आसान शब्दों में
अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ऐसी व्यवस्था पर काम कर रहे हैं जिससे उनकी सेनाएँ ज़रूरी जानकारी एक-दूसरे तक जल्दी पहुँचा सकें। पहले अलग-अलग प्रणालियों के कारण जानकारी हाथ से एक जगह से दूसरी जगह पहुँचानी पड़ती थी। नए अभ्यासों में सुधार दिखा है, लेकिन काम अभी पूरा नहीं हुआ। ड्रोन जैसे नए साधनों से मिलने वाली जानकारी साझा करना भी अब अधिक ज़रूरी हो गया है।
जब सेनाएँ एक-दूसरे को संदेश नहीं भेज पातीं
अलग-अलग देशों की सेनाएँ जब एक ही अभ्यास में साथ काम करती हैं, तब साझा संपर्क की अहमियत साफ दिखाई देती है। जापान में हुए एक त्रिपक्षीय अभ्यास में अमेरिकी, जापानी और ऑस्ट्रेलियाई सेनाओं ने हिस्सा लिया। वहाँ आवाज़ और दूसरी जानकारी साझा करने में इतनी दिक्कत आई कि सेनाएँ अपनी-अपनी प्रणालियों की मदद से घटनाओं की एक साझा तस्वीर नहीं बना पाईं। जानकारी को एक साथ दिखाने के लिए अभ्यास में शामिल लोगों को उसे हाथ से दूसरी प्रणाली में दर्ज करना पड़ा।
अमेरिकी सेना की प्रशांत क्षेत्रीय कमान के प्रमुख जनरल रोनाल्ड क्लार्क ने पद संभालने के एक महीने बाद इस घटना का ज़िक्र किया। यह केवल संपर्क में देरी का मामला नहीं था। जानकारी सीधे एक पक्ष से दूसरे पक्ष तक पहुँचाने का रास्ता न होने से सभी के लिए हालात की एक जैसी और साझा तस्वीर बनाना मुश्किल हो गया था। ऐसी तस्वीर में यह समझ शामिल होती है कि अपनी सेनाएँ कहाँ हैं और अभ्यास क्षेत्र में क्या हो रहा है। इसके बिना हर पक्ष अलग या देर से मिली जानकारी पर निर्भर रह सकता है।
क्लार्क ने उन्नत रक्षा सहयोग की बातों और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर बताया। वॉशिंगटन में उन्होंने ओकस समझौते से जुड़े एक हस्ताक्षर समारोह में हिस्सा लिया था। इस समझौते में संवेदनशील रक्षा तकनीक साझा करने की व्यवस्था है। फिर भी, मैदान में अलग-अलग देशों की सेनाओं के बीच संपर्क के लिए कई बार जानकारी को एक उपकरण से दूसरे उपकरण तक हाथ से पहुँचाना पड़ता था। इसका मतलब यह नहीं कि उन्नत तकनीक कहीं मौजूद ही नहीं थी। असली समस्या यह थी कि साझेदार देशों की प्रणालियाँ हमेशा उस तरह जानकारी साझा नहीं कर पाती थीं, जैसी संयुक्त अभ्यासों में ज़रूरत होती है।
एक ही प्रणाली की सीमाओं से आगे
अमेरिकी सेना कई वर्षों से ऐसे संपर्क रास्ते बनाने और आज़माने पर काम कर रही है जिनका इस्तेमाल क्षेत्र में संकट या संघर्ष की स्थिति में मित्र और साझेदार सेनाएँ कर सकें। इसी काम का एक हिस्सा प्रशांत मिशन नेटवर्क है। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी कमान के व्यापक नेटवर्क का हिस्सा है। पहले इसे इंडोपैकॉम मिशन नेटवर्क कहा जाता था। इसका इस्तेमाल एक-एक इकाई के बीच स्थानीय संपर्क से आगे, बड़े रणनीतिक और संचालन के स्तर पर किया जाता है।
इस नेटवर्क को किसी एक ऐसे उपकरण की तरह नहीं देखना चाहिए जो संपर्क की हर समस्या अपने-आप हल कर दे। इसका उद्देश्य अलग-अलग सैन्य प्रणालियों और कामकाजी वातावरणों को जोड़ना है, ताकि वे जानकारी आगे भेज और साझा कर सकें। इस व्यवस्था से दर्जनों देश जुड़े हैं। अमेरिकी सेना ने इसके ज़रिए यह भी परखा कि क्या वह अपने मित्रों और साझेदारों को जानकारी भेज सकती है और क्या वे उन्हीं आँकड़ों को देख सकते हैं। व्यावहारिक लक्ष्य यह है कि हर पक्ष के पास मौजूद जानकारी और दूसरे पक्षों की पहुँच के बीच की खाई कम हो।
