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मंगल के दो रहस्यमय चंद्रमाओं से धरती पर पहली सौगात लौटेगी।

आसान शब्दों में

जापान मंगल के दो छोटे चाँदों—फोबोस और डिमोस—की पड़ताल करने के लिए एक यान भेजने की तैयारी कर रहा है। यह यान पहले दोनों चाँदों का अध्ययन करेगा और फिर फोबोस से मिट्टी के नमूने लेकर लौटेगा। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन नमूनों से पता चलेगा कि ये चाँद कैसे बने और मंगल का शुरुआती इतिहास कैसा था।

छोटे चाँद, बड़े सवाल

फोबोस और डिमोस, पृथ्वी के चाँद के मुकाबले बहुत छोटे हैं। फोबोस की लंबाई करीब 22 किलोमीटर है, जबकि डिमोस का व्यास लगभग 13 किलोमीटर है। आकार छोटा होने के बावजूद, इनकी मिट्टी में सौरमंडल के अरबों साल पुराने इतिहास के सुराग छिपे हो सकते हैं।

वैज्ञानिक अब तक तय नहीं कर पाए हैं कि ये दोनों चाँद बने कैसे। एक विचार यह है कि मंगल से किसी बड़ी टक्कर के बाद निकली चट्टानी सामग्री उसकी परिक्रमा करने लगी और धीरे-धीरे जुड़कर चाँद बन गई। दूसरे विचार के मुताबिक, ये पुराने क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी कक्षा में खींच लिया। दूर से ली गई तस्वीरें और नज़रें इस पहेली को सुलझाने के लिए काफी नहीं हैं, इसलिए सतह की जाँच और नमूने का विश्लेषण अहम होगा।

इस सवाल का जवाब सिर्फ फोबोस और डिमोस का अतीत समझने में मदद नहीं करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह जानने में भी मदद मिल सकती है कि क्या शुरुआती दौर में मंगल जैसे ग्रहों तक पानी और कार्बन वाले यौगिक पहुँचे थे। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस मिशन में एक वैज्ञानिक उपकरण, तकनीकी परीक्षण और संचार सहायता दे रही है। वह अपनी टीम में शामिल अमेरिकी वैज्ञानिकों के काम के लिए भी धन दे रही है।

मंगल तक पहुँचने में लगेगा लंबा वक्त

यान प्रक्षेपण के तुरंत बाद मंगल तक नहीं पहुँचेगा। योजना के मुताबिक, वह अगस्त 2027 में मंगल के आसपास पहुँचेगा और करीब एक महीने बाद फोबोस की कक्षा में जाएगा। वहाँ से लगभग 18 महीनों तक दोनों चाँदों का निरीक्षण और जानकारी जुटाई जाएगी। इस दौरान टीम फोबोस के आसपास के हालात समझेगी और उसकी सतह के पास जाने की तैयारी करेगी।

प्रक्षेपण का सही समय चुनना भी आसान नहीं है। पृथ्वी और मंगल की स्थिति हर समय ऐसी नहीं होती कि उनके बीच की यात्रा ठीक से की जा सके। ऐसा मौका करीब हर 26 महीने में आता है। एमएमएक्स मिशन को पहले 2024 में रवाना होना था, लेकिन एच-3 रॉकेट से जुड़ी दिक्कतों के कारण यह टल गया। पिछला मौका निकल जाने के बाद अगली सही खिड़की का इंतज़ार करना पड़ा।

अब यान को जापान के तानेगाशिमा अंतरिक्ष केंद्र से 19 अक्टूबर को रवाना करने की योजना है। इसे एच-3 रॉकेट लेकर जाएगा। तय समय अमेरिका के पूर्वी तट पर दोपहर 3 बजकर 41 मिनट, ग्रीनविच समय के अनुसार शाम 7 बजकर 41 मिनट और जापान में 20 अक्टूबर की सुबह 4 बजकर 41 मिनट है। प्रक्षेपण का सीधा प्रसारण करीब एक घंटे पहले शुरू होगा।

कम गुरुत्व वाले चाँद पर छोटा रोबोट

2029 की शुरुआत में यान से इडेफिक्स नाम का छोटा फ्रांसीसी-जर्मन रोबोट फोबोस की सतह पर उतारा जाएगा। उसका वजन पृथ्वी पर करीब 25 किलोग्राम है, लेकिन फोबोस के बहुत कम गुरुत्व के कारण वहाँ वह सतह पर सिर्फ 15 ग्राम के बराबर दबाव डालेगा। इससे अंदाज़ा मिलता है कि वहाँ काम करना पृथ्वी या किसी बड़े ग्रह पर काम करने से कितना अलग होगा।

