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दिमाग़ के सुरक्षा-कवच में अस्थायी रास्ता बनाकर कैंसर से लड़ने की कोशिश

सरल शब्दों में

दिमाग़ के एक गंभीर कैंसर का इलाज मुश्किल है, क्योंकि उसकी कोशिकाएँ आसपास के स्वस्थ ऊतकों में फैल जाती हैं और दिमाग़ की प्राकृतिक सुरक्षा कई दवाओं को भीतर नहीं जाने देती। शोधकर्ताओं ने छोटे आनुवंशिक अणुओं को नन्हे कणों में भरकर, केंद्रित ध्वनि तरंगों की मदद से दिमाग़ तक पहुँचाने का तरीका आज़माया। पशु-अध्ययनों में इससे ट्यूमर की बढ़त धीमी हुई और जानवर अधिक समय तक जीवित रहे, लेकिन यह तरीका अभी मरीजों के इलाज के लिए तैयार नहीं है।

ऐसे ट्यूमर को हटाना और काबू करना मुश्किल

ग्लियोब्लास्टोमा वयस्कों में होने वाले घातक मस्तिष्क ट्यूमर के सबसे आम प्रकारों में से एक है और यह तेज़ी से बढ़ने वाले कैंसरों में गिना जाता है। अमेरिका में हर साल इससे 13,000 से अधिक लोगों की मौत होने का अनुमान है। इसकी चुनौती सिर्फ़ उस गांठ को पहचानने और निकालने की नहीं है जिसे देखा जा सकता है। कैंसर कोशिकाएँ ट्यूमर के आसपास के स्वस्थ मस्तिष्क ऊतक में भी घुसकर फैल सकती हैं।

जब कैंसर कोशिकाएँ मस्तिष्क के स्वस्थ ऊतकों के बीच फैल जाती हैं, तो सर्जन के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन-सा हिस्सा निकालना चाहिए और कौन-सा सुरक्षित रखना ज़रूरी है। ऐसे में हर कैंसर कोशिका को हटाने की कोशिश से मस्तिष्क के स्वस्थ हिस्सों को नुकसान पहुँच सकता है। जो कोशिकाएँ पीछे रह जाती हैं, वे बीमारी को आगे बढ़ा सकती हैं। इसीलिए सर्जरी के बाद भी ग्लियोब्लास्टोमा पर काबू पाना चुनौती बना रहता है।

आमतौर पर इलाज की शुरुआत सर्जरी से होती है, जिसमें डॉक्टर ट्यूमर का जितना संभव हो उतना हिस्सा निकालने की कोशिश करते हैं। इसके बाद बची हुई कैंसर कोशिकाओं को कम करने और मरीज की उम्र बढ़ाने के लिए विकिरण-चिकित्सा और कीमोथेरेपी दी जाती है। लेकिन इन तरीकों से बीमारी की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं होतीं और वे उन कोशिकाओं को हटाने की गारंटी भी नहीं देते जो आसपास के ऊतकों में फैल चुकी हों। इसी वजह से ऐसे उपायों में दिलचस्पी है जो उन कोशिकाओं तक पहुँच सकें जिन्हें निशाना बनाना कठिन है, या ट्यूमर को बढ़ावा देने वाले कई कारणों पर एक साथ असर डाल सकें।

कैंसर कोशिकाओं के मस्तिष्क में फैलने के अलावा एक अलग रुकावट भी है—रक्त-मस्तिष्क अवरोध। यह शरीर की प्राकृतिक व्यवस्था रक्त और मस्तिष्क के ऊतकों को अलग रखती है और मस्तिष्क को विषैले पदार्थों तथा संक्रमण फैलाने वाले कारकों जैसी हानिकारक चीज़ों से बचाती है। मगर यही सुरक्षा इलाज के रास्ते में बाधा बन सकती है, क्योंकि बहुत-सी दवाएँ इस अवरोध को पार करके ट्यूमर तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पातीं।