ऐसे संपर्क का फायदा केवल तकनीकी कड़ी बन जाने से नहीं मिलता। जानकारी उस व्यक्ति या दल तक ऐसे रूप में पहुँचनी चाहिए जिसका वह इस्तेमाल कर सके, और उसे पहुँचाने का तरीका नेतृत्व और तालमेल की ज़रूरतों के अनुकूल होना चाहिए। जब कई पक्ष जानकारी साझा करते हैं, तो वे चल रही गतिविधियों की एक-दूसरे से अधिक मेल खाती तस्वीर बना सकते हैं। इससे हर पक्ष के अलग-अलग और संभवतः अधूरे नज़रिए के आधार पर फैसले लेने की नौबत कम होती है।
अलग-अलग तरह के दो परीक्षण
इस साल के सैन्य अभ्यासों में नेटवर्क को परखने के दो व्यावहारिक मौके मिले, लेकिन दोनों की परिस्थितियाँ अलग थीं। बड़े पैमाने के बालिकातान अभ्यास में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने प्रशांत मिशन नेटवर्क का इस्तेमाल किया। इसका मकसद अभ्यास क्षेत्र में शामिल सेनाओं की स्थिति की ताज़ा तस्वीर पाना था। अमेरिकी सेना के मुताबिक, इस अभ्यास में वास्तविक मैदान पर चल रही गतिविधियों के दौरान और कई स्तरों पर जानकारी पर नज़र रखना संभव हुआ।
कुछ महीने बाद तीनों देश यामा सकुरा 91 अभ्यास में फिर एक साथ आए। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाला यह सालाना सैन्य अभ्यास 10 सितंबर को समाप्त हुआ। इसमें कमान केंद्रों के अभ्यास के दौरान नकली हालात से जुड़ी जानकारी सीधे साझा करने पर ध्यान दिया गया। दोनों परीक्षणों का फर्क अहम है। बालिकातान में चुनौती वास्तविक अभ्यास क्षेत्र में ताज़ा जानकारी दिखाने की थी, जबकि यामा सकुरा 91 में कमान केंद्रों के काल्पनिक परिदृश्य के भीतर जानकारी के आदान-प्रदान को परखा गया।
इनमें से कोई भी अभ्यास दूसरे की जगह नहीं लेता। कमान केंद्र में होने वाला अभ्यास यह जाँचने का मौका देता है कि नकली हालात में जानकारी नेतृत्व के अलग-अलग स्तरों के बीच किस तरह पहुँचती है। मैदान में होने वाला अभ्यास दिखाता है कि सेनाओं के आगे बढ़ने और बड़े इलाके में फैलने पर जानकारी साझा करने में क्या मुश्किलें आती हैं। अमेरिकी सेना के विवरण के अनुसार, दोनों अभ्यासों ने सीधे जानकारी साझा करने के दो अलग रूप दिखाए। एक में नकली हालात से जुड़ी जानकारी थी, जबकि दूसरे में वास्तविक अभ्यास क्षेत्र और कई स्तरों पर ताज़ा जानकारी का इस्तेमाल हुआ।
एक से अधिक तरह के अभ्यास में नेटवर्क का इस्तेमाल करने से उसकी क्षमता की अधिक पूरी तस्वीर मिल सकती है। नकली परिदृश्य में जानकारी सफलतापूर्वक भेज पाना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि मैदान में भी संपर्क उसी तरह काम करेगा। इसी तरह, अभ्यास स्थल पर जानकारी बाँटने से कमान के तालमेल से जुड़े हर सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। इसलिए इन दोनों परीक्षणों की तुलना उनके अलग-अलग पहलुओं के कारण उपयोगी है, न कि इसलिए कि वे एक जैसे चरण हैं।
साझेदारों के लिए एक ही तस्वीर देखने का मतलब
क्लार्क ने बताया कि साझेदारों के लिए बनाए गए कामकाजी नेटवर्क अब जानकारी आगे भेज और साझा कर सकते हैं, जो पहले संभव नहीं था। इससे कमान संभाल रहे अधिकारी लक्ष्य तय करने में काम आने वाली जानकारी भेज सकते हैं और हालात की साझा तस्वीर बना सकते हैं। ऐसा करते समय उन्हें पहले की तरह एक कामकाजी प्रणाली से दूसरी प्रणाली तक जानकारी हाथ से ले जाने पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
