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प्लाज़्मा के बदलते मिज़ाज पर नज़र: क्या छोटी-सी चिप संलयन रिएक्टर को संभाल पाएगी?

आसान शब्दों में

संलयन रिएक्टर के भीतर बहुत गरम गैस की हालत पल-पल बदल सकती है, इसलिए गड़बड़ी के संकेत जल्दी पकड़ना ज़रूरी है। शोधकर्ताओं ने ऐसी चिप बनाई है जो आँकड़ों को तेज़ी से परख सकती है। अभी इसे असली रिएक्टर में नहीं, बल्कि पहले से दर्ज आँकड़ों पर आज़माया गया है। इससे यह साबित नहीं हुआ है कि चिप रिएक्टर को सुरक्षित बना देगी।

संलयन रिएक्टर को जल्दी चेतावनी क्यों चाहिए?

यह प्रयोग टोकामाक नाम के उपकरणों से जुड़ा है। इनका आकार बड़ा होता है और इनके भीतर की जगह छल्ले जैसी होती है, कुछ-कुछ बीच से खाली केक जैसी। टोकामाक में चुंबकों की मदद से प्लाज़्मा को एक सीमित जगह में रखा जाता है। यही वह ईंधन है जिसका इस्तेमाल संलयन ऊर्जा बनाने की कोशिश में किया जाता है। लेकिन प्लाज़्मा को चुंबकों के भीतर बाँध देने भर से उसका व्यवहार स्थिर या आसानी से समझ में आने वाला नहीं हो जाता। उसकी हालत लगातार बदल सकती है और वह तेज़ी से अपनी तय स्थिति से हट सकती है।

अगर प्लाज़्मा में गड़बड़ी पैदा हो, तो उसकी स्थिरता अचानक बिगड़ सकती है और वह अपनी ऊर्जा खो सकता है। इससे रिएक्टर को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। इसलिए ऐसी गड़बड़ी को मामूली या नज़रअंदाज़ करने लायक समस्या नहीं माना जा सकता। टोकामाक को व्यावहारिक रूप से चलाना संभव होगा या नहीं, यह भी इस चुनौती से जुड़ा है। परियोजना में शामिल प्रिंसटन प्लाज़्मा भौतिकी प्रयोगशाला के शोध वैज्ञानिक माइकल चर्चिल का कहना है कि ऐसी घटनाओं से निपटने की क्षमता इन रिएक्टरों को लगातार चलाते रहने के लिए बुनियादी शर्त है।

प्लाज़्मा पर नज़र रखने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में माप जुटाने पड़ते हैं और उनका विश्लेषण उसी दौरान करना होता है, जब रिएक्टर के भीतर की स्थिति बदल रही हो। यहीं सामान्य कंप्यूटरों के सामने मुश्किल आती है। आँकड़े इतने अधिक और तेज़ी से आने वाले हो सकते हैं कि उनका विश्लेषण देर से पूरा हो, भले ही कंप्यूटर आखिरकार उन्हें सँभाल ले। इस काम में देरी मायने रखती है: घटना काफी आगे बढ़ जाने के बाद गड़बड़ी का संकेत मिलना, उसे शुरू में पहचान लेने जितना उपयोगी नहीं होता।

माप के स्रोत के पास ही आँकड़ों का विश्लेषण

नई चिप ऐसी कंप्यूटिंग पद्धति पर आधारित है जिसे न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग कहा जाता है। इसमें कंप्यूटर की बनावट इस तरह तैयार की जाती है कि वह कई काम एक साथ कर सके। इस तरीके में मस्तिष्क के काम करने की कुछ विशेषताओं से प्रेरणा ली जाती है। इसका मकसद इंसान की तरह हर पहलू में सोचने वाला कृत्रिम दिमाग बनाना नहीं है। विचार यह है कि कंप्यूटर को बड़ी मात्रा में संकेतों को तेज़ी से सँभालने और उनमें ऐसी बनावट पहचानने के लिए तैयार किया जाए, जो किसी समस्या का इशारा कर सकती हो।

