आसान शब्दों में
एक दूर का चट्टानी ग्रह अपने तारे का चक्कर सिर्फ 11 घंटे में लगा लेता है और वहाँ इतनी गर्मी है कि चट्टानें भी तप उठें। फिर भी जेम्स वेब दूरबीन के संकेत बताते हैं कि ग्रह के चारों ओर गैस की परत और चमकदार धातु जैसे बादल हो सकते हैं। ये बादल तारे की रोशनी का बड़ा हिस्सा लौटा देते हैं और शायद ग्रह के वातावरण को टिकाए रखने में मदद करते हैं।
एक ऐसा ग्रह जहाँ दिन और रात हमेशा के लिए बँटे हुए हैं
नासा के टेस अंतरिक्ष अभियान ने 2020 में दूसरे तारों के इर्द-गिर्द घूमने वाले ग्रहों की खोज के दौरान TOI-561 b को पहचाना था। इसके नाम से पता चलता है कि यह TOI-561 तारे से जुड़ा ग्रह है, लेकिन इसकी सबसे अनोखी बात इसका बेहद छोटा और तंग कक्षीय रास्ता है। कई ग्रहों को अपने तारे का एक चक्कर लगाने में दिन या महीने लगते हैं, जबकि इस दुनिया को उसी जगह पर लौटने में केवल 11 घंटे लगते हैं।
तारे के इतना पास होने के कारण TOI-561 b संभवतः ज्वारीय रूप से बँधा हुआ है। इसका मतलब है कि यह अपनी धुरी पर जितने समय में घूमता है, उतने ही समय में अपने तारे की परिक्रमा भी करता है। नतीजतन, ग्रह का एक ही हिस्सा हमेशा तारे की ओर रहता है और दूसरा हिस्सा उससे दूर, सीधी रोशनी से वंचित रहता है। इसलिए यहाँ धरती जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त का रोज़ का सिलसिला नहीं है: एक आधा हिस्सा लगातार दिन में है और दूसरा हमेशा अँधेरे में।
ग्रह के इन दोनों हिस्सों के बीच तापमान का बहुत बड़ा अंतर हो सकता है। तारे की ओर वाला भाग लगातार उसकी ऊर्जा और रोशनी सोखता है, जबकि दूसरी ओर सीधी धूप कभी नहीं पहुँचती। अगर दिन वाला हिस्सा बिना वातावरण के खुली चट्टान होता, तो उसका तापमान देखे गए तापमान से भी अधिक होने की उम्मीद होती। इसी बात ने शोधकर्ताओं के सामने सवाल खड़ा किया: क्या गैस की कोई परत गर्मी को रात वाले हिस्से तक पहुँचा रही है, या तारे की रोशनी का बड़ा हिस्सा सतह को गर्म करने से पहले ही लौट जाता है?
जेम्स वेब ने ग्रह की कक्षा पर रखी नज़र
इसका जवाब खोजने के लिए शोध दल ने जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन से ग्रह की चमक और तापमान में होने वाले बदलावों को देखा। कुल 37 घंटे तक किए गए अवलोकनों में ग्रह की लगभग चार पूरी परिक्रमाएँ शामिल थीं। मकसद सिर्फ ग्रह की तस्वीर लेना नहीं था। टीम ने यह मापने की कोशिश की कि ग्रह अपनी कक्षा में अलग-अलग जगहों से गुजरता है, तो तारे और दूरबीन की ओर आने वाली रोशनी किस तरह बदलती है।
ऐसे मापों से वैज्ञानिक ग्रह पर रोशनी और गर्मी के फैलाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं। कक्षा में आगे बढ़ते हुए उसकी चमक बदलती है, क्योंकि अलग-अलग समय पर ग्रह के अलग हिस्से हमारी ओर दिखाई देते हैं। शोध दल की सदस्य और वाटरलू विश्वविद्यालय की शोधकर्ता लीसा डांग के मुताबिक, इन बदलावों के विश्लेषण से पता चला कि ग्रह अपने तारे की काफी रोशनी लौटा देता है और गर्मी केवल दिन वाले हिस्से तक सीमित नहीं रहती। दोनों संकेत मिलकर इस संभावना को मजबूत करते हैं कि ग्रह के चारों ओर वातावरण मौजूद है।
लगभग पूरी कक्षा का अवलोकन करने से इस अध्ययन में पहली बार ग्रह के रात वाले हिस्से को भी देखा जा सका। मुख्य सवाल यह था कि क्या अँधेरी तरफ का तापमान इतना अधिक है कि दिन वाले हिस्से से वहाँ पहुँची गर्मी का पता चल सके। वेब के मापों से लगा कि रात वाला भाग इतना गर्म नहीं है कि दिन वाले हिस्से से गायब दिख रही ऊर्जा को केवल उसके ज़रिए समझाया जा सके। इस वजह से गर्मी के रात की ओर बहने का विचार पूरी कहानी नहीं समझा पाया और रोशनी के परावर्तित होने की भूमिका अहम हो गई।
शुक्र की तरह रोशनी लौटाता ग्रह
नतीजों के अनुसार, TOI-561 b अपने ऊपर पड़ने वाली तारे की रोशनी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा वापस अंतरिक्ष में भेज देता है। यह करीब 75 प्रतिशत है, जो लगभग उतना ही है जितना सौर मंडल में सूर्य की रोशनी सबसे अधिक लौटाने वाला ग्रह शुक्र परावर्तित करता है। तुलना के लिए, पृथ्वी तक पहुँचने वाली धूप का केवल लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा लौटता है। यह तुलना सिर्फ परावर्तित रोशनी की मात्रा की है; तापमान और वातावरण के लिहाज़ से शुक्र, पृथ्वी और TOI-561 b में बहुत बड़ा अंतर है।