जानकारी साझा करने का यह अर्थ नहीं है कि कोई पक्ष अपनी प्रणालियाँ या ज़िम्मेदारियाँ छोड़ दे। इसका मतलब यह हो सकता है कि ज़रूरी जानकारी उन पक्षों को मिल सके जिन्हें साझा काम के दौरान उसकी आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, जब किसी नौसैनिक कमांडर को ज़मीन पर चल रही गतिविधियों से जुड़ी जानकारी मिलती है, तो वह व्यापक सैन्य तालमेल का हिस्सा बन सकती है। वह जानकारी केवल एक पक्ष की प्रणाली तक सीमित नहीं रहती। यह इस बात पर निर्भर करता है कि नेटवर्क उसे पहुँचा पाता है या नहीं और साझेदार उसे अपने काम में शामिल कर पाते हैं या नहीं।
क्लार्क ने इस तरह के तालमेल का उदाहरण ब्रिगेडियर जनरल बर्नार्ड हैरिंगटन के काम से दिया। हैरिंगटन हिंद-प्रशांत में अमेरिकी सेना की बहु-क्षेत्रीय कमान और 7वीं इन्फैंट्री डिवीज़न का नेतृत्व करते हैं। वे दूर तक सटीक मार करने वाली ज़मीनी प्रणालियों, सेंसरों, अंतरिक्ष क्षमताओं, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और साइबर क्षमताओं से जुड़ी जानकारी एक साथ ला सकते हैं। फिर वे इसे प्रशांत बेड़े के कमांडर एडमिरल स्टीफन कोहलर के साथ साझा कर सकते हैं, जिन्होंने अभ्यास का नेतृत्व किया था। इसके बाद यह जानकारी सेनाओं के साझा कामकाज का हिस्सा बन सकती है।
इस उदाहरण का मुख्य संदेश अलग-अलग तरह की जानकारी और क्षमताओं को जोड़कर तालमेल के लिए एक व्यापक तस्वीर बनाना है। सेंसरों से मिले आँकड़े, ज़मीनी सैन्य क्षमता और अंतरिक्ष या इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी एक ही काम नहीं करतीं। फिर भी, इन्हें साझा करने से कमांडरों को उपलब्ध साधनों की अधिक पूरी समझ मिल सकती है। इसका उपयोग इस बात पर निर्भर करता है कि नेटवर्क क्या पहुँचा सकता है और कमांडर उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे करने का फैसला करते हैं। केवल आँकड़ों को एक जगह इकट्ठा कर देना काफी नहीं है।
ड्रोन के दौर में बदलती तकनीकी ज़रूरत
प्रशांत नेटवर्क को बेहतर बनाने का काम अमेरिकी सेना में नई तकनीक और जानकारी के नए स्रोत शामिल करने की कोशिश के साथ-साथ चल रहा है। इनमें ड्रोन भी शामिल हैं। जैसे-जैसे जानकारी देखने या इकट्ठा करने वाले उपकरणों की संख्या बढ़ती है, यह जानना भी ज़रूरी होता जाता है कि वे क्या देख रहे हैं, उन्हें कैसे नियंत्रित किया जा सकता है और उनसे मिलने वाली जानकारी का फायदा कैसे उठाया जाए।
ड्रोन जानकारी का एक नया स्रोत होते हैं, लेकिन केवल उनका मौजूद होना यह पक्का नहीं करता कि उनसे मिली जानकारी पूरी सेना के काम आएगी। अगर वह ऐसी संपर्क-व्यवस्था में ही बंद रहे जो साझेदारों या संबंधित कमांडरों तक नहीं पहुँचती, तो साझा तस्वीर बनाने में उसका योगदान कम हो सकता है। इसके उलट, अगर उस जानकारी को आगे भेजकर दूसरे स्रोतों से मिले आँकड़ों के साथ जोड़ा जा सके, तो मैदान में इस्तेमाल हो रहे साधनों की विविधता बढ़ने के साथ सेनाओं के बीच जानकारी साझा करने की अहमियत भी बढ़ सकती है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि सेना किसी उपकरण को चला सकती है या उससे जानकारी जुटा सकती है। यह भी देखना होगा कि उपकरणों और उनसे मिली जानकारी को कमान की व्यवस्था तथा साझेदार सेनाओं से कैसे जोड़ा जाए। जानकारी के स्रोत जितने विविध होंगे, उतना ही अहम होगा यह तय करना कि कौन उसे देख सकता है, वह उस तक कैसे पहुँचेगी और क्या वह उसे अपनी योजना में इस्तेमाल कर पाएगा। ये तकनीकी और संचालन से जुड़े सवाल एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसीलिए बहुराष्ट्रीय अभ्यासों में संपर्क को परखना तैयारी का अहम हिस्सा बन गया है।
