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समय से पहले जन्म: क्या मस्तिष्क का छोटा हिस्सा अपना रास्ता बदल लेता है?

आसान शब्दों में

गर्भावस्था के आखिरी महीनों में सेरिबेलम, यानी मस्तिष्क का एक हिस्सा, बहुत तेजी से बढ़ता है। बच्चा समय से पहले जन्म ले तो यह बढ़त गर्भ के बाहर जारी रहती है और कुछ कोशिकाएँ अलग ढंग से विकसित हो सकती हैं। एक नए अध्ययन में इसका संबंध छोटे सेरिबेलम और बचपन में चलने-फिरने, भाषा सीखने तथा सोचने में आने वाली कठिनाइयों से पाया गया।

गर्भावस्था के आखिरी महीनों में तेज़ बढ़त

गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में सेरिबेलम में बड़े बदलाव होते हैं। गर्भ के 24वें से 40वें सप्ताह के बीच उसका आकार करीब 5 गुना हो जाता है। इस दौरान दानेदार तंत्रिका कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है और वे अपने सही स्थानों तक पहुँचती हैं। साथ ही, पर्किन्जे कोशिकाएँ नाम की तंत्रिका कोशिकाओं की शाखाएँ विकसित होती हैं। इन कोशिकाओं और उनके आपसी संपर्कों का सही ढंग से बनना ऐसे तंत्रिका-जाल तैयार करने में मदद करता है, जो चलने-फिरने और शरीर का संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ भाषा और सोचने-समझने से जुड़े कामों में भी भाग लेते हैं।

जब गर्भावस्था पूरी अवधि तक पहुँचती है, तब ये बदलाव गर्भाशय के भीतर होते हैं। लेकिन बच्चा समय से पहले जन्म ले तो मस्तिष्क का विकास जन्म के बाद भी ऐसे माहौल में जारी रहता है, जो गर्भ के भीतर के माहौल से अलग होता है। इसमें नवजात शिशुओं की गहन देखभाल इकाई भी शामिल है, जहाँ इलाज से जुड़ी परिस्थितियाँ, आसपास की संवेदनाएँ और शरीर पर पड़ने वाला दबाव अलग-अलग हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर बच्चे का गहन देखभाल का अनुभव एक जैसा होता है। बात सिर्फ इतनी है कि विकसित हो रहे मस्तिष्क के ऊतकों को ऐसा परिवेश मिलता है, जो गर्भ में रहने पर मिलने वाले परिवेश से अलग है।

सेरिबेलम का महत्व केवल शरीर की हरकतों को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है। इसके तंत्रिका-जाल का तालमेल से विकसित होना कई दूसरे कामों में भी भूमिका निभाता है। इससे समझने में मदद मिलती है कि समय से पहले जन्मे कुछ बच्चों को संतुलन बनाने, हाथों से बारीक काम करने, भाषा सीखने या पढ़ाई में चुनौतियाँ क्यों आती हैं। इन कठिनाइयों के साथ हर बार मस्तिष्क की तस्वीरों में कोई बड़ी और साफ़ चोट दिखाई दे, यह ज़रूरी नहीं। इसी वजह से डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के लिए इनका कारण समझना मुश्किल रहा है।

मस्तिष्क की तस्वीरों से कोशिकाओं के नक्शे तक

इस सवाल की जाँच के लिए वाशिंगटन के राष्ट्रीय बाल अस्पताल और सिएटल बाल अस्पताल के शोधकर्ताओं ने लोगों से जुटाए गए दो तरह के आँकड़ों को साथ रखा। उन्होंने समय से पहले जन्मे 176 शिशुओं पर नज़र रखी। इसके लिए मस्तिष्क की जाँच वाली तस्वीरें ली गईं और शुरुआती वर्षों में बच्चों के विकास का लगातार आकलन किया गया। इसके साथ ही, उन्होंने मृत्यु के बाद प्राप्त 83 शिशुओं के सेरिबेलम के ऊतकों के नमूनों की जाँच की। इन नमूनों में समय से पहले और गर्भावस्था पूरी होने पर जन्मे, दोनों तरह के शिशुओं के ऊतक शामिल थे।

