आसान शब्दों में
समुद्र में किए गए एक प्रयोग में काली-पंख वाली शार्क ने धीमी, धड़कन जैसी आवाज़ें सुनने के बाद अपना रास्ता बदला। कुछ शार्क 74.0 मीटर दूर से भी आवाज़ के बाद मुड़ीं। इससे पता चलता है कि वे दूर की आवाज़ पर प्रतिक्रिया दे सकती हैं, लेकिन यह नहीं कि वे आवाज़ का सही ठिकाना पहचान पाती हैं या ऐसी आवाज़ से लोगों की सुरक्षा की जा सकती है।
फ्लोरिडा के समुद्र में हुआ प्रयोग
फ्लोरिडा अटलांटिक विश्वविद्यालय की कैरोलिन सुलिवन, एडमंड गर्स्टीन और स्टीवन काजिउरा ने यह अध्ययन किया। इसके नतीजे इंटीग्रेटिव ऑर्गेनिज़्मल बायोलॉजी नाम की शोध-पत्रिका में प्रकाशित हुए। शोधकर्ताओं ने काली-पंख वाली शार्क को चुना, जो सर्दियों में पाम बीच के पास उथले पानी में इकट्ठा होती हैं। इस जगह पर बड़ी संख्या में शार्क को देख पाना आसान था, इसलिए दल उनके प्राकृतिक माहौल में ऊपर से उनकी गतिविधियाँ रिकॉर्ड कर सका।
शोधकर्ताओं ने 2 से 5 मीटर गहरे पानी में एक नाव को स्थिर रखा। नाव के पीछे 13 से 19 मीटर की दूरी पर पानी में तैरता हुआ ध्वनि-विस्तारक लगाया गया। 40 से 50 मीटर की ऊँचाई पर उड़ते ड्रोन ने शार्क की गतिविधियों का वीडियो बनाया। इस तरह दल को पानी में शार्क के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। ध्वनि-विस्तारक को थामे तैरते उपकरण पर एक बत्ती भी लगाई गई थी, जो आवाज़ शुरू होते ही जल उठती थी। इससे वीडियो में बत्ती जलने के समय और शार्क की हरकत को मिलाकर देखना संभव हुआ।
सिर्फ़ इतना देखना कि शार्क उपकरण के पास तैर रही थी, प्रतिक्रिया मानने के लिए काफ़ी नहीं था। दल ने प्रतिक्रिया तभी दर्ज की, जब आवाज़ शुरू होने के ठीक बाद शार्क ने अपना रास्ता बदला। हवा से रिकॉर्ड किए गए वीडियो में शार्क और ध्वनि-विस्तारक के बीच की दूरी का अंदाज़ लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने नाव की लंबाई को पैमाना बनाया; नाव 6.73 मीटर लंबी थी। इस तरीके से बंद टैंक या किसी सीमित जगह के बजाय खुले समुद्र में दूरी का अनुमान लगाया जा सका।
डराने वाली आवाज़ें, खाने का बुलावा नहीं
हर परीक्षण की शुरुआत 10 किलोहर्ट्ज़ की ऊँची आवाज़ से हुई। इसके बाद 5 सेकंड की चुप्पी रखी गई और फिर तीन में से एक धीमी, धड़कन जैसी आवाज़ सुनाई गई। शुरुआती ऊँची आवाज़ भी 5 सेकंड तक चली। 10 किलोहर्ट्ज़ की आवाज़ पर शार्क ने कोई साफ़ बदलाव नहीं दिखाया। यह आवृत्ति शार्क की सुनने की जानी-पहचानी सीमा से बाहर है। इसके उलट, धीमी आवाज़ों के बाद कुछ शार्क ने दिशा बदली।
दल ने बहुत हल्की आवाज़ों के बजाय तेज़ आवाज़ें चुनीं, जो भोजन के स्रोत की नकल नहीं करती थीं। आवाज़ का स्तर 140 डेसीबल था। यह माप स्रोत से 1 मीटर की दूरी पर, 1 माइक्रोपास्कल के संदर्भ दबाव के हिसाब से किया गया था। प्रयोग वाली जगह के सबसे हल्के पृष्ठभूमि शोर से यह आवाज़ लगभग 80 डेसीबल तेज़ थी। शोधकर्ताओं के मुताबिक, मकसद ऐसा संकेत देना था जो इतना अप्रिय हो कि उससे साफ़ प्रतिक्रिया दिखे—भले ही परीक्षण के समय शार्क की स्थिति या उसकी प्रतिक्रिया की वजह अलग-अलग रही हो।
इस बात को ध्यान में रखना ज़रूरी है कि शार्क का मुड़ना यह साबित नहीं करता कि उसने किसी परिचित प्राकृतिक आवाज़ को सुना या वह उसकी ओर आकर्षित हुई। प्रयोग में ऐसी आवाज़ पर प्रतिक्रिया देखी गई थी जिसे जान-बूझकर परेशान करने वाला बनाया गया था। आवाज़ की तीव्रता भी व्यवहार को समझने में अहम है: हल्की आवाज़ का असर अचानक आई तेज़ आवाज़ से बिल्कुल अलग हो सकता है।
आँकड़े क्या बताते हैं?
