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दीवार के सहारे बैठना: कम कसरत करने पर भी कुछ फायदा बना रह सकता है

आसान शब्दों में

दीवार के सहारे बैठने वाली कसरत से कुछ लोगों के रक्तचाप में सुधार हुआ। बाद में हफ्ते में 1 या 2 बार कसरत करने से इसका कुछ फायदा बना रहा, लेकिन पूरी तरह छोड़ने पर वह कम हो गया। सबसे अच्छे नतीजे उन लोगों में दिखे जिन्होंने हफ्ते में 3 बार अभ्यास जारी रखा।

यह कसरत कैसी है और सवाल क्या था?

बीएमजे ओपन स्पोर्ट एंड एक्सरसाइज़ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन ने ऐसे सवाल की पड़ताल की है जो कई लोगों के मन में आता है: अगर कोई रक्तचाप के लिए फायदेमंद कसरत शुरू करे, तो क्या उसे हासिल किए गए फायदे बनाए रखने के लिए पहले जितनी ही कसरत करते रहना होगा? शोधकर्ताओं ने ऐसी कसरत चुनी जिसमें किसी सामान की जरूरत नहीं पड़ती—पीठ दीवार से टिकाकर बैठने की मुद्रा में स्थिर रहना। शुरुआती अभ्यास के बाद उन्होंने हफ्ते में अलग-अलग बार अभ्यास करने के असर की तुलना की।

बिना बार-बार शरीर हिलाए की जाने वाली कसरत

कुछ कसरतों में मांसपेशियाँ सिकुड़ती हैं और लगातार कसी रहती हैं, जबकि शरीर लगभग एक ही जगह पर स्थिर रहता है। यह तरीका चलने या साइकिल चलाने से अलग है, जिनमें जोड़ों और मांसपेशियों की हरकत बार-बार दोहराई जाती है। दीवार के सहारे बैठना, प्लैंक करना और मुट्ठी को दबाकर रखना ऐसी स्थिर कसरतों के उदाहरण हैं। इस अध्ययन में खास तौर पर पैरों और शरीर के निचले हिस्से की मांसपेशियों को दीवार के सहारे बैठने वाली कसरत से सक्रिय किया गया।

यह कसरत देखने में आसान लग सकती है, क्योंकि इसमें एक जगह से दूसरी जगह जाने की जरूरत नहीं होती। फिर भी इसमें मेहनत लगती है: व्यक्ति को एक मुद्रा में टिके रहना पड़ता है और इस दौरान मांसपेशियाँ लगातार काम करती रहती हैं। पहले के शोधों में संकेत मिले हैं कि इस तरह का अभ्यास रक्तचाप घटा सकता है। कुछ मामलों में इसका असर दूसरी तरह की कसरतों जितना, या उनसे भी ज्यादा हो सकता है। हालांकि, यह फायदा बनाए रखने के लिए कितनी बार अभ्यास करना जरूरी है, यह अब तक साफ नहीं था।

यह सवाल उन लोगों के लिए खास तौर पर अहम है जिन्हें व्यस्त दिनचर्या के बीच नियमित कसरत करना मुश्किल लगता है। पूरी तरह अभ्यास छोड़ देने और हफ्ते में एक बार समय निकालने के बीच का फर्क, हासिल हुए कुछ फायदों को बनाए रखने में मायने रख सकता है—भले ही कम बार की जाने वाली कसरत का असर सबसे नियमित कार्यक्रम जितना न हो। फिर भी, अध्ययन में हर तरह की कसरत नहीं परखी गई; इसमें खास तरह से दीवार के सहारे बैठने का अभ्यास किया गया और प्रतिभागियों का दायरा भी सीमित था।

अध्ययन में कौन शामिल था?

