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जब परमाणु पलक झपकते ही बदलते हैं: नई, छोटी एक्स-रे मशीन ने खोला पदार्थों का राज़।

आसान भाषा में

वैज्ञानिकों ने एक छोटा एक्स-रे स्रोत बनाया है, जो किसी पदार्थ में बहुत तेज़ी से होने वाले बदलावों को पकड़ सकता है। उन्होंने लेज़र की रोशनी से एक क्वांटम पदार्थ को गर्म किया और फिर उसकी बनावट में आए बदलावों को देखा। यह तरीका आगे चलकर नए इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों और प्रोटीनों को समझने में मदद कर सकता है।

परमाणुओं की हलचल को देखना क्यों ज़रूरी है?

ठोस पदार्थ हमें स्थिर दिखाई देते हैं, लेकिन परमाणुओं और क्वांटम कणों के स्तर पर उनमें लगातार हलचल हो सकती है। रोशनी या गर्मी पड़ने पर परमाणुओं की जगह बदल सकती है और इलेक्ट्रॉन नए ढंग से व्यवस्थित हो सकते हैं। इससे पदार्थ के गुण भी बदल जाते हैं। यह समझने के लिए कि बदलाव क्यों और कैसे होता है, केवल पहले और बाद की तस्वीरें काफी नहीं हैं। बदलाव के दौरान क्या घटता है, यह भी देखना पड़ता है।

इसी काम के लिए वैज्ञानिक समय के साथ बदलते पदार्थ का माप लेते हैं। पहले वे लेज़र की एक छोटी चमक से नमूने को उत्तेजित करते हैं। फिर तय समय बीतने पर एक्स-रे की चमक भेजकर उसकी अंदरूनी बनावट की जाँच करते हैं। दोनों चमकों के बीच का समय बदलते रहने से पदार्थ में आए बदलावों की कई तस्वीरें मिलती हैं। यह तेज़ गति की तस्वीरों को एक के बाद एक देखने जैसा है, लेकिन यहाँ कैमरे में दिखने वाली चीज़ों के बजाय नमूने की बेहद बारीक बनावट दर्ज होती है।

ऐसे कुछ बदलाव एक फेम्टोसेकंड में होते हैं—यानी एक सेकंड के दस लाख अरबवें हिस्से में। उन्हें पकड़ने के लिए बहुत छोटी चमकें बनाने वाला स्रोत और उनके समय को बेहद सटीक ढंग से मिलाने की व्यवस्था चाहिए। केवल ताकतवर एक्स-रे होना काफी नहीं है। जाँच के लिए भेजी जाने वाली एक्स-रे की चमक को नमूने तक ठीक उसी समय पहुँचना चाहिए, जब लेज़र से शुरू हुआ बदलाव उस खास अवस्था में हो जिसे वैज्ञानिक देखना चाहते हैं।

छोटी प्रयोगशाला अब शोध के लिए तैयार

एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी की टीम ने ASU X-Beams नाम की सुविधा इस उद्देश्य से विकसित की है कि कम जगह में ही एक्स-रे की मदद से पदार्थों का उन्नत अध्ययन किया जा सके। बड़े एक्स-रे केंद्रों के मुकाबले यह सुविधा कम जगह में बनाई गई है। इस परियोजना को अमेरिका के राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन के साथ-साथ निजी दान से भी मदद मिली। 31 अक्टूबर 2026 को जारी घोषणा के अनुसार, उपकरण ने कामकाज की एक अहम जाँच सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। अब यह सुविधा दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए राष्ट्रीय शोध केंद्र के रूप में काम शुरू करने की ओर बढ़ रही है।

यहाँ कामकाज की जाँच का मतलब केवल मशीन को चालू करना नहीं था। यह देखना भी ज़रूरी था कि उसके अलग-अलग हिस्से मिलकर असली वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते हैं या नहीं। CXLS नाम के छोटे एक्स-रे स्रोत ने बेहद तेज़ चमकें बनाने और क्वांटम पदार्थ में समय के साथ हो रहे बदलावों को मापने की अपनी क्षमता दिखाई। विश्वविद्यालय के मुताबिक, छोटे एक्स-रे उपकरणों की इस श्रेणी में यह एक अनोखी उपलब्धि है और सुविधा में आगे होने वाले प्रयोगों की शुरुआत भी।