इस चिप में अतिचालक सर्किट इस्तेमाल किए गए हैं। यह तकनीक क्वांटम कंप्यूटिंग में काम आने वाले कुछ उपकरणों से भी जुड़ी है। शोधकर्ताओं की योजना के मुताबिक, विशेष कामों के लिए तैयार कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिदम सीधे चिप पर चलाए जा सकते हैं। इस तरह आँकड़ों को पहले किसी दूर रखे कंप्यूटर या पारंपरिक कंप्यूटिंग व्यवस्था तक भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इससे माप लेने की जगह के पास ही आँकड़ों का विश्लेषण हो सकेगा और संकेत मिलने से लेकर उसका विश्लेषण होने तक का समय घटाने की कोशिश की जाएगी।

इस व्यवस्था की अहमियत इस बात में है कि चिप को प्रयोग के सारे आँकड़े दर्ज हो जाने के बाद विश्लेषण शुरू करने के लिए नहीं बनाया गया है। इसके बजाय, उससे यह उम्मीद है कि वह आँकड़ों के आते ही उन पर काम करे। परियोजना का नेतृत्व कर रहे ब्रुकहेवन राष्ट्रीय प्रयोगशाला में कृत्रिम बुद्धिमत्ता विभाग के प्रमुख शिंगहाई यू के अनुसार, चिप के भीतर ही जानकारी सहेजने की जगह और गीगाहर्ट्ज़ की गति से काम करने की क्षमता उसे एज कंप्यूटिंग के लिए उपयोगी बना सकती है। एज कंप्यूटिंग का मतलब है जानकारी का विश्लेषण उसी जगह या उसके करीब करना जहाँ से वह मिल रही हो, न कि हर बार उसे किसी बड़े कंप्यूटर केंद्र तक भेजना।

DIII-D टोकामाक के दर्ज आँकड़ों पर परीक्षण

अभी तक इस चिप को चालू टोकामाक से नहीं जोड़ा गया है। इसलिए परीक्षण के दौरान उसे रिएक्टर के भीतर मौजूद जीवित प्लाज़्मा का सामना नहीं करना पड़ा। इसके बजाय, टीम ने कैलिफ़ोर्निया राज्य के सैन डिएगो शहर में मौजूद DIII-D टोकामाक से पहले दर्ज किए गए आँकड़ों का इस्तेमाल किया। शोधकर्ताओं ने उन आँकड़ों को चिप में उसी गति से दोबारा चलाया, जिस गति से वे मूल रूप से जुटाए गए थे: हर सेकंड 10 लाख नमूने।

दोबारा चलाए गए आँकड़ों के इस तेज़ प्रवाह के साथ चिप तालमेल बनाए रखने में सफल रही। टीम ने उस पर असामान्य स्थितियों की पहचान करने और गड़बड़ियों का पहले से अनुमान लगाने वाले एल्गोरिदम भी चलाए। इस चरण में अहम बात यह दिखाई गई कि चिप आँकड़ों को उनकी दर्ज की गई गति के मुताबिक सँभाल सकती है। इससे यह साबित नहीं हुआ कि चिप ने किसी वास्तविक गड़बड़ी को रोका या चलते हुए रिएक्टर का प्रदर्शन बेहतर किया।

क्या हासिल हुआ है और क्या नहीं, यह समझने के लिए यह अंतर साफ़ रखना ज़रूरी है। पहले से दर्ज आँकड़ों को दोबारा चलाने से पता चलता है कि चिप कितनी तेज़ी से जानकारी ले और उसका विश्लेषण कर सकती है। लेकिन इससे उन सभी बातों की जाँच नहीं होती जो उसे किसी चालू सुविधा से जोड़ने पर सामने आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में वास्तविक समय में मिल रहे मापों को सँभालना और उन पर प्रतिक्रिया देना भी परीक्षण का हिस्सा होगा। इसी तरह, एल्गोरिदम का चेतावनी देना या किसी गड़बड़ी का अनुमान लगाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि नियंत्रण व्यवस्था उस जानकारी के आधार पर समय रहते सही कदम उठा पाएगी।

चर्चिल के मुताबिक, यह काम अभी प्रदर्शन और शुरुआती जाँच के चरण में है। टीम के नतीजे भी अभी प्रकाशित नहीं हुए थे; शोधकर्ता उन्हें प्रकाशन के लिए तैयार कर रहे थे। इसलिए इस परियोजना को संलयन रिएक्टरों में लगाने के लिए तैयार तकनीक नहीं, बल्कि एक कंप्यूटिंग मंच की क्षमता की शुरुआती जाँच समझना चाहिए।