इस प्रयोग में 100 वयस्क शामिल हुए। उनकी औसत उम्र 37.4 वर्ष थी। प्रतिभागियों का ऊपर वाला रक्तचाप 120 से 140 मिलीमीटर पारे के बीच था, यानी कुछ लोगों का रक्तचाप सामान्य स्तर पर था और कुछ का अपेक्षाकृत ऊँचा था। वे नियमित रूप से किसी तय कसरत कार्यक्रम का पालन नहीं कर रहे थे और उनमें से किसी को भी उच्च रक्तचाप होने का निदान नहीं मिला था।

ऊपर वाला रक्तचाप वह संख्या है जो बताती है कि दिल के सिकुड़कर धमनियों में खून धकेलने पर रक्त का दबाव कितना होता है। नीचे वाला रक्तचाप उस दबाव को बताता है जो दिल की धड़कनों के बीच उसके आराम करने के समय रहता है। रिपोर्ट में बताए गए दिशानिर्देशों के मुताबिक, ऊपर वाला रक्तचाप 130 से 139 मिलीमीटर पारे के बीच हो तो उसे सामान्य से ऊँची श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे स्तर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ जीवनशैली में बदलाव की सलाह दे सकते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अध्ययन के प्रतिभागियों को उच्च रक्तचाप का निदान मिला था।

अध्ययन में शामिल होने के लिए कुछ शर्तें तय की गई थीं। प्रतिभागियों को कोई चोट या बीमारी नहीं होनी चाहिए थी, उन्होंने पहले कभी रक्तचाप की दवा नहीं ली होनी चाहिए थी और अध्ययन के समय भी वे ऐसी दवाएँ नहीं ले रहे होने चाहिए थे। प्रतिभागियों का धूम्रपान न करना भी एक शर्त थी और हफ्ते में शराब की मात्रा 14 इकाई से ज्यादा नहीं होनी चाहिए थी। इन शर्तों से अध्ययन में शामिल लोगों की स्थिति को ठीक से समझने में मदद मिलती है, लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि नतीजे लंबे समय से बीमार लोगों या रक्तचाप की दवा लेने वालों पर अपने-आप लागू नहीं किए जा सकते।

पहले सभी ने एक जैसा अभ्यास किया

शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को बेतरतीब ढंग से 5 समूहों में बाँटा। एक समूह को तुलना के लिए रखा गया और उसने कसरत का कार्यक्रम नहीं अपनाया। बाकी 4 समूहों ने घर पर 4 हफ्ते तक एक ही कार्यक्रम किया। इस शुरुआती दौर में उन सभी समूहों के लोग हफ्ते में 3 बार अभ्यास करते थे। हर सत्र में दीवार के सहारे बैठने की मुद्रा में 4 बार टिकना शामिल था।

हर बार मुद्रा में टिकने के बाद प्रतिभागी 2 मिनट बैठकर आराम करते थे। इसलिए पहले कुछ हफ्तों में चारों अभ्यास समूहों को लगभग एक जैसी कसरत मिली। इसके बाद ही उन समूहों के अभ्यास के बीच वह फर्क शुरू हुआ जिसे अध्ययन में परखना था। उपलब्ध रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि हर बार मुद्रा में कितनी देर तक टिकना था, इसलिए इस जानकारी के आधार पर कसरत की सटीक अवधि बताना संभव नहीं है।

पहले 4 हफ्ते पूरे होने के बाद अगले 4 हफ्तों के लिए कसरत कितनी बार करनी है, यह बदल दिया गया। एक समूह ने हफ्ते में 3 सत्र जारी रखे, दूसरे ने इसे घटाकर 2 सत्र कर दिया और तीसरे ने हफ्ते में सिर्फ 1 सत्र किया। चौथे समूह ने कसरत पूरी तरह रोक दी। इस तरह शोधकर्ता अलग-अलग मात्रा में अभ्यास जारी रखने और बिल्कुल रुक जाने के असर की तुलना कर सके। पाँचवाँ समूह पूरे समय तुलना के लिए था और उसने यह कार्यक्रम नहीं अपनाया।