बच्चों की चिकित्सकीय निगरानी में केवल मस्तिष्क का आकार देखना शामिल नहीं था। 9, 18, 24 और 36 महीने की उम्र में उनके तंत्रिका-विकास का आकलन किया गया। इस तरह शोधकर्ता अलग-अलग उम्र में सेरिबेलम की तस्वीरों और उसके आकार के संकेतों की तुलना बच्चों के कौशल से कर सके। इससे उन्हें किसी एक समय पर ली गई एक तस्वीर के बजाय विकास की कई अवस्थाओं को समझने का मौका मिला।

ऊतक के नमूनों में कोशिकाओं की जगह को ध्यान में रखते हुए जीन की सक्रियता का विश्लेषण किया गया। इस तरीके से जीन की गतिविधि पढ़ते समय यह जानकारी भी बनी रहती है कि ऊतक की बनावट में हर कोशिका कहाँ स्थित है। यानी कोशिकाओं को उनकी जगह से अलग करके देखने के बजाय, उन्हें उसी स्थान के संदर्भ में समझा जाता है। जाँच में दो तरह की कोशिकाओं पर खास ध्यान दिया गया: दानेदार कोशिकाएँ, जो मस्तिष्क में बहुत बड़ी संख्या में होती हैं, और पर्किन्जे कोशिकाएँ, जो सेरिबेलम की बाहरी परत से निकलने वाले संकेतों और उसके संपर्कों में अहम भूमिका निभाती हैं।

इस अध्ययन का नेतृत्व सह-प्रथम लेखक जॉर्जियोस सानिदास और गैब्रिएली सिमोन्टी ने किया। यह काम राष्ट्रीय बाल अस्पताल के तंत्रिका-विज्ञान अनुसंधान केंद्र और शेख ज़ायद बाल शल्य नवाचार संस्थान के सहयोग से हुआ। पानागियोटिस क्रातिमेनोस और विटोरियो गालो ने वैज्ञानिक निगरानी में भूमिका निभाई और सहयोगी संस्थानों के अन्य शोधकर्ता भी इसमें शामिल थे। जीवित बच्चों से मिले आँकड़ों और मृत्यु के बाद जुटाए गए मानव ऊतकों की जानकारी को जोड़ने से शोधकर्ताओं को विकास में दिखने वाले बदलावों का कोशिकाओं के भीतर चल रही प्रक्रियाओं से संबंध समझने में मदद मिली।

सिर्फ विकास की धीमी रफ्तार नहीं

नतीजों से पता चला कि समय से पहले जन्म का संबंध सेरिबेलम के विकास के रास्ते में बदलाव से हो सकता है, न कि केवल सामान्य विकास की धीमी रफ्तार से। शोधकर्ताओं को ऐसे संकेत मिले कि दानेदार कोशिकाएँ पूरी तरह परिपक्व नहीं हो पातीं और पर्किन्जे कोशिकाओं की बनावट में होने वाली छँटाई तथा बदलाव भी सामान्य विकास के उसी चरण में देखे जाने वाले ढंग से नहीं चलते। इन दोनों तरह की कोशिकाओं में मिले फर्क बताते हैं कि विकास की पूरी व्यवस्था के अलग-अलग हिस्से एक ही गति से आगे नहीं बढ़ते।

सीधी भाषा में कहें तो बात सिर्फ इतनी नहीं कि सेरिबेलम को बढ़ने के लिए कुछ और समय चाहिए। समय से पहले जन्म के बाद कुछ कोशिकाएँ अलग जैविक अवस्था में विकसित हो सकती हैं। इसलिए जन्म के बाद समान उम्र के दो बच्चों, या गर्भावस्था के हिसाब से एक ही चरण में मौजूद बच्चों के परिपक्व होने के रास्ते अलग हो सकते हैं। यह फर्क उनके जीवन की शुरुआत में बनी परिस्थितियों से जुड़ा हो सकता है। अध्ययन इस ढर्रे को जैविक परिपक्वता के समय में बदलाव के रूप में बताता है, न कि ऐसी साधारण देरी के रूप में जिसे केवल कैलेंडर से नापा जा सके।

