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सिर्फ़ एक मिनट में बिखर गया तेज़ लॉन्च का सपना।

आसान शब्दों में

सुपर स्ट्राइपी नाम का रॉकेट छोटे उपग्रहों को कम खर्च में और जल्दी अंतरिक्ष तक पहुँचाने के लिए बनाया गया था। 2015 में हवाई से उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद वह नियंत्रण से बाहर होकर टूट गया और उसके साथ 13 उपग्रह भी नष्ट हो गए। इस रॉकेट की उड़ान फिर कभी नहीं हुई, लेकिन जल्दी प्रक्षेपण की ज़रूरत बनी रही और बाद में अमेरिकी अंतरिक्ष बल ने व्यावसायिक कंपनियों की मदद ली।

उड़ान तेज़, अंत बेहद जल्दी

3 नवंबर 2015 की शाम प्रशांत महासागर स्थित मिसाइल परीक्षण क्षेत्र के एक प्रक्षेपण केंद्र से एक प्रायोगिक रॉकेट रवाना हुआ। यह केंद्र हवाई राज्य के काउई द्वीप पर, बार्किंग सैंड्स के पास था। सुपर स्ट्राइपी की उड़ान सामान्य रॉकेटों से कुछ अलग ढंग से शुरू हुई: इसे प्रक्षेपण रेल की मदद से ज़मीन से रवाना करने के लिए बनाया गया था। अमेरिकी वायुसेना इस व्यवस्था को परखना चाहती थी, ताकि उपग्रहों को कक्षा में पहुँचाने का काम तेज़ और कम खर्चीला हो सके।

लेकिन रॉकेट अंतरिक्ष तक नहीं पहुँचा। उड़ान शुरू होने के एक मिनट से भी कम समय में वह अनियंत्रित ढंग से घूमने लगा। उसकी दिशा और गति बिगड़ती गई और आखिरकार वह टूटकर गिर गया। इस हादसे में रॉकेट के साथ उसके भीतर रखे छोटे उपग्रह भी खो गए।

एक नई व्यवस्था की परीक्षा

यह परीक्षण ऐसी व्यवस्था तैयार करने की कोशिश का हिस्सा था, जिसके ज़रिए ज़रूरत पड़ने पर छोटे उपग्रहों को कम समय में कक्षा तक भेजा जा सके। खास तौर पर ऐसे हालात में, जब किसी मिशन को जल्दी पूरा करना ज़रूरी हो। हवाई के प्रक्षेपण केंद्र से रॉकेट ने स्थानीय समय के मुताबिक रात करीब 9:45 बजे उड़ान भरी। शुरुआत में वह ऊपर की ओर बढ़ा, मगर जल्द ही उसकी राह बिगड़ गई। स्थिर ढंग से ऊपर जाने के बजाय उसका ढाँचा डगमगाने और घूमने लगा।

उड़ान का सबसे अहम हिस्सा बहुत कम समय तक चला। ज़मीन से रवाना होने के एक मिनट से भी कम समय में रॉकेट टूट गया और उसके साथ उसकी पूरी खेप नष्ट हो गई। उपलब्ध जानकारी में पहले चरण के इंजन में गड़बड़ी की आशंका जताई गई थी, लेकिन प्रकाशित जानकारी से इसकी पुष्टि नहीं हुई। इसलिए यह कहना ठीक है कि पहले चरण के इंजन में गड़बड़ी की आशंका थी, न कि यह हादसे का तयशुदा कारण था।

इस उड़ान में कुल 13 छोटे उपग्रह थे। वे सभी एक ही परियोजना या एक ही संस्था के नहीं थे। रॉकेट में एक मुख्य उपग्रह के साथ कई छोटे उपग्रह भी रखे गए थे। इसलिए नुकसान केवल प्रक्षेपण रॉकेट तक सीमित नहीं रहा: अलग-अलग संस्थाओं की कई योजनाएँ भी प्रभावित हुईं, क्योंकि वे अपने उपग्रहों के अंतरिक्ष तक पहुँचने की उम्मीद कर रही थीं।

