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जैव-तकनीक में लौटी रौनक, पर अब पैसा चुनिंदा दवाओं पर लग रहा है।

आसान शब्दों में

कई मुश्किल सालों के बाद दवा और जैव-तकनीक कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी फिर बढ़ी है। शेयरों में तेजी आई है और कंपनियों ने पहले से ज्यादा पैसा जुटाया है। लेकिन यह पैसा सबको बराबर नहीं मिल रहा: निवेशक उन दवाओं को तरजीह दे रहे हैं जिन्हें इंसानों पर आजमाए जाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए बाजार में सुधार जरूर है, मगर जोखिम अभी बने हुए हैं।

शेयरों और नए सार्वजनिक निर्गमों में दिखी वापसी

कई साल की गिरावट और इंतजार के बाद 2026 में जैव-तकनीक कंपनियों के शेयरों में फिर कुछ चमक लौटी। इसके साथ ही शेयर बाजार में नई कंपनियों के आने और निवेश के कुछ रास्तों से जुटाई गई रकम में भी बढ़ोतरी हुई। फिर भी बाजार में लगातार तेजी नहीं आई है। ब्याज दरों में बदलाव, पैसा जुटाने के असमान मौके और निवेशकों का उन दवाओं की ओर झुकाव, जिन्हें इंसानों पर आजमाने का समय करीब है—ये सभी बातें दिखाती हैं कि सुधार का फायदा हर कंपनी को एक जैसा नहीं मिल रहा। निवेश बैंक लक्सट वॉक की तीसरी तिमाही की बाजार-स्थिति रिपोर्ट ऐसे क्षेत्र की मिली-जुली तस्वीर पेश करती है जो सुधर तो रहा है, लेकिन अपनी कमजोरियों से पूरी तरह उबरा नहीं है।

शेयरों और सार्वजनिक निर्गमों में साफ सुधार

बाजार में आए बदलाव का एक स्पष्ट संकेत वे कोष हैं जिनके शेयरों का शेयर बाजार में कारोबार होता है और जो जैव-तकनीक कंपनियों के शेयरों पर नज़र रखते हैं। संपत्ति के लिहाज से सबसे बड़े आईशेयर्स जैव-तकनीक कोष में, रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, शुक्रवार को समाप्त 12 महीनों के दौरान 34% की बढ़त हुई। इसकी कीमत 154.58 डॉलर से बढ़कर 207.74 डॉलर हो गई और इसमें करीब 11 अरब डॉलर की संपत्ति है। इस श्रेणी के दूसरे सबसे बड़े कोष, स्टेट स्ट्रीट के एसपीडीआर जैव-तकनीक कोष में 39% का उछाल आया। इसकी कीमत 107.56 डॉलर से बढ़कर 149.54 डॉलर हुई और इसकी संपत्ति करीब 10.6 अरब डॉलर है।

कोषों के प्रदर्शन से किसी एक कंपनी की सेहत या किसी दवा की कामयाबी का फैसला नहीं किया जा सकता। फिर भी, महामारी के दौरान आई तेजी के बाद के कठिन दौर के मुकाबले यह दिखाता है कि निवेशकों की कुछ रुचि इस क्षेत्र में फिर लौटी है। यह बदलाव शुरुआती सार्वजनिक शेयर निर्गमों के बाजार में भी नज़र आता है। 2026 में बताए गए ऐसे निर्गमों की संख्या 27 रही और कंपनियों ने इनके ज़रिये 7.776 अरब डॉलर जुटाए। यह 2025 की तुलना में 573% अधिक है; उस साल इस क्षेत्र में 11 निर्गम हुए थे और कुल 1.155 अरब डॉलर जुटाए गए थे।

तीसरी तिमाही खास तौर पर उल्लेखनीय रही। लक्सट वॉक के आंकड़ों के मुताबिक, जैव-तकनीक की 9 कंपनियों ने शेयर बाजार में अपने शेयर जारी किए और मिलकर 2.4 अरब डॉलर जुटाए। पांच साल में किसी एक तिमाही के दौरान इस क्षेत्र में हुए निर्गमों की यह सबसे बड़ी संख्या थी। हालांकि, नए निर्गमों की वापसी का मतलब यह नहीं कि बाजार का दरवाज़ा हर कंपनी के लिए खुल गया है। निवेशक दवा के सफल होने की संभावना के अधिक ठोस सबूत चाहते हैं। जिन परियोजनाओं का काम अभी दवा खोजने के शुरुआती दौर में है, उनके लिए निवेशकों को भरोसा दिलाना कहीं कठिन है।

