आसान शब्दों में
नासा फिर से अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर भेजना चाहती है और 2028 के आखिर तक वहाँ उतरने का लक्ष्य रखती है। इससे पहले उसे कई उड़ानें पूरी करनी होंगी और अंतरिक्ष यानों के आपस में जुड़ने की क्षमता की जाँच करनी होगी। चीन भी 2029 के आखिर तक चाँद पर पहुँचने की कोशिश कर रहा है। इसलिए असली चुनौती केवल पहले पहुँचने की नहीं, बल्कि लगातार और सुरक्षित मिशन करने की है।
चाँद तक वापसी के लिए नियमित उड़ानें क्यों ज़रूरी हैं
अप्रैल 2026 में आर्टेमिस 2 के चाँद के चारों ओर घूमकर लौटने के बाद नासा के अधिकारी अब अंतरिक्ष यात्रियों को फिर चाँद की सतह पर भेजने को लेकर अधिक भरोसा जता रहे हैं। फिर भी भरोसा होना और मंज़िल का पक्का हो जाना एक बात नहीं है। अगला मिशन चाँद पर उतरने के लिए नहीं होगा। उसमें पृथ्वी की निचली कक्षा में यह जाँचा जाएगा कि ओरायन अंतरिक्ष यान और चाँद पर उतरने वाले यान आपस में ठीक तरह से जुड़ सकते हैं या नहीं। नासा का लक्ष्य है कि 2028 में आर्टेमिस 4 के तहत अंतरिक्ष यात्री चाँद पर उतरें। चीन ने भी 2029 के अंत तक वहाँ लोगों को लेकर उतरने का लक्ष्य घोषित किया है।
वापसी की शुरुआत नियमित प्रक्षेपण से
नासा के प्रमुख जारेड आइज़कमन ने कार्यक्रम की बात करते हुए रॉकेटों को नियमित रूप से उड़ाने को अपनी योजना का अहम हिस्सा बताया है। उनके मुताबिक, नासा के पास केवल महत्वाकांक्षी योजना या उन्नत यान होना काफी नहीं है। उसे अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली—जिसे संक्षेप में एसएलएस कहा जाता है—का रॉकेट कम से कम साल में एक बार उड़ाना चाहिए। उनका मानना है कि पृथ्वी से बहुत दूर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के मिशनों के लिए लगातार अभ्यास ज़रूरी है; कई साल के अंतराल पर होने वाली उड़ानों से यह तैयारी कायम नहीं रह सकती।
बार-बार उड़ान भरने पर दिया जा रहा ज़ोर महज़ कामकाज की एक छोटी-सी बात नहीं है। हर मिशन से दलों को प्रणालियों का इस्तेमाल करने, अंतरिक्ष यानों और धरती पर मौजूद टीमों के बीच तालमेल बैठाने और पिछले अनुभव से सीखने का मौका मिलता है। इस तरह अगली, पहले से अधिक कठिन उड़ान से पहले तैयारी बेहतर की जा सकती है। लगातार मिशन चलाने के लिए रॉकेटों और धरती पर कामकाज की व्यवस्था में बड़ा निवेश भी करना होगा। आइज़कमन की सोच में नियमित प्रक्षेपण से सरकारी खर्च का पूरा फायदा मिलना चाहिए, क्योंकि अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर की जाने वाली उड़ानों के साथ जोखिम भी जुड़े होते हैं।
नासा प्रमुख को उम्मीद नहीं है कि एजेंसी अंतरिक्ष शटल कार्यक्रम के शुरुआती वर्षों वाली रफ्तार पर लौटेगी, जब एक साल में चार उड़ानें करना संभव था। वे यह भी नहीं मानते कि नासा अपोलो मिशनों का तरीका फिर से अपनाएगी। फिर भी उनके अनुसार, पृथ्वी से दूर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने वाला कार्यक्रम चलाने के लिए साल में एक प्रक्षेपण न्यूनतम स्वीकार्य कसौटी है। इस तरह आर्टेमिस की प्रगति को परखने का एक व्यावहारिक पैमाना सामने आता है: केवल चाँद तक पहुँचने का लक्ष्य घोषित करना नहीं, बल्कि उसकी ओर नियमित रूप से आगे बढ़ पाना।
2027 का मिशन चाँद पर उतरने के लिए नहीं
आइज़कमन की बताई समय-सारिणी के मुताबिक, अप्रैल 2026 की उड़ान के बाद आर्टेमिस 3 का प्रक्षेपण 2027 में होना है। यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जाएगा, चाँद की सतह तक नहीं। इस दौरान नासा ओरायन कैप्सूल और चाँद पर उतरने वाले एक या दोनों यानों के बीच जुड़ने की प्रक्रिया जाँचेगी। इन यानों को स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन कंपनियाँ बना रही हैं। इनके नाम स्टारशिप और ब्लू मून हैं।