पुराने नाम से जुड़ा, नए दौर के लिए बना

सुपर स्ट्राइपी का नाम और उसकी बुनियादी सोच 1960 के दशक में सामने आए स्ट्राइपी रॉकेट से जुड़ी थी। पुराना स्ट्राइपी एक शोध रॉकेट था, जो पृथ्वी की कक्षा तक नहीं जाता था। उसका इस्तेमाल वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करने वाले यानों से जुड़े परीक्षणों और मिसाइल-रोधी हथियारों के लिए लक्ष्यों की जाँच में किया गया था। नए रूप में इस विचार को कहीं आगे ले जाने की कोशिश हुई: इसे तीन चरणों वाला ऐसा यान बनाना था, जो कक्षा तक पहुँच सके, न कि छोटी उड़ान के बाद वापस गिर जाए।

इसके तीनों चरणों में ठोस ईंधन से चलने वाले रॉकेट इंजन लगाए गए थे। इन्हें एरोजेट रॉकेटडाइन ने बनाया था। कई चरणों वाली व्यवस्था में चढ़ाई के दौरान रॉकेट के हिस्से एक के बाद एक काम करते हैं, न कि पूरी यात्रा में सभी हिस्से एक साथ काम करते रहते हैं। प्रक्षेपण रेल इसका एक खास पहलू थी। रॉकेट को मंच से रवाना होते समय दिशा देने के लिए इस रेल का इस्तेमाल होना था। यह सीधे खड़े पारंपरिक प्रक्षेपण मंच से उड़ान भरने के तरीके से अलग था।

यह परियोजना केवल पुराने रॉकेट को नए रूप में बनाने की कोशिश नहीं थी। वायुसेना ऐसी व्यवस्था की जाँच करना चाहती थी, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी ज़रूरतों के लिए तैयार रखा जा सके और जो छोटे उपग्रहों को कक्षा तक पहुँचाने का कम खर्चीला विकल्प दे। घोषित लक्ष्य था कि एक मिशन में 300 किलोग्राम तक का सामान अंतरिक्ष में पहुँचाया जाए और हर उड़ान पर करीब 15 मिलियन डॉलर खर्च हों। कागज़ पर ये आँकड़े आकर्षक थे: छोटे उपग्रहों के लिए पर्याप्त क्षमता और ऐसी कीमत, जिससे खास तरह के मिशनों के लिए उपग्रहों को कक्षा में भेजना आसान हो सके।

एक उड़ान में 13 उपग्रह

रॉकेट का मुख्य उपग्रह ORS-4 था। यह नाम तेज़ प्रतिक्रिया वाले चौथे अंतरिक्ष मिशन के लिए इस्तेमाल किया गया था। हवाई विश्वविद्यालय के इंजीनियरों ने इसे वायुसेना के लिए विकसित किया था और इसे हियाकासात नाम भी दिया। योजना थी कि यह उपग्रह पृथ्वी की तस्वीरें ले और पूरे एक साल तक पर्यावरण की स्थितियों पर नज़र रखे। इससे कक्षा से उपयोगी आँकड़े मिलने की उम्मीद थी। साथ ही, यह मिशन नए रॉकेट की उस काम को पूरा करने की क्षमता भी परखता, जिसके लिए उसे बनाया गया था।

बाकी 12 उपग्रह इस उड़ान में साथ भेजे जा रहे थे। इनमें नासा के एडिसन छोटे उपग्रह प्रायोगिक नेटवर्क मिशन के लिए तैयार किए गए आठ घनाकार उपग्रह और विश्वविद्यालयों के चार उपग्रह शामिल थे। घनाकार उपग्रह छोटे होते हैं, इसलिए उन प्रयोगों और कार्यक्रमों के लिए काम के होते हैं जिन्हें बड़े अंतरिक्ष यान की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे कई उपग्रहों को एक समूह के रूप में भी चलाया जा सकता है। इससे पूरा काम एक ही उपग्रह पर निर्भर रहने के बजाय कई इकाइयों में बाँटा जा सकता है।

छोटे उपग्रह अपेक्षाकृत कम खर्चीले हो सकते हैं, लेकिन उनके नष्ट होने का असर मामूली नहीं होता। हर उपग्रह के पीछे कोई मिशन या प्रयोग, उसे तैयार करने वाली टीम, प्रक्षेपण की योजना और उससे मिलने वाले आँकड़ों से जुड़ी उम्मीदें होती हैं। इस उड़ान में वायुसेना, नासा और अलग-अलग विश्वविद्यालयों के उपग्रह एक ही रॉकेट में रखे गए थे। जब प्रक्षेपण विफल हुआ, तो सभी उपग्रह एक साथ खो गए और 13 में से कोई भी अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुँचा।

