आसान शब्दों में
शोधकर्ताओं ने बहुत छोटी और तेज़ प्रकाश-झपकी से सिलिकॉन की सतह पर बेहद छोटी खाइयाँ बनाईं। प्रकाश की ताकत बदलने पर खाइयों की गहराई और आकार भी बदले। यह तरीका भविष्य में बिना साँचे के कुछ बारीक आकृतियाँ बनाने में काम आ सकता है, लेकिन अभी यह शुरुआती प्रयोग है और कारखानों में इसकी उपयोगिता साबित नहीं हुई है।
नई विधि की तलाश क्यों
सिलिकॉन की चिपों पर बारीक आकृतियाँ बनाने के लिए आम तौर पर कई चरणों वाली प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें अक्सर खास साँचे का इस्तेमाल होता है, जो तय नक्शे के मुताबिक रोशनी को रोकता या लौटाता है। ऐसे साँचे बनाना महँगा और पेचीदा है। जैसे-जैसे चिपों के पुर्ज़े छोटे होते हैं, साँचे को बेहद सटीक बनाना भी उतना ही ज़रूरी हो जाता है।
लेज़र से सीधे लिखने की विधि में रोशनी को सतह के चुने हुए हिस्सों पर केंद्रित किया जाता है, ताकि वहाँ से सामग्री हट जाए। इसमें बीच में किसी साँचे की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन दिखाई देने वाली या उसके पास की अवरक्त रोशनी से बहुत छोटी जगह पर ऊर्जा केंद्रित करना कठिन है। साथ ही, सामग्री में पहुँची गर्मी से तनाव या बारीक दरारें पड़ सकती हैं।
अत्यधिक पराबैंगनी रोशनी से और छोटी जगहों पर काम करने की संभावना जाँची जा सकती है। शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि बेहद छोटी प्रकाश-झपकी गर्मी से होने वाले नुकसान को घटाएगी। लेकिन केवल झपकी का छोटा होना इस बात का सबूत नहीं है, और इस अध्ययन में गर्मी के असर को सीधे नहीं मापा गया।
विशाल प्रयोगशाला में पल-भर की रोशनी
यह प्रयोग जापान की साकला सुविधा में किया गया। वहाँ मुक्त-इलेक्ट्रॉन लेज़र से लगभग ३० फेम्टोसेकंड की प्रकाश-झपकियाँ बनाई गईं। एक फेम्टोसेकंड, एक सेकंड का बेहद छोटा अंश है, इसलिए नमूने की सतह तक ऊर्जा पहुँचने का समय भी बहुत कम था। रोशनी के कणों की ऊर्जा लगभग ९२ इलेक्ट्रॉन वोल्ट थी। वे ५२५ माइक्रोमीटर मोटी सिलिकॉन चिप पर सीधे पड़े।
प्रयोग की स्थितियों में सिलिकॉन ने इस्तेमाल की गई रोशनी का लगभग कुछ भी हिस्सा वापस नहीं लौटाया। रोशनी सिलिकॉन के भीतर करीब ०.५९ माइक्रोमीटर तक समा सकती थी। दो चरणों वाली प्रकाश-व्यवस्था ने किरण को लगभग ३५० गुणा ७०० नैनोमीटर के क्षेत्र पर केंद्रित किया। इसमें किर्कपैट्रिक–बाएज़ प्रकार का शुरुआती दर्पण और एक दीर्घवृत्ताकार दर्पण था। नमूनों को बारीक नियंत्रण वाले मंच पर रखा गया, ताकि अलग-अलग जगहों पर रोशनी डाली जा सके।
ये आँकड़े एक उन्नत प्रयोगशाला की व्यवस्था के हैं, किसी आम कारखाने में रखी जा सकने वाली छोटी मशीन के नहीं। नतीजे एक बड़े शोध-केंद्र के प्रकाश-स्रोत से मिले। इस तरीके को आम इस्तेमाल तक पहुँचाने के लिए अधिक सुविधाजनक स्रोत चाहिए होंगे, साथ ही यह भी दिखाना होगा कि उन्हें स्थिर और कुशल ढंग से चलाया जा सकता है।