यह खोज एक चिकित्सकीय उलझन के कुछ हिस्से को समझने में मदद करती है। कुछ बच्चों को चलने-फिरने, भाषा या कामकाज की योजना बनाने और उसे पूरा करने जैसी क्षमताओं में कठिनाई हो सकती है, जबकि जाँच में किसी साफ़ जगह पर हुआ रक्तस्राव, ऑक्सीजन की कमी या बनावट से जुड़ी चोट नज़र न आए जो अकेले इन कठिनाइयों को समझा सके। विकास की संवेदनशील अवधि में कोशिकाओं और तंत्रिका-जाल के बनने का तरीका भी इन मुश्किलों से जुड़ा हो सकता है। यानी हर बार किसी बड़ी, साफ़ दिखाई देने वाली चोट की मौजूदगी ज़रूरी नहीं है।

अध्ययन यह नहीं कहता कि समय से पहले जन्मे हर बच्चे को एक जैसी कठिनाइयाँ होंगी या उनके विकास का रास्ता पहले से तय हो चुका है। इसके नतीजे बच्चों और ऊतकों के समूहों में दिखे संबंधों और ढर्रों का वर्णन करते हैं; वे हर बच्चे में होने वाले फर्क को नकारते नहीं हैं। लेकिन इन नतीजों से उस धारणा पर सवाल उठता है कि केवल समय बीतने से मस्तिष्क हमेशा उसी विकास-पथ पर लौट आएगा, जिस पर गर्भावस्था जारी रहने पर उसका विकास होता।

हर हफ्ते के साथ करीब 230 घन मिलीमीटर का फर्क

मस्तिष्क की तस्वीरों से मिले आँकड़ों में, गर्भावस्था पूरी होने से पहले बच्चा जितने सप्ताह गर्भ के बाहर बढ़ा, हर सप्ताह के साथ सेरिबेलम के आकार में औसतन करीब 230 घन मिलीमीटर की कमी का संबंध पाया गया। अध्ययन के सार में इस मात्रा को समझाने के लिए लगभग एक मटर के दाने के बराबर बताया गया। यह संख्या गर्भ के बाहर विकास की अवधि और सेरिबेलम के आकार के बीच पाया गया सांख्यिकीय संबंध बताती है। इससे किसी एक बच्चे के भविष्य के विकास का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

9 से 36 महीने की उम्र में सेरिबेलम का कम आकार कई विकास क्षेत्रों में स्पष्ट देरी से जुड़ा मिला। इनमें शरीर की बड़ी हरकतों और संतुलन जैसे बड़े मोटर कौशल, हाथों से बारीक काम करने के कौशल, अपनी बात कहने और दूसरों की बात समझने से जुड़ी भाषा-क्षमताएँ, तथा सोचने-समझने और काम सँभालने की क्षमता शामिल थीं। इन संबंधों का अर्थ यह नहीं है कि विकास के हर फर्क की वजह केवल सेरिबेलम का आकार है। फिर भी, वे मस्तिष्क की बनावट के विकास और शुरुआती बचपन में किए गए आकलनों के कुछ नतीजों के बीच एक संबंध दिखाते हैं।

230 घन मिलीमीटर का आँकड़ा इसलिए उपयोगी है कि यह गर्भावस्था पूरी होने से पहले गर्भ के बाहर बिताए समय और सेरिबेलम के विकास के बीच मिले संबंध को अलग-अलग आँकड़ों में तुलना योग्य मात्रा के रूप में रखता है। लेकिन इसे ऐसा पक्का नुकसान नहीं समझना चाहिए जो हर शिशु को हर सप्ताह होता ही हो, या जो बच्चे की सभी क्षमताओं का पूरा ब्योरा दे दे। शोधकर्ताओं ने सेरिबेलम की जन्म के बाद की बढ़त की रफ्तार पर असर डाल सकने वाले दूसरे कारक भी देखे। उनमें जन्म के समय गर्भावस्था की अवधि के अलावा और बातें भी शामिल थीं।

