आसान शब्दों में
नासा का मार्स ग्लोबल सर्वेयर 1996 में मंगल की कक्षा में पहुँचा और वहाँ से ग्रह की तस्वीरें लेकर पानी और जलवायु से जुड़े सुराग खोजे। उसने मंगल पर काम कर रहे कुछ रोवरों से मिले आँकड़े धरती तक पहुँचाने में भी मदद की। 9 साल तक काम करने के बाद उसकी ऊर्जा खत्म हो गई, लेकिन उससे मिली जानकारी ने मंगल की खोज को नई दिशा दी।
लंबे अंतराल के बाद मंगल की ओर वापसी
7 नवंबर 1996 को नासा का मार्स ग्लोबल सर्वेयर डेल्टा-2 रॉकेट से रवाना हुआ। यह मंगल की ओर जाने वाला ऐसा अमेरिकी अभियान था, जो 1975 में भेजे गए वाइकिंग अभियानों के बाद सफलतापूर्वक इस ग्रह तक पहुँचा। करीब दो दशक के अंतराल के बाद नासा फिर मंगल की खोज में जुटा था। इस बार यान को ग्रह की सतह पर उतारना मकसद नहीं था। उसे मंगल का चक्कर लगाते हुए उसकी सतह और वातावरण पर नज़र रखनी थी और ऐसी तस्वीरें व माप धरती पर भेजने थे, जिनसे वैज्ञानिक इस ग्रह को बेहतर ढंग से समझ सकें। समय के साथ यान की भूमिका केवल ऊपर से देखने तक सीमित नहीं रही; वह धरती और मंगल की सतह पर चल रहे कुछ रोवरों के बीच संपर्क की कड़ी भी बना।
लंबे अंतराल के बाद आया यह अभियान पुराने मिशनों की अगली कड़ी भर नहीं था। कक्षा में घूमते हुए यान ग्रह के बड़े-बड़े हिस्सों को देख सकता था और अलग-अलग इलाकों की तुलना कर सकता था। इस तरह मंगल के बारे में जानकारी जुटाना किसी एक जगह तक सीमित नहीं रहा।
कक्षीय यान और रोवर की ताकत अलग-अलग होती है। ऊपर से घूमने वाला यान पूरे ग्रह के अनेक हिस्सों की तस्वीरें और माप जुटा सकता है, जबकि रोवर सतह के छोटे से इलाके में जाकर मिट्टी और चट्टानों की सीधे जाँच करता है। मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने इन दोनों तरह के कामों को आपस में जोड़ा। उसने कक्षा से मंगल के नक्शे और जानकारी तैयार की, साथ ही सोजर्नर, स्पिरिट और ऑपर्च्युनिटी जैसे नासा के रोवरों से मिले आँकड़े धरती तक पहुँचाने में मदद की।
रोवरों से मिले आँकड़े धरती तक पहुँचाने का काम बहुत अहम था, क्योंकि वे मंगल पर जो कुछ देखते और मापते थे, उसकी जानकारी वैज्ञानिकों तक भेजनी होती थी। कक्षा में मौजूद यान संपर्क का रास्ता बनकर सतह पर चल रहे काम को धरती से जोड़ सकता था। इस व्यवस्था से कक्षा से मिली तस्वीरें और सतह पर काम कर रहे रोवरों के आँकड़े एक-दूसरे के पूरक बने। वैज्ञानिकों को मंगल के वातावरण और वहाँ की परिस्थितियों को समझने के लिए कई तरह के प्रमाण मिले।
सूखे ग्रह पर पानी के निशान
मार्स ग्लोबल सर्वेयर की तस्वीरों में वैज्ञानिकों का ध्यान मंगल की सतह पर बनी नालियों और गहरी खाँचों ने खींचा। उनकी बनावट ऐसी थी, मानो कभी वहाँ पानी बहा हो। इन आकृतियों का दिखना यह साबित नहीं करता कि पानी आज भी लगातार बह रहा है। मगर उनसे यह सवाल ज़रूर उठता है कि ये निशान कैसे बने और इन्हें आकार देने में पानी की क्या भूमिका रही होगी। ढलानों पर बनी कुछ राहों को देखकर यह संभावना भी सामने आई कि कुछ जगहों पर पानी थोड़े समय के लिए बहा हो।
इन तस्वीरों ने चर्चा को केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रहने दिया कि मंगल पर दूर अतीत में पानी रहा होगा या नहीं। उनसे यह संभावना भी जाँची जाने लगी कि ग्रह पर कभी-कभार पानी से जुड़ी गतिविधि हुई हो सकती है। कक्षा से ली गई तस्वीर किसी मिट्टी के कण या सतह के नीचे की हर बात नहीं दिखा सकती, लेकिन वह उन जगहों को पहचानने में मदद करती है जिनकी और बारीकी से जाँच होनी चाहिए। वैज्ञानिक अलग-अलग भू-आकृतियों के आकार और उनके स्थान की तुलना भी कर सकते हैं। जब सतह से मिले संकेत दूसरे तरह के आँकड़ों से मेल खाते हैं, तो यह परखने का आधार मजबूत होता है कि पानी ने उन निशानों को बनाने में भूमिका निभाई थी या नहीं।
