आसान भाषा में
वज़न और लंबाई से निकली एक संख्या हर व्यक्ति की सेहत की पूरी तस्वीर नहीं बताती। एक बड़े अध्ययन में मोटापे से जुड़े ऐसे जीन संकेत मिले जिन्हें उस संख्या से नहीं पहचाना जा सकता था। ये संकेत दिल की सेहत से भी जुड़े दिखे। यह तरीका आगे चलकर काम आ सकता है, लेकिन अभी इसे इलाज तय करने के लिए इस्तेमाल करना जल्दबाज़ी होगी।
एक संख्या से आगे, सेहत की पूरी तस्वीर
बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स निकालने के लिए वज़न को लंबाई के वर्ग से भाग दिया जाता है। इसकी गणना आसान है, इसलिए आबादी पर किए जाने वाले अध्ययनों और शुरुआती जाँच में इसका खूब इस्तेमाल होता है। लेकिन यह संख्या सीधे नहीं बताती कि शरीर में कितना हिस्सा चर्बी का है, चर्बी कहाँ जमा है या उसका असर अंगों और ऊतकों के कामकाज पर पड़ रहा है या नहीं। दो लोगों का बीएमआई एक जैसा हो सकता है, जबकि उनके शरीर में चर्बी की मात्रा, उसका फैलाव और सेहत पर उसका असर अलग-अलग हो।
इसी अंतर को ध्यान में रखकर अब मोटापे को केवल वज़न के आधार पर नहीं, बल्कि सेहत पर उसके असर के साथ समझने की बात हो रही है। क्लिनिकल मोटापे का मतलब सिर्फ़ इतना नहीं है कि किसी व्यक्ति का वज़न एक तय गणितीय सीमा से ऊपर है। इसमें शरीर में अतिरिक्त चर्बी की पहचान करने के साथ यह भी देखा जाता है कि कहीं उससे किसी अंग या ऊतक का काम तो प्रभावित नहीं हो रहा। अध्ययन से एक साल पहले, द लैंसेट डायबिटीज़ एंड एंडोक्राइनोलॉजी में 58 सदस्यों वाली एक समिति ने मोटापे की नई परिभाषा सुझाई थी। इसका मकसद जाँच को अधिक वस्तुनिष्ठ बनाना, डॉक्टरों के फैसलों में मदद करना और इलाज तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताएँ तय करना था।
समिति की सलाह है कि बीएमआई की भूमिका सीमित रखी जाए। यह आबादी के स्तर पर जोखिम का मोटा अंदाज़ लगाने या शुरुआती छँटाई के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की सेहत पर अकेले फैसला सुनाने का आधार नहीं होना चाहिए। शरीर में अतिरिक्त चर्बी की पुष्टि के लिए, जहाँ संभव हो, शरीर की चर्बी सीधे मापी जा सकती है। अगर ऐसा करना संभव न हो, तो बीएमआई के साथ शरीर का कम-से-कम एक और माप लेने की सलाह है, जैसे कमर का घेरा, कमर और कूल्हे का अनुपात या कमर और लंबाई का अनुपात। मापने के तरीके और उनकी सीमाएँ व्यक्ति की उम्र, लिंग और आबादी की पृष्ठभूमि के मुताबिक होनी चाहिए।
समिति ने एक व्यावहारिक छूट भी बताई है। जिन लोगों का बीएमआई 40 किग्रा/मी² से अधिक है, उनमें बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि-जाँच के शरीर में बहुत अधिक चर्बी होने की संभावना मानी जा सकती है। मोटापे की पुष्टि हो जाने के बाद, चाहे अंगों और ऊतकों के काम में गड़बड़ी हो या न हो, यह देखना चाहिए कि मामला क्लिनिकल मोटापे का है या नहीं। यह फर्क इसलिए अहम है क्योंकि केवल अतिरिक्त चर्बी का पता चलने से सेहत पर उसके पूरे असर का पता नहीं चलता।
अलग-अलग आबादियों में जीन का अध्ययन
नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसी व्यापक समझ को अपनाकर क्लिनिकल मोटापे के आनुवंशिक आधार की जाँच की। शोध दल में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के 9 शोधकर्ता और ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी का 1 शोधकर्ता शामिल था। उन्होंने क्लिनिकल मोटापे से ग्रस्त 151,642 लोगों के आँकड़ों का विश्लेषण किया और उनकी तुलना ऐसे 128,874 लोगों से की जिन्हें मोटापे से ग्रस्त नहीं माना गया था। अध्ययन में अलग-अलग आनुवंशिक पृष्ठभूमियों वाले 5 समूहों के लोग शामिल थे।