कुल 209 परीक्षणों में से 165 बार शार्क ने आवाज़ के स्रोत से दूर दिशा में मुड़कर प्रतिक्रिया दी। यह लगभग 79 प्रतिशत परीक्षणों के बराबर है। 209 में से किसी भी परीक्षण में 10 किलोहर्ट्ज़ वाली ऊँची जाँच-आवाज़ के बाद प्रतिक्रिया दर्ज नहीं हुई। दर्ज की गई 165 प्रतिक्रियाओं में से 118, यानी 71.5 प्रतिशत, उस क्षेत्र में हुईं जिसे शोधकर्ता दूर का ध्वनि-क्षेत्र मानते हैं।
यहाँ प्रतिशत के हिसाब में एक अंतर पर ध्यान देना उपयोगी है। अध्ययन के प्रकाशित सारांश में 71.6 प्रतिशत का आँकड़ा दिया गया है और साथ में 209 परीक्षणों का उल्लेख है, लेकिन 209 कुल परीक्षणों की संख्या है, प्रतिक्रियाओं की नहीं। दूर के क्षेत्र में मिली 118 प्रतिक्रियाओं को कुल 165 प्रतिक्रियाओं से भाग देने पर लगभग 71.5 प्रतिशत आता है। इस हिसाब को ठीक करने से अध्ययन का बड़ा नतीजा नहीं बदलता, लेकिन प्रतिशत पढ़ते समय सही कुल संख्या का इस्तेमाल स्पष्ट हो जाता है।
तीनों आवाज़ों के लिए सबसे दूर की प्रतिक्रिया की दूरी अलग-अलग थी: एक आवाज़ के लिए 74.0 मीटर, दूसरी के लिए 66.1 मीटर और तीसरी के लिए 61.8 मीटर। इसलिए कहा जा सकता है कि प्रतिक्रिया कम-से-कम 61.8 मीटर, यानी लगभग 62 मीटर की दूरी से भी दर्ज हुई। आसपास के शोर से आवाज़ कितनी तेज़ होनी चाहिए थी, यह भी हर आवाज़ के लिए समान नहीं था। सबसे कम आवृत्ति वाली आवाज़ के लिए यह बढ़त लगभग 16 डेसीबल थी, जबकि सबसे अधिक आवृत्ति वाली आवाज़ के लिए लगभग 45 डेसीबल।
पास और दूर के ध्वनि-क्षेत्र का मतलब
पानी के भीतर आवाज़ उसी तरह नहीं फैलती, जैसा कमरे में रखे ध्वनि-विस्तारक की मिसाल से लग सकता है। पानी के भीतर की आवाज़ मापते समय वैज्ञानिक स्रोत के पास के क्षेत्र और उससे दूर के क्षेत्र में फर्क करते हैं। इस अध्ययन में इन दोनों क्षेत्रों के बीच की सीमा तय करने के लिए तरंगदैर्ध्य के 3 गुने का नियम अपनाया गया। तरंगदैर्ध्य आवाज़ की आवृत्ति पर निर्भर करता है: आवृत्ति जितनी कम होती है, तरंग उतनी लंबी और स्रोत के पास का क्षेत्र उतना बड़ा होता है।
पानी में ध्वनि की रफ़्तार लगभग 1500 मीटर प्रति सेकंड होती है। 100 हर्ट्ज़ की आवृत्ति पर इस रफ़्तार को आवृत्ति से भाग देने पर तरंगदैर्ध्य 15 मीटर निकलता है। तरंगदैर्ध्य के 3 गुने वाले नियम से इस आवाज़ का पास का क्षेत्र 45 मीटर तक फैलेगा। शोधकर्ताओं ने प्रयोग की तीन आवाज़ों के लिए पास के क्षेत्र की सीमा लगभग 45 मीटर, 22.5 मीटर और 11.3 मीटर आँकी। ये दूरियाँ क्रमशः सबसे कम, बीच की और सबसे अधिक आवृत्ति वाली आवाज़ों के लिए अनुमान थीं।
