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ब्रह्मांड में पदार्थ क्यों बचा? जवाब किसी अदृश्य भारी कण में छिपा हो सकता है।

आसान शब्दों में

ब्रह्मांड की शुरुआत में पदार्थ और उसके उलटे गुणों वाले कण लगभग बराबर मात्रा में बने थे। वे एक-दूसरे से मिलकर मिट सकते थे, फिर भी थोड़ा-सा पदार्थ बच गया और उसी से तारे, ग्रह और हम बने। एक नए अध्ययन का सुझाव है कि लंबे समय तक टिकने वाले भारी कण ने शुरुआती ब्रह्मांड की हालत बदलकर इस बचे हुए पदार्थ को बचाने में मदद की होगी।

पदार्थ का बचा रहना अब भी पहेली क्यों है?

आज ब्रह्मांड पदार्थ से भरा दिखाई देता है। इसमें तारे, आकाशगंगाएँ और ग्रह हैं, और जो कुछ हम जानते हैं, वह भी पदार्थ से ही बना है। लेकिन इस विशाल दृश्य के पीछे एक उलझाने वाला सवाल छिपा है: शुरुआत में इतना पदार्थ बचा कैसे? भौतिकी की मौजूदा समझ के मुताबिक, ब्रह्मांड के आरंभिक दौर में पदार्थ और प्रतिपदार्थ लगभग बराबर संख्या में बने थे। जब पदार्थ का कोई कण अपने प्रतिकण से मिलता है, तो दोनों ऊर्जा में बदल जाते हैं। अगर इन दोनों की मात्रा पूरी तरह बराबर होती, तो ऐसी मुलाकातों में लगभग सब कुछ मिट जाता और ब्रह्मांड की संरचनाएँ बनाने लायक पदार्थ नहीं बचता।

साउथैम्पटन विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के शोधकर्ताओं ने इस पहेली का एक संभावित जवाब सुझाया है। उनके विचार में एक ऐसा भारी न्यूट्रिनो कण भूमिका निभा सकता है, जिस पर पहले बहुत कम ध्यान दिया गया। इसका दूसरे कणों से जुड़ाव बेहद कमजोर माना गया है। शोधकर्ताओं की गणनाओं के अनुसार, इसका कमजोर जुड़ाव यह साबित नहीं करता कि इसका कोई असर नहीं हो सकता। संभव है कि इसकी उम्र लंबी रही हो और इसी वजह से इसने ब्रह्मांड के शुरुआती इतिहास में भूमिका निभाई हो।

पदार्थ और प्रतिपदार्थ का अंतर

मुख्य मुश्किल यह है कि ज्ञात भौतिक नियम आसानी से नहीं समझाते कि ब्रह्मांड में आज दिखने वाला पदार्थ आखिर बचा कैसे। शुरुआत में तापमान बहुत ऊँचा था। उस समय कण और उनके प्रतिकण लगातार बनते और एक-दूसरे को मिटाते रहते थे। ब्रह्मांड फैलता गया और ठंडा होता गया, फिर भी ये प्रक्रियाएँ चलती रहीं। आखिरकार, प्रतिपदार्थ के कण अपने पदार्थ-कणों से मिले और ऊर्जा में बदलकर गायब हो गए।

लेकिन आज ब्रह्मांड में पदार्थ की कमी नहीं है। कुछ पदार्थ बचा हुआ है, और लगता है कि दोनों पक्षों के बीच एक छोटा-सा अंतर इसके लिए काफी था। अगर पदार्थ के कण प्रतिपदार्थ के कणों से थोड़े अधिक थे, तो दोनों के जोड़े मिट जाने के बाद भी अतिरिक्त पदार्थ बच सकता था। पदार्थ की यही बची हुई मात्रा आगे चलकर तारों और ग्रहों का आधार बनी। फिर भी, यह बात अपने आप नहीं बताती कि दोनों की संख्या में यह अंतर पैदा कैसे हुआ या उसे तय करने वाली शुरुआती परिस्थितियाँ क्या थीं।

भौतिक विज्ञानी पदार्थ और प्रतिपदार्थ के बीच इस असमानता को पदार्थ-प्रतिपदार्थ का असंतुलन कहते हैं। यह कोई मामूली बारीकी नहीं है। हमारा अस्तित्व ही इस बात पर टिका है कि ब्रह्मांड की शुरुआत दोनों के बीच पूरी बराबरी के साथ खत्म नहीं हुई। फिर भी, यह हल्का-सा झुकाव क्यों पैदा हुआ, इस पर शोध जारी है। नया अध्ययन इस सवाल को एक अलग दिशा से देखता है। आम तौर पर उन कणों पर ध्यान दिया जाता है जो दूसरे कणों से जोरदार ढंग से जुड़ते हैं और जानी-पहचानी प्रक्रियाओं में सीधे हिस्सा लेते हैं। इसके बजाय, शोधकर्ताओं ने पूछा कि क्या ऐसा कण भी ब्रह्मांड की परिस्थितियों को परोक्ष रूप से बदल सकता है, जो आम तौर पर दूसरी चीज़ों के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करता हो।