प्रकाश की ताकत से बदला खाई का आकार
नमूनों पर रोशनी डालने के बाद शोधकर्ताओं ने परमाणु-बल सूक्ष्मदर्शी से उनकी सतह की ऊँच-नीच मापी। यह यंत्र सतह के बहुत छोटे उभार और गड्ढे दिखा सकता है। जब हर परमाणु के लिए सोखी गई ऊर्जा ८ इलेक्ट्रॉन वोल्ट, यानी ६.० जूल प्रति वर्ग सेंटीमीटर थी, तो खाइयों की औसत गहराई करीब १.५ माइक्रोमीटर रही। कुछ खाइयों का सबसे गहरा हिस्सा १.८ माइक्रोमीटर तक पहुँचा।
हर खाई एक जैसी नहीं बनी। ज़्यादातर का आकार चौड़े कटोरे जैसा था, जो बीच के गहरे हिस्से की ओर सँकरा होता गया। एक नमूने में किनारे पर सामग्री की साफ़ उठी हुई परत भी दिखी, मानो कुछ सिलिकॉन हटकर पास में फिर जम गया हो। बार-बार डाली गई प्रकाश-झपकियों से बनी खाइयों के आकार में करीब १३ से २० प्रतिशत तक अंतर था। यानी नतीजा दोहराया जा सकता था, लेकिन हर बार हूबहू एक जैसा नहीं था।
ऊर्जा घटाकर प्रति परमाणु ५ इलेक्ट्रॉन वोल्ट, यानी ३.७ जूल प्रति वर्ग सेंटीमीटर करने पर खाइयाँ औसतन करीब १ माइक्रोमीटर गहरी और १.१ माइक्रोमीटर चौड़ी बनीं। उनकी चौड़ाई में लगभग १० प्रतिशत का अंतर था, जबकि गहराई में यह अंतर १८ से ३६ प्रतिशत तक रहा। इससे पता चलता है कि ऊर्जा बदलने से केवल हटाई गई सामग्री की मात्रा ही नहीं, खाई का एकरूपपन भी बदल सकता है।
जब ऊर्जा प्रति परमाणु २ इलेक्ट्रॉन वोल्ट, यानी १.५ जूल प्रति वर्ग सेंटीमीटर थी, तो सामग्री मुख्य रूप से उसी परत के पास से हटी जहाँ रोशनी पहले समाती है। खाई करीब ०.६ माइक्रोमीटर गहरी थी और उसका एक हिस्सा एक माइक्रोमीटर से कम चौड़ा था। फिर भी उसका तल चिकना नहीं था; वहाँ खुरदरापन और पूरी तरह न हटे सिलिकॉन के अवशेष दिखे। कम ऊर्जा पर एक दिशा में एक माइक्रोमीटर से छोटी आकृति तो बनी, लेकिन सतह बेदाग़ नहीं थी।
कंप्यूटर मॉडल ने क्या बताया
टीम ने माप लेने के साथ-साथ सर्फविक्स नाम की कई पैमानों पर काम करने वाली गणना-पद्धति से प्रक्रिया का मॉडल भी बनाया। एक्सटैंट नाम के कार्यक्रम ने शुरुआती फेम्टोसेकंड और पिकोसेकंड के दौरान इलेक्ट्रॉनों की प्रतिक्रिया और सामग्री में होने वाले बदलावों का हिसाब लगाया। इसके बाद लैम्प्स कार्यक्रम से अणुओं की गति का अनुकरण किया गया, ताकि सिलिकॉन के विकृत होने, दबाव की तरंगें फैलने और सामग्री के बाहर निकलने को नैनोसेकंड तक समझा जा सके।
गणना का बोझ कम करने के लिए शोधकर्ताओं ने मॉडल का आकार घटाया, लेकिन सोखी गई ऊर्जा का अनुपात बनाए रखा। मॉडल ने कुल मिलाकर सही रुझान दिखाया: अधिक ऊर्जा से बड़ी खाई बनी। फिर भी सबसे अधिक ऊर्जा वाली स्थिति में कंप्यूटर से निकली खाइयाँ असल माप से छोटी थीं। मॉडल ने गहराई करीब तीन गुना कम और चौड़ाई लगभग आधी आँकी।
