफेद बौना बनता है और बाद में अपने साथी तारे से पदार्थ हासिल करता है।
इस शोध का नेतृत्व भौतिकी विभाग की डॉक्टरेट की छात्रा ज़ेनिया ज़रीक ने किया। विभाग के प्रोफेसर पनब्रता मुखोपाध्याय इसके मुख्य शोधकर्ता थे। नतीजे एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित हुए। मुखोपाध्याय के मुताबिक, इस विचार की शुरुआत 2011 में हुई थी। उस समय गर्मियों में प्रशिक्षण ले रहे एक छात्र से एक सीधा-सा सवाल पूछा गया था: क्या चुंबकीय क्षेत्र सफेद बौने को जानी-पहचानी सीमा से अधिक भारी बना सकता है? आगे चलकर यह सवाल एक ऐसी शोध परियोजना में बदल गया, जिसमें तारे के विकास के पूरे सफर के दौरान इस संभावना को परखा गया।
इस काम के लिए टीम ने तारों के विकास का एसटीएआरएस नाम का कंप्यूटर कार्यक्रम बदला। यह कार्यक्रम मूल रूप से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में विकसित किया गया था। शोधकर्ताओं को केवल तारे के जीवन के किसी एक पड़ाव पर चुंबकत्व का असर जोड़ना नहीं था। उन्होंने कार्यक्रम का विस्तार किया, ताकि उसमें चुंबकीय क्षेत्र और सफेद बौनों के ठंडा होने की प्रक्रिया भी शामिल हो सके। फिर उन्होंने इसका इस्तेमाल तारे में लगातार होने वाले बदलावों का अनुकरण करने के लिए किया। इससे वे केवल अंतिम द्रव्यमान पर ध्यान देने के बजाय यह भी देख सके कि तारकीय अवशेष बना कैसे।
सफेद बौना बनने के बाद शोधकर्ताओं ने मॉडल में एक द्वितारा तंत्र जोड़ा, जिसमें उसका एक साथी तारा भी था। ऐसे तंत्रों में सफेद बौने का गुरुत्वाकर्षण अपने पड़ोसी तारे से गैस को धीरे-धीरे खींच सकता है। पदार्थ के इस तरह जुड़ने की प्रक्रिया को अभिवृद्धि कहते हैं। नया पदार्थ मिलने से समय के साथ सफेद बौने का द्रव्यमान बढ़ता है। लेकिन वह कितना पदार्थ सँभाल पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके भीतर काम करने वाले बल उसके अपने गुरुत्वाकर्षण का कितना मुकाबला कर सकते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र बलों का संतुलन कैसे बदलता है?
प्रस्तावित प्रक्रिया की शुरुआत ऐसे चुंबकीय क्षेत्र से हो सकती है जो पहले अपेक्षाकृत कमजोर हो। जैसे-जैसे सफेद बौना अधिक पदार्थ खींचता है, उसका द्रव्यमान और घनत्व बढ़ता है। उसका गुरुत्वाकर्षण भी उसकी आंतरिक बनावट को दबाकर उसे सिकोड़ने लगता है। मॉडल के मुताबिक, इस सिकुड़न से तारे के भीतर का चुंबकीय क्षेत्र अधिक शक्तिशाली हो सकता है। तब उसका असर, जो पहले सीमित था, तारे के संतुलन में कहीं अधिक अहम भूमिका निभाने लगता है।
मॉडल की तस्वीर में चुंबकीय क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ अतिरिक्त सहारा देता है। यानी तारा केवल सहारा देने वाली सामान्य प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं रहता; चुंबकत्व भी यह तय करने में शामिल हो जाता है कि वह बिना ढहे कितना पदार्थ अपने भीतर रख सकता है। इसीलिए सफेद बौने का अधिकतम द्रव्यमान उसके भीतर के चुंबकीय क्षेत्र के व्यवहार पर निर्भर हो सकता है, न कि सभी सफेद बौनों के लिए एक ही तय संख्या पर।
इस संभावित नतीजे से केवल अधिकतम द्रव्यमान ही नहीं बदल सकता। अगर चुंबकत्व सिकुड़न का विरोध करने में मदद करे, तो सफेद बौने के द्रव्यमान और उसके आकार के बीच का जाना-पहचाना संबंध भी बदल सकता है। इससे उन कुछ सफेद बौनों को समझने का रास्ता खुलता है जिनकी त्रिज्या उनके अपेक्षाकृत कम द्रव्यमान को देखते हुए अनपेक्षित रूप से बड़ी लगती है। हालांकि अध्ययन इन सभी पिंडों के लिए कोई पक्का स्पष्टीकरण नहीं देता, लेकिन यह संकेत करता है कि मॉडल बनाते समय चुंबकीय दबाव को शामिल करना उपयोगी हो सकता है।
अनुकरण में द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 2.4 गुना पहुँचा