भारी न्यूट्रिनो, जो पहली नज़र में खास नहीं दिखता

न्यूट्रिनो बेहद हल्के कण होते हैं। वे आम पदार्थ के बीच से गुजरते हुए अक्सर लगभग बिना किसी प्रतिक्रिया के निकल जाते हैं। शोधकर्ताओं ने जिस कण का अध्ययन किया, वह इसी परिवार का एक काल्पनिक सदस्य है, लेकिन आम न्यूट्रिनो से कहीं भारी है। दूसरे कणों से उसका जुड़ाव भी बहुत कमजोर माना गया है। इसी वजह से पदार्थ और प्रतिपदार्थ के अंतर की उत्पत्ति पर काम करने वाली गणनाओं में उसे आसानी से ऐसा कण समझकर छोड़ दिया जाता था, जिसका कोई खास असर नहीं होगा।

लेकिन प्रस्तावित विचार में अहम बात कण की बार-बार होने वाली प्रतिक्रियाएँ नहीं, बल्कि उसका लंबे समय तक बने रहना है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, यह कण पैदा होने के तुरंत बाद खत्म नहीं होता। ब्रह्मांड फैलता और ठंडा होता गया, तब भी यह काफी देर तक मौजूद रह सकता था। इस दौरान ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा में इसका योगदान इतना बढ़ सकता था कि कुछ समय के लिए दूसरे घटकों के योगदान से बड़ा हो जाए। इसका मतलब यह नहीं कि यह जरूरी तौर पर सबसे आम कण बन गया था। बात यह है कि ऊर्जा के कुल हिसाब में इसका हिस्सा कुछ समय के लिए दूसरों से बड़ा हो सकता था।

इससे समझ आता है कि कमजोर प्रतिक्रिया करने वाला कण भी व्यापक असर कैसे छोड़ सकता है। शुरुआती ब्रह्मांड कोई स्थिर मंच नहीं था, जिस पर कणों की प्रतिक्रियाएँ बस घट रही हों। उसका घनत्व, तापमान और फैलने की रफ्तार लगातार बदल रही थी। अगर भारी न्यूट्रिनो लंबे समय तक मौजूद रहा, तो वह इन परिस्थितियों के बदलने के ढंग को प्रभावित कर सकता था। शोधकर्ताओं के मॉडल के मुताबिक, ब्रह्मांड में एक अस्थायी दौर आया होगा, जब कुल ऊर्जा में इस कण का योगदान दूसरे घटकों के योगदान से बड़ा हो गया था। बाद में कण का क्षय हुआ और वह खत्म हो गया।

साउथैम्पटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता और अध्ययन में शामिल रिशव रोशन के मुताबिक, कण की लंबी उम्र ही वजह है कि उसे मामूली-सा घटक मानकर नज़रअंदाज़ करने के बजाय गंभीरता से लिया जाना चाहिए। वह शुरुआती समय में ही गायब नहीं हुआ होगा, बल्कि ब्रह्मांड के ठंडा होने के दौरान बना रह सकता था। फिर वह उस दौर पर असर डाल सकता था, जब पदार्थ और प्रतिपदार्थ के बीच असंतुलन पैदा करने के लिए जरूरी परिस्थितियाँ बन रही थीं। इससे यह साबित नहीं होता कि ऐसा कण सचमुच मौजूद है। लेकिन यह जरूर दिखता है कि केवल कमजोर जुड़ाव के आधार पर उसे ब्रह्मांड के इतिहास से बाहर नहीं किया जा सकता।

संवेदनशील दौर में बदली हुई परिस्थितियाँ

इस विचार का यह मतलब नहीं है कि भारी न्यूट्रिनो ने सीधे पदार्थ बनाया या प्रतिपदार्थ को पदार्थ में बदल दिया। उसकी संभावित भूमिका कुछ अधिक सूक्ष्म है। उसकी मौजूदगी ने ब्रह्मांड के विकास का रास्ता बदला होगा और इस तरह उस तापमान पर असर डाला होगा, जिस पर मूलभूत कणों और उनके प्रतिकणों के बीच अहम प्रतिक्रियाएँ हुईं। इन प्रतिक्रियाओं का सही समय मायने रख सकता है, क्योंकि उसी से तय हो सकता है कि दोनों पक्षों के बीच कितना अंतर जमा हुआ।