शोधकर्ताओं ने अध्ययन शुरू होने पर रक्तचाप, दिल की धड़कन की रफ्तार और दिल तथा रक्त वाहिकाओं के काम से जुड़े दूसरे संकेतकों को मापा। उन्होंने 4 हफ्ते और फिर 8 हफ्ते बाद भी ये माप लिए। इस तरह शुरुआती सुधार देखने के साथ-साथ यह जाँचना भी संभव हुआ कि अभ्यास घटाने या रोकने पर वह सुधार बना रहता है या नहीं।

पहले 4 हफ्तों में अभ्यास करने वाले सभी समूहों को फायदा

शुरुआती 4 हफ्ते पूरे होने पर कसरत करने वाले चारों समूहों के नतीजे तुलना वाले समूह से बेहतर थे। उनके ऊपर और नीचे, दोनों रक्तचाप में कमी आई। औसत धमनियों के दबाव में भी गिरावट देखी गई। यह वह माप है जो दिल की धड़कन के पूरे चक्र के दौरान धमनियों पर पड़ने वाले दबाव का औसत संकेत देता है।

ये नतीजे पहले के उन अध्ययनों से मेल खाते हैं जिनमें स्थिर मुद्रा वाली कसरत और रक्तचाप के बीच संबंध देखा गया है। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि हर व्यक्ति में रक्तचाप उतनी ही मात्रा में घटेगा या सबकी प्रतिक्रिया एक जैसी होगी। अध्ययन में एक खास समूह के औसत नतीजे दर्ज किए गए थे; इसमें उच्च रक्तचाप का निदान पा चुके लोग या उसकी दवा लेने वाले लोग शामिल नहीं थे। शुरुआती अभ्यास के दौरान सुधार दिखना भी अपने-आप यह नहीं बताता कि कम अभ्यास जारी रखने पर क्या होगा। यही सवाल अगले चरण में परखा गया।

जब समूहों ने अपने-अपने तय कार्यक्रम अपनाने शुरू किए, तो नीचे वाले रक्तचाप में कसरत वाले समूहों और तुलना समूह के बीच का फर्क सांख्यिकीय रूप से भरोसेमंद नहीं रहा। 8वें हफ्ते तक, हफ्ते में 1 या 2 बार अभ्यास करने से इस संख्या में सुधार बना रहने का पक्का प्रमाण नहीं मिला। हालांकि, दूसरे कुछ संकेतक तुलना समूह के मुकाबले बेहतर रहे।

हफ्ते में एक बार अभ्यास से कुछ फायदा बना रहा, पूरा नहीं

8 हफ्ते के अंत में, हफ्ते में 1 या 2 बार अभ्यास जारी रखने वाले प्रतिभागियों का ऊपर वाला रक्तचाप और औसत धमनियों का दबाव तुलना समूह के मुकाबले कम था। इन बदलावों को सांख्यिकीय रूप से अहम माना गया। जिन लोगों के लिए बार-बार कसरत करना संभव नहीं है, उनके लिए यह एक काम की बात है: कम सत्र करने से पहले हासिल हुआ पूरा फायदा मिटा नहीं, कम-से-कम अध्ययन की छोटी निगरानी अवधि में।

लेकिन फायदा कितना था, यह इस बात पर निर्भर करता था कि प्रतिभागी कितनी बार अभ्यास कर रहे थे। हफ्ते में 3 सत्र जारी रखने वाले समूह में अध्ययन शुरू होने से लेकर आखिर तक ऊपर वाले रक्तचाप में औसतन 13.73 मिलीमीटर पारे की गिरावट दर्ज की गई। हफ्ते में 2 बार कसरत करने वाले समूह में औसत गिरावट 6.95 मिलीमीटर पारे थी, जबकि हफ्ते में 1 बार अभ्यास करने वालों में यह 6.56 मिलीमीटर पारे रही।