यह फर्क इसलिए अहम है कि शार्क के बारे में आम तौर पर माना जाता रहा है कि उनके पास हवा से भरा तैरने वाला थैला नहीं होता। कुछ दूसरी मछलियों में ऐसी बनावट दूर की आवाज़ के कुछ हिस्सों को पकड़ने में मदद कर सकती है। इसलिए लंबे समय तक यह धारणा रही कि शार्क मुख्य रूप से आवाज़ के स्रोत के पास ही उसकी प्रतिक्रिया देती हैं। लेकिन प्रयोग में दो आवाज़ों के लिए पास के क्षेत्र की अनुमानित सीमा से आगे भी शार्क मुड़ीं। इससे पुरानी धारणा की जाँच करने की ज़रूरत सामने आती है, हालाँकि यह नतीजा अपने आप यह नहीं बताता कि शार्क ने आवाज़ को किस इंद्रिय से महसूस किया।
आवाज़ पर शार्क की प्रतिक्रिया पहले भी देखी गई है
यह बात कई दशकों से जानी जाती है कि आवाज़ शार्क के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। 1963 में डोनाल्ड नेल्सन और सैमुअल ग्रुबर ने एक अध्ययन प्रकाशित किया था। उसमें बताया गया कि धीमी, धड़कन जैसी आवाज़ें मियामी की चट्टानी समुद्री दीवारों के पास बड़ी शार्क को आकर्षित कर सकती हैं। सबसे असरदार धड़कनें आम तौर पर 20 से 60 हर्ट्ज़ के बीच थीं। यह सीमा छटपटा रही मछली की आवाज़ जैसी हो सकती है। इससे ऊँची धड़कनों या लगातार सुनाई देने वाली धीमी आवाज़ों का असर वैसा नहीं था।
बाद के अध्ययनों से पता चला कि शार्क आवाज़ की ओर आएगी या उससे दूर जाएगी, यह उसकी तीव्रता और शार्क की उस समय की स्थिति पर निर्भर कर सकता है। 1978 में फ्लोरिडा जलडमरूमध्य और बहामास में किए गए अध्ययन में रेशमी शार्क आवाज़ के स्रोत के पास आईं। लेकिन आवाज़ का स्तर लगभग 20 डेसीबल बढ़ने पर वे तेज़ी से पीछे हट गईं, खासकर तब जब आवाज़ अचानक तेज़ हुई थी। बार-बार परीक्षण करने पर उनकी प्रतिक्रिया कमज़ोर पड़ने लगी। छोटी शार्क के पास ताज़ी कटी हुई मछलियाँ होने पर आवाज़ का असर भी घट गया। अगले साल नींबू शार्क पर किए गए अध्ययन में पीछे हटने के लिए पृष्ठभूमि शोर के मुकाबले कम-से-कम 18 डेसीबल की बढ़ोतरी ज़रूरी थी—यह जानकारी मौजूदा अध्ययन में पहले के शोध के सार के रूप में दी गई है।
इसलिए शार्क और आवाज़ के संबंध को इस आसान नियम में नहीं बाँधा जा सकता कि आवाज़ उन्हें हमेशा खींचती है या हमेशा भगाती है। धड़कनों की बनावट और उनकी तीव्रता के साथ-साथ शार्क की हालत और बार-बार आवाज़ सुनने का असर भी नतीजे पर पड़ सकता है। फ्लोरिडा का यह प्रयोग तेज़ प्रतिक्रिया पैदा करने वाली अप्रिय आवाज़ के असर को देखने के लिए बनाया गया था; इसका उद्देश्य शार्क को लोगों से दूर रखने का पक्का तरीका जाँचना नहीं था।
सबूत की सीमा और जिन बातों को नहीं मापा गया