यह परीक्षण इसलिए अहम है, क्योंकि पृथ्वी से अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने और उन्हें चाँद की सतह तक पहुँचाने के बीच एक ज़रूरी कड़ी है। अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने वाला यान, उन्हें चाँद पर उतारने वाले यान से अलग है। इसलिए यह पक्का करना होगा कि दोनों यान कक्षा में एक-दूसरे तक पहुँच सकें और तय प्रक्रियाओं के अनुसार साथ काम कर सकें। इसी वजह से आर्टेमिस 3 को चाँद तक पहुँचने की कोशिश के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह तैयारी का मिशन है, जिसका मकसद आगे के चरणों के लिए कार्यक्रम को तैयार करना है।
इस योजना को अप्रैल 2026 में चाँद के चारों ओर घूमकर लौटे आर्टेमिस 2 मिशन से कुछ गति मिली है। आइज़कमन ने कहा कि अब उन्हें लगता है कि कार्यक्रम पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक राह पर है। उन्होंने इस उड़ान के नतीजे पर संतोष भी जताया। लेकिन एक मिशन का सफल होना आगे की समय-सारिणी या आने वाले मिशनों के हर हिस्से की तैयारी की गारंटी नहीं देता। इसलिए अधिकारी इस उपलब्धि को अंत मानने के बजाय उड़ानें जारी रखने, अभ्यास करने और परीक्षण पूरे करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं।
आज की चाँद-दौड़ अपोलो के दौर से कैसे अलग है
अमेरिका और चीन के बीच मौजूदा मुकाबले से 1960 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चाँद तक पहुँचने की होड़ याद आती है। लेकिन आइज़कमन ने कहा है कि दोनों दौरों की तुलना पूरी तरह ठीक नहीं बैठती। उनके वर्णन के मुताबिक, शीत युद्ध के समय कंप्यूटर और कई दूसरी तकनीकों में अमेरिका बहुत आगे था। आज, उनके आकलन में, मुकाबला कहीं अधिक करीबी है। चीन के पास ऐसी क्षमताएँ हैं जिनकी वजह से उसे गंभीर प्रतिद्वंद्वी मानना चाहिए, न कि ऐसा देश जो अमेरिका के स्तर से बहुत पीछे हो।
दोनों देशों के घोषित लक्ष्यों के बीच समय का अंतर बहुत बड़ा नहीं है। अमेरिका 2028 के आखिर तक अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर उतारना चाहता है, जबकि चीन कहता है कि वह 2029 के अंत से पहले लोगों को लेकर वहाँ उतरने की कोशिश करेगा। आइज़कमन मानते हैं कि चीन अपना घोषित लक्ष्य हासिल कर सकता है। इसकी वजह बताते हुए वे चाँद पर उतरने वाले यानों, चाँद पर चलने वाले वाहनों और अंतरिक्ष सूटों का ज़िक्र करते हैं जिन्हें चीन दिखा चुका है। उन्होंने ऐसे मिशन की योजना का भी उल्लेख किया जिसमें दो प्रक्षेपण होंगे और जिसका डिज़ाइन यानों को दोबारा इस्तेमाल करने की सुविधा देता है। आइज़कमन की बातचीत में सामने आए ये पहलू बताते हैं कि नासा चीन की समय-सीमा को दूर की या काल्पनिक संभावना नहीं मानती।
फिर भी केवल तारीखों को सामने रखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि दौड़ कौन जीतेगा। अंतरिक्ष यात्रियों को चाँद पर उतारना एक जटिल काम है। इसकी सफलता रॉकेटों, यानों, प्रणालियों और प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है, जिन्हें मिलकर ठीक काम करना होगा। इसीलिए एसएलएस को हर साल उड़ाने पर नासा का ज़ोर अनुभव और तैयारी बनाए रखने की कोशिश से जुड़ा है; बात केवल उड़ानों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। परीक्षण या आपसी तालमेल के किसी भी चरण में देरी होने पर 2028 में चाँद पर उतरने की समय-सारिणी पर दबाव पड़ सकता है।
मानव अनुभव भी कार्यक्रम की ताकत है
आइज़कमन का मानना है कि नासा केवल अपोलो कार्यक्रम से मिले ऐतिहासिक सबक पर निर्भर नहीं है, क्योंकि आर्टेमिस मिशनों की बनावट और उनकी राह पुराने अभियानों से अलग है। उन्होंने आर्टेमिस 2 की तुलना अपोलो 8 से और आर्टेमिस 3 की तुलना अपोलो 9 से की। उनका मकसद यह बताना था कि मंज़िल एक जैसी होने से आज के मिशन पुरानी योजनाओं की नकल नहीं बन जाते। हर चरण की अपनी ज़रूरतें हैं और नया कार्यक्रम 1960 के दशक में अपनाए गए तरीके से अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