खतरे को पहचानना और उसे रोकना अलग बातें हैं

संभावित गड़बड़ी के संकेत जल्दी देख लेना और उस गड़बड़ी को उपकरण को नुकसान पहुँचाने से रोक देना, दोनों अलग काम हैं। पहला काम संकेतों को मापने, उनका विश्लेषण करने और आगे क्या हो सकता है, इसका अनुमान लगाने से जुड़ा है। दूसरे के लिए ऐसा उचित कदम उपलब्ध होना चाहिए जिसे लागू भी किया जा सके और जो प्लाज़्मा के व्यवहार पर असर डालने के लिए पर्याप्त जल्दी उठाया जाए। परियोजना के विवरण में बताए गए परीक्षण में दोबारा चलाए गए आँकड़ों को सँभालने की क्षमता परखने की बात थी। उसमें नियंत्रण की पूरी प्रक्रिया के सफल होने का प्रमाण नहीं मिला।

टीम के मुताबिक, टोकामाक अभी भी इस तरह की चिप के बिना काम करते हैं। हालांकि, मौजूदा नियंत्रण प्रणालियाँ समस्या पर उतनी तेज़ी से प्रतिक्रिया नहीं दे पातीं, जितनी तेज़ी से नई चिप उसे पहचान सकती है। इससे एक सवाल खुला रह जाता है: क्या तेज़ पहचान से खतरे के सामने आने और उससे निपटने के बीच का अंतर कम होगा, या इससे सिर्फ़ विश्लेषण बेहतर होगा और रिएक्टर के संचालन का नतीजा नहीं बदलेगा? अभी तक किसी वास्तविक परीक्षण ने इसका पक्का जवाब नहीं दिया है।

पहले से सहेजे गए आँकड़ों पर चलने वाले नमूने और असली रिएक्टर से जुड़े परीक्षण के बीच की दूरी वैज्ञानिक काम का अहम अगला पड़ाव है। जब चिप को चलते हुए उपकरण से जोड़ा जाएगा, तो टीम को देखना होगा कि वह आते हुए मापों को सही ढंग से सँभालती है या नहीं और उसका विश्लेषण वास्तविक नियंत्रण के लिए उपयोगी है या नहीं। मौजूदा परीक्षण के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि गड़बड़ियाँ कम होंगी, उनसे होने वाला नुकसान घटेगा या केवल इस चिप की वजह से संलयन रिएक्टर सुरक्षित हो जाएँगे।

संलयन रिएक्टरों से आगे भी इस्तेमाल की संभावना

यू इस तकनीक का भविष्य सिर्फ़ संलयन के काम तक सीमित नहीं मानते। तेज़ गणना और चिप के भीतर ही मौजूद स्मृति उन जगहों पर मददगार हो सकती है जहाँ कोई पारंपरिक कंप्यूटर केंद्र पास में न हो या इस्तेमाल के लायक न हो। यही एज कंप्यूटिंग का विचार है: जानकारी के स्रोत के पास मौजूद उपकरण उसका कुछ विश्लेषण खुद करें, बजाय इसके कि हर जानकारी को केंद्रीय कंप्यूटिंग व्यवस्था तक भेजा जाए और वहाँ उसके विश्लेषण का इंतज़ार किया जाए।

हालाँकि, इसका यह मतलब नहीं कि चिप ने इन सभी संभावित कामों में अपनी उपयोगिता साबित कर दी है। यू ने भविष्य में जिन इस्तेमालों को आज़माने की इच्छा जताई है, वे अभी संभावनाएँ हैं। अब तक DIII-D के आँकड़ों पर असामान्य स्थितियाँ पहचानने और गड़बड़ी का अनुमान लगाने वाले एल्गोरिदम संलयन के संदर्भ में ही परखे गए हैं। संभावित उपयोगों को उस काम से अलग समझना ज़रूरी है जो प्रयोग में वास्तव में किया जा चुका है।