आँकड़े ब्रिटिश बायोबैंक और अमेरिकी ऑल ऑफ अस कार्यक्रम से लिए गए। ब्रिटिश बायोबैंक में करीब आधे मिलियन लोगों से जुटाई गई जैविक, स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी जानकारी है। अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों का ऑल ऑफ अस कार्यक्रम सटीक चिकित्सा को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है। इसमें अमेरिका में रहने वाले 1 मिलियन या उससे अधिक लोगों के आँकड़े जुटाने की योजना है। इतने बड़े संसाधनों से शोधकर्ता यह जाँच सकते हैं कि नतीजे अलग-अलग आबादियों में भी दिखते हैं या नहीं, न कि सिर्फ़ किसी छोटे नमूने या एक ही आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले समूह में।
विश्लेषण में शोधकर्ताओं को क्लिनिकल मोटापे से जुड़े 127 स्वतंत्र आनुवंशिक स्थान मिले। इनमें से 63 स्थानों का बीएमआई से सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण संबंध नहीं दिखा। इसका यह अर्थ नहीं है कि बीएमआई बेकार है। बल्कि नतीजे संकेत देते हैं कि जब मोटापे की पहचान में स्वास्थ्य और शरीर से जुड़े व्यापक पैमानों को शामिल किया जाता है, तो आनुवंशिक पहलू के ऐसे हिस्से भी सामने आ सकते हैं जिन्हें केवल वज़न और लंबाई पर केंद्रित अध्ययन नहीं पकड़ पाते।
खून की चर्बी से जुड़ा आनुवंशिक संकेत
दोनों विश्लेषणों में rs15285 नाम के एक खास आनुवंशिक बदलाव का फर्क दिखाई दिया। यह बदलाव LPL जीन के एक नियामक हिस्से में है। LPL जीन शरीर को लिपोप्रोटीन लाइपेज़ नाम का एंज़ाइम बनाने के निर्देश देता है। यह एंज़ाइम खून में मौजूद चर्बी, जिसमें ट्राइग्लिसराइड भी शामिल हैं, को सँभालने की प्रक्रिया में मदद करता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस आनुवंशिक बदलाव का संबंध LPL जीन की सक्रियता से जुड़े संकेतों और खून में ट्राइग्लिसराइड की अधिक मात्रा से था। यह संबंध संभावित रूप से अहम है, क्योंकि खून में मौजूद चर्बी और दूसरे कण शरीर की चयापचय प्रक्रियाओं से प्रभावित होते हैं और उनमें गड़बड़ी दिल से जुड़े जोखिमों के साथ हो सकती है। फिर भी, किसी आनुवंशिक संबंध का दिखना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि उस बदलाव से कोई खास बीमारी होती है। इससे यह भी तय नहीं होता कि उस बदलाव वाले हर व्यक्ति के लिए कौन-सा चिकित्सा कदम सही होगा।
यह नतीजा बताता है कि मोटापे को समझना बीएमआई के आधार पर लोगों को क्रम में रखने से कहीं अधिक पेचीदा हो सकता है। कुछ आनुवंशिक अंतर खून की चर्बी को सँभालने जैसी खास प्रक्रियाओं से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन उनका असर वज़न और लंबाई के अनुपात में उसी तरह दिखाई दे, यह ज़रूरी नहीं है। जीन के अंतर से लेकर खून की चर्बी में बदलाव और फिर स्वास्थ्य जोखिम तक की कड़ियों को समझने के लिए और अध्ययन करने होंगे।
कई आनुवंशिक संकेतों को जोड़कर बनी रेटिंग
शोधकर्ताओं ने केवल अलग-अलग आनुवंशिक स्थानों को नहीं देखा। उन्होंने क्लिनिकल मोटापे के लिए एक बहु-जीन रेटिंग भी बनाई। इसमें बड़ी संख्या में आनुवंशिक बदलावों की जानकारी जोड़कर यह आँका जाता है कि किसी खास लक्षण से जुड़ी आनुवंशिक प्रवृत्ति कितनी है। इस रेटिंग का संबंध बीएमआई, शरीर में चर्बी के अनुपात और कमर के घेरे से मिला। यानी यह शरीर के कई अलग-अलग मापों से जुड़ी थी, केवल बीएमआई से नहीं।