टीम के एक परीक्षण से पता चलता है कि चुंबकत्व को शामिल करने पर नतीजा कितना बदल सकता है। मॉडल की शुरुआत कार्बन और ऑक्सीजन से बने ऐसे सफेद बौने से हुई जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 1.02 गुना था। अनुकरण में माने गए तारकीय इतिहास के मुताबिक, यह सफेद बौना ऐसे तारे से बना था जिसका मुख्य जीवनकाल के दौरान द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का करीब 8 गुना था।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने यह अनुकरण किया कि सफेद बौना अपने साथी तारे से हर साल सूर्य के द्रव्यमान का 10⁻⁹ हिस्सा हासिल कर रहा है। यानी हर साल सूर्य के द्रव्यमान का एक अरबवाँ हिस्सा उसमें जुड़ रहा है। चुंबकीय असर को शामिल करने पर इस स्थिति में सफेद बौने का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 2.4 गुना हो गया। इसकी तुलना में, चुंबकीय असर को शामिल न करने वाला दूसरा मॉडल करीब 1.4 गुना द्रव्यमान पर रुक गया, जो चंद्रशेखर सीमा का पारंपरिक मान है।
इन दोनों नतीजों के बीच का फर्क यह नहीं बताता कि हर सफेद बौना सूर्य के द्रव्यमान का 2.4 गुना हो जाएगा। न ही इसका अर्थ है कि चुंबकीय क्षेत्र हर बार सीमा को अपने आप बढ़ाकर कोई नई तय संख्या बना देता है। यह नतीजा खास परिस्थितियों वाले एक अनुकरण से आया है। इनमें शुरुआती पिंड का द्रव्यमान, पदार्थ हासिल करने की दर और चुंबकीय क्षेत्र को मॉडल में दिखाने का तरीका शामिल हैं। फिर भी यह हिसाब एक ऐसा रास्ता दिखाता है जिससे कुछ सफेद बौने सामान्य सीमा से अधिक भारी हो सकते हैं। बात केवल इतनी कहने तक सीमित नहीं रहती कि ऐसे पिंड सिद्धांत में संभव हैं।
यह बात इसलिए भी अहम है कि किसी समीकरण या सरल मॉडल में अत्यधिक भारी पिंड के संभव होने की पुष्टि कर देना, उसके बनने का सवाल हल नहीं करता। वहाँ तक पहुँचाने वाला तारकीय इतिहास भी विश्वसनीय होना चाहिए: पहले एक मूल तारा हो, फिर उससे सफेद बौना बने और उसके बाद ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हों कि वह पदार्थ खींच सके और चुंबकीय क्षेत्र विकसित हो, जो उसकी आंतरिक बनावट पर असर डाले। इस अनुकरण में इन चरणों की पूरी कड़ी का पता लगाने की कोशिश की गई। इसलिए यह अधिकतम द्रव्यमान का अलग-थलग अनुमान भर नहीं, बल्कि तारे के विकास से जुड़ी एक संभावित व्याख्या है।
इसका सुपरनोवा विस्फोटों से क्या संबंध है?
अगर कुछ सफेद बौने सूर्य के द्रव्यमान का 1.4 गुना से अधिक भारी हो सकते हैं, तो इससे प्रकार Ia सुपरनोवा को समझने का तरीका प्रभावित हो सकता है। इन विस्फोटों का इस्तेमाल ब्रह्मांड में दूरियाँ मापने के लिए किया जाता है। इनकी अधिकतम चमक का मान तय किया जा सकता है और फिर उसकी तुलना उस चमक से की जाती है जो वास्तव में पृथ्वी तक पहुँचती है। इस तुलना से खगोलविद विस्फोट की दूरी का अनुमान लगाते हैं और फिर इन मापों से ब्रह्मांड के फैलाव तथा उसके इतिहास का अध्ययन करते हैं।
यह तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि इस तरह के सुपरनोवा एक हद तक नियमित व्यवहार करते हैं, जिससे उनकी चमक का मान तय करने के बाद उन्हें ब्रह्मांड में रोशनी के भरोसेमंद संकेतक की तरह इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन अगर फटने वाले कुछ सफेद बौने अनुमान से कहीं अधिक भारी हों या उनके चुंबकीय गुण अलग हों, तो उनसे निकलने वाली ऊर्जा और उनकी चमक सामान्य तस्वीर से अलग हो सकती है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि कुछ प्रकार Ia विस्फोट अपेक्षा से अधिक चमकीले क्यों दिखाई देते हैं। इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनके आधार पर सूर्य के द्रव्यमान के करीब 2.8 गुना तक के द्रव्यमान की संभावना उठी थी।
फिर भी यह अनुकरण अपने आप यह साबित नहीं करता कि अत्यधिक चमकीले सुपरनोवा वास्तव में इतने भारी, चुंबकीय सफेद बौनों से ही बनते हैं। यह व्याख्या की एक कठिनाई का संभावित हल पेश करता है: विस्फोट से पहले कोई तारा जानी-पहचानी सीमा से आगे कैसे जा सकता है? इस संबंध की पुष्टि के लिए मॉडल के नतीजों की खगोलीय अवलोकनों से तुलना करनी होगी। इसके लिए विस्फोटों और पीछे बच जाने वाले तारों के गुणों का अध्ययन करना होगा और अलग-अलग संभावित परिदृश्यों की भविष्यवाणियों की तुलना खगोलविदों के अवलोकनों से करनी होगी।