पैसा उन दवाओं की ओर, जो मरीजों के करीब हैं

निजी निवेश के सौदों से पता चलता है कि दवा विकसित करने की राह में कंपनी कहां तक पहुंची है, यह अब बहुत अहम हो गया है। उत्तरी अमेरिका में तीसरी तिमाही के दौरान जोखिम पूंजी के 46 निवेश सौदे हुए। दूसरी तिमाही 2026 में ऐसे 55 सौदे हुए थे और 2025 की तीसरी तिमाही में 38। पिछली तिमाही के मुकाबले सौदों की संख्या कम रही, लेकिन हर सौदे की औसत रकम बढ़कर 96 मिलियन डॉलर हो गई। दूसरी तिमाही में यह 83 मिलियन डॉलर और पिछले साल की तीसरी तिमाही में 75 मिलियन डॉलर थी। ज्यादातर गतिविधि ‘सीरीज़ बी’ दौर में केंद्रित रही। यानी जिन कंपनियों को पैसा मिला, वे अक्सर विकास के आगे के चरण में थीं और उन्हें पहले से बड़ी रकम मिली।

लक्सट वॉक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक जेफ मर्सन, जो मई में शुरू की गई निवेश कंपनी बैन्यन बायो इनोवेशन्स के भी मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक हैं, का कहना है कि कंपनियों को सिर्फ उनके निवेश-दौर के आधार पर बांटने से सबसे अहम फर्क छिप सकता है: उनका इलाज विकसित करने का काम किस चरण तक पहुंचा है। मसलन, बैन्यन ऐसे उपचारों के आधार पर नई कंपनियां बनाने पर काम करती है जो परीक्षणों के दूसरे चरण तक पहुंच चुके हैं। इन कंपनियों की शुरुआत फिर भी ‘सीरीज़ ए’ निवेश-दौर से हो सकती है। इसलिए दौर का नाम भर यह नहीं बताता कि कंपनी शुरुआती चरण में है या आगे बढ़ चुकी है। ज्यादा अहम यह है कि क्या उसके पास आगे विकसित करने के लिए दवा का उम्मीदवार तैयार है, या ऐसे इंसानी परीक्षणों के आंकड़े हैं जिन्हें निवेशक परख सकते हैं।

जो कंपनियां अभी दवा खोजने या इंसानों पर परीक्षण शुरू होने से पहले उसकी जांच करने में लगी हैं, उनके लिए पैसा जुटाने का माहौल ज्यादा कठिन है। मर्सन के अनुसार, यह 2020 और 2021 से बड़ा बदलाव है। उन वर्षों में विज्ञान की नई संभावनाओं और शोध के उभरते क्षेत्रों पर आधारित मंचों में खूब दिलचस्पी थी, भले ही कंपनियों के पास इंसानों पर परीक्षण के लिए तैयार कोई साफ उपचार न हो। अब निवेशक आम तौर पर दवा विकसित करने की दिशा में ठोस प्रगति देखना चाहते हैं। वे ऐसी कंपनी को तरजीह दे सकते हैं जिसके पास दवा का पूरा उम्मीदवार तैयार हो, या जो इंसानों पर परीक्षण शुरू करने की अर्जी देने से ठीक पहले के चरण में पहुंच गई हो।

इसीलिए अब एक तरीका यह भी है कि किसी दूसरी संस्था में विकसित किए गए उपचार को आधार बनाकर नई कंपनी बनाई जाए और उसे आगे बढ़ाने के लिए टीम, विशेषज्ञता और खास मकसद के लिए दिया गया निवेश जुटाया जाए। ऐसी परियोजना को शुरू से विकसित करने की तुलना में इस रास्ते पर खर्च कम हो सकता है, लेकिन इससे परीक्षण और आंकड़ों की जरूरत खत्म नहीं होती। विश्वविद्यालय या प्रयोगशाला की किसी परियोजना को बहुत जल्दी नई कंपनी में बदल देने से भी मुश्किल खड़ी हो सकती है: बाजार में निवेशकों को आकर्षित करने लायक बनने तक उसे लंबे समय तक पैसों की कमी झेलनी पड़ सकती है।