जब इस रेटिंग की तुलना बीएमआई पर आधारित आनुवंशिक रेटिंग से की गई, तो नई रेटिंग का दिल और रक्तवाहिनियों से जुड़े जोखिम कारकों तथा सूजन से जुड़े प्रोटीन के संकेतों के साथ अधिक मज़बूत संबंध दिखा। इन प्रोटीन संकेतों में इंटरल्यूकिन-6, फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर 21 और हेपेटोसाइट ग्रोथ फैक्टर शामिल थे। नई रेटिंग का संबंध इंसुलिन के असर में कमी से जुड़े संकेतों से भी था। इनमें एडिपोनेक्टिन, रेज़िस्टिन, लेप्टिन और लेप्टिन रिसेप्टर शामिल थे।
इस तुलना का यह मतलब नहीं है कि नई रेटिंग सूजन या इंसुलिन प्रतिरोध का निदान करती है, और न ही यह आम चिकित्सा जाँचों की जगह लेती है। यह कई आनुवंशिक संकेतों को जोड़ने का एक सांख्यिकीय तरीका है। इसके बाद देखा जाता है कि इन संकेतों का मेल दूसरे स्वास्थ्य लक्षणों से बैठता है या नहीं। नतीजे बताते हैं कि भविष्य में यह कुछ समूहों में जोखिम का बेहतर अंदाज़ लगाने में मददगार हो सकती है। लेकिन इसका व्यावहारिक महत्व तभी साबित होगा, जब यह दिखे कि डॉक्टरों के पास उपलब्ध जाँचों और व्यक्ति के स्वास्थ्य इतिहास से आगे बढ़कर यह सचमुच उपयोगी जानकारी देती है।
दिल के दौरे और स्ट्रोक से संभावित संबंध
शोध दल के अनुसार, क्लिनिकल मोटापे की आनुवंशिक रेटिंग, बीएमआई पर आधारित रेटिंग की तुलना में, 3 अहम घटनाओं के लिए आनुवंशिक जोखिम के अलग-अलग स्तर पहचानने में बेहतर रही। ये घटनाएँ थीं दिल की मांसपेशी तक खून पहुँचने में रुकावट के कारण होने वाला दिल का दौरा, हार्ट फेलियर और स्ट्रोक। बेहतर पहचान का अर्थ यह है कि सांख्यिकीय मॉडल लोगों को उनके तुलनात्मक जोखिम के अनुसार कुछ अधिक सटीकता से अलग कर सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि किसी एक व्यक्ति को बीमारी होने की निश्चित भविष्यवाणी की जा सकती है।
शोधकर्ताओं ने अमेरिका के 4 लंबे समय से चल रहे स्वास्थ्य अध्ययनों में इस सुधार को परखा। पहला था एथेरोस्क्लेरोसिस कम्युनिटीज़ स्टडी, जिसे संक्षेप में ARIC कहा जाता है। इस अध्ययन में एथेरोस्क्लेरोसिस के ऐसे जोखिम कारकों पर भी ध्यान दिया गया जो अभी चिकित्सकीय जाँच में साफ़ दिखाई नहीं देते थे। इसमें दिल की बीमारियों के जोखिम भी शामिल थे। इन बीमारियों में दिल का दौरा, कोरोनरी धमनी रोग, स्ट्रोक और हार्ट फेलियर शामिल हैं। इसमें अमेरिका के करीब 16,000 वयस्कों ने हिस्सा लिया था।
दूसरा अध्ययन मल्टी-एथनिक स्टडी ऑफ एथेरोस्क्लेरोसिस था, जिसे MESA के नाम से जाना जाता है। इसे अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के हृदय, फेफड़े और रक्त संस्थान का समर्थन मिला। यह अध्ययन लक्षण सामने आने से पहले दिल और रक्तवाहिनियों से जुड़ी बीमारी की विशेषताओं पर ध्यान देता है। साथ ही, यह उन कारकों का पता लगाता है जो बीमारी के स्पष्ट रूप लेने या शुरुआती बदलावों के बढ़ने का संकेत दे सकते हैं। 2000 से 2002 के बीच इसकी शुरुआती जाँच में 6,814 वयस्क शामिल थे।
तुलना में फ्रामिंघम हार्ट स्टडी के आँकड़े भी शामिल थे। यह अध्ययन 1948 में शुरू हुआ था, ताकि दिल और रक्तवाहिनियों की बीमारियों में योगदान देने वाले आम लक्षणों और कारकों की पहचान की जा सके। 1971 से बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन इस अध्ययन में अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के लिए अनुबंधित संस्था और शैक्षणिक साझेदार की भूमिका निभा रहा है। अध्ययन के अलग-अलग समूहों में कुल 15,400 से अधिक प्रतिभागियों के आँकड़े जुटाए गए हैं।