विश्वविद्यालय की CXFEL प्रयोगशाला का नेतृत्व भौतिकी के प्रोफेसर और प्रयोगशाला निदेशक अरविंदर संधू करते हैं। बड़ी टीम में करीब 80 शोधकर्ता और विशेषज्ञ शामिल हैं। इनमें लेज़र, कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग और जीवविज्ञान के जानकार भी हैं। इतनी विविधता बताती है कि इस तरह का एक्स-रे स्रोत बनाना केवल भौतिकी का काम नहीं है। इसमें प्रकाश व्यवस्था, मापने वाले उपकरण, सॉफ़्टवेयर और इंजीनियरिंग के हिस्सों को साथ मिलाकर ऐसा साधन तैयार करना पड़ता है, जिसे कई तरह के वैज्ञानिक सवालों पर इस्तेमाल किया जा सके।

क्वांटम पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की बदलती व्यवस्था

उपकरण को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने 1T-टैंटलम डाइसल्फाइड नाम का पदार्थ चुना, जिसका रासायनिक सूत्र TaS2 है। इसमें इलेक्ट्रॉन और परमाणु अलग-अलग तरह की अवस्थाओं में व्यवस्थित हो सकते हैं। इसके गुणों पर वैज्ञानिक अब भी शोध कर रहे हैं। इस पदार्थ में आवेश-घनत्व तरंगें भी बनती हैं। ये ऐसे ढाँचे हैं जो पदार्थ के भीतर इलेक्ट्रॉनों के फैलाव से जुड़े होते हैं। इन्हें किसी एक इलेक्ट्रॉन की अलग-थलग हलचल के बजाय पूरे क्रिस्टल में दोहराए जाने वाले सामूहिक क्रम की तरह समझना बेहतर है।

प्रयोग में टीम ने नमूने को गर्म करने और उत्तेजित करने के लिए निकट-अवरक्त लेज़र की 800 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य वाली चमक इस्तेमाल की। पदार्थ के प्रतिक्रिया देने के बाद उसकी बनावट को एक्स-रे की चमकों से जाँचा गया। एक्स-रे की किरणें नमूने से टकराकर अलग-अलग दिशाओं में बिखरती हैं और उनसे बना ढाँचा परमाणुओं तथा इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था की जानकारी देता है। इस ढाँचे को एक डिटेक्टर पर दर्ज करके वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि पदार्थ की बनावट में क्या बदलाव आया।

प्रयोग की सबसे अहम शर्त यह थी कि लेज़र की चमक और एक्स-रे की चमक नमूने तक लगभग एक ही समय पहुँचे—उनके बीच का अंतर 1 नैनोसेकंड से अधिक न हो। नैनोसेकंड, फेम्टोसेकंड से बहुत लंबा समय है, फिर भी इस सीमा के भीतर दोनों चमकों का तालमेल बनाए रखना प्रयोग के लिए ज़रूरी था। अगर जाँच करने वाली एक्स-रे गलत समय पर पहुँचती, तो माप उस अवस्था को नहीं दिखाता जिसे वैज्ञानिक देखना चाहते थे। तब तक पदार्थ एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना शुरू कर चुका हो सकता था।

नए रूप के बनने की शुरुआती झलक

कमरे के तापमान पर इस पदार्थ में आवेश-घनत्व तरंगों का एक लगभग नियमित क्रम होता है। इसमें इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल की जाली के साथ कुछ हद तक नियमित ढंग से व्यवस्थित रहते हैं। लेज़र से उत्तेजित करने पर नमूना कम व्यवस्थित और अधिक ऊर्जा वाली अवस्था की ओर बढ़ा, जिसे असंगत अवस्था कहा जाता है। इसलिए यह प्रयोग केवल गर्म किए गए पदार्थ की बाद की तस्वीर लेने तक सीमित नहीं था; इसमें समय के साथ बदलते क्रम को भी दर्ज किया गया।