नाकाम उड़ान के बाद थम गया कार्यक्रम

सुपर स्ट्राइपी को तेज़ प्रक्षेपण के विकल्पों में शामिल होने वाली नई व्यवस्था माना जा रहा था। लेकिन उसकी परीक्षण उड़ान के बाद आगे के मिशनों की कड़ी शुरू नहीं हुई। हादसे के बाद वायुसेना ने इस रॉकेट का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया और इसकी कोई दूसरी उड़ान भी नहीं हुई। समय बीतने के साथ कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ पाया और आखिरकार यह नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाला प्रक्षेपण साधन नहीं बन पाया।

यह नतीजा रॉकेट बनाने की एक अहम चुनौती दिखाता है: केवल अच्छा डिज़ाइन और कम कीमत का लक्ष्य किसी सेवा को भरोसेमंद नहीं बना देता। रॉकेट को परीक्षणों में सफल होना पड़ता है, सुरक्षित ढंग से उपग्रह पहुँचाने की क्षमता साबित करनी होती है और यह भी दिखाना होता है कि उसे बार-बार चलाया जा सकता है। जब कई उपग्रहों को लेकर जा रहा रॉकेट शुरुआती उड़ान में ही नाकाम हो जाए, तो नुकसान केवल उस रॉकेट के टूटने तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरी व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित होता है और संबंधित संस्थाओं को यह तय करने में समय लगता है कि दोबारा कोशिश करना सही होगा या नहीं।

एक हादसा यह साबित नहीं करता कि प्रक्षेपण रेल से उड़ान भरने का विचार ही काम नहीं कर सकता। इसी तरह, अकेली घटना से नाकामी के सभी कारण भी तय नहीं किए जा सकते। जो बात साफ है, वह यह कि उस मिशन में इस्तेमाल हुआ रॉकेट अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पहले नियंत्रण खो बैठा। पहले चरण के इंजन में गड़बड़ी की आशंका के बावजूद कार्यक्रम दोबारा उड़ान शुरू करने का भरोसा नहीं जुटा सका। इस तरह सुपर स्ट्राइपी तेज़ प्रतिक्रिया के वादे और ज़रूरत के वक्त लगातार भरोसेमंद ढंग से काम करने वाला रॉकेट बनाने की कठिनाई के बीच के अंतर का उदाहरण बन गया।

सरकारी परियोजना से व्यावसायिक प्रक्षेपण तक

सुपर स्ट्राइपी का कार्यक्रम रुकने के बाद अमेरिकी वायुसेना या अंतरिक्ष बल ने उसी रॉकेट से कोई और मिशन नहीं किया। इसके बजाय, अंतरिक्ष बल ने तेज़ प्रक्षेपण के विकल्प देने के लिए व्यावसायिक कंपनियों की सेवाएँ लेनी शुरू कीं। यह तरीका ज़रूरत पूरी करने की रणनीति में बदलाव दिखाता है। अब किसी एक सरकारी प्रायोगिक रॉकेट पर निर्भर रहने के बजाय, उन कंपनियों के साथ काम किया जा सकता था जिनके पास पहले से रॉकेट और प्रक्षेपण सेवाएँ मौजूद थीं।

इसका एक उदाहरण अमेरिकी अंतरिक्ष बल और रॉकेट लैब के बीच विक्टस हेज़ मिशन के लिए हुआ सहयोग है। इस प्रक्षेपण की तैयारी के लिए केवल 17 घंटे पहले सूचना दी गई थी। इसे बहुत कम समय की सूचना पर प्रक्षेपण करने का नया रिकॉर्ड बताया गया। इसका अर्थ यह नहीं कि हर अंतरिक्ष मिशन इतनी जल्दी पूरा किया जा सकता है। लेकिन यह उस क्षमता का नमूना है जिसे सैन्य संस्थाएँ विकसित करना चाहती थीं: व्यावसायिक व्यवस्थाओं का सहारा लेकर प्रक्षेपण का अनुरोध मिलने और उसे पूरा करने के बीच का समय घटाना।