ठोस सुधार, लेकिन समस्या का अंत नहीं
क्लार्क के मुताबिक, नेटवर्क ने ऐसी समस्या पर काम किया है जो कई वर्षों से निराशा का कारण बनी हुई थी। वे इसे इस क्षेत्र में काम करने का एक अहम नया तरीका मानते हैं। फिर भी, अभ्यासों से जो बात सामने आई है, वह जानकारी आगे भेजने और साझा करने की क्षमता में सुधार है। इससे यह साबित नहीं होता कि सभी भाग लेने वाले देशों की प्रणालियाँ एक जैसी हो गई हैं या साथ काम करने की सारी मुश्किलें खत्म हो गई हैं।
अभ्यास आम तौर पर जानी-पहचानी परिस्थितियों में कुछ चुने हुए पहलुओं को परखते हैं। वे सेनाओं को यह समझने का मौका देते हैं कि क्या ठीक काम कर रहा है और कहाँ सुधार की ज़रूरत है। इस बार कमान केंद्रों में नकली हालात से जुड़ी जानकारी साझा करने की जाँच हुई। साथ ही, वास्तविक अभ्यास क्षेत्र में और एक से अधिक स्तरों पर ताज़ा जानकारी पहुँचाने को भी परखा गया। ये अहम नतीजे हैं, क्योंकि उनसे पता चलता है कि काम केवल विचार या योजना तक सीमित नहीं रहा। कई देशों की भागीदारी वाले अभ्यासों में अब इसका प्रयोग करके देखा जा रहा है।
नेटवर्क कितना कारगर है, यह इस बात से भी जुड़ा है कि सेनाओं को उसका इस्तेमाल करने के लिए कैसे तैयार किया जाता है। तकनीक जानकारी के आदान-प्रदान का रास्ता देती है, लेकिन उस जानकारी को फैसलों और तालमेल में बदलने के लिए भाग लेने वालों को यह समझना होता है कि उन्हें क्या मिला है और उसे अपने काम में कैसे शामिल करना है। इसलिए साझा क्षमता बनाने में संपर्क तकनीक विकसित करना, उसका परीक्षण करना और अलग-अलग परिस्थितियों में साझेदारों के साथ उसका इस्तेमाल करना—तीनों शामिल हैं।
निष्कर्ष
अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे उनकी सेनाएँ पहले की तरह अटकती जानकारी के बजाय आँकड़े साझा कर सकें और हालात की मिलती-जुलती तस्वीर देख सकें। बालिकातान 26 में वास्तविक अभ्यास क्षेत्र में ताज़ा जानकारी साझा करने को परखा गया, जबकि 10 सितंबर को समाप्त हुए यामा सकुरा 91 में कमान केंद्रों के अभ्यास के दौरान नकली हालात की जानकारी के आदान-प्रदान पर ध्यान दिया गया। अमेरिकी सेना के अनुसार, नेटवर्क ने ऐसी जानकारी साझा करना संभव किया जो पहले उपलब्ध नहीं थी। इससे ज़मीनी, नौसैनिक और दूसरी तरह की जानकारी के बीच तालमेल बनाने में मदद मिल सकती है।
इस काम की अहमियत इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि सेना अधिक तकनीक, खासकर ड्रोन, इस्तेमाल करने की ओर बढ़ रही है। उनसे मिलने वाली जानकारी को सही समय पर पहुँचाना, समझना और काम में लाना ज़रूरी होगा। लेकिन संपर्क बेहतर होने का मतलब यह नहीं कि प्रणालियों का पूरा मेल हो गया है। अभ्यास अब भी नेटवर्क की व्यावहारिक सीमाएँ समझने और सेनाओं के बीच सहयोग सुधारने का ज़रिया हैं। बड़ा लक्ष्य यही है कि भाग लेने वाले देश ज़रूरी जानकारी समय पर साझा कर सकें, न कि उसे अलग-अलग प्रणालियों के बीच हाथ से पहुँचाने को मजबूर हों।