जब दूसरे रास्ते तंग हों, तो दवा के अधिकार देने का विकल्प

शुरुआती सार्वजनिक निर्गमों और जोखिम पूंजी के अलावा, दवा कंपनियों के बीच अधिकार देने और मिलकर काम करने के समझौते भी पैसा जुटाने या बाजार तक पहुंचने का अहम रास्ता बनकर उभरे हैं। लेकिन तीसरी तिमाही में ऐसे समझौतों की कुल घोषित कीमत घटकर करीब 48 अरब डॉलर रह गई, जो 41 सौदों में बंटी थी। दूसरी तिमाही में 43 सौदों की कुल कीमत 71.5 अरब डॉलर थी। हर सौदे की औसत कीमत भी 1.662 अरब डॉलर से घटकर 1.171 अरब डॉलर रह गई। इसका यह मतलब जरूरी नहीं कि नई दवाओं में दिलचस्पी घट गई है। रिपोर्ट इस बदलाव को इस बात से जोड़ती है कि अब निवेशक उन उपचारों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जो इंसानों पर परीक्षण के चरण तक पहुंच चुके हैं। पहले के कुछ सौदों की घोषित कीमत भविष्य में मिलने वाली किस्तों और कई शर्तों पर निर्भर थी।

इस बाजार में चीन की हिस्सेदारी बड़ी है। 2026 की तीसरी तिमाही के अंत तक दुनिया भर में दर्ज अधिकार-संबंधी समझौतों की कुल कीमत में 58% हिस्सा चीनी कंपनियों का था। पिछले साल इसी अवधि में यह हिस्सा 48% था। अमेरिका की हिस्सेदारी 26% और यूरोप तथा ब्रिटेन की मिलाकर 8% रही। मर्सन इस अंतर की एक वजह यह बताते हैं कि कुछ चीनी कंपनियों के लिए हांगकांग के बाजार के ज़रिये पैसा जुटाना मुश्किल हुआ है। पिछले साल यह उनके लिए एक अहम रास्ता था। शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया और उससे जुड़े नियम अब अधिक पेचीदा हो गए हैं। शेयर जारी करने की अनुमति सरकारी संस्थाओं की मंजूरी पर निर्भर करती है।

मर्सन के अनुमान के मुताबिक, चीनी कंपनियों के सौदों की कुल कीमत में विलय और अधिग्रहण का हिस्सा करीब 1% ही था। जब शेयर जारी करना या पूरी कंपनी बेचना मुश्किल हो जाए, तब दवा या तकनीक के अधिकार किसी दूसरी कंपनी को देना पूंजी जुटाने का व्यावहारिक रास्ता बन सकता है। कभी-कभी इससे निवेशकों को रकम का कुछ हिस्सा वापस भी दिया जा सकता है। इससे समझ आता है कि अधिकार देने वाले समझौते चीनी कंपनियों के लिए अमेरिका की तुलना में अधिक अहम क्यों हैं। अमेरिका में किसी दवा के इंसानी परीक्षण शुरू कर लेने के बाद उसके अधिकार पाने के लिए पूरी कंपनी खरीदना कई मामलों में आम रास्ता है।

फिर भी, घोषित आंकड़ों को सावधानी से देखना चाहिए। चीन से जुड़े कुछ सौदों की कुल कीमत में ऐसी बड़ी रकम शामिल हो सकती है जो शुरुआत में नहीं दी जाती, बल्कि भविष्य में कुछ लक्ष्य पूरे होने पर मिलती है—और वे लक्ष्य शायद पूरे न हों। इसलिए समझौते में बताई गई कीमत का मतलब यह नहीं कि हस्ताक्षर होते ही उतना पैसा कंपनी के खाते में आ गया। मर्सन के मुताबिक, इन सौदों की कीमत का आकलन करने के तरीकों में फर्क है। कुछ चीनी समझौतों में शुरुआती भुगतान घोषित कुल कीमत का कम हिस्सा हो सकता है, जबकि भविष्य में मिलने वाली संभावित किस्तों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। निवेशकों को यह फर्क समझना चाहिए कि कितना पैसा अभी उपलब्ध है और कितनी रकम आगे के नतीजों पर निर्भर है।

अधिग्रहण और निजी निवेश दिखाते हैं बाजार के कई रास्ते

बाजार में हलचल सिर्फ अधिकार-संबंधी समझौतों तक सीमित नहीं रही। तीसरी तिमाही में विलय और अधिग्रहण के 30 सौदों की कुल कीमत 42.1 अरब डॉलर रही। दूसरी तिमाही में दर्ज तीन साल के ऊंचे स्तर से यह कम थी; उस दौरान 35 सौदों की कीमत 80.7 अरब डॉलर थी। फिर भी, 2026 के पहले 9 महीनों में ऐसे सौदों का कुल मूल्य 173 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो 2025 के पूरे साल में दर्ज कुल रकम से अधिक है। मर्सन द्वारा चर्चा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, विलय और अधिग्रहण के सौदों की कुल कीमत का 91% हिस्सा अमेरिका में स्थित कंपनियों के हिस्से आया।

