आसान शब्दों में
सोवियत संघ ने 1 नवंबर 1962 को मार्स 1 नाम का यान मंगल के पास से गुजारने के लिए भेजा था। यान अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता रहा, लेकिन दिशा सँभालने वाले हिस्से में खराबी के कारण धरती से उसका संपर्क टूट गया। वह मंगल के पास तो पहुँचा, मगर अपने साथ जुटाई जानकारी धरती तक नहीं पहुँचा सका।
एक नई कोशिश, पिछली नाकामियों के बाद
मंगल तक पहुँचने की सोवियत संघ की कोशिशों में मार्स 1 पहला यान नहीं था। नाम से ऐसा लग सकता है, लेकिन उससे पहले मंगल की ओर यान भेजने के 3 प्रयास हो चुके थे और तीनों रॉकेट के उड़ान भरने के दौरान ही नाकाम हो गए थे। इस पृष्ठभूमि में मार्स 1 मंगल तक पहुँचने की शुरुआती कोशिशों में से एक था। इसमें इंजीनियरों को कई मुश्किलों से एक साथ जूझना पड़ा। उन्हें यान को ले जाने वाले रॉकेट, यान के अपने उपकरणों और धरती से बहुत दूर तक संपर्क बनाए रखने की चुनौती का सामना करना था। उस समय मंगल तक की यात्रा का ऐसा कोई अनुभव भी नहीं था, जिस पर भरोसा किया जा सके।
मंगल तक पहुँचने की मुश्किलें सिर्फ सोवियत संघ के सामने नहीं थीं। अमेरिका को भी अपने शुरुआती प्रयासों में कई अड़चनों का सामना करना पड़ा। इसके 2 साल बाद नासा का मैरिनर 4 मंगल के पास से सफलतापूर्वक गुज़रा और ऐसा करने वाला पहला यान बना। इसलिए मार्स 1 को पूरी तरह सफल कहना ठीक नहीं होगा, लेकिन वह उन कोशिशों की कड़ी में शामिल था जिन्होंने मंगल की खोज को दूरबीन से देखने और कल्पना करने के दायरे से आगे बढ़ाकर वहाँ यान भेजने तक पहुँचाया।
उड़ान ठीक रही, लेकिन खराबी तुरंत सामने नहीं आई
रॉकेट से अलग होने के बाद मार्स 1 ने अपने सौर पैनल खोल दिए और मंगल की ओर चल पड़ा। शुरुआत से ऐसा लगा कि यान तय रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। लेकिन मिशन पर नज़र रखने के लिए धरती पर भेजे जाने वाले उसके आँकड़ों पर निर्भर रहना पड़ता था। इन्हीं आँकड़ों की जाँच करते हुए मिशन की निगरानी कर रहे लोगों को पता चला कि यान की दिशा सँभालने वाली प्रणाली के गैस के एक वाल्व से रिसाव हो रहा था।
पूरे मिशन के लिहाज़ से वह वाल्व बहुत छोटा-सा हिस्सा था, लेकिन उसमें आई खराबी का असर यान के एक बेहद ज़रूरी काम पर पड़ा। यान को अपनी दिशा इस तरह सँभालनी होती है कि उसका एंटीना धरती की ओर रहे और वह धरती पर मौजूद निगरानी दलों के साथ संकेत भेज और हासिल कर सके। दिशा ठीक न रख पाने पर नियमित संपर्क बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता है, भले ही यान अंतरिक्ष में आगे बढ़ता रहे। इस तरह नियंत्रण प्रणाली के एक हिस्से की खराबी ने यान और धरती के बीच संपर्क को सीधे खतरे में डाल दिया।
अंतरिक्ष में दिशा बनाए रखना छोटी बात नहीं
बहुत दूर तक जाने वाली उड़ानों में संपर्क कोई ऐसी अतिरिक्त सुविधा नहीं है, जिसे आसानी से छोड़ा जा सके। यान की हालत के बारे में जानकारी धरती तक इसी रास्ते से पहुँचती है। इसी के सहारे उसे आदेश भेजे जाते हैं और उससे मिलने वाले आँकड़े हासिल किए जाते हैं। यह सब तभी संभव है, जब एंटीना सही दिशा में हो। अगर यान अपनी स्थिति को स्थिर न रख सके या ज़रूरत के मुताबिक दिशा न बदल पाए, तो एंटीना को ठीक तरह से धरती की ओर करना कठिन हो जाता है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब यान का इंजन चल रहा हो और वह अपने रास्ते से भटका न हो।