प्रयोग से साफ़ तौर पर इतना पता चलता है कि धीमी आवाज़ें शुरू होने के बाद काली-पंख वाली शार्क ने दिशा बदली और आवाज़ के अध्ययन में इस्तेमाल की गई परिभाषा के अनुसार कुछ प्रतिक्रियाएँ दूर के क्षेत्र में हुईं। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि शार्क ने ध्वनि-विस्तारक की ठीक जगह पहचान ली थी। शोधकर्ताओं ने स्रोत से दूर मुड़ने को किसी दिशा में संकेत महसूस करने का सबूत माना। फिर भी, ऊपर से रिकॉर्ड किया गया वीडियो यह नहीं बता सकता कि शार्क स्रोत की जगह कितनी सटीकता से समझ पाई या उसने उसका अंदाज़ किस तरह लगाया।
अध्ययन में आवाज़ के साथ पानी के कणों की होने वाली हलचल नहीं मापी गई। इस हलचल का माप यह समझने में मदद कर सकता था कि शार्क ने असल में कौन-सा संकेत पकड़ा। शोधकर्ताओं ने कहा कि खुले समुद्र में काम करते हुए ऐसा माप लेना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए यह विचार कि शार्क पानी के कणों की गति के आधार पर प्रतिक्रिया कर रही थीं, अभी केवल एक संभावित व्याख्या है; माप के ज़रिए इसकी सीधे पुष्टि नहीं हुई है।
सबसे दूर की प्रतिक्रिया, 74.0 मीटर, को भी सावधानी से समझना चाहिए। ड्रोन का कैमरा असीमित बड़े क्षेत्र को नहीं देख रहा था: चित्र की सबसे लंबी दिशा में उसका दृश्य 75 से 94 मीटर तक फैला था। इसलिए 74 मीटर वीडियो में दिखाई दी सबसे दूर की प्रतिक्रिया है, शार्क की सुनने की अंतिम सीमा नहीं। संभव है कि कैमरे के दृश्य से बाहर भी कोई प्रतिक्रिया हुई हो; यह भी संभव है कि ऐसा न हुआ हो। प्रयोग इन दोनों संभावनाओं में फैसला नहीं करता।
सबसे कम आवृत्ति वाली आवाज़ का नतीजा बाकी दोनों आवाज़ों की तुलना में समझना अधिक पेचीदा है। इसी आवाज़ पर सबसे दूर की प्रतिक्रिया मिली, लेकिन इसकी तरंग लंबी होने के कारण इसका पास का क्षेत्र भी बड़ा था। अध्ययन की गणना के मुताबिक, इस आवाज़ की केवल 33.9 प्रतिशत प्रतिक्रियाएँ दूर के क्षेत्र में हुईं। दूसरी दो आवाज़ों के लिए यह हिस्सा क्रमशः 87.2 प्रतिशत और 96.6 प्रतिशत था। अध्ययन में प्रतिक्रियाओं की संख्या जोड़ने पर ये प्रतिशत लगभग 20, 41 और 57 प्रतिक्रियाओं के बराबर बैठते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि सबसे कम आवृत्ति वाली आवाज़ में 100 हर्ट्ज़ से नीचे की कुछ ऊर्जा भी थी। इससे उसकी तरंग लंबी हुई और गणना के अनुसार पास का क्षेत्र और फैल गया। फिर भी उनका मानना था कि 400 से 800 हर्ट्ज़ के बीच की ऊर्जा से जुड़ी प्रतिक्रियाओं को केवल पास के क्षेत्र के इस फैलाव से आसानी से नहीं समझाया जा सकता। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि सभी प्रतिक्रियाओं को दूर से आवाज़ महसूस करने के बराबर मज़बूत सबूत नहीं माना जा सकता।
क्या आवाज़ से शार्क को दूर रखने की दीवार बन सकती है?