इन आँकड़ों से पता चलता है कि हफ्ते में एक बार अभ्यास करने का भी असर था, लेकिन उससे उतनी बड़ी गिरावट नहीं आई जितनी ज्यादा बार अभ्यास करने वाले समूह में देखी गई। एक और दो सत्र वाले समूहों के औसत नतीजे एक-दूसरे के करीब जरूर थे, पर इससे यह साबित नहीं होता कि दोनों कार्यक्रम बराबर असरदार हैं। अध्ययन में इस खास समूह के नतीजे दिए गए हैं; इससे यह नहीं कहा जा सकता कि हर व्यक्ति पर असर एक जैसा होगा या दूसरी परिस्थितियों में दोनों कार्यक्रमों के बीच का फर्क मायने नहीं रखेगा।

हफ्ते में 3 बार अभ्यास करने वाले समूह में कुछ दूसरे संकेतकों में भी सुधार बना रहा। इनमें शरीर की कुल परिधीय रक्त-वाहिका प्रतिरोध और दिल की धड़कनों के बीच के अंतर में होने वाला बदलाव शामिल था। परिधीय प्रतिरोध से पता चलता है कि रक्त वाहिकाओं में बहते समय खून को कितना प्रतिरोध झेलना पड़ता है; वाहिकाएँ सिकुड़ने पर यह बढ़ सकता है। धड़कनों के बीच के बदलाव से दिल की एक धड़कन और अगली धड़कन के अंतर में होने वाला उतार-चढ़ाव समझा जाता है। यह दिल के कामकाज को नियंत्रित करने से जुड़े संकेतकों में से एक है। इन नतीजों से संकेत मिलता है कि अधिक बार कसरत करने का संबंध केवल ऊपर वाले रक्तचाप में बदलाव से नहीं, बल्कि कुछ व्यापक लाभों से भी था।

कसरत पूरी तरह रोकने पर क्या हुआ?

सबसे साफ तुलना उस समूह में दिखी जिसने शुरुआती 4 हफ्तों के बाद अभ्यास रोक दिया था। प्रशिक्षण के बाद इस समूह में जो सुधार दिखे थे, वे बाद में घट गए। 8वें हफ्ते के अंत तक उनके रक्तचाप के माप तुलना समूह से सांख्यिकीय रूप से अलग नहीं थे। दूसरे शब्दों में, निगरानी के बाकी समय में पूरी तरह कसरत छोड़ देने वालों में शुरुआती फायदा बना रहने के प्रमाण नहीं मिले।

इससे यह साबित नहीं होता कि कोई भी व्यक्ति कसरत रोकते ही अपना सारा सुधार खो देगा। अध्ययन में कार्यक्रम बदलने के बाद सिर्फ 4 हफ्ते तक प्रतिभागियों पर नजर रखी गई और केवल एक खास कसरत को परखा गया। फिर भी, नतीजे इस ओर इशारा करते हैं कि अगर लक्ष्य हासिल हुए कुछ सुधार बनाए रखना है, तो पूरी तरह रुकने के बजाय थोड़ी-बहुत गतिविधि जारी रखना बेहतर हो सकता है। ये नतीजे यह भी याद दिलाते हैं कि कसरत एक बार करके खत्म होने वाली चीज नहीं, बल्कि ऐसी आदत है जिसका असर बनाए रखने के लिए उसे जारी रखना पड़ सकता है।

नतीजों को समझते समय क्या ध्यान रखें?

अध्ययन से स्थिर मुद्रा वाली कसरत के संभावित फायदे सामने आते हैं, लेकिन इससे ऐसा नुस्खा या सही कार्यक्रम तय नहीं होता जो हर किसी के लिए उपयुक्त हो। इसमें 100 लोग शामिल थे और उनकी औसत उम्र 37.4 वर्ष थी। शुरुआत में उनका ऊपर वाला रक्तचाप 120 से 140 मिलीमीटर पारे के बीच था। अध्ययन में ऐसे लोग शामिल नहीं थे जिन्हें उच्च रक्तचाप का निदान मिला था या जो पहले रक्तचाप की दवा ले चुके थे। प्रतिभागियों को कोई बीमारी या चोट नहीं होनी चाहिए थी और वे धूम्रपान नहीं करते थे। शराब का सेवन हफ्ते में 14 इकाई से ज्यादा नहीं होना चाहिए था।