यहीं सुपर स्ट्राइपी की कोशिश और बाद के प्रक्षेपण तरीकों के बीच संबंध दिखाई देता है। जिस समस्या को हल करने के लिए यह कार्यक्रम शुरू हुआ था, वह रॉकेट की नाकामी के बाद भी बनी रही: ज़रूरत पड़ने पर छोटे उपग्रहों को जल्दी अंतरिक्ष तक पहुँचाना। मगर उसे पूरा करने का तरीका बदल गया। समाधान अब उस प्रायोगिक रॉकेट की वापसी पर निर्भर नहीं था; जल्दी प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत पूरी करने के लिए व्यावसायिक कंपनियाँ भी चुने गए रास्ते का हिस्सा बन गईं।

हवाई की उड़ान से मिली सीख

नवंबर 2015 की उड़ान नए प्रक्षेपण साधन बनाने में शामिल जोखिमों को एक छोटी-सी घटना में सामने ले आती है। एक ही परियोजना में लागत घटाने, 300 किलोग्राम तक का सामान अंतरिक्ष में भेजने, तीन चरणों वाले डिज़ाइन का इस्तेमाल करने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए तेज़ प्रतिक्रिया देने जैसे लक्ष्य जुड़े हुए थे। मगर उड़ान एक मिनट से भी कम समय में नाकाम हो गई। इससे साफ हुआ कि किसी अच्छे दिखने वाले डिज़ाइन में इन लक्ष्यों को शामिल कर देना ही उन्हें वास्तविक क्षमता में बदलने के लिए काफी नहीं है।

इस नुकसान ने यह भी दिखाया कि घनाकार उपग्रह किसी बड़ी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं; वे ऐसे छोटे उपकरण नहीं हैं जिन्हें बिना किसी असर के आसानी से बदल दिया जाए। उन 13 उपग्रहों में अलग-अलग कामों की योजनाएँ थीं: पृथ्वी और पर्यावरण पर एक साल तक नज़र रखने वाला मुख्य उपग्रह, नासा के प्रयोग से जुड़े आठ उपग्रह और विश्वविद्यालयों के चार उपग्रह। सभी को एक उड़ान में भेजने से रॉकेट का साझा इस्तेमाल संभव हुआ, लेकिन हादसे का असर भी एक साथ उन सभी योजनाओं पर पड़ा।

इस परियोजना की सबसे स्पष्ट विरासत यह है कि तेज़ प्रक्षेपण की ज़रूरत सुपर स्ट्राइपी के बंद होने के बाद भी बनी रही। रॉकेट ने उड़ान भरना बंद कर दिया, लेकिन जिस उद्देश्य से उसे बनाया गया था, वह दूसरे इंतज़ामों में दिखाई देता रहा। इनमें 17 घंटे की सूचना पर मिशन शुरू करने की तैयारी भी शामिल है। दोनों तरीकों और उनके अमल में बड़ा अंतर है, मगर दोनों के पीछे सवाल एक ही है: जब किसी मिशन में समय बहुत अहम हो, तो उपग्रहों को कक्षा तक जल्दी कैसे पहुँचाया जाए।

निष्कर्ष

सुपर स्ट्राइपी एक महत्वाकांक्षी परियोजना थी। इसका मकसद 1960 के दशक के एक रॉकेट से प्रेरित विचार को तीन चरणों वाले कक्षीय यान में बदलना और छोटे उपग्रहों को हर उड़ान पर 15 मिलियन डॉलर के खर्च के लक्ष्य के साथ अंतरिक्ष तक पहुँचाना था। लेकिन 3 नवंबर 2015 को हवाई में हुई इसकी परीक्षा एक मिनट से भी कम समय में रॉकेट के टूटने और 13 उपग्रहों के नष्ट होने के साथ समाप्त हुई। पहले चरण के इंजन में गड़बड़ी की आशंका रही, पर इसकी पुष्टि नहीं हुई। कार्यक्रम फिर उड़ान तक नहीं लौटा और अमेरिकी अंतरिक्ष बल ने बाद में प्रक्षेपण की तैयारी तेज़ करने के लिए व्यावसायिक कंपनियों का सहारा लिया। विक्टस हेज़ के उदाहरण में सूचना से प्रक्षेपण तक का समय 17 घंटे रहा। रॉकेट नाकाम हुआ, लेकिन जल्दी प्रक्षेपण की ज़रूरत और उसे भरोसेमंद ढंग से पूरा करने की चुनौती आज भी अहम हैं।