मापों से पता चला कि नया रूप कैसे उभरता और फैलता है। शुरुआत में पदार्थ के भीतर बहुत छोटे क्षेत्र बने, जो धीरे-धीरे जुड़कर बड़े और अधिक एकसार क्षेत्र बन गए। टीम ने इस बदलाव को कुछ पिकोसेकंड से लेकर कई नैनोसेकंड तक के समय में देखा। एक पिकोसेकंड, एक सेकंड का एक लाख करोड़वाँ हिस्सा होता है। समय इतना छोटा होने के बावजूद, इन मापों से यह अहम जानकारी मिली कि उत्तेजित होने के बाद पदार्थ की बनावट किस तरह विकसित होती है।

इस तरह के माप यह समझने में मदद करते हैं कि पदार्थ में बदलाव पूरे नमूने में एक साथ होने वाली छलाँग भर नहीं है; वह जगह-जगह फैलते हुए भी आगे बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए, क्या पहले छोटे क्षेत्र बनते हैं और फिर आपस में जुड़ते हैं? या समय बीतने के साथ उनका ढाँचा किसी और तरह बदलता है? इन सवालों के जवाब पदार्थ के व्यवहार की अधिक साफ़ तस्वीर देते हैं। एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी में भौतिकी के सहायक प्रोफेसर और ऐसे मापों के विशेषज्ञ सैमुअल टिटेलबाउम ने बताया कि आँकड़ों में असंगत अवस्था का उभरना और छोटे क्षेत्रों के जुड़ने से उसका बढ़ना साफ़ दिखाई दिया।

एक्स-रे से प्रयोग को क्या मिलता है?

एक्स-रे से परमाणुओं की ऐसी फिल्म नहीं बनती जैसी साधारण कैमरे से दिखाई देने वाली चीज़ों की बनती है। इसके बजाय, नमूने के साथ एक्स-रे की प्रतिक्रिया का ढाँचा उसकी अंदरूनी बनावट के बारे में बताता है। वैज्ञानिक उत्तेजना और माप की प्रक्रिया को बार-बार दोहराते हैं और हर बार दोनों चमकों के बीच का समय बदलते हैं। फिर अलग-अलग समय पर मिले मापों को जोड़कर पदार्थ के विकास का क्रम तैयार किया जा सकता है। इसी तरह के क्रम को रूपक के तौर पर «अणुओं की फिल्म» कहा जाता है।

छोटी एक्स-रे चमकें इसलिए उपयोगी हैं कि माप उस समय हो जाए, इससे पहले कि पदार्थ अतिरिक्त गर्मी के कारण बदल जाए या प्रयोग के दौरान नमूने को नुकसान पहुँचे। जाँच का समय उस बदलाव से छोटा रखना, जिसका अध्ययन हो रहा है, एक ही माप में अलग-अलग अवस्थाओं के मिल जाने की आशंका घटाता है। लेज़र और एक्स-रे के बीच सटीक तालमेल से हर माप को उत्तेजित नमूने की एक खास समय की अवस्था से जोड़ा जा सकता है।

इस प्रयोग से यह संकेत मिलता है कि इसी तकनीक से TaS2 के अलावा दूसरे पदार्थों की भी जाँच की जा सकती है। परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों की बदलती व्यवस्था पर नज़र रखने से पता चल सकता है कि दूसरे पदार्थ रोशनी या गर्मी के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसे अध्ययन उन वैज्ञानिकों के लिए उपयोगी हैं जो यह जानना चाहते हैं कि किसी पदार्थ के इलेक्ट्रॉनिक या संरचनात्मक गुण क्यों बदलते हैं और वह किन हालात में एक अलग अवस्था में जाने लगता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत पदार्थों से जुड़ी उम्मीदें