यान का अवलोकन केवल खाँचों तक सीमित नहीं था। उसने मंगल की सतह के बड़े इलाकों के साथ-साथ उसके वातावरण और भीतरी बनावट से जुड़ी जानकारी जुटाने में भी योगदान दिया। इतने अलग-अलग पहलुओं को एक साथ देखने से ग्रह की कहानी के कई हिस्सों को जोड़ना संभव हुआ। सतह की बनावट बताती है कि वहाँ कौन-सी प्रक्रियाएँ काम कर चुकी हैं, जबकि वातावरण और ग्रह के भीतर का अध्ययन इन निशानों को व्यापक संदर्भ में समझने में मदद करता है।
हेमेटाइट ने सुझाए उतरने के ठिकाने
मंगल पर हेमेटाइट नाम का खनिज भी इस यान के अवलोकनों में सामने आया। इसकी मौजूदगी वैज्ञानिकों के लिए खास थी, क्योंकि हेमेटाइट आम तौर पर ऐसी परिस्थितियों में बनता है जिनमें पानी की भूमिका होती है। केवल इस खनिज के मिलने से उस जगह पानी का पूरा इतिहास पता नहीं चलता, लेकिन यह भूवैज्ञानिक संकेत आगे की खोज का रास्ता दिखा सकता है। पानी से जुड़ा खनिज मिलने पर वैज्ञानिकों के पास उस इलाके को और ध्यान से देखने और इसके बनने की परिस्थितियों के दूसरे संकेत खोजने की वजह होती है।
कक्षा से मिली यह जानकारी आगे के अभियानों की योजना बनाने में भी काम आई। स्पिरिट और ऑपर्च्युनिटी रोवरों को हेमेटाइट की तलाश के लिए भेजा गया और दोनों को अपने उतरने के ठिकानों के पास यह खनिज मिला। इससे पता चलता है कि ऊपर से की गई खोज सतह पर जाने वाले यान का लक्ष्य तय करने में कैसे मदद कर सकती है। पहले कक्षा से बड़े इलाके का सर्वेक्षण होता है, फिर खास दिलचस्पी वाली जगहें चुनी जाती हैं और उसके बाद रोवर वहाँ पहुँचकर मिट्टी और चट्टानों की पास से जाँच करता है।
कक्षा से मिली जानकारी और सतह पर किए गए काम के इस मेल ने मार्स ग्लोबल सर्वेयर के असर को उसके अपने अभियान से कहीं आगे पहुँचा दिया। ऊपर से देखने वाला यान ऐसे स्थानों की ओर ध्यान दिला सकता है जहाँ आगे के मिशन को भेजना उपयोगी हो। रोवर जब वहाँ पहुँचते हैं, तो वे चट्टानों और मिट्टी की जाँच करके यह परख सकते हैं कि कक्षा से बनी ग्रह की व्यापक तस्वीर वहाँ की वास्तविक परिस्थितियों से मेल खाती है या नहीं।
विज्ञान का यान और संपर्क की कड़ी
मार्स ग्लोबल सर्वेयर केवल ऐसा यान नहीं था जो दूसरे वाहनों के संदेश धरती तक पहुँचाता हो। उसने अपना वैज्ञानिक काम भी किया और 9 साल की सक्रिय अवधि में 240 हज़ार से अधिक तस्वीरें भेजीं। तस्वीरों के इस बड़े संग्रह से वैज्ञानिक मंगल को कई कोणों से देख सकते थे, उसकी अलग-अलग जगहों की तुलना कर सकते थे और सतह के ऐसे ब्योरे पर दोबारा विचार कर सकते थे जिनकी व्याख्या नए ज्ञान के साथ बदल सकती थी।
तस्वीरों का एक और फायदा यह था कि वे किसी छोटे इलाके को ग्रह के बड़े परिदृश्य में उसकी जगह के साथ दिखाती थीं। कोई रोवर किसी खास जगह की चट्टान या मिट्टी की बनावट बता सकता है, लेकिन कक्षा से ली गई तस्वीर यह समझने में मदद करती है कि वह इलाका मंगल की दूसरी भू-आकृतियों के मुकाबले कहाँ स्थित है। इस तरह पास से की गई जाँच और दूर से देखे गए व्यापक दृश्य को आपस में जोड़ा जा सकता है। हर नई खोज को उसके आसपास के संदर्भ से काटकर देखने की ज़रूरत नहीं रहती।
आँकड़े पहुँचाने के काम ने भी इस यान को मंगल की खोज की पूरी व्यवस्था का हिस्सा बनाया। वह केवल एक अलग मिशन नहीं था जिसका असर उसके काम बंद करते ही खत्म हो जाता। किसी दूसरे ग्रह तक पहुँचना ही काफी नहीं होता; वहाँ काम कर रहे यानों को अपनी खोजों की जानकारी धरती तक भेजनी भी होती है। सतह पर मौजूद रोवरों और धरती पर उनके काम पर नज़र रखने वाली टीमों के बीच संपर्क बनाकर मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने एक ही समय पर चल रहे अभियानों को आपस में जोड़ने में मदद की।
