सरल शब्दों में
यह कहानी है जॉर्ज डोर की, जिन्होंने अपनी संपत्ति को एक राष्ट्रीय उद्यान में बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने माउंट डेजर्ट द्वीप की प्राकृतिक सुंदरता को संरक्षित करने के लिए अपनी जिंदगी और धन समर्पित कर दिया, ताकि यह सभी के लिए उपलब्ध रहे और अमीरों द्वारा इसका शोषण न हो सके।
जॉर्ज डोर का अद्वितीय निर्णय
बीसवीं सदी की शुरुआत में, बॉस्टन के एक धनी उत्तराधिकारी जॉर्ज डोर ने अपनी संपत्ति का उपयोग एक नेक उद्देश्य के लिए करने का निर्णय लिया। उन्होंने अमेरिका के मेन राज्य में माउंट डेजर्ट द्वीप की प्राकृतिक सुंदरता की रक्षा करने का बीड़ा उठाया।
द्वीप पर मंडराते खतरे
उन्नीसवीं सदी के अंत में, माउंट डेजर्ट द्वीप अमीरों के लिए एक आकर्षक स्थल बन गया था। लेकिन समय के साथ, ये अमीर लोग इस सुंदर भूमि को निजी संपत्ति में बदलने लगे। इसके अलावा, लकड़ी काटने की मशीनों के आगमन ने द्वीप के वनों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर दिया।
भूमि संरक्षण के लिए संस्था की स्थापना
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष चार्ल्स इलियट की सलाह पर, डोर ने 1901 में हैंकॉक काउंटी में सार्वजनिक भूमि की रक्षा के लिए एक विशेष संस्था की स्थापना की। इसका उद्देश्य द्वीप पर भूमि खरीदकर उसे जनता के लिए खुला रखना था। इस संस्था में डोर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
भूमि संग्रह के निरंतर प्रयास
डोर ने चालीस वर्षों से अधिक समय तक भूमि खरीदने का प्रयास जारी रखा, जब भी आवश्यकता पड़ी, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत धनराशि का उपयोग किया। 1913 तक, संस्था के पास लगभग 6000 एकड़ भूमि थी, जो ज्यादातर डोर के प्रयासों और दान के कारण थी।
राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तन
1916 में, डोर ने सरकार को इस भूमि को एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकार करने के लिए मना लिया। तीन साल बाद, इसे लाफायेट राष्ट्रीय उद्यान में बदल दिया गया, जो मिसिसिपी नदी के पूर्व का पहला राष्ट्रीय उद्यान था। 1929 में इसका नाम बदलकर अकाडिया राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया।
समापन
1944 में जॉर्ज डोर का निधन हो गया, लेकिन उन्होंने अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अकाडिया राष्ट्रीय उद्यान को एक स्थायी धरोहर के रूप में छोड़ दिया, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया गया।