TaS2 में आवेश-घनत्व तरंगों पर इसलिए भी ध्यान दिया जाता है कि वे भविष्य की इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों में काम आने वाले पदार्थों से जुड़ी हो सकती हैं। इस पदार्थ पर चर्चा करते समय जानकारी जमा करने, सेंसर और टोपोलॉजिकल क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे संभावित क्षेत्र सामने आते हैं। लेकिन इस प्रयोग का अर्थ यह नहीं है कि ये तकनीकें तैयार हो गई हैं या उपकरण ने कोई नया उत्पाद बना दिया है। इसका सीधा लाभ यह है कि वैज्ञानिकों को पदार्थ के बुनियादी व्यवहार को समझने का बेहतर साधन मिला है, जिससे आगे चलकर पदार्थों का आकलन और विकास किया जा सकता है।

गर्मी के प्रति पदार्थ की प्रतिक्रिया को देखना तापीय तनाव समझने में भी मददगार हो सकता है। इलेक्ट्रॉनिक हिस्से ऐसे हालात में काम करते हैं जहाँ तापमान बदल सकता है। यह जानना कि गर्म होने पर कोई पदार्थ अपनी बनावट कैसे बदलता है, काम करने के ढंग में बदलाव या खराबी के कुछ कारण समझने में मदद कर सकता है। फिर भी, मौजूदा अध्ययन का मकसद किसी इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड की उम्र जाँचना या बाज़ार में बिकने वाले उपकरण का डिज़ाइन परखना नहीं था। यह क्वांटम नमूने में बदलाव देखने की स्रोत की क्षमता की जाँच थी।

इस खबर को पढ़ते समय इन सीमाओं का ध्यान रखना ज़रूरी है। अभी की प्रत्यक्ष उपलब्धि यह है कि CXLS ने क्वांटम पदार्थ में तेज़ संरचनात्मक बदलावों को समय के साथ मापना संभव कर दिखाया है। आगे इसका व्यावहारिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि शोधकर्ता इसकी मदद से क्या-क्या माप और समझ पाते हैं। बदलाव के शुरुआती चरणों को देख पाना वैज्ञानिकों को परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था तथा पदार्थ के गुणों के आपसी संबंध पर अधिक सटीक सवाल उठाने में मदद करेगा।

अगला पड़ाव: प्रोटीन और अधिक तेज़ स्रोत

TaS2 पर प्रयोग के बाद टीम की योजना प्रोटीन के क्रिस्टलों में समय के साथ होने वाले बदलावों का अध्ययन करने की है। शोधकर्ता ऐसे प्रोटीन चुनना चाहते हैं जिनकी भूमिका इंसानों की बीमारियों या नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़े कामों में अहम हो। समूह पहले बता चुका है कि उसने अपने पहले प्रोटीन की संरचना का पता लगाया था। अब उसका लक्ष्य केवल एक अवस्था में प्रोटीन का आकार बताना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि समय के साथ उनमें क्या बदलाव होते हैं।

यह अगला कदम दिखाता है कि एक ही तरह का उपकरण तेज़ संरचनात्मक बदलावों से जुड़े कई सवालों के जवाब खोजने में काम आ सकता है। प्रोटीन ऐसे अणु हैं जिनका आकार उनके काम से जुड़ा होता है। उनकी गति और बदलती बनावट का अध्ययन करने से शरीर में चलने वाली प्रक्रियाओं या काम के लिहाज़ से अहम तरीकों को समझने में मदद मिल सकती है। हालाँकि, टीम ने अभी यह नहीं बताया है कि किन प्रोटीनों पर प्रयोग होगा या आगे के अध्ययनों से क्या नतीजे निकलेंगे। इसलिए यह काम अभी तैयारी के चरण में है।

