आसान शब्दों में
पानी से कुछ मुश्किल रसायनों को हटाने के बाद वे अक्सर कचरे में जमा रह जाते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसी झिल्ली बनाई है जो इन रसायनों को पकड़ने के साथ-साथ उनकी मजबूत रासायनिक कड़ियों को तोड़ने में भी मदद करती है। छह तरह के प्रदूषकों पर 58 दिनों तक चले परीक्षण में इसने 96% तक प्रदूषण हटाया और 83% तक फ्लोरीन अलग किया, लेकिन इसे सस्ता और बड़े पैमाने पर कारगर बनाने के लिए अभी काम बाकी है।
पानी से अलग करना ही काफी क्यों नहीं
पीएफएएस नाम से जाने जाने वाले रसायनों से भरे पानी को साफ करना दोहरी चुनौती है: पहले उन्हें पानी से निकालना और फिर यह तय करना कि निकालने के बाद उनका क्या किया जाए। एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी और उसके सहयोगी संस्थानों के शोधकर्ताओं ने एक प्रायोगिक उपाय तैयार किया है, जिसमें ये दोनों काम एक ही उत्प्रेरक झिल्ली में करने की कोशिश की गई है। झिल्ली प्रदूषकों को अपनी सतह की ओर खींचती है और ऐसी परिस्थितियाँ बनाती है जिनसे उन रासायनिक कड़ियों का कुछ हिस्सा टूट सके, जो इन पदार्थों को लंबे समय तक टिकाऊ बनाती हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ की पत्रिका में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि प्रदूषकों को केवल पानी से निकालकर दूसरे कचरे में जमा करने से आगे बढ़ना संभव हो सकता है।
अलग करने की समस्या से तोड़ने की चुनौती तक
पीएफएएस समूह में ऐसे रसायन शामिल हैं जिनके अणुओं में कार्बन और फ्लोरीन के परमाणुओं के बीच कड़ियाँ होती हैं। इन कड़ियों को तोड़ना कठिन है, इसलिए पारंपरिक तरीकों से इन रसायनों को तोड़ना चुनौतीपूर्ण बना रहता है। इसी वजह से इन्हें कभी-कभी हमेशा बने रहने वाले रसायन कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें किसी भी हालत में बदला नहीं जा सकता, बल्कि यह कि इनके टूटने का प्रतिरोध इन्हें हटाना और नष्ट करना मुश्किल बना देता है।
सक्रिय कार्बन, आयन-विनिमय और झिल्ली-छानने जैसी तकनीकें पानी से पीएफएएस निकाल सकती हैं। लेकिन प्रदूषक को पानी से हटा देना अपने-आप में उसका नष्ट हो जाना नहीं है। वह इस्तेमाल हो चुकी किसी सामग्री में या कचरे के किसी हिस्से में अधिक मात्रा में जमा हो सकता है, जिसे बाद में अलग से संभालना पड़ता है। इस तरह कोई तकनीक एक जगह पानी के प्रदूषण की समस्या घटा सकती है, लेकिन साथ ही ऐसा प्रदूषित कचरा छोड़ सकती है जिसे इकट्ठा करना, जमा रखना या फिर से उपचारित करना जरूरी हो।
नई खोज का मकसद झिल्ली को महज पानी और प्रदूषक को अलग करने वाली रुकावट से आगे ले जाना है। झिल्ली प्रदूषक अणुओं को पकड़ने वाली सतह का काम करती है। उस पर एक रासायनिक उत्प्रेरक भी लगा होता है, जो सक्रिय हाइड्रोजन को इन अणुओं के साथ प्रतिक्रिया करने में मदद देता है। हाइड्रोजन की मदद से अणु से फ्लोरीन परमाणु हटाने की प्रक्रिया को फ्लोरीन-वियोजन कहते हैं। इस तरीके का लक्ष्य पीएफएएस को बस एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना नहीं, बल्कि उसकी रासायनिक बनावट में बदलाव करना है।
बारीक रेशों पर साथ जुटते हैं प्रदूषक और हाइड्रोजन