रोबोट के दो जुड़े हुए काम होंगे। वह फोबोस की सतह की बनावट और उसमें मौजूद सामग्री का जायज़ा लेगा। साथ ही, वह ऐसी जानकारी जुटाएगा जिससे मुख्य यान के उतरने और नमूना लेने की जगह तय करने में मदद मिलेगी। सतह कितनी सख्त या ऊबड़-खाबड़ है, यह जानना सुरक्षित उतरने के लिए जरूरी है।

कक्षा से दोनों चाँदों का अध्ययन और रोबोट का काम पूरा होने के बाद, मिशन की योजना 2030 में मुख्य यान को फोबोस पर उतारने की है। यान कम से कम 10 ग्राम सतही सामग्री इकट्ठा करेगा। मात्रा भले ही छोटी हो, लेकिन यह ऐसे चाँद से सीधे लिया गया नमूना होगा जहाँ से पहले कभी सामग्री धरती पर नहीं लाई गई।

फोबोस से धरती की प्रयोगशालाओं तक

नमूना लेने के बाद यान धरती की ओर लौटेगा। तय योजना के अनुसार, नमूनों वाला कैप्सूल 2031 में धरती पर उतरेगा। वैज्ञानिक उसमें मौजूद सामग्री की जाँच करके फोबोस के इतिहास और विकास के सुराग खोजेंगे और उसके बनने से जुड़े दोनों विचारों को परखेंगे। इस नमूने की तुलना मंगल और सौरमंडल के छोटे पिंडों की सामग्री से भी की जा सकेगी।

नमूना धरती पर लाने का एक बड़ा फायदा यह है कि वैज्ञानिक सिर्फ यान से मिली जानकारी पर निर्भर नहीं रहेंगे। वे सामग्री की बार-बार जाँच कर सकेंगे और दुनिया भर के शोधकर्ता अलग-अलग तरीकों से उसका अध्ययन कर पाएँगे। लेकिन नमूना लौटाने से पहले यान को कई मुश्किल पड़ाव पार करने होंगे—प्रक्षेपण, मंगल तक की यात्रा, कक्षा में काम, रोबोट को उतारना, सतह पर उतरना, नमूना लेना और उसे धरती तक पहुँचाना।

नमूने लौटाने का जापान का अनुभव

जापान के लिए अंतरिक्ष से नमूने लाना नया काम नहीं है। हायाबुसा मिशन 2010 में इतोकावा नाम के क्षुद्रग्रह से सामग्री धरती पर लाया था। इसके दस साल बाद हायाबुसा-2 रयुगू क्षुद्रग्रह के नमूने लेकर लौटा। इन पुराने मिशनों का अनुभव एमएमएक्स के काम आएगा, हालाँकि फोबोस तक पहुँचना और उसकी सतह के पास काम करना अलग तरह की चुनौती है।

आने वाला प्रक्षेपण कई साल चलने वाले अभियान की बस शुरुआत है। पहले यान को धरती से सुरक्षित रवाना होना होगा, फिर मंगल तक लंबी यात्रा करनी होगी और फोबोस के पास सावधानी से काम करना होगा। हर पड़ाव से मिली जानकारी के आधार पर अगला कदम उठाया जाएगा। आखिर में नमूना धरती पर पहुँचेगा और उसका विस्तृत अध्ययन शुरू होगा।

इस मिशन से क्या पता चल सकता है

एमएमएक्स का मुख्य लक्ष्य यह समझना है कि फोबोस और डिमोस मंगल से निकली सामग्री से बने थे या वे ऐसे क्षुद्रग्रह हैं जिन्हें मंगल ने अपनी कक्षा में बाँध लिया। जापान से रवाना होने के बाद यान मंगल की कक्षा में अध्ययन करेगा, फोबोस पर रोबोट उतारेगा और वहाँ से नमूना लेकर 2031 में धरती पर लौटाने की कोशिश करेगा। अगर योजना सफल रही, तो यह सामग्री मंगल और उसके चाँदों के इतिहास के साथ-साथ सूर्य के पास के चट्टानी ग्रहों के शुरुआती हालात समझने में भी मदद कर सकती है।