इलाज और देखभाल का माहौल भी मायने रखता है

अध्ययन के अनुसार, जन्म के समय गर्भावस्था की अवधि मस्तिष्क की कोशिकाओं के भीतर परिपक्व होने के रास्ते की एक अहम शुरुआती स्थिति तय करती है, लेकिन वही अकेला कारक नहीं है। पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली बीमारियाँ, शरीर पर पड़ने वाला दबाव और नवजात शिशुओं की गहन देखभाल इकाई में अपनाए जाने वाले देखभाल के कुछ तरीके भी सेरिबेलम की बढ़त की रफ्तार से जुड़े हो सकते हैं। इसका मतलब है कि बच्चों के नतीजे किसी एक वजह से तय नहीं होते। जन्म के बाद मिलने वाली देखभाल उस विकास-पथ को बदल सकती है, जिसकी शुरुआत समय से पहले जन्म के साथ हुई।

यहाँ किसी असर का वर्णन करने और यह साबित करने में फर्क करना ज़रूरी है कि कोई खास इलाज नुकसान पहुँचाता है या मस्तिष्क की रक्षा करता है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि बच्चे के इलाज और देखभाल की परिस्थितियों का संबंध विकास में पाए गए फर्क से हो सकता है। लेकिन वे हर इलाज-पद्धति पर एक जैसा फैसला नहीं देते और न ही यह कहते हैं कि गहन देखभाल अपने-आप में सभी अंतरों की वजह है। बच्चों को चिकित्सकीय सहायता की ज़रूरत होती है; शोध का उद्देश्य यह समझना है कि उनके मस्तिष्क की विकास-अवस्था को ध्यान में रखते हुए यह सहायता बेहतर ढंग से कैसे दी जाए।

ऊतक में कोशिकाओं की जगह को ध्यान में रखते हुए जीन की सक्रियता का विश्लेषण इसलिए अहम है कि इससे उन अंतरों की झलक मिलती है जिन्हें मस्तिष्क की तस्वीरें अकेले नहीं दिखा पातीं। तस्वीरों से आकार मापा जा सकता है या मस्तिष्क की सामान्य बनावट देखी जा सकती है। वहीं, जीन की गतिविधि का नक्शा कोशिकाओं की अपनी अवस्था के बारे में सवाल पूछने में मदद करता है: क्या वे परिपक्व हुई हैं? क्या उनकी शाखाएँ विकसित हुई हैं? क्या अलग-अलग तरह की कोशिकाएँ एक-दूसरे के साथ तालमेल से आगे बढ़ रही हैं? इन दोनों स्तरों की जानकारी को साथ रखने से समझ अधिक व्यापक होती है, लेकिन इनमें से कोई भी दूसरे की जगह नहीं लेता।

सिर्फ उम्र नहीं, विकास की अवस्था को भी समझना

ये नतीजे नवजात शिशुओं की चिकित्सा के सामने एक व्यावहारिक सवाल रखते हैं: बच्चे के विकास का आकलन करते समय क्या केवल जन्म के बाद बीते समय को गिनना काफी है, या उसकी जैविक परिपक्वता का भी अंदाज़ लगाना चाहिए? शोधकर्ताओं का मानना है कि समय से पहले जन्मे बच्चों की निगरानी में मस्तिष्क की विकास-अवस्था को ध्यान में रखने से फायदा हो सकता है। इस तरह आकलन केवल कैलेंडर में दर्ज उम्र पर निर्भर नहीं रहेगा। इसका मकसद जोखिम को बेहतर ढंग से समझना और बच्चे की विकास-अवस्था के मुताबिक सही समय पर सहायता देना है।