इस प्रणाली में झिल्ली के रेशों पर पैलेडियम की परत चढ़ी होती है। यहाँ पैलेडियम एक उत्प्रेरक धातु का काम करता है। हाइड्रोजन गैस को रेशों के भीतर से गुजारा जाता है, जहाँ वह पैलेडियम की परत तक पहुँचती है। इसके बाद हाइड्रोजन के दो सक्रिय रूप बनते हैं। वे सामग्री के भीतर अलग-अलग जगहों पर मौजूद रहते हैं और अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं, लेकिन प्रदूषक के उपचार में दोनों की हिस्सेदारी होती है।
पहला रूप पैलेडियम की सतह पर रहता है और पीएफएएस अणुओं को अपनी ओर खींचकर प्रतिक्रिया वाली जगह के पास रोकने में मदद करता है। दूसरा रूप पैलेडियम के भीतर चला जाता है और वहाँ बीटा अवस्था वाले पैलेडियम हाइड्राइड के रूप में जमा रहता है। हाइड्रोजन का यह भंडार फ्लोरीन-वियोजन की प्रतिक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी प्रेरक बल देता है। इस बनावट में प्रदूषक केवल उत्प्रेरक के पास से गुजरता नहीं है, बल्कि प्रदूषक और हाइड्रोजन एक ही सतह के पास इकट्ठा होते हैं और धातु के भीतर जमा हाइड्रोजन भी प्रतिक्रिया में काम आता है।
एक आसान उदाहरण से समझें तो झिल्ली के हर रेशे पर एक छोटी-सी कार्यशाला लगी है। उसकी सतह लक्ष्य अणुओं को खींचती है, वहाँ हाइड्रोजन पहुँचती है और दोनों के मिलने की जगह के पास रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि झिल्ली से गुजरने वाला हर अणु एक ही हद तक टूटता है। परीक्षण में अलग-अलग रसायनों के नतीजे अलग थे और पानी से हटाने तथा फ्लोरीन निकालने के प्रतिशत भी एक जैसे नहीं थे।
सामग्री के भीतर क्या हो रहा है, यह जानने के लिए शोधकर्ताओं ने ठोस अवस्था में उसकी जाँच की। विश्लेषण में पैलेडियम हाइड्राइड बनने के संकेत मिले। शोधकर्ताओं ने पैलेडियम की क्रिस्टलीय बनावट में फैलाव भी देखा, जिसका संबंध हाइड्रोजन जमा होने से था। इन अवलोकनों से यह समझने में मदद मिलती है कि सक्रिय हाइड्रोजन झिल्ली के भीतर कैसे बनती, जमा होती और काम में आती है। यानी अध्ययन केवल यह नहीं देखता कि पानी से कितना प्रदूषक गायब हुआ, बल्कि सामग्री के अंदर चल रही प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश करता है।
58 दिनों तक छह रसायनों की जाँच
शोधकर्ताओं ने झिल्ली को नियमों और निगरानी में खास अहमियत रखने वाले छह रसायनों पर परखा: PFOA, PFOS, PFNA, PFHxS, PFBS और GenX। प्रणाली लगातार 58 दिनों तक चलाई गई। परीक्षण के दौरान इसने लक्ष्य प्रदूषकों को अधिकतम 96% तक हटाया, जबकि फ्लोरीन-वियोजन की दर 83% तक पहुँची।
ये दोनों आँकड़े उपचार के अलग-अलग पहलुओं को बताते हैं। प्रदूषण हटाने का प्रतिशत यह बताता है कि परीक्षण में बाहर निकलने वाले पानी से कितना प्रदूषक हटाया गया। दूसरी ओर, फ्लोरीन-वियोजन से पता चलता है कि कार्बन और फ्लोरीन के बीच की कड़ियों को बदलने वाली रासायनिक प्रक्रिया कितनी हुई। इसलिए सिर्फ हटाने की दर देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि पानी से निकला हर अणु पूरी तरह टूटकर दूसरे पदार्थों में बदल गया। दूसरा आँकड़ा रासायनिक बदलाव की हद का एक अलग पहलू दिखाता है।
सबसे ऊँचे ये प्रतिशत इस बात की गारंटी नहीं देते कि परीक्षण किए गए सभी छह रसायनों के नतीजे एक जैसे थे। झिल्ली का प्रदर्शन अणु की बनावट पर निर्भर करता था। लंबी शृंखला वाले पीएफएएस, उनके छोटे शृंखला वाले समकक्षों के मुकाबले, पानी से जल्दी हटे और उनमें फ्लोरीन-वियोजन भी तेजी से हुआ। पानी में कई तरह के प्रदूषकों का मिश्रण हो तो यह फर्क खास मायने रखता है, क्योंकि हर पदार्थ झिल्ली के सामने एक ही तरह से व्यवहार नहीं करता।