इन आंकड़ों में अमेरिकी और चीनी कंपनियों की अलग-अलग स्थिति दोनों देशों में पैसा जुटाने के अलग रास्ते दिखाती है; इससे किसी देश में नई खोजों की गुणवत्ता के बारे में सीधा फैसला नहीं किया जा सकता। अमेरिका में बड़ी दवा कंपनी किसी ऐसी कंपनी को खरीदना पसंद कर सकती है जिसके पास इंसानों पर परीक्षण के चरण में पहुंची दवा हो, या उसके मुख्य अधिकार हों। चीन में, जब कंपनी को शेयर बाजार में आने या बिकने के मौके कम मिलें, तब अधिकार देने के समझौते ज्यादा अहम हो जाते हैं। देशों के बीच होने वाले सहयोग के सौदों पर दोनों ओर से नियमों और देशों के आपसी संबंधों से जुड़े जोखिम बने रहते हैं। तकनीक का हस्तांतरण किन शर्तों पर हो सकता है, इस बारे में सरकारी फैसलों और नीतियों के साथ-साथ सौदों की शर्तें भी बदल सकती हैं।

निजी निवेश का एक और रास्ता है—पहले से शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों में निजी निवेश करना। इसे संक्षेप में पीआईपीई सौदा कहा जाता है। तीसरी तिमाही में इस तरह के निवेश की रकम 14 सौदों के ज़रिये बढ़कर 3.808 अरब डॉलर हो गई। दूसरी तिमाही में यह 603 मिलियन डॉलर थी और 2025 की तीसरी तिमाही में 1.151 अरब डॉलर। इनमें से कुछ सौदे उलटे विलय से जुड़े थे। इस तरीके में निजी कंपनी पहले से सूचीबद्ध कंपनी के साथ विलय करके सार्वजनिक बाजार में प्रवेश करती है। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अक्सर अतिरिक्त पैसा जुटाना पड़ता है। मर्सन के उदाहरण के मुताबिक, अगर बाजार में 20 सामान्य सार्वजनिक निर्गम और 20 उलटे विलय हों, तो 40 कंपनियां सार्वजनिक हो सकती हैं। इनमें विलय के ज़रिये आने वाली कंपनियों को कई मामलों में पीआईपीई निवेश की जरूरत पड़ती है।

कोई कंपनी इस तरह का निवेश इसलिए भी चुन सकती है कि उसे पहले से पता हो कि कितनी रकम मिलेगी और वह उस पर भरोसा कर सकेगी—भले ही बाद में शेयरों का एक और निर्गम करके मिलने वाली संभावित रकम इससे अधिक हो। दवा-परीक्षण के नतीजे घोषित होने तक इंतजार करने पर, अगर बाजार आंकड़ों का स्वागत करे, तो कंपनी की कीमत बढ़ सकती है। लेकिन नतीजे पसंद न आने पर शेयर गिर सकते हैं और पैसा जुटाने का मौका भी बंद हो सकता है। इसलिए पीआईपीई निवेश अनिश्चितता घटाने का एक तरीका बन सकता है, खासकर तब जब कंपनी का प्रबंधन यह न जानता हो कि आने वाले आंकड़ों पर निवेशक कैसी प्रतिक्रिया देंगे।

कौन-सी बातें सुधार की रफ्तार रोक सकती हैं?

सुधार के संकेतों के बावजूद, इस क्षेत्र के शेयर व्यापक अर्थव्यवस्था से अलग नहीं चलते। मर्सन कुछ खास निवेशकों की हाल की सुस्ती को बढ़ती महंगाई और लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड पर बढ़ते ब्याज से जोड़ते हैं। जब उधार लेना महंगा हो और कम जोखिम वाले निवेश से बेहतर आमदनी मिलने की संभावना हो, तो ऐसी जैव-तकनीक कंपनियों के लिए पैसा जुटाना कठिन हो जाता है जिन्हें दवा से कमाई शुरू करने में कई साल लग सकते हैं। बातचीत में बताए गए घटनाक्रम के मुताबिक, ईरान में युद्ध शुरू होने के बाद बदले हालात के साथ सार्वजनिक निर्गमों की गतिविधि कुछ समय के लिए थम गई थी। फिर वसंत और गर्मियों में बाजार में तेजी लौटी, लेकिन हाल के हफ्तों में रफ्तार फिर धीमी हुई।