हालाँकि, दोनों दौरों के बीच एक समानता आइज़कमन को नासा और अंतरिक्ष उद्योग में मौजूद कुशल लोगों की अहमियत में दिखती है। उनके साथ वह ऊर्जा और महत्वाकांक्षा भी ज़रूरी है, जो लोगों को बड़े अभियान को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। यह अनुभव केवल किसी रॉकेट या कैप्सूल में नहीं दिखाई देता। प्रणालियों की जाँच करने, उड़ान के बारीक काम सँभालने और पिछले मिशनों से सीखने की क्षमता में भी यह अनुभव शामिल है। आर्टेमिस 2 के बाद नासा के सामने चुनौती है कि उसकी सफलता से मिली सीख को आर्टेमिस 3 में काम आने वाले अनुभव में बदले और फिर उससे अगले चरण की तैयारी करे।
नासा ने 2028 में लोगों को चाँद पर उतारने की कोशिश आर्टेमिस 4 के लिए रखी है। इस क्रम में 2026 में चाँद के चारों ओर उड़ान हुई, 2027 में पृथ्वी की कक्षा में जुड़ने की जाँच होनी है और 2028 में चाँद की सतह पर पहुँचने का प्रयास है। यह क्रम दिखाता है कि चाँद पर उतरना, उसके चारों ओर घूमने के बाद सीधे लगाई जाने वाली छलाँग नहीं है। बीच के चरणों की जाँच भी ज़रूरी है। इससे यह भी समझ आता है कि आइज़कमन साल में कम से कम एक प्रक्षेपण पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं: बहुत लंबे अंतराल से टीमों और प्रणालियों की तैयारी बनाए रखना कठिन हो सकता है।
चाँद पर झंडा लगाने से बड़ा दाँव
आइज़कमन की नज़र में मुकाबले का महत्त्व केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि कौन-सा देश पहले पहुँचेगा। वे इसके नतीजे को अमेरिका की व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्थिति, उसकी तकनीकी क्षमता पर भरोसे और सुरक्षा संबंधी उसकी विश्वसनीयता से जोड़ते हैं। उन्होंने ऐसे फैसलों के उदाहरण दिए जिन पर देशों के बीच ताकत का संतुलन असर डाल सकता है—जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कंप्यूटर, कारों, विमानों और जहाज़ों के लिए तकनीक चुनना। उनके अनुसार, इन सवालों के कारण अमेरिका का चाँद तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा न हो पाना केवल अंतरिक्ष कार्यक्रम की नाकामी नहीं होगा; उसके अंतरराष्ट्रीय असर भी हो सकते हैं।
यह नज़रिया बताता है कि चाँद की उड़ानें अब वैज्ञानिक खोज और प्रतीकात्मक उपलब्धि से आगे बढ़कर योजना बनाने, उसे अमल में लाने और तकनीकी मुकाबले की क्षमता की कसौटी बन गई हैं। फिर भी अधिकारियों की राजनीतिक सोच और मिशनों से वास्तव में साबित होने वाली बातों में फर्क रखना ज़रूरी है। नासा के अधिकारियों के बयान मुकाबले के महत्त्व और जोखिमों को लेकर उनकी राय बताते हैं। कार्यक्रम कितना सक्षम है, इसका फैसला आने वाले परीक्षणों और प्रक्षेपणों के नतीजों तथा 2028 के लक्ष्य की ओर हुई प्रगति से होगा।
किसी लक्ष्य की तारीख घोषित कर देने का मतलब यह नहीं कि उसे हासिल करना तय हो गया। योजना तभी आगे बढ़ेगी जब आर्टेमिस 3 अपना परीक्षण पूरा करे और नासा तथा उसके साझेदार लोगों को चाँद पर उतारने की दिशा में काम जारी रख सकें। इसलिए अभी खुला सवाल यही है कि नेतृत्व जिस नियमित प्रक्षेपण की माँग कर रहा है, क्या वह उपलब्ध अनुभव के साथ मिलकर समय-सारिणी को वास्तविक उपलब्धि में बदलने के लिए पर्याप्त होगा। इसका जवाब केवल भाषणों से नहीं मिलेगा। यह इस बात से तय होगा कि हर चरण अगले चरण की राह कितनी अच्छी तरह तैयार करता है।
निष्कर्ष
नासा की योजना है कि मिशनों को एक के बाद एक पूरा करते हुए आर्टेमिस 4 के तहत 2028 के आखिर तक लोगों को चाँद पर उतारा जाए। अप्रैल 2026 में आर्टेमिस 2 की सफलता के बाद एजेंसी 2027 में आर्टेमिस 3 भेजने की तैयारी कर रही है, ताकि पृथ्वी की निचली कक्षा में अंतरिक्ष यानों के जुड़ने की जाँच हो सके। जारेड आइज़कमन चाहते हैं कि एसएलएस रॉकेट कम से कम साल में एक बार उड़ाया जाए। दूसरी ओर, चीन 2029 के अंत से पहले चाँद पर उतरने का लक्ष्य रखता है और नासा प्रमुख के बताए अनुसार उसके पास यान, उपकरण और दो प्रक्षेपणों वाली योजना है। इसलिए इस मुकाबले का फैसला सिर्फ घोषित तारीखों से नहीं होगा। असली कसौटी यह है कि दोनों देश अपनी योजनाओं को सफल और लगातार होने वाले मिशनों में बदल पाते हैं या नहीं।