GenX को तोड़ना अधिक कठिन क्यों था
शोधकर्ताओं ने जिन दूसरे रसायनों को परखा, उनके मुकाबले GenX का उपचार कठिन रहा। फिर भी झिल्ली उसे हटाने और उसमें से फ्लोरीन अलग करने में सफल रही। इस प्रक्रिया के बाद 2-प्रोपॉक्सीप्रोपेनोइक एसिड नाम का एक यौगिक बना। यह उदाहरण दिखाता है कि किसी तकनीक की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह प्रतिक्रिया करती है या नहीं। यह भी देखना पड़ता है कि प्रतिक्रिया कितनी तेजी से होती है और हर पदार्थ में कितना रासायनिक बदलाव ला पाती है।
शोधकर्ताओं ने GenX के अधिक प्रतिरोध के पीछे उसकी कई विशेषताओं को जिम्मेदार माना। उसके अणु में ईथर कड़ी है, वह दूसरे पदार्थों की तुलना में पैलेडियम की सतह पर कम चिपकता है और उसमें कार्बन-फ्लोरीन कड़ियाँ तोड़ने के लिए औसतन अधिक ऊर्जा चाहिए। जब अणु उत्प्रेरक की सतह की ओर कम आकर्षित होता है, तो उसके प्रतिक्रिया वाली जगह के पास पहुँचने की संभावना घट सकती है। और जब उसकी कड़ियाँ तोड़ना कठिन हो, तो उन्हें अलग करने की चुनौती बढ़ जाती है। ये बातें अलग-अलग रसायनों के नतीजों में दिखने वाले फर्क को समझने में मदद करती हैं, हालांकि हर अंतर का कारण कोई एक ही बात नहीं है।
लंबी और छोटी शृंखला वाले रसायनों तथा GenX के बीच की तुलना दिखाती है कि उपचार की योजना बनाते समय प्रदूषक की पहचान पर ध्यान देना जरूरी है। सभी पदार्थों को केवल पीएफएएस नाम के एक बड़े समूह में रखकर उनके व्यवहार को एक जैसा नहीं माना जा सकता। हर रसायन की बनावट यह बदल सकती है कि वह झिल्ली से कितनी अच्छी तरह चिपकता है और उसमें से फ्लोरीन निकालना कितना आसान होता है। इसीलिए छह पदार्थों पर मिले नतीजे इस तरीके के काम करने का प्रमाण तो देते हैं, लेकिन पीएफएएस समूह के हर रसायन पर वैसा ही प्रदर्शन होने की गारंटी नहीं देते।
इस तरीके में नया क्या है
इस प्रणाली की खासियत यह है कि यह प्रदूषक को पकड़ने और उसकी रासायनिक बनावट बदलने की कोशिश को एक ही प्रणाली में जोड़ती है। पानी से प्रदूषक अलग करने वाली कई प्रक्रियाओं का मुख्य लक्ष्य उसे पानी से बाहर निकालना होता है। लेकिन उसके बाद उसे पकड़ने वाली सामग्री का उपचार करना फिर भी जरूरी रहता है। उत्प्रेरक झिल्ली का उद्देश्य उसी सतह पर रासायनिक प्रतिक्रिया की गुंजाइश बनाना है जहाँ प्रदूषक पानी से हटाया जाता है। इसमें पैलेडियम, पीएफएएस और हाइड्रोजन के बीच होने वाली प्रतिक्रिया का लाभ लिया जाता है।
अध्ययन के अनुसार, प्रणाली आम परिस्थितियों में काम करती है। यह बात उसे उन उपायों से अलग करती है जिनमें काम करने के लिए बहुत कठिन परिस्थितियों की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन केवल इस जानकारी से यह तय नहीं किया जा सकता कि इसे चलाने का खर्च कितना होगा या इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना कितना आसान होगा। इसे बड़े पैमाने पर बनाने और चलाने से जुड़ी दूसरी गणनाएँ भी जरूरी हैं, जिनकी जानकारी यहाँ दिए गए नतीजों में नहीं है। इसी तरह, 58 दिनों तक लगातार चला परीक्षण अध्ययन के भीतर लंबे समय की जाँच जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि हर तरह के पानी में या इससे भी लंबी अवधि तक प्रदर्शन स्थिर रहेगा।