इससे उन दो बातों का फर्क समझ में आता है जो सुनने में एक जैसी लग सकती हैं: यान का अपनी यात्रा जारी रखना और मिशन के लोगों का यह जान पाना कि उसके साथ क्या हो रहा है। कोई यान अंतरिक्ष में बहुत दूर तक जा सकता है, जबकि धरती पर मौजूद नियंत्रण दल उसकी हालत के बारे में कुछ न जान पाए या उससे संपर्क न कर सके। मार्स 1 के मामले में दिशा सँभालने वाले गैस के वाल्व में रिसाव हुआ और यान मंगल की ओर का करीब आधा रास्ता तय कर चुका था, तभी संपर्क टूट गया। संकेत मिलना बंद होने का मतलब यह नहीं था कि यान चलना बंद कर चुका है। इसका सीधा अर्थ था कि उसकी निगरानी कर रहे लोग उससे संपर्क में नहीं रह गए थे।
मंगल के पास पहुँचा, पर योजना के मुताबिक मिशन पूरा नहीं हुआ
आखिरकार मार्स 1 मंगल के पास पहुँचा और उसके करीब से गुज़रा। इस यात्रा की एक खास बात यह है कि धरती से संपर्क रास्ते के लगभग आधे हिस्से में टूट जाने के बावजूद यान अपने तय लक्ष्य तक पहुँच गया। लेकिन किसी ग्रह के पास पहुँच जाना अपने आप में वैज्ञानिक लक्ष्य हासिल करने के बराबर नहीं होता। किसी अंतरिक्ष मिशन की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं आँकी जाती कि यान कहाँ तक गया, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसने अपना काम पूरा किया या नहीं और उसके नतीजे धरती तक पहुँचे या नहीं।
मार्स 1 की कहानी का विरोधाभास भी यही है। एक ओर, यान की यात्रा रॉकेट के उड़ान भरने के साथ खत्म नहीं हुई और संपर्क टूटने के बाद भी वह मंगल तक बढ़ता रहा। दूसरी ओर, संपर्क के बिना इस तरह के मिशन की निगरानी करना संभव नहीं रह गया और इसलिए इसे पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता। उपलब्ध जानकारी में यान से मिले किसी खास माप या वैज्ञानिक नतीजे का ब्योरा नहीं है। ऐसे में उसके नाम ऐसे निष्कर्ष जोड़ना ठीक नहीं होगा, जिनकी पुष्टि दर्ज जानकारी से नहीं होती। साफ बात इतनी है कि यान मंगल के पास पहुँचा, लेकिन धरती से जुड़े रहने की उसकी क्षमता जवाब दे गई।
मंगल शुरुआती खोज अभियानों का लक्ष्य क्यों बना
अंतरिक्ष यानों का दौर शुरू होने से बहुत पहले ही मंगल ने आसमान देखने वालों का ध्यान खींच लिया था। दूरबीनों से मंगल को आसमान में चमकते बिंदु के बजाय एक ग्रह के रूप में देखना संभव हुआ और उसके स्वभाव को लेकर सवाल बढ़ने लगे। जब अंतरिक्ष में यान भेजना मुमकिन हुआ, तो लाल ग्रह वैज्ञानिकों के लिए आकर्षक मंज़िल बन गया। उसके पास जाकर अध्ययन करने से ऐसी बातें जानने का मौका मिल सकता था, जिन्हें दूर से देखने भर से समझना संभव नहीं था।
वैज्ञानिकों की दिलचस्पी के बावजूद मंगल तक की यात्रा आसान नहीं थी। वहाँ पहुँचना, उसकी कक्षा में जाना या उसकी सतह पर उतरना, सब जटिल चुनौतियाँ थीं। मार्स 1 का मिशन इस मुश्किल का एक ऐसा पहलू सामने लाता है जिसका संबंध सिर्फ दूरी से नहीं था। पूरी यात्रा में यान के अलग-अलग हिस्सों को साथ मिलकर काम करना था, ज़रूरी प्रणालियों को संभावित खराबियों के बावजूद चलना था और यान की दिशा ऐसी बनाए रखनी थी कि धरती से संपर्क बना रहे। इस पूरी कड़ी की किसी एक कड़ी में कमजोरी भी बाकी कामों की सफलता पर असर डाल सकती थी, चाहे यान ने बहुत बड़ी दूरी ही क्यों न तय की हो।