इस तस्वीर में इलेक्ट्रॉन और लेप्टॉन कहलाने वाले दूसरे मूलभूत कणों का एक बड़ा समूह शामिल है। इसके साथ ही हिग्स बोसॉन से जुड़ी एक प्रक्रिया भी अहम है। हिग्स बोसॉन उस प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसके जरिए कई मूलभूत कण अपना द्रव्यमान पाते हैं। शोधकर्ताओं के मॉडल में भारी न्यूट्रिनो उस तापमान को बदलता है, जिस पर इनमें से कुछ कण हिग्स की मदद से अपने प्रतिकणों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं।

यहाँ तापमान को किसी असली बटन की तरह नहीं, बल्कि प्रतिक्रियाओं के रास्ते में आने वाले एक अहम मोड़ की तरह समझा जा सकता है। अलग-अलग तापमान पर कणों के प्रतिक्रिया करने की संभावना और उनकी गति बदल जाती है। अगर भारी न्यूट्रिनो के योगदान से ब्रह्मांड उन परिस्थितियों तक किसी दूसरे समय पर पहुँचा, तो पदार्थ और प्रतिपदार्थ के बीच अंतर बनने का ढंग भी बदल सकता था। इस तरह ऐसा कण, जो खुद बहुत कम प्रतिक्रिया करता है, परोक्ष रूप से असर डाल सकता था।

इस प्रस्ताव का महत्व यह है कि यह पुराने हिसाब में एक नए कारक को जोड़ता है। पदार्थ और प्रतिपदार्थ के असंतुलन की उत्पत्ति समझने वाले कुछ पुराने मॉडल कमजोर जुड़ाव वाले न्यूट्रिनो को नजरअंदाज करते थे। अध्ययन पूछता है कि क्या ऐसा करना सही था। इसकी गणनाओं का जवाब है कि कण अपनी लंबी उम्र और ऊर्जा में संभावित योगदान के कारण अहम हो सकता है, भले ही वह आम प्रतिक्रियाओं में जोरदार ढंग से हिस्सा न लेता हो।

ब्रह्मांड के फैलाव में छूटे निशान

इस संभावित परिदृश्य का असर पदार्थ और प्रतिपदार्थ के अनुपात तक सीमित नहीं है। अगर किसी भारी कण ने थोड़े समय के लिए ब्रह्मांड की ऊर्जा के घनत्व पर दबदबा बनाया, तो ब्रह्मांड का फैलाव उस तरह से अलग हो सकता था, जैसा उस कण की गैरमौजूदगी में होता। फैलाव की रफ्तार इस बात से प्रभावित होती है कि ब्रह्मांड में कितनी ऊर्जा मौजूद है। इसलिए, ऊर्जा में सबसे बड़ा योगदान देने वाले घटक के बदलने से शुरुआती दौर के इतिहास में कोई निशान छूट सकता है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के अध्ययनकर्ता सुदीप्ता शो का कहना है कि फैलाव के इतिहास में ऐसा संभावित बदलाव इस विचार को केवल सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित न रखकर परखने का रास्ता खोलता है। शुरुआती ब्रह्मांड में हुए बदलावों ने आदिम गुरुत्वाकर्षण तरंगों में कुछ खास संकेत छोड़े हो सकते हैं। ये अंतरिक्ष-समय में उठने वाली लहरें हैं। माना जाता है कि ब्रह्मांड की शुरुआती प्रक्रियाओं में से कुछ ने ऐसी तरंगें पैदा की होंगी।

अगर इन तरंगों को मापा जा सके या उनके गुणों का सटीक अनुमान लगाया जा सके, तो उनसे बहुत पुराने ब्रह्मांड की परिस्थितियों की जानकारी मिल सकती है। यहाँ यह साफ रखना जरूरी है कि शोधकर्ता यह नहीं कह रहे कि कोई खास गुरुत्वाकर्षण तरंग पहले ही देखी जा चुकी है और उससे भारी न्यूट्रिनो का अस्तित्व साबित हो गया है। उनका प्रस्ताव यह है कि उनका मॉडल आदिम संकेतों में ऐसे खास नमूने दिखा सकता है जिन्हें पहचाना जा सके। भविष्य में ये संकेत यह जाँचने का तरीका बन सकते हैं कि फैलाव में प्रस्तावित बदलाव सचमुच हुआ था या नहीं।

ऐसे निशान ढूँढ़ना खुद कण को सीधे देखने की कोशिश से अलग है। माना गया कण आज ब्रह्मांड में आम वस्तु की तरह मौजूद नहीं है, इसलिए उसे सीधे देखकर पहचान पाना संभव नहीं होगा। लेकिन शुरुआती परिस्थितियों पर उसके असर की छाप उस दौर से बचे संकेतों में दिखाई दे सकती है। यह अप्रत्यक्ष जाँच का तरीका है: वैज्ञानिक फैलाव के इतिहास में किसी संभावित निशान को खोजेंगे और फिर उसकी तुलना अलग-अलग मॉडलों की भविष्यवाणियों से करेंगे।