छोटे अणुओं से कई जीनों को निशाना बनाने की कोशिश

वर्जीनिया विश्वविद्यालय की टीम ने ऐसा तरीका आज़माया जो कैंसर कोशिका की किसी एक ही प्रक्रिया पर असर करने वाली दवा पर निर्भर नहीं है। इस विचार के केंद्र में माइक्रोआरएनए नाम के छोटे आनुवंशिक अणु हैं, जो जीनों की गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं। रोजर अबूनादर के नेतृत्व में हुए प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने ऐसे माइक्रोआरएनए अणुओं की पहचान की, जो ग्लियोब्लास्टोमा के बढ़ने और विकसित होने से जुड़े कई जीनों की गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं।

एक से अधिक जीनों को निशाना बनाने की अहमियत यह है कि कैंसर की बढ़त हमेशा किसी एक ही कारण पर निर्भर नहीं होती। कई प्रक्रियाएँ कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने और जीवित रहने में मदद कर सकती हैं। सिद्धांत रूप में, माइक्रोआरएनए के इस्तेमाल से ट्यूमर से जुड़े कई कारकों को एक साथ दबाया जा सकता है; हर कारक के लिए अलग इलाज खोजने की ज़रूरत शायद न पड़े। शोधकर्ताओं का कहना है कि कैंसर की बढ़त में भूमिका निभाने वाले कुछ अणुओं को निशाना बनाने वाली दवाएँ अभी उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इस तरीके को परखना उपयोगी हो सकता है।

हालाँकि, कई लक्ष्यों पर असर डालने की संभावना का यह मतलब नहीं है कि इलाज तैयार हो चुका है या मरीजों में इसका असर तय है। नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि अणु सही ऊतक तक पहुँचते हैं या नहीं और जीवित शरीर में कैंसर कोशिकाओं पर किस तरह असर करते हैं। इस अध्ययन में माइक्रोआरएनए को अकेले देने की बात नहीं है। असल चुनौती यह भी है कि उन्हें किस तरह साथ ले जाकर उस सुरक्षा-अवरोध के पार पहुँचाया जाए, जो आमतौर पर बहुत-से पदार्थों को दिमाग़ में जाने से रोकता है।

रक्त-मस्तिष्क अवरोध में थोड़ी देर के लिए रास्ता

दिमाग़ तक पहुँचने की समस्या से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने माइक्रोआरएनए ले जाने वाले नैनोकणों को केंद्रित अल्ट्रासाउंड तरंगों और बहुत छोटी बुलबुलियों के साथ इस्तेमाल किया। चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग की मदद से तरंगों को उस हिस्से की ओर निर्देशित किया गया जिसे निशाना बनाना था। इससे प्रक्रिया को पूरे दिमाग़ पर बेतरतीब ढंग से लागू करने के बजाय चुने हुए स्थान पर केंद्रित करने में मदद मिलती है।

अल्ट्रासाउंड तरंगों के साथ इस्तेमाल होने पर सूक्ष्म बुलबुलियाँ थोड़े समय के लिए रक्त-मस्तिष्क अवरोध को खोलने में मदद करती हैं। यह अस्थायी बदलाव नैनोकणों को दिमाग़ में प्रवेश करने का मौका देता है, और वे अपने साथ माइक्रोआरएनए ले जाते हैं। जब ये अणु ज़रूरी हिस्से तक पहुँचते हैं, तो वे ट्यूमर की बढ़त से जुड़े जीनों की गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं।

इस तरीके में तीन चीज़ों के तालमेल की ज़रूरत है: तरंगों को सही जगह पर केंद्रित करना, बुलबुलियों की मदद से अवरोध को सीमित समय के लिए पार करने लायक बनाना और फिर आनुवंशिक सामग्री पहुँचाने के लिए नैनोकणों का इस्तेमाल करना। हर चीज़ का काम अलग है। तरंगें खुद इलाज को नहीं ले जातीं, बुलबुलियाँ जीनों को निशाना बनाने वाला पदार्थ नहीं हैं और नैनोकण परिवहन का साधन हैं। इन सभी चरणों को जोड़ना ही इस प्रयोग में दिमाग़ तक अणु पहुँचाने की नई बात है।