नाकामियों से जमा हुआ अनुभव
जो कोशिशें पूरी तरह सफल नहीं होतीं, वे खोज के इतिहास में बेकार नहीं हो जातीं। शुरुआती मिशन ऐसी मुश्किलें उजागर कर सकते हैं जिन्हें सिर्फ योजना बनाते समय देख पाना संभव नहीं होता। उनसे पता चलता है कि खराबी कहाँ आ सकती है, किन प्रणालियों पर पूरा मिशन निर्भर है और किसी एक हिस्से के काम न करने का असर बाकी कामों पर कैसे पड़ता है। उपलब्ध जानकारी यह नहीं बताती कि मार्स 1 की खराबी के जवाब में बाद के यानों की बनावट में कौन-से खास बदलाव किए गए। फिर भी सोवियत और अमेरिकी कोशिशों का क्रम साफ दिखाता है कि मंगल के पास पहली सफल उड़ान तक पहुँचने का रास्ता किसी एक प्रयास से नहीं खुला।
सोवियत संघ के 3 प्रयास रॉकेट के उड़ान भरने के समय ही नाकाम हुए थे। इसके बाद मार्स 1 ने उड़ान भरी और संपर्क टूटने के बावजूद मंगल के पास से गुज़रा। फिर 2 साल बाद मैरिनर 4 ने मंगल के पास पहली सफल उड़ान पूरी की। इन कोशिशों के बीच अंतरिक्ष खोज में तरक्की का स्वभाव दिखाई देता है। यह रॉकेट के उड़ान भरने से सीधे खोज तक जाने वाला रास्ता नहीं है, बल्कि ऐसे प्रयोगों की एक श्रृंखला है जो कुछ हद तक सफल हो सकते हैं, बीच में अटक सकते हैं या आगे चलकर बेहतर कोशिश की राह खोल सकते हैं।
मार्स 1 की कहानी आज भी क्यों मायने रखती है
इस मिशन की अहमियत एक उपलब्धि और उसकी साफ सीमा, दोनों में है। सोवियत संघ की पिछली 3 कोशिशें उड़ान भरने से पहले ही नाकाम हो गई थीं; उनके बाद मार्स 1 मंगल की ओर काफी आगे बढ़ा और सचमुच ग्रह के पास से गुज़रा। लेकिन दिशा सँभालने वाली प्रणाली के गैस वाल्व में आई खराबी ने एंटीना को सही दिशा में बनाए रखना कठिन कर दिया। आखिरकार, रास्ते के करीब आधे हिस्से में धरती से संपर्क टूट गया। यह कहानी याद दिलाती है कि अंतरिक्ष में सफलता केवल धरती से उड़ान भरने के पल से तय नहीं होती।
यह यात्रा मंगल की खोज की दिशा में इंसानी कोशिशों को भी बड़े नज़रिए से देखने का मौका देती है। मंगल तक पहुँचने, वहाँ उतरने या उसकी सतह की खोज करने की बात आधुनिक मिशनों के साथ ही शुरू नहीं हुई थी। उससे पहले लंबा काम हुआ, जिसमें कई ऐसे प्रयास शामिल थे जो अपने सारे लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए। इस सफर में मार्स 1 एक शुरुआती पड़ाव था। वह मंगल के करीब तो पहुँचा, लेकिन मिशन को इस तरह पूरा नहीं कर पाया कि उसे वैज्ञानिक और कामकाज, दोनों ही लिहाज़ से पूरी तरह सफल कहा जा सके।
निष्कर्ष
मार्स 1 ने 1 नवंबर 1962 को मंगल की ओर उड़ान भरी। सोवियत संघ की यह चौथी कोशिश थी; इससे पहले 3 प्रयास रॉकेट के उड़ान भरने के समय नाकाम हो गए थे। यान ने अपने सौर पैनल खोलकर यात्रा शुरू की, लेकिन आँकड़ों की जाँच में दिशा सँभालने वाली प्रणाली के गैस वाल्व में रिसाव का पता चला। दिशा ठीक रखने की क्षमता घटने से एंटीना को धरती की ओर करना और संपर्क बनाए रखना मुश्किल होता गया। रास्ते के करीब आधे हिस्से में संपर्क टूट गया। यान फिर भी आगे बढ़ा और मंगल के पास से गुज़रा, लेकिन मिशन पूरी तरह सफल नहीं हुआ। 2 साल बाद मैरिनर 4 मंगल के पास सफल उड़ान भरने वाला पहला यान बना। मार्स 1 की अधूरी यात्रा का सबक आज भी अहम है: किसी दूर की दुनिया तक पहुँचना काफी नहीं, यान को अपना काम करते रहना और उससे मिली जानकारी धरती तक पहुँचाना भी ज़रूरी है।