दिलचस्प प्रस्ताव, लेकिन पक्का निष्कर्ष नहीं

यह अध्ययन अमेरिकन फिजिकल सोसायटी की पत्रिका फिजिकल रिव्यू लेटर्स में प्रकाशित हुआ है। इसमें एक सैद्धांतिक मॉडल और उससे जुड़ी गणनाएँ पेश की गई हैं। मॉडल कमजोर जुड़ाव वाले भारी न्यूट्रिनो, कुछ समय के लिए कुल ऊर्जा में उसके बड़े योगदान और पदार्थ-प्रतिपदार्थ की असमानता पैदा करने वाली परिस्थितियों में बदलाव के बीच संबंध जोड़ता है। लेकिन गणनाओं से मेल खाने वाले मॉडल और कण के अस्तित्व की पुष्टि करने वाले प्रयोग में फर्क है। यह अध्ययन अभी यह साबित नहीं करता कि कण मौजूद है या पदार्थ के बचे रहने की असली वजह वही था।

यह काम भौतिकविदों को परखने का एक नया रास्ता देता है। अगर भविष्य में आदिम संकेत मिलते हैं और वे ब्रह्मांड के फैलाव में कुछ खास बदलावों से मेल खाते हैं, तो इस प्रस्ताव की संभावना मजबूत हो सकती है। अगर आँकड़े अनुमानित निशानों से मेल न खाएँ, तो शोधकर्ताओं को मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है या कोई दूसरा जवाब खोजना पड़ सकता है। दोनों ही स्थितियों में, सिर्फ विचार सामने रख देने से मामला तय नहीं होता। वैज्ञानिक रूप से इसकी अहमियत इस बात में है कि यह ऐसे नतीजे बताता है जिनकी तुलना अवलोकनों से की जा सकती है।

किसी कण के कुछ समय के लिए «हावी» होने का यह अर्थ भी नहीं है कि पूरा ब्रह्मांड उसी से बना था या बाकी कणों का अस्तित्व खत्म हो गया था। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि सीमित अवधि के लिए कुल ऊर्जा घनत्व में उस कण का संभावित योगदान सबसे बड़ा हो गया होगा। इस फर्क को समझना जरूरी है: परिकल्पना ब्रह्मांड के इतिहास के एक अस्थायी दौर के बारे में है, न कि हर युग में भारी न्यूट्रिनो की स्थायी मौजूदगी के बारे में।

सबसे अहम बात यह है कि यह शोध पदार्थ की पहेली को पूरी तरह सुलझाने का दावा नहीं करता। यह सुझाव देता है कि ब्रह्मांड के इतिहास में ऐसा एक घटक हो सकता है, जिसे पहले पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उसका असर सीधे और जोरदार प्रतिक्रिया करने के बजाय, प्रतिक्रियाओं के समय और ब्रह्मांड के फैलाव को बदलने के जरिए सामने आया होगा। इस विचार की बारीकियों की और जाँच जरूरी है। इस कण और पदार्थ-प्रतिपदार्थ के असंतुलन के बीच संबंध साबित करने के लिए अवलोकनों से मिले सबूत या मॉडल की स्वतंत्र जाँच भी चाहिए।

निष्कर्ष

यह अध्ययन भारी न्यूट्रिनो जैसे एक कण पर नए सिरे से ध्यान देता है, जिसे कमजोर जुड़ाव के कारण अब तक कम महत्व का माना जा सकता था। साउथैम्पटन विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के शोधकर्ताओं की गणनाएँ बताती हैं कि उसकी लंबी उम्र ने उसे शुरुआती ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा पर कुछ समय के लिए असर डालने का मौका दिया होगा। इससे तापमान और पदार्थ-प्रतिपदार्थ के असंतुलन से जुड़ी प्रतिक्रियाओं का समय बदल सकता था। ब्रह्मांड के फैलाव पर पड़ा ऐसा असर आदिम गुरुत्वाकर्षण तरंगों में संभावित निशान भी छोड़ सकता है। फिजिकल रिव्यू लेटर्स में प्रकाशित यह विचार फिलहाल एक सैद्धांतिक व्याख्या है, अंतिम प्रमाण नहीं। अगर भविष्य में उससे मेल खाते संकेत मिलते हैं, तो वैज्ञानिक उस पुराने सवाल का जवाब पाने के करीब पहुँच सकते हैं: प्रतिपदार्थ से टकराने के बाद पदार्थ बचा कैसे?