अवरोध को थोड़ी देर के लिए खोलने का पहलू संवेदनशील है, क्योंकि यह व्यवस्था मस्तिष्क की रक्षा का अहम काम करती है। इसलिए केवल यह दिखा देना काफी नहीं कि इलाज की सामग्री दिमाग़ तक पहुँच सकती है। इस तरीके को विकसित करने के लिए यह भी जाँचना होगा कि इसे सुरक्षित और असरदार ढंग से कैसे निर्देशित और इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रकाशित नतीजे यह साबित नहीं करते कि यह तकनीक अब मरीजों के लिए उपलब्ध इलाज बन गई है; वे इसे अध्ययन के दौर में मौजूद एक प्रयोगात्मक रणनीति के रूप में पेश करते हैं।

प्रयोगों में क्या नतीजे मिले?

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में और ग्लियोब्लास्टोमा के पशु-मॉडलों में इस तरीके को परखा। टीम के बताए नतीजों के अनुसार, माइक्रोआरएनए से जुड़े इलाज के बाद ट्यूमर की बढ़त धीमी हुई और इलाज पाए जानवर अधिक समय तक जीवित रहे। ये शुरुआती नतीजे उत्साह बढ़ाते हैं, लेकिन इनसे यह पता नहीं चलता कि यह तरीका इंसानों में अपनाया जा सकेगा या नहीं, और मौजूदा इलाज से मिलने वाले नतीजों की तुलना में यह कितना लाभ दे सकता है।

पशु-मॉडल में मिले नतीजे और मरीजों के इलाज में मिली सफलता के बीच बड़ा अंतर होता है। मरीजों पर उपचार के परीक्षणों में इस तरीके का आकलन करने से पहले अगले शोध चरणों में इसकी और जाँच करनी होगी। सामने रखे गए नतीजों में यह नहीं कहा गया कि इंसानों पर इलाज शुरू हो चुका है या इस प्रयोग से ग्लियोब्लास्टोमा का इलाज संभव होना साबित हुआ है। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि ये इस बात के शुरुआती प्रमाण हैं कि आनुवंशिक अणुओं को पहुँचाने और अवरोध को निर्देशित ढंग से थोड़ी देर खोलने के तरीकों को एक साथ आज़माया जा सकता है—न कि यह बीमारी का सिद्ध इलाज है।

फिर भी, यह तरीका एक अहम शोध-प्रश्न उठाता है: क्या छोटे आनुवंशिक अणुओं से कैंसर को बढ़ावा देने वाले कई कारकों को दबाया जा सकता है और फिर उन्हें दिमाग़ तक पहुँचने से रोकने वाली बाधा को पार किया जा सकता है? जानवरों में ट्यूमर की बढ़त धीमी करने में मिली सफलता इस सवाल को प्रयोगों के आधार पर परखने का कारण देती है, लेकिन इसका जवाब अभी नहीं देती। आगे और अध्ययन करने होंगे ताकि पता चले कि असर बना रहता है या नहीं और दूसरे प्रयोगों में भी दोहराया जा सकता है या नहीं। उसके बाद ही यह देखा जा सकेगा कि तरीका मरीजों पर जाँच के चरण तक पहुँच सकता है या नहीं।

शोध किसने किया और नतीजों की सीमाएँ क्या हैं?

इस काम की अगुआई रोजर अबूनादर ने की, जिनके पास चिकित्सा की डिग्री और पीएचडी है। वे वर्जीनिया विश्वविद्यालय के चिकित्सा महाविद्यालय में सूक्ष्मजीव-विज्ञान, प्रतिरक्षा-विज्ञान और कैंसर जीव-विज्ञान विभागों में प्रोफेसर हैं। उनका काम विश्वविद्यालय के व्यापक कैंसर केंद्र और आरएनए विज्ञान एवं चिकित्सा केंद्र से भी जुड़ा है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशन में प्रकाशित हुआ, जिसे संक्षेप में जेसीआई कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने इसका पूरा लेख मुफ्त में उपलब्ध कराया।