निवेशकों के फैसलों पर राजनीतिक और नियामक नियमों की स्पष्टता भी असर डालती है। मर्सन का मानना है कि मध्यावधि चुनाव के चलते कुछ लोग राजनीतिक संतुलन की तस्वीर साफ होने तक इंतजार कर सकते हैं। अमेरिका में दवा विकसित करने की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने वाला कोई कानून इस क्षेत्र को सहारा दे सकता है। लेकिन उन्हें नहीं लगता कि चीन से प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी, और न ही वे मानते हैं कि दोनों देशों का सहयोग नियमों से जुड़े जोखिमों से पूरी तरह अलग रखा जा सकता है। तकनीक साझा करने या उपचार-संपत्तियों के लेन-देन पर संभावित पाबंदियां किसी भी पक्ष से लग सकती हैं। इससे सौदों में अनिश्चितता की एक और परत जुड़ जाती है।

दवा खोजने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका बढ़ रही है, लेकिन वह विकास की पूरी राह को छोटा नहीं कर देती। कंप्यूटर आधारित तरीकों से नए रासायनिक पदार्थों के सुझाव देने या शोध के शुरुआती चरणों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। फिर भी दवा को इंसानों पर परीक्षणों से गुजरना होता है और शोधकर्ताओं को बीमारी की प्रगति तथा नतीजे सामने आने तक इंतजार करना पड़ता है। मर्सन का अनुमान है कि अब आधे से ज्यादा दवाओं की खोज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद ली जाती है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि दवा पर होने वाले खर्च का 99.5% हिस्सा उपचार का उम्मीदवार चुन लिए जाने के बाद आता है। इससे साफ है कि सिर्फ एक समझदार तकनीकी औजार होने से दवा कंपनी सफल नहीं हो जाती और न ही शेयर बाजार में उसे ऊंची कीमत मिलने की गारंटी मिलती है।

जो नई कंपनियां जोखिम पूंजी कोषों के बाहर से पैसा जुटाना चाहती हैं, उनके सामने अब भी कठिनाइयां हैं। कुछ टीमें परिवारों के निवेश कार्यालयों या किसी खास बीमारी पर काम करने वाली संस्थाओं का सहारा ले सकती हैं। विश्वविद्यालय भी उनसे निकली कंपनियों में निवेश कर सकते हैं, ताकि वे विकास के अगले चरण तक पहुंच सकें। लेकिन इन विकल्पों से पैसा मिलना तय नहीं होता। निजी संस्थाएं भी कामयाबी की संभावना के साफ संकेत मांगती हैं। बीमारी से सीधा रिश्ता न हो तो ऐसे परिवारों को ढूंढना भी मुश्किल हो सकता है जो उस काम के लिए रकम देने को तैयार हों। कैंसर और प्रतिरक्षा से जुड़ी बीमारियों के इलाज में निवेशकों की दिलचस्पी सबसे ज्यादा बनी हुई है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर शोध को भी ठीक-ठाक मौके मिलते दिख रहे हैं। दूसरी ओर, मर्सन के मुताबिक दुर्लभ बीमारियों में आज वैसी उत्सुकता नहीं दिखती जैसी पहले थी, हालांकि छोटे बाजारों में भी इलाज के महत्वपूर्ण मौके हो सकते हैं।

निष्कर्ष

2026 के आंकड़े बताते हैं कि जैव-तकनीक क्षेत्र में निवेशकों का कुछ भरोसा लौटा है। बड़े कोषों में 34% और 39% की बढ़त दर्ज हुई, सार्वजनिक निर्गमों से 7.776 अरब डॉलर जुटाए गए, पीआईपीई निवेश बढ़ा और 2026 के पहले 9 महीनों में अधिग्रहणों की कुल कीमत 2025 के पूरे साल से आगे निकल गई। लेकिन इन आंकड़ों से यह नहीं मान लेना चाहिए कि पूरे क्षेत्र में सुधार पक्का हो चुका है। शुरुआती चरण की कंपनियां अब भी पैसा जुटाने में जूझ रही हैं, निवेश का झुकाव उन दवाओं की ओर है जिन्हें इंसानों पर आजमाने का समय करीब है और ब्याज दरें, नियम-कायदे तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बाजार को प्रभावित कर सकते हैं। मर्सन को मध्यम और लंबी अवधि में इस क्षेत्र के मौके मजबूत लगते हैं। मगर यह आशावाद कितना सही साबित होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कितने भरोसेमंद आंकड़े पेश करती हैं और नए सार्वजनिक निर्गमों की मौजूदा लहर के बाद भी निवेश का प्रवाह बना रहता है या नहीं।