दक्षिणी ध्रुव से मिले जलवायु के संकेत
यान ने मंगल के दक्षिणी ध्रुव पर भी नज़र रखी। वहाँ कुछ ऐसी विशेषताएँ दिखीं जिनका संबंध जलवायु में बदलाव से हो सकता था। इस नतीजे को संभावित संकेत के रूप में समझना ज़रूरी है। एक ही मिशन से बदलाव की प्रकृति या उसके कारण तय नहीं हो जाते; अवलोकन केवल यह बताते हैं कि किन बातों पर आगे अध्ययन करना चाहिए। ध्रुवीय इलाके में दिखने वाले फर्क और बनावट वैज्ञानिकों के सामने नए सवाल रखते हैं, जिनसे वे समझ सकते हैं कि समय के साथ मंगल कैसे बदलता रहा है।
किसी पूरे ग्रह की पड़ताल में ध्रुवीय क्षेत्रों की भी खास जगह होती है। वे सिर्फ दूर-दराज़ के इलाके नहीं, बल्कि मंगल की जलवायु और पूरे पर्यावरण का हिस्सा हैं। कक्षा से उन पर नज़र रखने से उन्हें ग्रह के नक्शे में रखकर दूसरी जगहों से तुलना करना संभव होता है। दक्षिणी ध्रुव के संकेतों ने, सतह की नालियों और हेमेटाइट के साथ मिलकर, मंगल को समझने का एक और रास्ता खोला। इससे ग्रह को केवल शांत और स्थिर सतह के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे संसार के रूप में देखा जा सका जिसकी सतह पर बदलावों के निशान हैं और जिनकी जाँच की जा सकती है।
कई साल के काम के बाद अचानक अंत
मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने उम्मीद से अधिक समय तक काम किया, लेकिन अंतरिक्ष में यान को घुमाने से जुड़ी एक समस्या के बाद उसका मिशन समाप्त हो गया। उस प्रक्रिया के दौरान यान की एक बैटरी सूरज की रोशनी के सामने आ गई और बाद में यान की ऊर्जा खत्म हो गई। नवंबर 2006 में उससे संपर्क हमेशा के लिए टूट गया। इस तरह 9 साल तक सक्रिय रहने और बड़ी मात्रा में तस्वीरें व आँकड़े भेजने के बाद उसका काम बंद हुआ।
यान का काम रुकना उसकी उपलब्धियों के मिट जाने जैसा नहीं था। उससे मिले अवलोकन आगे के अभियानों के लिए उपयोगी आधार बने रहे। जिन जानकारियों ने खोज की दिशा और ठिकाने चुनने में मदद की थी, उनका महत्व यान के खामोश हो जाने पर खत्म नहीं हुआ। इस मिशन की कहानी दिखाती है कि अंतरिक्ष यान एक दिन काम करना बंद कर सकते हैं, लेकिन उनके नतीजे वैज्ञानिकों के सवालों और आगे की यात्राओं से जुड़े फैसलों में लंबे समय तक बने रहते हैं।
अपने पूरे अभियान में इस यान ने कई काम साथ-साथ किए। उसने कक्षा से मंगल का सर्वेक्षण किया, पानी और जलवायु से जुड़े संकेत देखे, ऐसे खनिज की पहचान की जिसने कुछ खास इलाकों की ओर ध्यान खींचा और रोवरों के आँकड़े धरती तक पहुँचाए। इसलिए उसका योगदान केवल तस्वीरें भेजने तक सीमित नहीं था। उसने कक्षा से किए गए अवलोकनों को सतह पर चल रही खोज से जोड़ा और वाइकिंग अभियानों के बाद आए लंबे अंतराल के बाद मंगल की खोज को फिर गति देने में मदद की।
निष्कर्ष
मार्स ग्लोबल सर्वेयर 7 नवंबर 1996 को रवाना हुआ। 1975 के वाइकिंग अभियानों के बाद मंगल तक पहुँचने वाला यह नासा का पहला सफल मिशन था और इसने ग्रह की खोज का नया दौर शुरू किया। 9 साल के काम में इसने 240 हज़ार से अधिक तस्वीरें भेजीं, पानी से बनी हो सकने वाली नालियों और आम तौर पर पानी की मौजूदगी में बनने वाले हेमेटाइट का पता लगाया, तथा दक्षिणी ध्रुव पर जलवायु में संभावित बदलावों के संकेत देखे। सोजर्नर, स्पिरिट और ऑपर्च्युनिटी के आँकड़े धरती तक पहुँचाने में भी इसकी भूमिका रही। नवंबर 2006 में ऊर्जा खत्म होने से इसका अभियान थम गया, लेकिन कक्षा से मिले दृश्यों और सतह पर की गई खोजों को जोड़ने का इसका योगदान मंगल को समझने में अब भी अहम है।