विश्वविद्यालय CXFEL परियोजना के तहत दूसरा उपकरण भी बना रहा है। इसे मौजूदा स्रोत से अधिक तेज़ और अपनी गति तथा कामकाज के ढंग को बदलने के लिहाज़ से अधिक लचीला बनाया जा रहा है। इसके 2028 में पूरा होने की उम्मीद है। इसे विकसित करते समय CXLS से मिले अनुभवों का इस्तेमाल होगा और प्रदर्शन बेहतर करने के लिए अतिरिक्त प्रयोग किए जाएँगे। इस तरह परियोजना के दो चरण हैं: पहले से मौजूद स्रोत ने माप करना संभव साबित किया है, जबकि दूसरा उपकरण अधिक नियंत्रण और गति देने के लिए तैयार किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से दुनिया भर के शोधकर्ताओं तक

एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी चाहती है कि X-Beams दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए वैज्ञानिक सुविधा बने। किसी उपकरण की अहमियत केवल उन नतीजों से नहीं आँकी जाती जो उसे बनाने वाली टीम हासिल करती है। यह भी मायने रखता है कि दूसरे वैज्ञानिक उससे किन सवालों की जाँच कर सकते हैं। शोधकर्ताओं के लिए खुलने पर अलग-अलग क्षेत्रों के लोग इस सुविधा का इस्तेमाल कर सकेंगे—जैसे पदार्थ भौतिकी, प्रोटीन अध्ययन और इमेजिंग।

संधू का मानना है कि छोटे आकार और तेज़ एक्स-रे चमकों का मेल विज्ञान, उद्योग और चिकित्सा के क्षेत्रों में एक्स-रे के नए इस्तेमाल का रास्ता खोल सकता है। फिर भी, भविष्य में संभव होने वाले उपयोगों और अब तक हासिल नतीजों को अलग-अलग समझना चाहिए। मौजूदा प्रयोग ने क्वांटम पदार्थ में बदलावों को समय के साथ मापकर दिखाया है। इन क्षमताओं को दूसरे कामों में उपयोगी बनाने से पहले और प्रयोग तथा विकास की ज़रूरत होगी।

इस परियोजना की एक और अहम बात यह है कि इतनी क्षमता वाले छोटे स्रोत को चलाने के लिए कई विषयों के विशेषज्ञों का साथ काम करना ज़रूरी है। इसी वजह से सुविधा तैयार करने में करीब 80 लोगों ने योगदान दिया। प्रयोग की सफलता लेज़र, एक्स-रे, नमूने और डिटेक्टर के सही तालमेल पर निर्भर करती है। साथ ही, मापों का विश्लेषण भी ऐसा होना चाहिए कि उनमें छिपे बारीक बदलाव समझे जा सकें। सुविधा को शोधकर्ताओं के लिए खोलकर टीम उम्मीद करती है कि यह नए पदार्थों और उनसे जुड़े सवालों की जाँच का साझा मंच बनेगी, न कि केवल एक प्रयोग तक सीमित उपकरण।

निष्कर्ष

ASU X-Beams में CXLS स्रोत की जाँच ने दिखाया कि छोटा एक्स-रे उपकरण भी क्वांटम पदार्थ में होने वाले तेज़ बदलावों को दर्ज कर सकता है। टीम ने 800 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य वाले निकट-अवरक्त लेज़र और जाँच के लिए भेजी गई एक्स-रे चमकों के बीच का अंतर 1 नैनोसेकंड से कम रखा। इससे TaS2 में असंगत अवस्था के उभरने और छोटे क्षेत्रों से बड़े क्षेत्रों में फैलने का पता चला; यह बदलाव कुछ पिकोसेकंड से कई नैनोसेकंड तक के समय में देखा गया। यह क्षमता प्रोटीन के क्रिस्टलों सहित आगे के शोध के रास्ते खोलती है। अधिक तेज़ और लचीले दूसरे उपकरण के 2028 में पूरा होने की उम्मीद है। इस काम का सबसे बड़ा महत्व कोई तैयार उत्पाद नहीं, बल्कि यह नई समय-खिड़की है, जिससे वैज्ञानिक देख सकेंगे कि उत्तेजित होने पर पदार्थ कैसे बदलता है।