यह प्रयोग इस सवाल का जवाब नहीं देता। इसमें शार्क की केवल एक प्रजाति, फ्लोरिडा के तट का केवल एक स्थान और आवाज़ चलाने की कुछ तय परिस्थितियाँ शामिल थीं। परीक्षण के दौरान शार्क का तुरंत मुड़ना यह नहीं बताता कि बार-बार आवाज़ सुनने पर भी असर बना रहेगा या वह तैरने की जगहों के पास आने से रुक जाएगी। 1978 के अध्ययन में रेशमी शार्क की प्रतिक्रिया बार-बार आवाज़ सुनने पर घट गई थी। इससे पता चलता है कि किसी आवाज़ की आदी होने से व्यवहार बदल सकता है।
2019 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स नाम की शोध-पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन भी सावधानी बरतने की वजह देता है। उसमें काली शार्क ने किलर व्हेल की आवाज़ें चलाने पर अपनी प्रतिक्रिया में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं दिखाया। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष था कि अकेली आवाज़ उन्हें रोकने का असरदार तरीका नहीं थी। इसका अर्थ यह नहीं कि हर आवाज़ बेअसर होती है। लेकिन काली-पंख वाली शार्क के इस प्रयोग में दिखी प्रतिक्रिया को लोगों की सुरक्षा के व्यावहारिक उपाय का पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता।
शार्क की सुनने की क्षमता का राज़ कहाँ हो सकता है?
फ्लोरिडा के शोधकर्ताओं ने भीतरी कान की एक बनावट को संभावित वजह के रूप में सुझाया है, जिसे मैक्युला नेगलेक्टा कहा जाता है। यह संवेदनशील बाल-जैसी कोशिकाओं वाला हिस्सा है और दूर की आवाज़ महसूस करने में भूमिका निभा सकता है। काली-पंख वाली शार्क के करीबी संबंधियों में दूसरी कुछ शार्क प्रजातियों की तुलना में ऐसी कोशिकाएँ अधिक पाई गई हैं। लेकिन प्रयोग में शामिल काली-पंख वाली शार्क में इन कोशिकाओं की गिनती अभी नहीं हुई है। इसलिए इन कोशिकाओं और दर्ज की गई प्रतिक्रिया के बीच का संबंध एक परिकल्पना है, जिसकी सीधे जाँच होना बाकी है।
काजिउरा के मुताबिक, अगला कदम यह समझना है कि शार्क की इंद्रियाँ दूर से आने वाले संकेतों को कैसे पकड़ती हैं और उनका अर्थ कैसे समझती हैं। सुलिवन ने अपना शोध स्नातकोत्तर अध्ययन के हिस्से के रूप में पूरा किया। उनका कहना है कि समुद्र में आवाज़ का अध्ययन अहम है, क्योंकि टैंकों में ध्वनि दीवारों से टकराकर लौटती है और कई दिशाओं से शार्क तक पहुँचती है। ऐसी लौटती आवाज़ें बंद जगह में प्रयोग के नतीजों को उलझा सकती हैं: वहाँ आवाज़ का माहौल सरल और अलग-अलग संकेतों से मुक्त होने के बजाय कई मिली-जुली आवाज़ों से भरा हो सकता है।
निष्कर्ष
समुद्र में नियंत्रित तरीके से किए गए इस प्रयोग में काली-पंख वाली शार्क ने धीमी, धड़कन जैसी आवाज़ों पर प्रतिक्रिया दी। वीडियो में सबसे दूर की प्रतिक्रिया 74.0 मीटर पर दिखी। कुल 209 परीक्षणों में 165 बार शार्क मुड़ीं और इनमें से 118 प्रतिक्रियाएँ शोधकर्ताओं की परिभाषा के अनुसार दूर के ध्वनि-क्षेत्र में हुईं। यह महत्वपूर्ण सबूत है कि कुछ शार्क दूर की आवाज़ पर प्रतिक्रिया कर सकती हैं। लेकिन इससे उनकी सुनने की अधिकतम दूरी तय नहीं होती, न यह साबित होता है कि वे आवाज़ का स्रोत ठीक-ठीक पहचानती हैं या उसे महसूस करने का तरीका क्या है। यह अध्ययन यह भी साबित नहीं करता कि ध्वनि-विस्तारक तैराकों की रक्षा कर सकते हैं। फिलहाल सबसे स्पष्ट बात यही है कि कुछ शार्क दूर की आवाज़ पर प्रतिक्रिया देती हैं; यह कैसे होता है और इस प्रतिक्रिया पर कितना भरोसा किया जा सकता है, यह अब भी खुला सवाल है।