आसान शब्दों में
पैकबायो और वेरिली ऐसी सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था बनाने पर काम कर रही हैं, जहाँ लोगों की आनुवंशिक जानकारी को उनके स्वास्थ्य रिकॉर्ड के साथ समझा जा सके। इससे शोधकर्ताओं को बीमारियों का अध्ययन करने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडल तैयार करने में मदद मिल सकती है। फिलहाल यह साझेदारी विकास के दौर में है; इसके नतीजे या बड़े स्तर पर शुरुआत की तारीख घोषित नहीं हुई है।
लंबी रीडिंग से क्या पता चलता है?
पैकबायो की हाईफाई तकनीक आनुवंशिक सामग्री के लंबे हिस्सों को पढ़ती है। छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़कर पूरी तस्वीर बनाना कभी-कभी मुश्किल होता है, खासकर तब जब जीनोम के किसी हिस्से में बदलाव हो। लंबे हिस्से पढ़ने से शोधकर्ताओं को जीनोम की बनावट और उसके अलग-अलग भागों के आपसी संबंध समझने में मदद मिल सकती है।
इस तरीके से जीनोम के बड़े हिस्सों में होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सकता है। यह डीएनए से जुड़ी मिथाइलेशन नाम की रासायनिक निशानियों और आरएनए की पूरी प्रतियों को भी पढ़ सकता है। इससे शोधकर्ताओं को किसी नमूने की अधिक व्यापक जानकारी मिलती है, बजाय इसके कि वे आनुवंशिक कोड के कुछ छोटे हिस्सों तक ही सीमित रहें।
हालाँकि, जीन संबंधी ढेर सारी जानकारी अपने आप यह नहीं बताती कि उसका किसी व्यक्ति की सेहत या चिकित्सा इतिहास से क्या रिश्ता है। आनुवंशिक और स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड अलग-अलग तरह के आँकड़े हैं; उन्हें जोड़ने के लिए विशेष औज़ारों और प्रक्रियाओं की ज़रूरत पड़ सकती है। इसलिए यह साझेदारी जीनोम पढ़ने की नई मशीन बनाने के बजाय, आँकड़े जुटाने, सँभालने और स्वास्थ्य जानकारी से उनकी तुलना करने की प्रक्रिया पर काम कर रही है।
आँकड़ों को जोड़ने का डिजिटल मंच
इस योजना का अहम हिस्सा वेरिली प्री है, जो स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को सँभालने, उसका विश्लेषण करने और शोध में इस्तेमाल करने का मंच है। समझौते के तहत पैकबायो की जीनोम पढ़ने वाली प्रक्रियाओं को इससे जोड़ा जाएगा। वेरिली अपने शोध कार्यक्षेत्र को इस तरह तैयार करेगी कि हाईफाई से मिले जीनोम के आँकड़े और असल स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी जानकारी साथ रखकर व्यवस्थित की जा सके और उनका विश्लेषण हो सके।
यह काम केवल फाइलें एक जगह जमा करने तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर काम करने वाली संस्थाओं को ऐसे नियम और व्यवस्थाएँ चाहिए जो तय करें कि आँकड़े कैसे सँभाले और इस्तेमाल किए जाएँ। साथ ही, उन्हें जानकारी खोजने और उसका विश्लेषण करने के सुरक्षित औज़ार भी चाहिए। वेरिली के मुताबिक, उसके मंच में आँकड़ों के प्रबंधन, उन्हें व्यवस्थित करने और सुरक्षित शोध के लिए सुविधाएँ हैं। इसकी तकनीक स्वास्थ्य संस्थाओं को निजी स्वास्थ्य जानकारी सँभालने में मदद देने के लिए बनाई गई है।
दोनों कंपनियों का कहना है कि वे वेरिली प्री के सुरक्षित डिजिटल माहौल में सॉफ्टवेयर सहायकों का इस्तेमाल करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडल तैयार और चला भी सकेंगी। मॉडल को आँकड़ों से सिखाने की प्रक्रिया प्रशिक्षण कहलाती है। प्रशिक्षण के बाद नए आँकड़ों पर उससे जवाब या नतीजा हासिल करना अनुमान लगाना कहलाता है। घोषणा में किसी खास मॉडल या चिकित्सा उपयोग का नाम नहीं दिया गया है, इसलिए इसे इलाज के फैसले लेने वाली तैयार प्रणाली की घोषणा नहीं मानना चाहिए।
जीनोम और स्वास्थ्य रिकॉर्ड साथ क्यों?