संलयन के इस काम में इस्तेमाल किया गया कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल आज के बड़े भाषा मॉडलों से भी बहुत छोटा है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों के काम अलग हैं। यहाँ उद्देश्य खास तरह के संकेतों का विश्लेषण करना है, न कि आम विषयों पर लिखना या खुले सवालों के जवाब देना। मॉडल का छोटा होना अपने आप में न तो परियोजना की कमजोरी साबित करता है, न उसकी ताकत। असली कसौटी यह है कि वह तय काम को ज़रूरी समय में कर पाता है या नहीं और वास्तविक संचालन में लगाने पर उसकी उपयोगिता साबित होती है या नहीं।

अगला कदम: दस गुना बड़ा तंत्रिका-जाल

टीम चिप की अगली पीढ़ी बनाने की योजना पर काम कर रही है। उसमें तंत्रिका-जाल मौजूदा मॉडल से 10 गुना बड़ा होगा। घोषित योजना के अनुसार, इस चिप को अगले साल की शुरुआत में ब्रुकहेवन में पेश किया जाना था और बाद में DIII-D में लगाया जाना था। परियोजना के विवरण में इससे अधिक सटीक कैलेंडर तारीख नहीं दी गई थी। इसलिए इस समय-सीमा को टीम की घोषित योजना समझना चाहिए, न कि काम पूरा होने की पक्की तारीख।

अगर ये कदम उठाए जाते हैं, तो नई पीढ़ी की चिप को सुविधा में लगाना दर्ज आँकड़ों को दोबारा चलाने से अलग तरह का परीक्षण होगा। इससे तकनीक पहले से सहेजे गए आँकड़ों की गति के साथ तालमेल बिठाने की जाँच से आगे बढ़कर किसी असली रिएक्टर से आ रहे आँकड़ों को सँभालने की जाँच कर सकेगी। इस दौरान आँकड़ों को पहले किसी भंडारण डिस्क से होकर भेजने की ज़रूरत नहीं होगी। फिर भी, इस चरण तक पहुँच जाना अपने आप में यह साबित नहीं करेगा कि चिप टोकामाक को नुकसान से बचाती है। यह जानना भी ज़रूरी होगा कि उसकी चेतावनियाँ कितनी सटीक और उपयोगी हैं और वे नियंत्रण व्यवस्था से किस तरह जुड़ती हैं।

तंत्रिका-जाल बड़ा होने से उसे अधिक पेचीदा ढर्रों का विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है, लेकिन अभी यह केवल संभावना है, साबित हो चुका नतीजा नहीं। बड़े मॉडल की भी जाँच करनी होगी। साथ ही, तंत्रिका-जाल का आकार बढ़ने से यह गारंटी नहीं मिलती कि प्रतिक्रिया तेज़ होगी या अनुमान बेहतर होंगे। आगे के परीक्षणों से पता चलेगा कि अतिचालक उपकरण और खास कामों के लिए बने एल्गोरिदम साथ मिलकर दर्ज आँकड़ों को सफलतापूर्वक सँभालने के अलावा कोई ठोस लाभ देते हैं या नहीं।

निष्कर्ष

ब्रुकहेवन और ग्रेट स्काई की चिप टोकामाक की एक बुनियादी चुनौती पर काम करने की कोशिश है: प्लाज़्मा में बदलाव को इतनी जल्दी पहचानना कि गड़बड़ी बढ़ने से पहले उस पर ध्यान दिया जा सके। DIII-D के पहले से दर्ज आँकड़ों पर हुए प्रयोग में चिप ने हर सेकंड 10 लाख नमूनों की गति से आते आँकड़ों के साथ तालमेल रखा और असामान्य स्थितियाँ पहचानने तथा खतरे का अनुमान लगाने वाले एल्गोरिदम चलाए। लेकिन इसे अभी जीवित प्लाज़्मा पर नहीं परखा गया है और यह साबित नहीं हुआ कि इससे गड़बड़ी रुकती है या रिएक्टर अधिक सुरक्षित होता है। अगली पीढ़ी में तंत्रिका-जाल को 10 गुना बड़ा करने की योजना तकनीक को वास्तविक परीक्षण के करीब ले जा सकती है। इसकी असली अहमियत का फैसला तभी होगा, जब यह दिखेगा कि तेज़ विश्लेषण को उपयोगी नियंत्रण में बदला जा सकता है।