इस शोध में शेखर साहा, यिंग झांग, मायरोन के. गिल्बर्ट जूनियर, कॉलिन ड्यूब, फरीना हनीफ़, एलिज़ाबेथ चियान श्यू मुलहाली, सिल्विया बेदनारिक, यूनान सन, पावेल मार्सिन्केविच, शिनताओ वांग, जियोंग क्वाक, एहसान एच. भुलाश, हाओलिन ली, केडी हडसन, मणिकर्णा डिंडा, तापस साहा, मैथ्यू मैककॉर्ड, फिदेला गेसस, निकोला क्रूशैंक्स, रोज़िमार रिवेरा कोलोन, लिली डेल ओलियो, राजिता अंबु, वोंजी लियू, सुंगी चोई, बेंजामिन कीवास, पंकज कुमार, अलेक्ज़ेंडर एल. क्लेबानॉव, डेविड शिफ, जियोंग सू सुक, जस्टिन हैंज़ और जिमी माता ने भी योगदान दिया। इनके साथ मार्कस हाफ़नर और अबूनादर भी शोध दल में शामिल थे।

इस काम के मुख्य वित्तपोषण में राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के राष्ट्रीय कैंसर संस्थान की ओर से दिए गए अनुदान U01 CA220841 और P30 CA044579 शामिल थे। राष्ट्रीय तंत्रिका-विकार एवं आघात संस्थान ने R01 NS122222 और R21 NS122136 अनुदानों के ज़रिए सहायता दी। इसके अलावा टीम को वर्जीनिया विश्वविद्यालय के व्यापक कैंसर केंद्र से प्रयोगात्मक अनुदान, शेफ़ फ़ाउंडेशन, बेन और कैथरीन आइवी फ़ाउंडेशन तथा फ़ोकस्ड अल्ट्रासाउंड फ़ाउंडेशन से भी मदद मिली। शोधकर्ताओं ने बताया कि इस काम में उनका कोई वित्तीय हित नहीं था।

यह अध्ययन वर्जीनिया विश्वविद्यालय में कैंसर शोध के लिए केंद्रित अल्ट्रासाउंड के इस्तेमाल को विकसित करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। विश्वविद्यालय ने चार्लोट्सविल स्थित फ़ोकस्ड अल्ट्रासाउंड फ़ाउंडेशन के साथ मिलकर ऐसा केंद्र बनाया है जहाँ इस तकनीक को कैंसर की प्रतिरक्षा-चिकित्सा के साथ जोड़ने का अध्ययन किया जाता है। विश्वविद्यालय का व्यापक कैंसर केंद्र अमेरिका के उन 57 केंद्रों में से एक है जिन्हें राष्ट्रीय कैंसर संस्थान ने यह दर्जा दिया है। लेकिन इस पृष्ठभूमि से मौजूदा नतीजे की प्रकृति नहीं बदलती: ग्लियोब्लास्टोमा पर यह शोध अभी प्रयोगात्मक है और मरीजों को होने वाले लाभ का प्रमाण नहीं मिला है।

निष्कर्ष

यह अध्ययन दो मुश्किलों से एक साथ निपटने की शोध-दिशा दिखाता है: ट्यूमर को बढ़ावा देने वाले कई कारकों को निशाना बनाना और इलाज को दिमाग़ तक पहुँचाना। वर्जीनिया विश्वविद्यालय की टीम ने नैनोकणों में भरे माइक्रोआरएनए को केंद्रित अल्ट्रासाउंड और सूक्ष्म बुलबुलियों के साथ इस्तेमाल किया, ताकि रक्त-मस्तिष्क अवरोध थोड़ी देर के लिए पार किया जा सके। प्रयोगशाला और पशु-अध्ययनों में ट्यूमर की बढ़त धीमी हुई और जानवर अधिक समय तक जीवित रहे। ये नतीजे शुरुआती हैं, अंतिम नहीं: इंसानों में इनकी पुष्टि नहीं हुई है और मरीजों के इलाज के रूप में आज़माने से पहले और शोध की ज़रूरत है।