इस शोध का असर असाधारण विस्फोटों की एक श्रेणी को समझने से कहीं आगे भी हो सकता है। अगर चुंबकत्व विस्फोट से पहले सफेद बौने का द्रव्यमान और आकार बदलता है, तो दूरी मापने के लिए इस्तेमाल होने वाले सुपरनोवा की चमक की व्याख्या भी प्रभावित हो सकती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि ब्रह्मांड की दूरी मापने के तरीके बेकार हो जाएँगे। बल्कि, इन विस्फोटों को जन्म देने वाले पिंडों में मौजूद विविधता को बेहतर समझने से उनकी चमक का मान तय करने का तरीका सुधर सकता है और अलग-अलग तरह के मामलों में फर्क करना आसान हो सकता है।
नतीजे की सीमाएँ और इससे क्या साबित नहीं होता
मॉडल से मिले नतीजे और सीधे किए गए अवलोकन में फर्क समझना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने किसी तारे को अपनी आँखों के सामने बढ़ते हुए सूर्य के द्रव्यमान का 2.4 गुना होते नहीं देखा। अध्ययन में ऐसा कोई अवलोकन-आधारित प्रमाण भी नहीं दिया गया कि शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले सभी सफेद बौने चंद्रशेखर सीमा से आगे निकल जाते हैं। इसमें कंप्यूटर अनुकरण है, जो बताता है कि कुछ खास परिस्थितियों में ऐसा विकास संभव हो सकता है। यह यह भी दिखाता है कि सिकुड़न के दौरान चुंबकीय क्षेत्र का मजबूत होना अतिरिक्त द्रव्यमान को सहारा कैसे दे सकता है।
इस नतीजे पर कितना भरोसा किया जा सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कार्यक्रम में भौतिकी को कितनी सटीकता से दिखाया गया है और तारे के विकास, पदार्थ के जुड़ने, ठंडा होने तथा चुंबकीय क्षेत्र के बारे में की गई धारणाएँ कितनी सही हैं। यह जानने के लिए कि प्रकृति में भी ऐसा रास्ता संभव है या नहीं, यह पता लगाना होगा कि इसके लिए जरूरी परिस्थितियाँ कितनी आम हैं। यह भी देखना होगा कि क्या द्वितारा तंत्र पर्याप्त समय तक सही दर से पदार्थ दे सकते हैं। अनुकरण में दिए गए आँकड़े इन सभी सवालों का सामान्य जवाब नहीं देते, लेकिन आगे जाँच और विकास के लिए एक शुरुआती आधार देते हैं।
इस काम की अहमियत यह है कि इसमें उन दो सवालों को एक साथ जोड़ा गया है जिन पर अलग-अलग भी विचार किया जा सकता था: क्या चुंबकत्व द्रव्यमान की सीमा बदल सकता है? और क्या कोई तारा सचमुच उन चरणों से गुजर सकता है जो उसे इस सीमा से भारी सफेद बौने तक पहुँचा दें? दूसरे सवाल का जवाब खोजने के लिए टीम ने तारे के मुख्य जीवनकाल से लेकर उसके सफेद बौना बनने तक के विकास को देखा और फिर साथी तारे से पदार्थ हासिल करने की प्रक्रिया का मॉडल बनाया।
निष्कर्ष
यह शोध सफेद बौनों के अधिकतम द्रव्यमान पर लंबे समय से चल रही चर्चा में चुंबकीय क्षेत्र को अहम जगह देता है। भारतीय विज्ञान संस्थान के भौतिकी विभाग और उसके सहयोगियों के अनुकरण में सूर्य के द्रव्यमान के 1.02 गुना से शुरू हुआ एक सफेद बौना सूर्य के द्रव्यमान के करीब 2.4 गुना तक पहुँचा। इसके उलट, चुंबकीय असर को शामिल न करने वाला मॉडल सूर्य के द्रव्यमान के करीब 1.4 गुना पर रुक गया। इस परिदृश्य में सफेद बौना सूर्य के द्रव्यमान के 8 गुना वाले मूल तारे से बना था और हर साल सूर्य के द्रव्यमान के 10⁻⁹ हिस्से की दर से पदार्थ हासिल कर रहा था।
यह नतीजा चंद्रशेखर सीमा को मिटाता नहीं है और न ही हर तारे के लिए कोई नई अधिकतम सीमा तय करता है। इसके बजाय यह बताता है कि चुंबकीय क्षेत्र की ताकत और पदार्थ हासिल करने का इतिहास जैसी परिस्थितियाँ कुछ सफेद बौनों को सामान्य तस्वीर से अलग बना सकती हैं। आगे के अवलोकन अगर इस रास्ते का समर्थन करते हैं, तो इससे अपेक्षा से अधिक भारी सफेद बौनों और कुछ अधिक चमकीले प्रकार Ia सुपरनोवा को समझने में मदद मिल सकती है। साथ ही, यह उन तरीकों की समझ को बेहतर कर सकता है जिनसे वैज्ञानिक ब्रह्मांड की दूरियाँ और उसका विकास मापते हैं।