गणना के मुताबिक खाई के किनारे का कुछ सिलिकॉन बाहर की ओर धकेला जा सकता है, फिर वापस आकर जम सकता है। इससे किनारे पर दोबारा जमी सामग्री की परत बनने की संभावित वजह समझ में आती है। लेकिन गणना और असल माप का अंतर बताता है कि मौजूदा मॉडल प्रक्रिया के सभी बारीक पहलुओं को नहीं पकड़ पा रहे हैं। खाइयों के आकार का सटीक अनुमान लगाने से पहले इन मॉडलों को बेहतर बनाना होगा।
सूक्ष्म खाइयों से आगे की संभावनाएँ
अत्यधिक पराबैंगनी रोशनी से सीधे लिखने का तरीका ऐसे पुर्ज़ों या साँचे बनाने में मदद कर सकता है जिनके आकार अपेक्षाकृत बड़े हों। संभावित क्षेत्रों में सूक्ष्म विद्युत-यांत्रिक संवेदक, मोटरों का नियंत्रण, बैटरी प्रबंधन और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं। ये केवल संभावित उपयोग हैं; प्रयोग में ऐसे उपकरण बनाकर नहीं दिखाए गए।
इस तरीके से साँचे बनाने की कुछ मौजूदा प्रक्रियाओं पर निर्भरता घट सकती है। इनमें रासायनिक उपचार, प्लाज़्मा से सामग्री हटाना और प्रकाश-संवेदनशील परतें निकालना शामिल हैं। लेकिन अध्ययन ने न तो संसाधनों की खपत या पर्यावरण पर असर मापा, न ही मौजूदा तरीकों से इसकी लागत और रफ़्तार की तुलना की। इसलिए कम संसाधन खर्च करने वाली सूखी प्रक्रिया का विचार अभी संभावना भर है, साबित नतीजा नहीं।
एक व्यावहारिक मुश्किल यह है कि प्रयोग में मुक्त-इलेक्ट्रॉन लेज़र इस्तेमाल हुआ, जो विशेष शोध-सुविधा में उपलब्ध है। अध्ययन के मुताबिक, उच्च हार्मोनिक्स से अत्यधिक पराबैंगनी रोशनी बनाना छोटे स्रोत तैयार करने का एक रास्ता हो सकता है। लेकिन कारखानों में इसका इस्तेमाल करने से पहले और विकास तथा परीक्षण ज़रूरी होंगे। एटोसेकंड तक की और छोटी प्रकाश-झपकियों का सुझाव भी दिया गया है, पर गर्मी से होने वाले तनाव को घटाने का यह लाभ इस प्रयोग में मापा नहीं गया।
नतीजा
प्रयोग से पता चला कि अत्यधिक पराबैंगनी रोशनी की एक बेहद छोटी झपकी सिलिकॉन हटा सकती है और खाई बना सकती है। रोशनी की ऊर्जा के अनुसार खाइयों का आकार और गहराई बदली: कम ऊर्जा पर गहराई करीब ०.६ माइक्रोमीटर थी, जबकि अधिक ऊर्जा पर सबसे गहरी खाई १.८ माइक्रोमीटर तक पहुँची। मापों में अंतर भी साफ़ था। इस काम की अहमियत यह है कि इसने सूक्ष्म स्तर पर रोशनी से सीधे सतह काटने की संभावना दिखाई है, न कि किसी तैयार औद्योगिक तकनीक की घोषणा की है। आगे गणना-पद्धति सुधारनी होगी, बड़े पैमाने पर रफ़्तार और दोहराव की जाँच करनी होगी, गर्मी और पर्यावरण पर असर मापना होगा और उपयुक्त प्रकाश-स्रोत विकसित करने होंगे। ये कदम पूरे होने तक यह तरीका प्रयोगशाला में उम्मीद जगाने वाला औज़ार है, चिप बनाने की मौजूदा विधियों का साबित विकल्प नहीं।