इतनी अधिक रोशनी लौटना केवल देखने में दिलचस्प बात नहीं है, बल्कि इससे ग्रह में गर्मी के संतुलन को समझने में मदद मिलती है। जो रोशनी वापस लौट जाती है, वह ग्रह की सतह में समाकर उसे गर्म नहीं करती। इस तरह रोशनी लौटाने वाली कोई परत तारे की ओर वाले हिस्से में सोखी जाने वाली ऊर्जा को घटा सकती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि तारे की लगातार तेज़ रोशनी के सामने होने के बावजूद सतह का तापमान खुली चट्टान के मामले में जितना होने की उम्मीद थी, उससे कम क्यों दिखा। इसीलिए संभावित वातावरण को केवल गर्मी इधर-उधर ले जाने वाली परत के रूप में नहीं देखा जा रहा; उसमें ऐसे बादल भी हो सकते हैं जो ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अंतरिक्ष में लौटा देते हैं।
शोध दल का अनुमान है कि यह परावर्तन ग्रह के गर्म वातावरण में बनने वाले सिलिकेट खनिजों के बादलों के कारण हो सकता है। सुझाए गए पदार्थों में सिलिकॉन डाइऑक्साइड और मैग्नीशियम सिलिकेट शामिल हैं। ये ऐसे खनिज यौगिक हैं जिनका रिश्ता पृथ्वी पर मिलने वाली परिचित चीज़ों, जैसे क्वार्ट्ज और रेत, से है। लेकिन इस बेहद गर्म ग्रह के बादलों को पृथ्वी के पानी वाले बादलों जैसा नहीं समझना चाहिए। यहाँ वे धात्विक पदार्थों के ऐसे कण हो सकते हैं जो इस तपती हवा में वाष्प बन सकते हैं या ठंडे होकर छोटे कणों के रूप में जम सकते हैं।
ऐसी परतें तारे की रोशनी को सोखे जाने से पहले वापस लौटा सकती हैं, कुछ-कुछ ढाल की तरह। वे ग्रह के वातावरण को बनाए रखने में भी मददगार हो सकती हैं, हालाँकि अभी के आँकड़ों से इस रिश्ते के सारे पहलू स्पष्ट नहीं होते। अवलोकन वातावरण होने की संभावना को सहारा देते हैं और तेज़ी से रोशनी लौटाने वाले बादलों की ओर संकेत करते हैं। मगर उनसे अभी यह तय नहीं हुआ है कि वातावरण में कौन-सी गैसें हैं या वहाँ की सामग्री ग्रह के चारों ओर किस तरह घूमती है।
वातावरण के दो बिल्कुल अलग संभावित रूप
वैज्ञानिक अभी नहीं जानते कि TOI-561 b का वातावरण किन पदार्थों से बना है। एक संभावना यह है कि वहाँ कार्बन डाइऑक्साइड से भरपूर घना वातावरण हो, जो मोटे तौर पर शुक्र के वातावरण की याद दिलाए। दूसरी संभावना में सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक हो सकती है। ऐसा वातावरण बृहस्पति के चंद्रमा आयो की बहुत सक्रिय ज्वालामुखीय दुनिया जैसा लग सकता है। आयो पूरे सौर मंडल में सबसे अधिक ज्वालामुखीय गतिविधि वाला पिंड है।
इन तुलनाओं का यह अर्थ नहीं है कि TOI-561 b शुक्र या आयो की हूबहू नकल है। वे वैज्ञानिकों के सामने ग्रह के वातावरण की शुरुआत और उसके टिके रहने को समझने के दो संभावित रास्ते रखते हैं। अगर ज्वालामुखी गैसें छोड़कर वातावरण को भरते रहते हैं, तो वे समय के साथ खोती हुई गैसों की भरपाई कर सकते हैं, जैसा आयो के मामले में माना जाता है। लेकिन अगर वातावरण की बनावट कुछ और निकली, तो उसे टिकाए रखने के पीछे दूसरी प्रक्रियाएँ हो सकती हैं। दोनों ही स्थितियों में, असल में कौन-कौन से पदार्थ मौजूद हैं, यह जानना इस दुनिया को ठीक से समझने का ज़रूरी पहला कदम है।
वातावरण के टिके रहने का सवाल इसलिए खास है क्योंकि TOI-561 b अपने तारे से बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा पाता है और उसकी सतह का तापमान 1800 डिग्री सेल्सियस से अधिक है। पहले यह माना जाता था कि इतनी गर्म दुनिया शायद वातावरण को बनाए ही नहीं रख पाएगी। नए संकेतों से अब यह संभावना खुली है कि इन बेहद कठिन हालात के बावजूद उसके चारों ओर कोई वातावरण अरबों वर्षों से बना हुआ हो। हालाँकि ये संकेत अपने आप वातावरण की उम्र या उसके विकास का पूरा इतिहास साबित नहीं करते। वे एक नया सवाल उठाते हैं: कौन-सी प्रक्रियाएँ इस परत को बचाती हैं या उसमें नई गैसें जोड़ती रहती हैं?