अध्ययन का नेतृत्व ब्रूस रिटमैन ने किया, जो एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के बायोडिज़ाइन संस्थान में स्वेट सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल बायोटेक्नोलॉजी के निदेशक हैं। इस काम में राइस यूनिवर्सिटी, टोंगजी यूनिवर्सिटी, सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय और नानजिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे। अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इसमें सक्रिय हाइड्रोजन पर निर्भर ऐसी उत्प्रेरक झिल्लियों के विकास का वर्णन है, जो पीएफएएस के छह रसायनों को पकड़कर उनमें से फ्लोरीन निकाल सकती हैं।
प्रयोगशाला से प्रदूषकों के गाढ़े कचरे तक
शोधकर्ता इस झिल्ली को पीएफएएस हटाने की मौजूदा सभी तकनीकों का तैयार विकल्प नहीं बता रहे हैं। इसका एक संभावित इस्तेमाल उन गाढ़े कचरे के उपचार में हो सकता है, जो मौजूदा जल-शोधन प्रणालियों से निकलता है। ऐसे मामले में नई तकनीक उस तरल या कचरे पर काम कर सकती है जिसमें प्रदूषक पहले ही इकट्ठा हो चुके हैं। इससे एक ही बार में उपचार की सभी मौजूदा प्रक्रियाओं को बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हालाँकि, व्यावहारिक स्तर पर एक साफ चुनौती है: पैलेडियम महँगा है। इसलिए प्रणाली की पकड़ने और रासायनिक बदलाव करने की क्षमता बनाए रखते हुए जरूरी धातु की मात्रा कम करना, इसके विकास का अहम हिस्सा होगा। प्रयोगों में मिले अच्छे नतीजे अकेले यह तय करने के लिए काफी नहीं कि तकनीक बड़े पैमाने पर उपयोग के लायक है। यह भी देखना होगा कि कितने उत्प्रेरक की जरूरत है, उसे चलाने का खर्च कितना है और प्रक्रिया से बने पदार्थों का उपचार, इसके उपयोग के हिसाब से उचित लागत पर किया जा सकता है या नहीं।
शोधकर्ता ऐसी मिश्रित झिल्लियाँ बनाने पर भी काम कर रहे हैं जिनमें पैलेडियम के साथ प्रदूषकों को तोड़ सकने वाले जीवाणु हों। लेकिन यह मौजूदा अध्ययन से जुड़ी एक अलग शोध-दिशा है, न कि इस परीक्षण में इस्तेमाल हुई प्रणाली का विवरण। 58 दिनों तक जाँची गई झिल्ली पैलेडियम और हाइड्रोजन पर निर्भर थी, सूक्ष्मजीवों पर नहीं। दोनों रास्तों का फर्क समझना जरूरी है, ताकि मौजूदा प्रयोग के नतीजों का श्रेय उन घटकों को न दिया जाए जो उसमें इस्तेमाल ही नहीं हुए।
निष्कर्ष
पैलेडियम की परत वाली ये झिल्लियाँ पीएफएएस उपचार का ऐसा तरीका पेश करती हैं जो रसायनों को पानी से खींचने के साथ उनकी रासायनिक कड़ियाँ तोड़ने की भी कोशिश करता है। छह रसायनों, जिनमें GenX भी शामिल था, पर 58 दिनों तक चले परीक्षण में प्रदूषक 96% तक हटे और फ्लोरीन-वियोजन 83% तक पहुँचा। नतीजे रसायन की बनावट के अनुसार बदले: लंबी शृंखला वाले पदार्थों का उपचार तेजी से हुआ, जबकि GenX अधिक प्रतिरोधी रहा, हालाँकि उससे उपचार के बाद 2-प्रोपॉक्सीप्रोपेनोइक एसिड बना। इस तरीके को व्यावहारिक बनाने के लिए पैलेडियम का इस्तेमाल घटाना और सही उपयोगों में इसकी क्षमता जाँचना जरूरी है। इसलिए यह शोध उम्मीद जगाने वाला कदम है, लेकिन पीएफएएस से होने वाले हर तरह के जल-प्रदूषण का तैयार और अंतिम समाधान नहीं।