कोशिकाओं के भीतर होने वाले बदलावों के जिन संकेतों की पहचान की जा रही है, वे भविष्य में परिपक्वता का अंदाज़ लगाने या जोखिम के स्तर को अधिक ठीक ढंग से बाँटने के तरीके विकसित करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह अभी शोध की संभावना है, अस्पतालों में इस्तेमाल के लिए तैयार जाँच-पद्धति नहीं। आँकड़ों में किसी संकेत की खोज से लेकर भरोसेमंद जाँच तैयार करने और फिर उसके आधार पर इलाज का फैसला करने तक कई और जाँच-पड़ताल की ज़रूरत होगी।

शोध दल इस समय तंत्रिका कोशिकाओं की रक्षा के लिए बनाए गए कुछ पदार्थों की जाँच कर रहा है। साथ ही, वह ऐसे बेहतर चिकित्सकीय तरीकों पर काम कर रहा है जिनका लक्ष्य संवेदनशील अवधियों में दानेदार और पर्किन्जे कोशिकाओं के तंत्रिका-जाल को सहारा देना है। शोधकर्ताओं का मकसद सेरिबेलम की बढ़त को बनाए रखना और बच्चों के विकास के अवसर बेहतर करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी खास इलाज की प्रभावशीलता पहले ही साबित हो चुकी है। इस शोध को रेनर सेरिबेलम परियोजना फाउंडेशन का समर्थन मिला।

इस दिशा की अहमियत यह है कि इससे सेरिबेलम को केवल एक ऐसे हिस्से के रूप में देखने के बजाय, जिसमें बस आकार नापा जाता है, एक बदलती हुई व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है। इसमें अलग-अलग तरह की कोशिकाएँ अलग समय-सारिणी के मुताबिक विकसित होती हैं। अगर हर बच्चे के मस्तिष्क की जैविक अवस्था का भरोसेमंद ढंग से पता लगाना संभव हो सके, तो इलाज से जुड़े शोध अधिक सटीक बनाए जा सकते हैं। इससे यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि विकास के किन समयों में कोशिकाएँ और तंत्रिका-जाल आसपास के असर के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं।

निष्कर्ष

साइंस में प्रकाशित यह अध्ययन इस बात के प्रमाण देता है कि समय से पहले जन्म से सेरिबेलम का विकास-पथ बदल सकता है; यह बदलाव केवल विकास की रफ्तार धीमी होने और बाद में अपने-आप उसकी भरपाई हो जाने तक सीमित नहीं हो सकता। शोधकर्ताओं ने 176 शिशुओं की मस्तिष्क-जाँच और विकास की निगरानी की, साथ ही 83 शिशुओं के सेरिबेलम के ऊतकों का कोशिकाओं की जगह को ध्यान में रखते हुए विश्लेषण किया। उन्हें दानेदार कोशिकाओं के परिपक्व होने और पर्किन्जे कोशिकाओं के विकसित होने में फर्क मिला। गर्भावस्था पूरी होने से पहले गर्भ के बाहर विकास के हर सप्ताह का संबंध सेरिबेलम के आकार में करीब 230 घन मिलीमीटर की कमी से भी पाया गया। 9 से 36 महीने की उम्र में यह आकार चलने-फिरने, भाषा और काम सँभालने से जुड़ी क्षमताओं में पाए गए अंतरों से जुड़ा था।

इन नतीजों से समय से पहले जन्मे हर बच्चे का भविष्य तय नहीं हो जाता। न ही ये साबित करते हैं कि सेरिबेलम का कम आकार ही विकास की हर कठिनाई की वजह है। फिर भी, वे वैज्ञानिक सवाल को एक नई दिशा देते हैं: बात सिर्फ यह नहीं कि मस्तिष्क कितना बढ़ा, बल्कि यह भी है कि उसकी कोशिकाएँ कैसे और किन परिस्थितियों में परिपक्व हुईं। जीन से जुड़े संकेतों और बचाव के उपायों पर शोध जारी रहने से बच्चों के जैविक अंतरों को ध्यान में रखने वाली देखभाल विकसित करने और समय से पहले जन्म के बाद सेरिबेलम के संवेदनशील विकास-काल को बेहतर समझने में मदद मिल सकती है।