आगे के अवलोकन क्या बताएँगे?
शोध दल का मानना है कि जेम्स वेब से और लंबी तरंगदैर्घ्य वाली रोशनी में किए गए अवलोकन अलग-अलग व्याख्याओं के बीच फर्क करने में मदद कर सकते हैं। अलग पदार्थ रोशनी में अलग निशान छोड़ते हैं। उन निशानों का विश्लेषण यह दिखा सकता है कि वातावरण कार्बन डाइऑक्साइड से भरपूर धुंध जैसा है, उसमें सल्फर डाइऑक्साइड के स्पष्ट संकेत हैं, या उसकी बनावट कुछ ऐसी है जिसका अभी अंदाज़ा नहीं लगाया गया। आगे के माप उन धात्विक बादलों के बारे में भी अधिक जानकारी दे सकते हैं जो रोशनी के असाधारण परावर्तन की व्याख्या करते हैं।
वातावरण की बनावट पता चलने पर तीन आपस में जुड़े रहस्यों को समझने में मदद मिलेगी: तारे की इतनी रोशनी वापस कैसे लौटती है, ग्रह के दोनों हिस्सों में गर्मी किस तरह बँटती है और इतनी कठोर जगह पर वातावरण कैसे टिका रह सकता है। हर जवाब ग्रह की अलग-अलग संभावित तस्वीरों को परखने में मदद करेगा। क्या उस पर रोशनी लौटाने वाले बादलों का असर सबसे अधिक है, क्या ज्वालामुखी गैसें लगातार वातावरण को नया करती हैं, या फिर दोनों ही प्रक्रियाएँ साथ काम कर रही हैं?
इस अध्ययन में वाटरलू विश्वविद्यालय की लीसा डांग समेत कई शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। टीम के नतीजे द एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल में प्रकाशित हुए। यह अध्ययन दिखाता है कि दूर के ग्रहों को समझने के लिए उनकी सतह का सीधा और साफ़ दृश्य मिलना हमेशा ज़रूरी नहीं होता। कक्षा के दौरान रोशनी और तापमान में होने वाले बदलाव एक अकेली तस्वीर से न दिखने वाली बातें सामने ला सकते हैं—जैसे संभावित वातावरण और ग्रह के उजले तथा अँधेरे हिस्सों के अलग-अलग व्यवहार।
निष्कर्ष
TOI-561 b एक बेहद चरम चट्टानी दुनिया है। यह हमसे करीब 280 प्रकाश-वर्ष दूर है। इसे 2020 में खोजा गया था और यह अपने तारे का एक चक्कर केवल 11 घंटे में पूरा करता है। इसकी सतह का तापमान 1800 डिग्री सेल्सियस से अधिक है। जेम्स वेब ने 37 घंटे तक इसका अवलोकन किया, जिसमें करीब चार परिक्रमाएँ शामिल थीं। इन मापों से संकेत मिला कि ग्रह तारे की लगभग 75 प्रतिशत रोशनी लौटाता है और उसके चारों ओर सिलिकेट खनिजों के बादल तथा वातावरण हो सकते हैं।
उस वातावरण की असल बनावट अभी एक खुला सवाल है। उसमें शुक्र के वातावरण जैसे कुछ पदार्थ हो सकते हैं, या सल्फर डाइऑक्साइड और आयो जैसी ज्वालामुखीय गतिविधि से जुड़े संकेत मिल सकते हैं। जेम्स वेब के आगे के, लंबी तरंगदैर्घ्य वाले अवलोकन इन संभावनाओं को परखने में मदद करेंगे। फिलहाल यह खोज इसलिए अहम है कि इससे पता चलता है—बेहद गर्म ग्रह भी रोशनी लौटाने, गर्मी बाँटने और शायद लंबे समय तक वातावरण बनाए रखने के अनपेक्षित तरीके अपना सकते हैं।