अध्ययन की एक अहम सीमा यह है कि फायदे बनाए रखने की अवधि सिर्फ 4 हफ्ते थी। इसलिए यह पता नहीं चलता कि हफ्ते में एक बार कसरत करने से सुधार महीनों या सालों तक बना रहेगा या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि समय बीतने के साथ अलग-अलग कार्यक्रमों के बीच का फर्क बढ़ेगा या कम होगा। इन सवालों के जवाब के लिए लंबे समय तक निगरानी वाले अध्ययन जरूरी हैं। इसी तरह, दीवार के सहारे बैठने के नतीजों को हर तरह की स्थिर कसरत या सहनशक्ति और ताकत बढ़ाने वाले अलग-अलग कार्यक्रमों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता; उनके असर को अलग से जाँचना होगा।

सांख्यिकीय रूप से अहम बदलाव और किसी एक व्यक्ति के लिए पक्का नतीजा—इन दोनों में फर्क समझना भी जरूरी है। किसी समूह का औसत दूसरे समूह से बेहतर होने का यह मतलब नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति का रक्तचाप उतना ही घटा। न ही यह माना जा सकता है कि अध्ययन से बाहर किसी व्यक्ति में भी ठीक उतना ही बदलाव होगा। इन नतीजों को चिकित्सकीय जाँच का विकल्प नहीं मानना चाहिए और न ही इनके आधार पर डॉक्टर की लिखी दवा में बदलाव करना चाहिए। अध्ययन में कसरत को तय परिस्थितियों में परखा गया था; इसमें दवाएँ रोकने या उनकी जगह कसरत अपनाने की जाँच नहीं की गई।

फिर भी, शारीरिक गतिविधि के बारे में चल रही चर्चा में यह अध्ययन एक उपयोगी बात सामने रखता है। जब कई बार कसरत करना मुश्किल हो, तो थोड़ी मात्रा में अभ्यास जारी रखना, उसे पूरी तरह छोड़ देने से बेहतर विकल्प हो सकता है और कम-से-कम कुछ समय तक रक्तचाप से जुड़े फायदे बनाए रखने में मदद कर सकता है। जो लोग ज्यादा नियमित रह सकते हैं, उनके लिए इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि हफ्ते में 3 सत्र करने का संबंध ऊपर वाले रक्तचाप में सबसे बड़ी गिरावट और दिल तथा रक्त वाहिकाओं से जुड़े कुछ अन्य संकेतकों में सुधार बने रहने से था।

निष्कर्ष

इस अध्ययन में 100 वयस्कों ने दीवार के सहारे बैठने वाली कसरत की और उनकी औसत उम्र 37.4 वर्ष थी। पहले 4 हफ्तों तक हफ्ते में 3 बार अभ्यास करने के बाद कई संकेतकों में सुधार दिखा। अगले 4 हफ्तों में हफ्ते में 1 या 2 सत्र जारी रखने वालों में ऊपर वाले रक्तचाप और औसत धमनियों के दबाव में सांख्यिकीय रूप से अहम कमी बनी रही, लेकिन नीचे वाले रक्तचाप में नहीं। हफ्ते में 3 सत्र करने वालों में ऊपर वाले रक्तचाप की गिरावट सबसे बड़ी, 13.73 मिलीमीटर पारे थी; 2 सत्र करने वालों में यह 6.95 और 1 सत्र करने वालों में 6.56 मिलीमीटर पारे रही। पूरी तरह अभ्यास रोकने वालों में तुलना समूह से फर्क नहीं बचा। नतीजे कम समय और एक खास समूह तक सीमित हैं, फिर भी वे बताते हैं कि कसरत कम कर देना उसे पूरी तरह छोड़ने से बेहतर हो सकता है। अपने लिए सही कार्यक्रम चुनने पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी रहेगा।