चौथा अध्ययन विमेन्स हेल्थ इनिशिएटिव था। इसे पहली बार 1992 में आर्थिक सहायता मिली थी। यह रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं में दिल की बीमारी, स्तन कैंसर, बड़ी आँत और मलाशय के कैंसर तथा हड्डियों के कमजोर होने से बचाव के तरीकों पर केंद्रित है। इसमें 161,808 महिलाओं ने नाम दर्ज कराया था। अलग-अलग मकसद और विशेषताओं वाले इन चार अध्ययनों में रेटिंग को परखने से यह देखने का मौका मिला कि उसका संबंध स्वतंत्र आँकड़ों और अलग-अलग समूहों में भी बना रहता है या नहीं।
उम्मीद जगाते नतीजे, मगर क्लिनिक में इस्तेमाल अभी दूर
शोधकर्ताओं ने अध्ययन के शुरुआती संस्करण में बताया कि प्रतिभागियों को मोटापे की आनुवंशिक प्रवृत्ति के निम्न, मध्यम और उच्च स्तरों में बाँटने पर, बीएमआई पर आधारित रेटिंग के बजाय क्लिनिकल मोटापे की रेटिंग इस्तेमाल करने से 35% लोगों की जोखिम श्रेणी बदल गई। श्रेणी बदलने का मतलब है कि नए मॉडल के अनुसार कुछ लोग अलग जोखिम समूह में आ गए। इसका यह अर्थ नहीं है कि उनमें से 35% को कोई बीमारी हो गई या केवल श्रेणी बदलने से उनकी सेहत के नतीजे अपने-आप बेहतर हो जाएँगे।
शोध दल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बीएमआई के आकलन से आगे बढ़कर इन रेटिंगों को निदान, जोखिम का वर्गीकरण या स्थिति के प्रबंधन में इस्तेमाल करने से पहले और शोध की ज़रूरत है। मोटापे के कुछ दुर्लभ रूपों में आनुवंशिक जाँच से खास इलाज चुनने में मदद मिल सकती है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली बहु-जीन रेटिंग हर व्यक्ति के लिए सही या बेहतर इलाज तय कर पाएगी। रेटिंग की उपयोगिता इस बात से भी प्रभावित हो सकती है कि उसे बनाने वाले आँकड़ों में अलग-अलग आबादियों का कितना अच्छा प्रतिनिधित्व है।
इस काम के नतीजे 2026 में अमेरिकन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स की सालाना बैठक में शोध पोस्टर के रूप में पेश किए गए। यह बैठक 20 से 24 अक्टूबर तक मॉन्ट्रियल में हुई। शोध का शीर्षक था क्लिनिकल मोटापे का जीनोम-स्तरीय विश्लेषण और बहु-जीन भविष्यवाणी। अध्ययन के पत्राचार के लिए ज़िम्मेदार सह-लेखक थे सुहैल ज़ाहिद, एमडी और पीएचडी, जो जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के सिकरॉन सेंटर फॉर द प्रिवेंशन ऑफ कार्डियोवैस्कुलर डिज़ीज़ में शोधकर्ता हैं, और एलेक्सिस पटेल, पीएचडी। पटेल विश्वविद्यालय के मेलोन सेंटर फॉर इंजीनियरिंग इन हेल्थकेयर की निदेशक और डेटा साइंस एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संस्थान में रणनीति तथा साझेदारी की निदेशक हैं। शोध दल ने अध्ययन का शुरुआती संस्करण 22 मई को भी प्रकाशित किया था।
निष्कर्ष
नतीजे इस विचार को मज़बूती देते हैं कि क्लिनिकल मोटापे से जुड़ी आनुवंशिक और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का कुछ हिस्सा केवल बीएमआई से सामने नहीं आता। शोधकर्ताओं को इससे जुड़े 127 आनुवंशिक स्थान मिले, जिनमें से 63 का बीएमआई से महत्वपूर्ण संबंध नहीं था। उन्होंने ऐसी आनुवंशिक रेटिंग भी बनाई जिसका संबंध दिल की सेहत, सूजन और इंसुलिन प्रतिरोध के संकेतों से था। बताए गए विश्लेषणों में इस रेटिंग ने दिल के दौरे, हार्ट फेलियर और स्ट्रोक के जोखिम को अलग-अलग पहचानने में बेहतर प्रदर्शन किया। अमेरिका के 4 बड़े अध्ययनों में इसकी उपयोगिता परखी गई और शुरुआती विश्लेषण में 35% प्रतिभागियों की जोखिम श्रेणी बदल गई। फिर भी, यह अभी शोध का नतीजा है, क्लिनिक में इस्तेमाल के लिए तैयार तरीका नहीं। इसकी अतिरिक्त उपयोगिता साबित करना बाकी है। व्यापक संदेश यह है कि मोटापे का आकलन एक संख्या तक सीमित रखने के बजाय शरीर की चर्बी, उसके फैलाव, अंगों के कामकाज और व्यक्ति की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को साथ देखकर अधिक सही बनाया जा सकता है।