जीन संबंधी आँकड़े आनुवंशिक विशेषताओं की जानकारी देते हैं, जबकि स्वास्थ्य रिकॉर्ड बताते हैं कि किसी व्यक्ति की सेहत और देखभाल की स्थिति असल जीवन में कैसी रही है। शोधकर्ताओं को दोनों तरह की जानकारी उचित सुरक्षा के साथ मिले, तो वे जीनोम में दिखने वाली बातों और बीमारी या इलाज के रिकॉर्ड के बीच संबंधों का अध्ययन कर सकते हैं। लेकिन केवल आँकड़े जोड़ देने से सही निष्कर्ष की गारंटी नहीं मिलती; शोध का सही तरीका, सावधानी से किया गया विश्लेषण और नतीजों की जाँच भी उतनी ही ज़रूरी है।
इस साझेदारी का लक्ष्य शोध संस्थानों, दवा कंपनियों, चिकित्सा केंद्रों और आबादी के स्तर पर जीन का अध्ययन करने वाले कार्यक्रमों को बड़े शोध में मदद देना है। तकनीकी प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से जुड़ें, तो हर परियोजना के लिए अलग व्यवस्था बनाने की ज़रूरत घट सकती है। इससे भागीदार संस्थाएँ लंबे आनुवंशिक पाठों वाले बड़े और जटिल आँकड़ा-समूहों पर काम कर पाएँगी। फिर भी, इससे शोध तेज़ होगा या कोई खास खोज होगी, इस बारे में अभी कोई आँकड़ा सामने नहीं आया है।
वेरिली के अधिकारियों ने तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों, कैंसर, दुर्लभ बीमारियों और ऐसे अन्य क्षेत्रों का ज़िक्र किया है जहाँ चिकित्सा की ज़रूरतें अब भी बड़ी हैं। इससे पता चलता है कि शोध में जीनोम संबंधी आँकड़ों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि साझेदारी किसी एक बीमारी पर केंद्रित है या इसके पास तैयार इलाज है। घोषित योजना का जोर आँकड़ों और औज़ारों की व्यवस्था बनाने पर है; असल चिकित्सा लाभ भविष्य में होने वाले शोध पर निर्भर करेगा।
शुरुआत हो चुकी है, पर कई बातें बाकी हैं
पैकबायो ने बताया है कि पूरे जीनोम को पढ़ने की उसकी कुछ प्रक्रियाएँ पहले से ही वेरिली प्री में चल रही हैं। यानी दोनों प्रणालियों को जोड़ने का काम शून्य से शुरू नहीं होगा। साझेदारी आगे बढ़ने के साथ कंपनियाँ इस जुड़ाव को और लंबी रीडिंग वाले तथा अधिक जटिल कार्यक्रमों तक फैलाने की योजना बना रही हैं, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समय-सारणी जारी नहीं की गई है।
कई अहम बातें अब भी साफ नहीं हैं। कंपनियों ने समझौते की वित्तीय शर्तें, इसमें शामिल ग्राहक या इसे बड़े स्तर पर उपलब्ध कराने की तारीख नहीं बताई है। यह भी नहीं बताया गया कि कितने बड़े आँकड़ा-समूह जुटाए जाएँगे या कौन-सी शोध परियोजनाएँ पहले शुरू होंगी। इसलिए इस घोषणा को तकनीकी जुड़ाव विकसित करने और शोध की क्षमता बढ़ाने की योजना के रूप में देखना चाहिए, न कि ऐसी पूरी सेवा के रूप में जो अब हर संस्था के लिए उपलब्ध हो।
यह साझेदारी यह भी दिखाती है कि चिकित्सा शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का काम मॉडल बनाने से पहले ही शुरू हो जाता है। आँकड़ों को इस तरह जुटाना, व्यवस्थित करना और जोड़ना पड़ता है कि उनका विश्लेषण हो सके, साथ ही उनके इस्तेमाल पर उचित नियंत्रण भी रहे। इस परियोजना में पैकबायो लंबे आनुवंशिक पाठों का डेटा लाने की कोशिश कर रही है, जबकि वेरिली स्वास्थ्य जानकारी सँभालने और उसका विश्लेषण करने का डिजिटल माहौल दे रही है। आखिरकार इसका असर आँकड़ों की गुणवत्ता, उनके इस्तेमाल और उनसे होने वाले शोध पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष
पैकबायो और वेरिली की योजना में जीनोम के लंबे हिस्से पढ़ने वाली तकनीक को स्वास्थ्य जानकारी सँभालने और उस पर शोध करने के मंच से जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद ऐसे आँकड़ा-समूह बनाना आसान करना है जिनमें आनुवंशिक और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साथ हो, ताकि शोध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडल तैयार करने में उनका उपयोग किया जा सके। लेकिन यह काम अभी आगे बढ़ाया जा रहा है। घोषणा में न तो चिकित्सा नतीजे दिए गए हैं, न ग्राहकों, वित्तीय व्यवस्था या समय-सारणी का ब्योरा। साझेदारी से वास्तव में क्या हासिल होगा, यह उन शोध परियोजनाओं के पूरा होने पर ही पता चलेगा जो इस जुड़ाव का इस्तेमाल करेंगी।